Wednesday, February 28, 2018

चित्रकथा - 57: इस दशक के नवोदित नायक (भाग - 9)

अंक - 57

इस दशक के नवोदित नायक (भाग - 9)


"फ़टा पोस्टर निकला हीरो..."




’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! स्वागत है आप सभी का ’चित्रकथा’ स्तंभ में। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें हम लेकर आते हैं सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े विषय। श्रद्धांजलि, साक्षात्कार, समीक्षा, तथा सिनेमा के विभिन्न पहलुओं पर शोधालेखों से सुसज्जित इस साप्ताहिक स्तंभ की आज 57-वीं कड़ी है।

हर रोज़ देश के कोने कोने से न जाने कितने युवक युवतियाँ आँखों में सपने लिए माया नगरी मुंबई के रेल्वे स्टेशन पर उतरते हैं। फ़िल्मी दुनिया की चमक-दमक से प्रभावित होकर स्टार बनने का सपना लिए छोटे बड़े शहरों, कसबों और गाँवों से मुंबई की धरती पर क़दम रखते हैं। और फिर शुरु होता है संघर्ष। मेहनत, बुद्धि, प्रतिभा और क़िस्मत, इन सभी के सही मेल-जोल से इन लाखों युवक युवतियों में से कुछ गिने चुने लोग ही ग्लैमर की इस दुनिया में मुकाम बना पाते हैं। और कुछ फ़िल्मी घरानों से ताल्लुख रखते हैं जिनके लिए फ़िल्मों में क़दम रखना तो कुछ आसान होता है लेकिन आगे वही बढ़ता है जिसमें कुछ बात होती है। हर दशक की तरह वर्तमान दशक में भी ऐसे कई युवक फ़िल्मी दुनिया में क़दम जमाए हैं जिनमें से कुछ बेहद कामयाब हुए तो कुछ कामयाबी की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं। कुल मिला कर फ़िल्मी दुनिया में आने के बाद भी उनका संघर्ष जारी है यहाँ टिके रहने के लिए। ’चित्रकथा’ के अन्तर्गत पिछले कुछ समय से हम चला रहे हैं इस दशक के नवोदित नायकों पर केन्द्रित यह लघु श्रॄंखला जिसमें हम बातें करते हैं वर्तमान दशक में अपना करीअर शुरु करने वाले नायकों की। प्रस्तुत है ’इस दशक के नवोदित नायक’ श्रॄंखला की नौवीं कड़ी।





र्ष 2017 में ’इस दशक के नवोदित नायक’ नामक इस सीरीज़ के कुल आठ अंकों में हमने 90 से अधिक नायकों की बातें की हैं। यह कारवाँ 2018 में भी जारी है और तब तक जारी रहेगा जब तक कि हर नवोदित नायक का ज़िक्र हम कर ना लें। आज के इस अंक में सबसे पहले बातें चार ऐसे अभिनेताओं की जिनका नाम एक है - करण। टेलीविज़न की दुनिया का जाना पहचाना नाम है करण वाही जिनके हँसमुख स्वभाव और अच्छी मेज़बानी करने की वजह से वो घर घर में पसन्द किए जाते हैं। 9 जून 1986 को दिल्ली के एक पंजाबी परिवार में जन्में करण वाही ने अपनी स्कूली पढ़ाई St. Mark's Senior Secondary Public School से पूरी की, और उच्च शिक्षा भी दिल्ली में ही रह कर दिल्ली विश्वविद्यालय के अधीन IILM Institute से प्रबंधन में पूरी की। अपने स्कूल के दिनों में वो बहुत अच्छा क्रिकेट खेलने लगे थे जिस वजह से उन्हें अपना करीयर क्रिकेट में नज़र आने लगा था। वर्ष 2003 में 17 वर्ष की आयु में करण का निर्वाचन दिल्ली के Under-19 क्रिकेट टीम में हो गया। कहना आवश्यक है कि इसी सीलेक्शन में विराट कोहली और शिखर धवन जैसे आज के सफल खिलाड़ियों का भी चयन हुआ था। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि करण वाही भी किस स्तर के खिलाड़ी रहे होंगे। लेकिन क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर थी। एक बार खेल के दौरान करण को भयानक चोट लग गई, जिसकी वजह से उनका परिवार इस खेल के खिलाफ़ हो गए और करण को क्रिकेटर बनने का सपना छोड़ना पड़ा। उच्च-माध्यमिक की परीक्षा के बाद करण ने प्रबन्धन के एक कोर्स में भर्ती हो गए इस सोच के साथ कि इस कोर्स के बाद वो अपने पिता का हाथ बँटाएंगे उनके व्यवसाय में। लेकिन फिर एक बार क़िस्मत को कुछ और मंज़ूर थी। इंसान की क़िस्मत जहाँ लिखी हो, वो वहीं जा पहुँचता है। 2004 में करण ने अभिनय में अपना हाथ आज़माने के लिए "Rose Audio Visuals" की टेलीविज़न सीरीज़ ’Remix’ में रणवीर सिसोदिया का किरदार निभाया। यह किरदार एक "angry lover boy" का किरदार था जिसे करण इतनी ख़ूबसूरती और प्राकृतिक अंदाज़ से निभाया कि वो काफ़ी मशहूर हो गए थे युवा वर्ग में। उनके इस दमदार अदाकारी ने उन्हें उस वर्ष का Best Male Newcomer का Indian Telly Award भी दिलवाया। इस तरह के फ़िक्शन शोज़ के बाद वर्ष 2009 में करण वाही मुख्य नायक के रूप में नज़र आए धारावाहिक ’मेरे घर आयी एक नन्ही परी’ में। 2010 में उनका सर्वाधिक लोकप्रिय धारावाहिक शुरु हुआ ’दिल मिल गए’ जिसमें वो करण सिंह ग्रोवर के साथ काम किया। करण सिंह ग्रोवर की चर्चा हम अपने इस सीरीज़ में पहले ही कर चुके हैं। अत: करण वाही की बातें जारी रखते हुए यह बता दें कि 2011 में करण वाही का अगला धारावाहिक आया ’कुछ तो लोग कहेंगे’। इसमें उनके साथ मोहनीष बहल जैसे दिग्गज अभिनेता भी थे। 2012 में ’तेरी मेरी लव स्टोरीज़’ और इसके बाद ’कहानी हमारी... दिल दोस्ती दीवानेपन की’ में भी मुख्य नायक का किरदार निभाया। करण वाही रियलिटी शोज़ और अवार्ड फ़ंक्शनों के सफल मेज़बान माने जाते हैं। उनकी मेज़बानी में उनका सेन्स ऑफ़ ह्युमर चार चाँद लगा देते हैं। मेज़बानी के लिए भी उन्हें कई टेलीविज़न पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। 2011 में करण ने भ्रमण पर आधारित रियलिटी शो ’Jee Le Ye Pal’ में भाग लिया और इसके विजेता बने। इसी दौरान करण वाही का रुझान फ़िल्मों की तरफ़ झुकने लगा था। इसके लिए उन्हें अपने शरीर पर काम करने की आवश्यक्ता आन पड़ी। बहुत कम समय में करण ने कड़ी मेहनत से अपना शारीरिक गठन मज़बूत किया जिसका नतीजा उन्हें हाथोंहाथ मिला। मतलब यह कि 2013 में उन्हें UK की अख़बार Eastern Eye ने "Sexiest Asian Man on the Planet" की सूची में 46-वें स्थान पर बिठा दिया, जो उनके लिए सम्मान की बात थी। अब फ़िल्मकारों की भी नज़र उन पर पड़ने लगी, और 2014 में हबीब फ़ैसल की रोमांटिक कॉमेडी फ़िल्म ’दावत-ए-इश्क़’ में आदित्य रॉय कपूर और परिनीति चोपड़ा के साथ करण वाही को भी सह-अभिनेता के रूप में कास्ट किया गया। इस फ़िल्म में उनके द्वारा निभाये गए अमजद के किरदार को दर्शकों ने हाथों हाथ ग्रहण किया और उनकी काफ़ी प्रशंसा हुई। मुख्य नायक के रूप में 2014 में ही अमृतपाल सिंह बिंद्रा की फ़िल्म ’बब्बू की जवानी’ में उन्हें मौका मिला जिसमें उनकी नायिका थीं रिया चक्रवर्ती। यह फ़िल्म नहीं चली जिस वजह से करण एक फ़िल्मी नायक के रूप में स्थापित नहीं हो सके। 2018 में करण की एक महत्वपूर्ण फ़िल्म आने जा रही है ’हेट स्टोरी 4’ जिसमें वो नायक की भूमिका में नज़र आएंगे। इस सीरीज़ की पहले की तीन फ़िल्में काफ़ी चर्चित रहीं, इसलिए यह अनुमान लगाया जा रहा है कि इस फ़िल्म से करण वाही को प्रसिद्धी मिलने के आसार बहुत अधिक है। अब देखना यह है कि इस फ़िल्म में राजवीर की भूमिका को करण कितना सजीव कर पाते हैं।

करण वाही के बाद अब दूसरे नंबर पर बात करते हैं करण सिंह छाबरा की। चंडीगढ़ में जन्में और पले बढ़े करण सिंह छाबरा बचपन से ही बहुत स्मार्ट और जोशीले रहे हैं। स्कूल और कॉलेज में वो बहुत लोकप्रिय रहे और तमाम प्रतियोगिताओं में भाग लिया करते थे। आकर्षक चेहरे और सुडौल कदकाठी के धनी करण ने अपने कॉलेज में एक मॉडलिंग् प्रतियोगिता में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया जिसकी वजह से उनका इस क्षेत्र में गंभीरता से पाँव रखने की इच्छा हुई। ग्लैमर जगत में शोहरत हासिल करने की ख़्वाहिश लेकर करण चंडीगढ़ से दिल्ली आ गए और संघर्ष करने लगे। 2007 में सफलता की पहली सीढ़ी उन्होंने लांघी जब Super Model Hunt प्रतियोगिता में वो विजयी बन कर निकले। इससे फ़ैशन जगत के नामचीन लोग उन्हें जानने लगे और नतीजा यह हुआ कि उन्हें काम मिलने शुरु हो गए। कई नामी ब्रैण्ड्स के रैम्प शोज़ के ऑफ़र उन्हें मिले और हर बार अपना जल्वा उन्होंने रैम्प पर दिखा कर दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित किया। उनका नाम इसलिए भी मशहूर हुआ कि वो पहले ऐसे राष्ट्रीय स्तर के मॉडल थे जिन्होंने अपनी पगड़ी को अपने से अलग नहीं किया। इस वजह से पंजाब में उनका लोग बहुत सम्मान करते हैं। हाँ, यह ज़रूर सच है कि आगे चल कर उन्हें प्रतियोगिता के चलते पगड़ी और लम्बे बालों के साथ समझौता करना पड़ा। 2007 से लगभग सात साल तक मॉडलिंग् करने के बाद फ़िल्म जगत का दरवाज़ा उनके लिए खुला जब 2014 में उन्हें ’हीरोपन्ती’ में एक किरदार निभाने का मौका मिला। इसी फ़िल्म से टाइगर श्रॉफ़ का भी फ़िल्मी सफ़र शुरु हुआ था जिनकी चर्चा हम पहले ही इस सीरीज़ में कर चुके हैं। इस फ़िल्म के बाद करण सिंह छाबरा नज़र आए 2016 की फ़िल्म ’Chalk n Duster’ में जिसमें शबाना आज़मी और जुही चावला मुख्य किरदारों में थीं। इस फ़िल्म में उनके निभाये किरदार को सराहा गया। इसके बाद 2017 की फ़िल्म ’राब्ता’ में वो दिखे। फ़िल्म शुरु शुरु में चर्चा में रही लेकिन रिलीज़ के बाद ज़्यादा सफल सिद्ध नहीं हुई। इसी दौरान करण कुछ रियलिटी शोज़ में भी नज़र आए जैसे कि 'MTV Splitsvilla 9', 'MTV Love School' और 'Bindass Super Stud 2011'। जैसा कि नाम में सुपर स्टड है, करण सिंह छाबरा ने अपने आप को एक सुपर स्टड के रूप में ढाला और ’हर मर्द का दर्द’, ’ब्रह्मराक्षस’ और ’सबसे बड़ा कलाकार’ जैसे शोज़ में नज़र आए। इन दिनों करण चर्चे में हैं क्योंकि वो जून 2018 में प्रदर्शित होने वाली बड़ी फ़िल्म ’फ़न्ने ख़ान’ में काम कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि इस फ़िल्म में उनका एक power packed cameo रोल है। ’फ़न्ने ख़ान’ एक म्युज़िकल कॉमेडी फ़िल्म है जिसे अतुल मांजरेकर निर्देशित कर रहे हैं। अनिल कपूर, ऐश्वर्या राय बच्चन और राजकुमार राव जैसे सफल कलाकारों के बीच करण सिंह छाबरा अपनी छाप किस हद तक छोड़ पाएंगे यह तो 15 जून को फ़िल्म प्रदर्शित होने के बाद ही पता चल पाएगी। यह फ़िल्म वर्ष 2000 की ऑस्कर मनोनीत बेलजियन फ़िल्म ’Everybody's Famous’ का आधिकारिक रीमेक है, इस वजह से इस फ़िल्म से काफ़ी उम्मीदें लगाई जा रही हैं और इस फ़िल्म की सफलता पर कुछ हद तक करण की सफलता भी जुड़ी होंगी। हक़ीक़त वक़्त ही बयाँ करेगी।

करण कापड़िया अभिनेत्री व डिज़ाइनर सिम्पल कापड़िया (डिम्पल कापड़िया की छोटी बहन) के सुपुत्र हैं। यानी ट्विंकल खन्ना के मौसेरे भाई और अक्षय कुमार के साले साहब। फ़िल्मी परिवार से ताल्लुख़ रखने की वजह से और एक आकर्षक कदकाठी व सुन्दर चेहरे के धनी करण कापड़िया को फ़िल्म जगत में एन्ट्री आसानी से ही मिल गई। ऊपर से बचपन से ही फ़िल्म निर्माण को बहुत क़रीब से देखने की वजह से उन्हें सहायक के रूप में काम भी बड़ी आसानी से मिल गया। राहुल ढोलकिया जब ’सोसायटी काम से गई’ बना रहे थे, तब करण ने उसमें उनके सहायक के रूप में काम किया और फ़िल्म निर्माण की बारीकियाँ सीखी। उनका अभिनय सफ़र ’अज़हर’ फ़िल्म से शुरु होना था, लेकिन किसी कारण से हो ना सका। ’अज़हर’ के निर्देशक टोनी ड’सूज़ा ने अपना वादा पूरा करते हुए अपनी अगली फ़िल्म में उन्हें लौंच करने का निर्णय लिया है। यह फ़िल्म 2018 में बन कर तैयार होगी जिसका अभी तक नामकरण नहीं हुआ है। करण कापड़िया को भले एक सहायक के रूप में काम मिल गया हो लेकिन अभिनय के लिए उन्हें भी कई ऑडिशनों का सामना करना पड़ा और बहुत बार उन्हें रिजेक्ट भी किया गया यह कहते हुए कि उनमें कोई ख़ास बात नज़र नहीं आ रही। उन्होंने अपने अभिनय पर मेहनत की और बाद में उन्हें अच्छी प्रतिक्रियाएँ मिलनी शुरु हुईं। टोनी ड’सूज़ा ने निश्चित रूप से मीडिया को बताया है कि उनकी अगली फ़िल्म में करण ही नायक बनेंगे और दर्शकों एक नया स्टार मिलने वाला है। टोनी ने करण पर जो भरोसा दिखाया है, करण को इस खरा उतरने के लिए काफ़ी मेहनत करनी पड़ेगी जिसमें कोई संदेह नहीं है। उधर करण का ट्विंकल खन्ना और अक्षय कुमार के साथ भी बहुत अच्छी दोस्ती है; करण ने एक साक्षात्कार में बताया है कि उन दोनों को भी उनसे बहुत सारी उम्मीदें हैं। बताया जाता है कि फ़िल्म जगत में उतरने से पहले करण का वज़न 112 किलो था, लेकिन नियमित रूप से कसरत कर के अपनी वज़न को 88 किलो तक लाने में कामयाब हुए हैं। इसके अलावा तैराकी और घुड़सवारी में भी प्रशिक्षित हो कर अपने आप को एक नायक बनने के क़ाबिल बनाया है। अक्षय कुमार के नक्श-ए-क़दम पर चलते हुए करण ने भी बैंकाक का रुख़ किया और वहाँ से छह महीने मार्शल आर्ट सीखा। Jeff Goldberg Studio से अभिनय का कोर्स भी किया। दूसरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि नवोदित नायक करण कापड़िया ने अपने आप को हर संभव तरीके से संवारा है, तैयार किया है। उधर अक्षय कुमार का टोनी डी’सूज़ा के साथ बहुत अच्छा संबंध है; दोनों ने ’ब्लू’ और ’बॉस’ जैसी फ़िल्मों में साथ काम किया है। ’बॉस’ फ़िल्म में करण ने टोनी को असिस्ट किया था जिस वजह से टोनी को उनमें एक नायक बनने के गुण दिखाई दिए। अपनी माँ सिम्पल कापड़िया के 2009 में निधन हो जाने के बाद करण पनी मासी डिम्पल कापड़िया को ही अपनी दूसरी माँ मानते हैं। करण कापड़िया को एक उज्वल भविष्य के लिए हम देते हैं ढेरों शुभकामनाएँ!

पुष्पेन्दर कुमार वोहरा के किरदार में 2017 की फ़िल्म ’भंवरे’ से फ़िल्म जगत में क़दम रखने वाले करहन देव टेलीविज़न का एक जानामाना नाम रहे हैं। हाँ, यह ज़रूर है कि टेलीविज़न पर वो करहन देव के नाम से नहीं, बल्कि करण ठाकुर के नाम से जाने गए, पहचाने गए। टीवी पर करण एक अभिनेता और एक मेज़बान, दोनों भूमिकाओं में नज़र आए। ’भाग्यविधाता’, ’बड़ी दूर से आए हैं;, ’सावधान इण्डिया’, ’CID', 'Crime Patrol' और 'Haunted Nights' जैसे शोज़ में वो देखे गए, सराहे गए। कई नामचीन ब्रैण्ड्स के विज्ञापनों में भी करण ठाकुर नज़र आए। करण ठाकुर का जन्म मुंबई में ही हुआ था, लेकिन उनके जन्म के कुछ ही समय के भीतर उनका परिवार दिल्ली स्थानान्तरित हो गया। इस वजह से करण की शिक्षा-दीक्षा दिल्ली में हुई। दिल्ली के थिएटर जगत से करण छुटपन से ही जुड़ गए और नाटकों, ड्रामाओं और अन्य कई कलात्मक क्षेत्रों में निरन्तर भाग लेते रहे। इस वजह से अभिनय के क्षेत्र में उनका आधार बहुत मज़बूत हो गया था और आगे चल कर इस क्षेत्र में गंभीरता से क़दम रखने में ज़्यादा असुविधा नहीं हुई। मुंबई में रहते उनकी स्कूली शिक्षा स्वामी विवेकानन्द स्कूल से शुरु हुई जो दिल्ली जाकर युवाशक्ति स्कूल से पूरी हुई। उच्च-माध्यमिक उत्तीर्ण करने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरु कॉलेज से करण ने बी.ए. की पढ़ाई की और स्नातक बने। यहीं पे आकर उनकी पढ़ाई का सिलसिला ख़त्म नहीं हुआ। नई दिल्ली के भारतीय विद्या भवन से ’रेडियो ऐण्ड टेलीविज़न जर्नलिज़्म’ में पोस्ट ग्रजुएशन डिप्लोमा तथा हिसार, हरियाणा के गुरु जम्बेश्वर विश्वविद्यालय से मास कमुनिकेशन में मास्टर्स (स्नातकोत्तर) किया। इस तरह से पूरी पढ़ाई अच्छी तरह से सम्पन्न होने के बाद ही करण देव व्यावसायिक रूप से अभिनेता बने। पहली ब आर टेलीविज़न के परदे पर वो नज़र आए ’ससुराल गेंदा फूल’ धारावाहिक में एक अतिथि कलाकार के रूप में। लेकिन जल्दी ही ’भाग्यविधाता’, ’बड़ी दूर से आए हैं;, ’सावधान इण्डिया’, ’CID', 'Crime Patrol' और 'Haunted Nights' में उन्होंने काम किया और लोग उन्हें पहचानने लगे। ’ना बोले तुम ना मैंने कुछ कहा’ में उन्होंने नेगेटिव रोल निभाया और उसके बाद ’वो तेरी भाभी है पगले’ में हास्य किरदार में नज़र आए। करण अपने स्कूल के दिनों से ही ऐंकरिंग् किया करते थे। स्कूल और कॉलेज के फ़ंक्शनों में उन्हें ऐंकरिंग् का भार दिया जाता था। इसलिए टेलीविज़न में भी उन्हें मेज़बानी के कई अवसर प्राप्त हुए जिनमें ’रेडियो मिर्ची म्युज़िक अवार्ड्स’ फ़ंक्शन सर्वोपरि है। 2010 से टीवी का सफ़र शुरु करने के बावजूद फ़िल्मों में क़दम रखने के लिए उन्हें पूरे सात साल का इन्तज़ार करना पड़ा। 2017 में लेखक, निर्माता, निर्देशक और अभिनेता शौर्य सिंह जब ’भंवरे’ की कहानी पर काम कर रहे थे, जो तीन दोस्तों की कहानी थी, तभी उन्होंने यह निर्णय लिया था कि इन तीन दोस्तों के किरदारों में कौन कौन होंगे। एक तो वो ख़ुद ही हैं, दूसरे हैं जशन सिंह और तीसरे करहन देव। डार्क कॉमेडी पर आधारित यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर जम नहीं पाई, लेकिन युवाओं में फ़िल्म चर्चित रही। इस फ़िल्म में करहन देव के अभिनय की भी प्रशंसा हुई। अभी तो उनका फ़िल्मी सफ़र बस शुरु ही हुआ है। उनके अभिनय क्षमता को देख कर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि भविष्य में वो अपने अनोखे अभिनय से कई फ़िल्मों को संवारेंगे, और क्रिटिकल अक्लेम के साथ साथ कमर्शियली भी उनके फ़िल्म कामयाब होंगे।

Hasan & Himansh
चार करण के बाद अब आगे बढ़ते हैं हसन ज़ैदी के साथ। उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में जन्में हसन ज़ैदी लखनऊ के पास हरदोई से ताल्लुख़ रखते हैं। ओमान की राजधानी मसकट में भी अपनी शुरुआती ज़िन्दगी का लम्बा सफ़र तय किया हसन ने। साइप्रस के Eastern Mediterranean University से Bachelor of Tourism and Hospitality Management की पढ़ाई पास करने के बाद उन्होंने माया नगरी मुंबई में अपना करीअर बनाने का निर्णय लिया। यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि हसन के वालिद अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर हैं और उर्दू के जानेमाने शायर, और उनकी वालिदा हिन्दी शिक्षिका रही हैं। इस तरह से हसन ज़ैदी के अन्दर संस्कृति के अंकुर छुटपन से ही फूट पड़े थे। स्कूल के ड्रामा सोसायटी में हसन सक्रीय भूमिका निभाया करते और बहुत लोकप्रिय बन चुके थे। हसन ज़ैदी ने मुंबई में अपनी शुरुआत की टेलीविज़न धारावाहिकों के माध्यम से। उनके अभिनय से सजे उल्लेखनीय धारावाहिक रहे ’हमने ली है शपथ’, खोटे सिक्के’, ’रिश्ता.कॉम’, ’कुमकुम’, ’सबकी लाडली बेबो’, ’सुन यार चिल मार’, ’एक लड़की अनजानी सी’, ’नाम गुम जाएगा’, ’हमसे है ज़माना’, ’क्योंकि सास भी कभी बहू थी’, ’तुम साथ हो जब अपने’ प्रमुख। विक्रम भट्ट की नज़र उन पर पड़ने में ज़्यादा देर नहीं लगी और 2013 की उनकी फ़िल्म ’Horror Story’ में हसन को कास्ट किया गया। इस फ़िल्म में उनके साथ करण कुन्द्रा, निशान्त मलकानी और रविश देसाई भी थे।करण और निशान्त की चर्चा हम इस सीरीज़ में कर चुके हैं, रविश की बातें हम आगे करेंगे। ख़ैर, ’Horror Story’ की कहानी कुछ ऐसी थी कि सात युवक-युवतियाँ एक बार एक बहिष्कृत होटल में एक रात बिताने की सोचते हैं। किसी भी हॉरर फ़िल्म में अभिनय करने के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण बात होती है एक अभिनेता के लिए, वह है एक्सप्रेशन। बताने की ज़रूरत नहीं कि हसन ज़ैदी ने कमाल का अभिनय किया है इस फ़िल्म में। आयुष राणा निर्देशित इस फ़िल्म से हसन का बॉलीवूड में प्रवेश हुआ और फिर इसके बाद वो कई और फ़िल्मों में नज़र आए - 2014 में ’डिश्कियाऊँ’ और 2017 में ’सरग़ोशियाँ’। कश्मीरी पार्श्व पर बनी ’सरग़ोशियाँ’ में आर्यन रैना के किरदार में हसन ज़ैदी को काफ़ी सराहन मिली थी। इसी साल उन्होंने ’For Bindiya Call Jugnu’ में भी अभिनय किया। इन सभी फ़िल्मों में हसन ज़ैदी मुख्य नायक के रोल में नज़र नहीं आए। लेकिन बहुत जल्द फ़िल्म ’कभी कभी’ आने जा रही है जिसमें हसन ज़ैदी मुख्य किरदार में नज़र आएंगे। एक और अभिनेता जो इन दिनों चर्चा में हैं, ये हैं हिमांश कोहली। टीवी धारावाहिक ’हमसे है लाइफ़’ के लोकप्रिय राघव ओबेरोय की भूमिका में हिमांश कोहली घर घर में जाने गए। 3 नवंबर 1989 को दिल्ली में जन्में हिमांश ने K. R. Mangalam World School से पढ़ाई सम्पन्न की Mass Media में स्नातक की। बचपन से ही हिमांश राजेश खन्ना से बहुत ज़्यादा मुतासिर थे। उनके मैनरिज़्म्स, उनके बोलने का अंदाज़, आँखों से बात करने का हुनर, ये सब हिमांश ग़ौर से महसूस किया करते थे और उनका कहना है कि अपने अभिनय में भी वो राजेश खन्ना को ही अपना गुरु मानते आए हैं। वैसे हिमांश ने अपना सफ़र एक RJ के रूप में 2011 में दिल्ली के Radio Mirchi में शुरु की थी। उसी साल ’हमसे है लाइफ़’ में उन्हें मौका मिल गया और 2012 तक इसमें काम करने के बाद फ़िल्म का ऑफ़र मिलते ही टेलीविज़न छोड़ दिया। 2012 में निर्देशन दिव्य कुमार आज के दौर के युवाओं को लेकर एक फ़िल्म बना रहे थे ’यारियाँ’। इसमें लक्ष्य के किरदार के लिए उन्होंने हिमांश को चुना। यह किरदार फ़िल्म के मुख्य किरदारों में से एक था। 2014 में जब यह फ़िल्म बन कर प्रदर्शित हुई तो बहुत हिट हुई और हिमांश युवावर्ग में हिट हो गए। ’यारियाँ’ की सफलता के चलते हिमांश को अगले ही साल ’अभी नहीं तो कभी नहीं’ में मुख्य नायक का रोल मिल गया। यह फ़िल्म 2016 में रिलीज़ हुई थी। 2017 में हिमांश कई फ़िल्मों में नज़र आए जैसे कि ’जीना इसी का नाम है’, ’स्वीटी वेड्स NRI', 'रांची डायरीज़’, और ’दिल जो ना कह सका’। दुर्भाग्यवश इनमें से एक भी फ़िल्म चली नहीं और हिमांश को ’यारियाँ’ के बाद जिस सफलता की तलाश थी, वह उनसे दूर दूर ही भारती रही। करण जोहर की 2018 की महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’Student of the Year 2’ में हिमांश को कास्ट किया गया है जो अपने आप में उनके लिए एक सम्मान की बात है। जिस तरह से ’’Student of the Year’ से वरुण धवन और सिद्धार्थ मल्होत्रा की गाड़ी चल पड़ी थी, देखना यह है कि क्या ’Student of the Year 2’ में हिमांश की भी क़िस्मत चमकेगी? इस फ़िल्म में टाइगर श्रॉफ़ मुख्य नायक रहेंगे। 

यहाँ आकर समाप्त होती है ’इस दशक के नवोदित नायक’ श्रृंखला की नौवीं कड़ी। अगली बार फिर कुछ और नए अभिनेताओं की बातें लेकर हाज़िर होंगे। बने रहिए ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के ’चित्रकथा’ के साथ।




आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, February 25, 2018

राग चन्द्रकौंस : SWARGOSHTHI – 358 : RAG CHANDRAKAUNS




स्वरगोष्ठी – 358 में आज


पाँच स्वर के राग – 6 : “सन सनन सनन जा री ओ पवन…”


प्रभा अत्रे से राग चन्द्रकौंस की बन्दिश और लता मंगेशकर से फिल्म का गीत सुनिए




डॉ. प्रभा अत्रे
लता मंगेशकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पाँच स्वर के राग” की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनमें केवल पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में रागों के गायन अथवा वादन की प्राचीन परम्परा है। संगीत के सिद्धान्तों के अनुसार राग की रचना स्वरों पर आधारित होती है। विद्वानों ने बाईस श्रुतियों में से सात शुद्ध अथवा प्राकृत स्वर, चार कोमल स्वर और एक तीव्र स्वर; अर्थात कुल बारह स्वरो में से कुछ स्वरों को संयोजित कर रागों की रचना की है। सात शुद्ध स्वर हैं; षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। इन स्वरों में से षडज और पंचम अचल स्वर माने जाते हैं। शेष में से ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वरों के शुद्ध स्वर की श्रुति से नीचे की श्रुति पर कोमल स्वर का स्थान होता है। इसी प्रकार शुद्ध मध्यम से ऊपर की श्रुति पर तीव्र मध्यम स्वर का स्थान होता है। संगीत के इन्हीं सात स्वरों के संयोजन से रागों का आकार ग्रहण होता है। किसी राग की रचना के लिए कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वर की आवश्यकता होती है। जिन रागों में केवल पाँच स्वर का प्रयोग होता है, उन्हें औड़व जाति, जिन रागों में छः स्वर होते हैं उन्हें षाडव जाति और जिनमें सातो स्वर प्रयोग हों उन्हें सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। रागों की जातियों का वर्गीकरण राग के आरोह और अवरोह में लगने वाले स्वरों की संख्या के अनुसार कुल नौ जातियों में किया जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। ऐसे रागों को औड़व-औड़व जाति का राग कहा जाता है। श्रृंखला की छठी कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग चन्द्रकौंस का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात गायिका विदुषी प्रभा अत्रे के स्वरों में राग चन्द्रकौंस की एक बन्दिश के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। राग चन्द्रकौंस के स्वरों का फिल्मी गीतों में बहुत कम उपयोग किया गया है। राग चन्द्रकौंस के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1961 में प्रदर्शित फिल्म “सम्पूर्ण रामायण” से वसन्त देसाई का स्वरबद्ध किया एक गीत –“सन सनन सनन जा री ओ पवन…”, लता मंगेशकर के स्वर में सुनवा रहे हैं।



आज का राग “चन्द्रकौंस” है। इस राग में हम आपको दो रचनाएँ सुनवाएँगे। सबसे पहले आप 1961 में प्रदर्शित “सम्पूर्ण रामायण” फिल्म से राग चन्द्रकौंस पर आधारित एक मोहक गीत सुनेंगे। गीतकार भरत व्यास का लिखा और संगीतकार वसन्त देसाई का स्वरबद्ध किया यह गीत है। फिल्मी गीतों में रागों का प्रयोग और इस मामले में कभी भी समझौता न करने में संगीतकर वसन्त देसाई अग्रणी थे। फिल्म संगीत की बदलती प्रवृत्तियों के बावजूद उन्होने अपने शुरुआती दौर से लेकर वर्ष 1975 तक अपनी अन्तिम फिल्म “शक” तक अपने संगीत में रागों का साथ नहीं छोड़ा। इस प्रतिबद्धता के कारण लोकप्रियता को एक कसौटी के र्रोप में बहुत महत्वपूर्ण नहीं समझा गया और यही कारण है कि उनके लोकप्रिय गीतों की संख्या बहुत अधिक नहीं है। आज का गीत लता मंगेशकर का गाया हुआ है। परन्तु वसन्त देसाई कभी भी लता मंगेशकर पर आश्रित नहीं थे। लता मंगेशकर के बिना भी उनके राग आधारित संगीत के बल पर आठवें दशक की फिल्म “गुड्डी” का गीत –“बोले रे पपीहरा...” वाणी जयराम के स्वर में अत्यन्त लोकप्रिय हुआ था। ऐसे ही सिद्धान्तवादी, स्वाभिमानी और आत्मविश्वास से परिपूर्ण संगीतकार वसन्त देसाई द्वारा स्वरबद्ध राग चन्द्रकौंस पर आधारित गीत –“सन सनन सनन जा री ओ पवन...” लता मंगेशकर के स्वर में सुनिए।

राग चन्द्रकौंस : “सन सनन सनन जा री ओ पवन...” : लता मंगेशकर : फिल्म – सम्पूर्ण रामायण



रे प वर्जित, कोमल ग नि, औड़व कर विस्तार,
म स वादी-संवादी सों, चन्द्रकौंस तैयार।
राग चन्द्रकौंस को भैरवी थाट का जन्य राग माना जाता है। इस राग में गान्धार और धैवत स्वर कोमल लगाए जाते हैं। ऋषभ और पंचम स्वर पूर्णतः वर्जित होता है। केवल पाँच स्वर का राग होने से इस राग की जाति औड़व-औड़व होती है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग चन्द्रकौंस का गायन-वादन मध्यरात्रि के समय सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। राग मधुवन्ती की तरह यह भी आधुनिक राग है जिसकी रचना राग मालकौंस के कोमल निषाद को शुद्ध निषाद में परिवर्तित करने से हुई है। यह राग भैरवी थाट के अन्तर्गत माना जाता है, किन्तु सत्य तो यह है की राग चन्द्रकौंस पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा प्रवर्तित दस थाट में से किसी भी थाट के अन्तर्गत नहीं आता। उच्चस्तर के कई राग हैं, जैसे अहीर भैरव, आनन्द भैरव, मधुवन्ती, चन्द्रकौंस आदि, जो दस थाट में से किसी भी थाट के अन्तर्गत नहीं आते। राग चन्द्रकौंस तीनों सप्तकों में समान रूप से प्रयोग किया जाता है और तीनों सप्तकों में खिलता है। इस राग में विलम्बित व द्रुत खयाल, तराना आदि गाया जाता है, किन्तु ठुमरी नहीं गायी जाती। इस राग को गाते-बजाते समय बीच-बीच में शुद्ध निषाद प्रयोग करने की आवश्यकता होती है, इससे एक ओर राग चन्द्रकौंस के स्वरूप की स्थापना होती है तो दूसरी ओर राग मालकौंस से बचाव भी होता रहता है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, विदुषी प्रभा अत्रे के स्वर में भक्तिरस से परिपूर्ण एक खयाल रचना। यह रचना एकताल में निबद्ध है। आप इस खयाल रचना का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग चन्द्रकौंस : “सगुण स्वरूप नन्दलाल...” : डॉ. प्रभा अत्रे


संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 358वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 360वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 3 मार्च, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 360वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 356वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1966 में प्रदर्शित फिल्म “दिल दिया दर्द लिया” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – वृन्दावनी सारंग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल व कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – आशा भोसले और मुहम्मद रफी

“स्वरगोष्ठी” की पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” की छठी कड़ी में आपने राग चन्द्रकौंस का परिचय प्राप्त किया। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने लिए विदुषी डॉ. प्रभा अत्रे के स्वर में राग चन्द्रकौंस के एक द्रुत खयाल का रसास्वादन किया था। साथ ही आपने फिल्म “सम्पूर्ण रामायण” से राग चन्द्रकौंस के स्वरों में पिरोया एक मधुर गीत लता मंगेशकर के स्वर में सुना। पिछले अंक में संगीतकार चाँद परदेशी का चित्र हम सबके लिए उपलब्ध कराने वाले पाठक बीकानेर, राजस्थान के लक्ष्मीनारायण सोनी अब हमारे नियमित पाठक बन गए हैं। हमें विश्वास है कि श्री सोनी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक में पाँच स्वर के एक अन्य राग पर आपसे चर्चा करेंगे। इस नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Tuesday, February 20, 2018

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की लघुकथा 'दो घड़े'

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में उन्हीं की कहानी मैजस्टिक मूँछें का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं सूर्यकांत त्रिपाठी 'निरालाकी "दो घड़े", जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 11 सेकण्ड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

निराला की कहानी दो-घड़े का गद्य हिंदी समय पर उपलब्ध है। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानी, उपन्यास, नाटक, धारावाहिक, प्रहसन, झलकी, एकांकी, या लघुकथा को स्वर देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्म वसंत पंचमी, 1896 को मेदिनीपुर (पश्चिम बंगाल) में हुआ था। उनका रचनाकर्म गीत, कविता, कहानी, उपन्यास, अनुवाद, निबंध आदि विधाओं में प्रकाशित हुआ। उनका देहांत 15 अक्टूबर 1961 को इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ।

हर सप्ताह यहीं पर सुनिए एक नयी कहानी

"नदी में बाढ़ आ गई, बहाव में दोनों घड़े बहते चले।"
(सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की "दो घड़े" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
दो घड़े mp3

#Fifth Story: Do Ghade; Author: Suryakant Tripathi Nirala; Voice: Anurag Sharma; Hindi Audio Book/2018/5.

Monday, February 19, 2018

चित्रकथा - 56: फ़िल्मों में फ़ैज़

अंक - 56

फ़िल्मों में फ़ैज़


"ये वो सहर तो नहीं..."




’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! स्वागत है आप सभी का ’चित्रकथा’ स्तंभ में। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें हम लेकर आते हैं सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े विषय। श्रद्धांजलि, साक्षात्कार, समीक्षा, तथा सिनेमा के विभिन्न पहलुओं पर शोधालेखों से सुसज्जित इस साप्ताहिक स्तंभ की आज 54-वीं कड़ी है।

13 फ़रवरी को उर्दू के मशहूर शायर और लेखक फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की 108-वीं जन्म-जयन्ती दुनिया भर में मनायी गई। बामपंथी विचारधारा रखने वाले फ़ैज़ को अपने उसूलों के लिए जेल भी जाना पड़ा और अपने वतन से आत्मनिर्वासित भी हुए। मार्क्सवादी फ़ैज़ को 1962 में सोवियत संघ ने ’लेनिन शान्ति पुरस्कार’ से सम्मानित किया। साहित्य में उनके अमूल्य योगदान के लिए पाक़िस्तान सरकार ने 1990 में उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान ’निशान-ए-इम्तियाज़’ से सम्मानित किया। फ़ैज़ की ग़ज़लों और कविताओं को कई बार फ़िल्मों में भी जगह मिली है। आइए आज ’चिरकथा’ में हम नज़र डालें उन फ़िल्मों पर जिनमें मौजूद है फ़ैज़ की शायरी और उनकी कविताएँ।






फ़ैज़ का जन्म 1911 में हुआ था। फ़िल्मों में उनके योगदान की बात करें तो 35 साल की उम्र में उन्होंने इस ओर रुख़ किया और 1947 में पहली बार किसी फ़िल्म में उनकी रचना सुनाई दी। बम्बई में निर्मित यह फ़िल्म थी ’रोमियो ऐण्ड जुलियट’। हुस्नलाल-भगतराम के संगीत में फ़ैज़ की लिखी कविता "दोनों जहाँ तेरी मोहब्बत में हार के" को गाया ज़ोहरा अम्बालेवाली और शर्माजी ने। ये शर्माजी और कोई नहीं बल्कि हमारे संगीतकार ख़य्याम साहब हैं जो उन दिनों साम्प्रदायिक अस्थिरता के चलते अपना नाम बदल लिया था। रोमियो-जुलियट की मोहब्बत को किस ख़ूबसूरती से फ़ैज़ ने इस गीत में उभारा है, ज़रा पढिये - "मैं तेरी मूरत बस निहार के, दोनों जहाँ में तेरी मोहब्बत में हार के, रोता जा रहा है कोई, सद-ए-ग़म गुज़ार के। विरह, मयकदा, ख़ुमार, सावन उदास है, तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के। एक फ़ुर्सत-ए-निगाह मिली, वो भी चार दिन, देखें है हमने खाकले प्रवरदिगार के।" कुछ लोगों का ख़याल है कि इस ग़ज़ल में ख़य्याम की नहीं बल्कि जी. एम. दुर्रानी की आवाज़ है, लेकिन ख़य्याम साहब ने एक साक्षात्कार में बताया है कि यह उन्हीं का गाया हुआ है। अविभाजित भारत के पंजाब में जन्में फ़ैज़ ने ब्रिटिश इंडियन आर्मी में नौकरी की और मेडल भी जीते। 1947 में भारत को आज़ादी मिली और फ़ैज़ हो गए सरहद के उस पार। पाक़िस्तान में वो The Pakistan Times के सम्पादक के पद पर कार्य किया और कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रीय सदस्य रहे। 1951 में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया लिआक़त सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के जुर्म में, और उन्हें जेल में डाल दिया गया।

चार साल जेल में क़ैद रहने के बाद जब वो बाहर निकले, तब तक वो बहुत ज़्यादा मशहूर हो चुके थे। जब वो जेल से रिहा हुए तब वो एक नायक बन चुके थे। उन्ही दिनों मशहूर फ़िल्मकार ए. आर. कारदार के पुत्र ए. जे. कारदार ने उन्हें अपनी एक फ़िल्म के लिए स्क्रिप्ट लिखने का न्योता दिया। फ़ैज़ ने अपनी पसन्दीदा उपन्यास ’The Boatman of the Padma’ (माणिक बन्दोपाध्याय की क्लासिक उपन्यास ’पद्मा नदीर मांझी का अंग्रेज़ी अनुवाद) को चुना और बंगाल के मछुआरों के जीवन पर आधारित इस उपन्यास पर स्क्रिप्ट लिखी। फ़िल्म के निर्देशन में भी फ़ैज़ ने सक्रीय भूमिका अदा की। ’जागो हुआ सवेरा’ शीर्षक से इस फ़िल्म का निर्माण 1959 में पूरा हुआ और फ़िल्म प्रदर्शित हुई। बॉक्स ऑफ़िस में फ़िल्म ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया लेकिन कई अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म उत्सवों में इस फ़िल्म ने वाहवाही लूटी। इससे पहले भी फ़ैज़ की एक कविता पर फ़िल्म बनाने की कोशिश हुई थी। ’हम तो तरीक राहों में मारे गए’ नामक कविता (जो अमरीकी दम्पति जुलियस और इथेल रोज़ेनबर्ग के जीवन पर आधारित है) पर यह फ़िल्म बननी थी पर अन्तत: नहीं बन पायी। बाद के सालों में भी फ़ैज़ ने कई बार फ़िल्में बनाने की योजना बनाई लेकिन हर बार किसी ना किसी वजह से फ़िल्म नहीं बन सकी। उनकी एकमात्र अंग्रेज़ी कविता ‘The Unicorn and the Dancing Girl’ पर आधारित एक वृत्तचित्र बनाई गई जिसमें मोहेंजोदारो के अवशेषों से बरामद दो कलाकृतियों की बातें हैं। यह फ़िल्म 1963 में UNESCO के तत्वावधान में बनी थी और इसमें मानव सभ्यता की यात्रा का वर्णन है। फ़ैज़ ने फ़िल्म निर्माण को एक कला समझा, और उन्हें यह बात बहुत चुभती थी कि सभी रचनात्मक क्रियाओं को "कला" लेकिन फ़िल्म को "इंडस्ट्री" कहा जाता है। ये तमाम बातें हमें प्राप्त हुईं फ़ैज़ की जीवनी Love and Revolution: Faiz Ahmed Faiz – The Authorised Biography से जिसे लिखा अली मदीह हाशमी ने।

अब ज़िक्र फ़ैज़ के लिखे गीत और ग़ज़लों की जिन्हें हमने सुने हमारी फ़िल्मों में। 1962 की पाक्सितानी फ़िल्म ’क़ैदी’ में मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ ने गाया फ़ैज़ का मशहूर कलाम "मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग"। इसे स्वरबद्ध किया था संगीतकार राशिद आत्रे ने। 1953-54 के आसपास नूरजहाँ और उनके पति शौकर हुसैन रिज़्वी के बीच वैवाहिक तनावों के चलते दोनों के बीच तलाक़ हो गया, और 1959 में नूरजहाँ ने फ़िल्म अभिनेता एजाज़ दुर्रानी से शादी कर ली। दुर्रानी के दवाबों के चलते नूरजहाँ को अभिनय छोड़ना पड़ा और उनके अभिनय-गायन से सजी अन्तिम फ़िल्म 1961 में आयी ’मिर्ज़ा ग़ालिब’। इसके बाद सिर्फ़ गायन का सफ़र जारी रखते हुए 1962 में ’क़ैदी’ में फ़ैज़ के इस ग़ज़ल को गा कर वो फिर एक बार शोहरत की बुलंदी पर पहुँच गईं। इस नज़्म के बनने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। जिस दिन फ़ैज़ को जेल से रिहा किया जा रहा था, उस दिन नूरजहाँ जेल के बाहर उनका इन्तज़ार कर रही थीं। फ़ैज़ के जेल से रिहा होने की ख़ुशी में उनके तमाम दोस्तों ने जश्न मनाने का फ़ैसला किया। उस जश्न में नूरजहाँ भी शामिल थीं और सभी ने उनसे गाने की गुज़ारिश की। नूरजहाँ ने उस दिन फ़ैज़ की ही नज़्म "मुझसे पहली सी मोहब्बत..." को नग़मे के रूप में गा कर सुनाया जिसे उन्होंने उसी वक़्त ख़ुद कम्पोज़ भी किया बिना किसी साज़ के सहारे। उसे सुन कर हर कोई आश्चर्यचकित हो गए। बाद में फ़ैज़ जब भी इस नज़्म को पढ़ते, इसमें वो नूरजहाँ का नाम ज़रूर शामिल करते क्योंकि उनके अनुसार नूरजहाँ की वजह से इस नज़्म में रूह आ गई थी। फ़िल्म ’क़ैदी’ में जब यह नज़्म सुनाई दी, तब इसे और भी अधिक लोकप्रियता मिली और सरहदों को पार कर दुनिया भर में मशहूर हो गई। 

"मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग" में फ़ैज़ कहते हैं - "मैनें समझा था कि तू है तो दरख़शां है हयात, तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर का झगड़ा क्या है, तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात, तेरी आखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है..."। इसी से प्रेरित हो कर हमारे यहाँ के शायर और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने 1969 की फ़िल्म ’चिराग़’ में मुखड़ा लिखा "तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है"। मजरूह के लिखे इस गीत को भी ख़ूब लोकप्रियता मिली और आज यह एक सदाबहार नग़मा बन चुका है। ऐसी था फ़ैज़ के अल्फ़ाज़ों का जल्वा! नूरजहाँ द्वारा इस नज़्म को अत्यधिक लोकप्रिय बनाने के बाद जब भी कभी फ़ैज़ को इस नज़्म को पढ़ने का दरख्वास्त मिलता, वो उसे खारिज कर देते यह कहते हुए, "वो गीत अब मेरा कहाँ, नूरजहाँ का हो गया है!" उनके हिसाब से भले उन्होंने इसे लिखा हो, पर नूरजहाँ ने इसे अपनी आवाज़ और अंदाज़-ए-बयाँ से रूह भर दी है, और इसलिए इस नज़्म पर सिर्फ़ उन्हीं का हक़ है। ऐसे थे फ़ैज़ और उनकी शख़्सियत!

भारत में बनने वाली फ़िल्मों की अगर बात करें तो 1965 की शम्मी कपूर - जयश्री अभिनीत फ़िल्म ’जानवर’ में फ़ैज़ की लिखी क़ता को शामिल किया गया - "रात यूं दिल में तेरी खोयी हुई याद आई, जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाए, जैसे सेहराओं में हौले से चले बाद-ए-नसीम, जैसे बीमार को बे-वजह क़रार आ जाए"। आशा भोसले और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ों में इसे स्वरबद्ध किया शंकर जयकिशन ने। इस गीत की ख़ास बात यह है कि इसमें कोई रीदम नहीं है, कम से कम साज़ों के इस्तमाल से इसे शम्मी कपूर और जयश्री एक नाव में नदी की सैर करते हुए एक दूसरे से बातचीत के रूप में कर रहे हैं, लेकिन पूरे सुर में और शायराना अंदाज़ में भी। इसके बाद एक लम्बे अन्तराल के बाद 1982 की मुज़फ़्फ़र अली की फ़िल्म ’आगमन’ में फ़ैज़ को सुनाई दिया। इस फ़िल्म का निर्माण Uttar Pradesh Sugarcane Seed and Development Corporation ने किया था Integrated Films के बैनर तले। फ़िल्म में गन्ने के को-ऑपरेटिव सोसायटी की राजनीति और तौर-तरीकों को दिखाया गया था। फ़िल्म को मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली। फ़िल्म की सबसे ख़ास बात यह थी कि इसके संगीतकार थे उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ाँ और गाने लिखे फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और हसरत जयपुरी ने। फ़ैज़ के लिखे नग़मों की बात करें तो पहला नग़मा एक नज़्म है "ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शब-गज़ीदा सहर, वो इन्तज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं..."। इसे तीन भागों में फ़िल्म में शामिल किया गया है। पहला और तीसरा भाग अनुराधा पौडवाल ने गाया है जबकि दूसरा भाग उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ाँ साहब ने ही गाया है। दूसरा नग़मा फ़ौज़ की एक कविता का हिस्सा है। "दरबार-ए-वतन में जब इक दिन, सब जाने वाले जाएंगे, कुछ अपनी सज़ा को पहुँचेंगे, कुछ अपनी जज़ा ले जाएंगे", ये हैं इस कविता की पहली लाइनें। दस लाइनों की इस कविता का पाँच, छह, सात और आठवें लाइनों को लेकर यह गीत बनाया गया है "अब टूट गिरेंगी ज़ंजीरें, अब ज़िंदानों की ख़ैर नहीं, जो दरिया झूम के उठे हैं, तिनकों से ना टाले जाएंगे..."। इस गीत के भी दो संस्करण हैं, एक हरिहरन की एकल स्वर में और दूसरे में हरिहरन के साथ हैं उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा साहब। फ़ैज़ का लिखा फ़िल्म का अगला नग़मा एक ग़ज़ल है "जुनूं की याद मनाओ कि जश्न का दिन है, सलीब-ओ-दार सजाओ कि जश्न का दिन है"। इसे हरिहरन ने गाया है। ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ाँ की गाई एक और नज़्म है "निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँ, चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले, जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले, नज़र चुरा के चले जिस्म-ओ-जाँ बचा के चले"।


फ़ैज़ की शायरी और लेखनी में मज़दूरों की बातें हैं, समानता की बातें हैं। इसलिए अक्सर उनकी कविताओं, नज़्मों और ग़ज़लों को ऐसी फ़िल्मों के लिए चुनी जाती हैं जिनमें इस तरह की विषयवस्तु होती है। ’आगमन’ के अगले ही साल 1983 में आई बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्म ’मज़दूर’ जिसमें दिलीप कुमार और राज बब्बर ने अभिनय किया। फ़िल्म में फ़ैज़ का लिखा "हम महनत कश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे, इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे" के बोलों में थोड़ा फेर बदल कर गीतकार हसन कमाल ने लिख डाला "हम मेहनत कश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे, इक बाग़ नहीं, इक खेत नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे"। इसके लिए फ़िल्म में फ़ैज़ को क्रेडिट नहीं दिया गया जो ताज्जुब की बात है। और यह उस समय की बात है जब फ़ैज़ ज़िंदा थे। फ़िल्म की नामावली में कहीं भी फ़ैज़ का ज़िक्र नहीं है जो बेहद शर्म की बात है। ख़ैर, 1986 में मुज़फ़्फ़र अली की अगली फ़िल्म आई ’अंजुमन’ जिसमें शबाना आज़मी, फ़ारुख़ शेख, रोहिणी हत्तंगड़ी मुख्य किरदारों में थे। लखनऊ की पृष्ठभूमि पर बनी इस फ़िल्म में चिकन कढ़ाई श्रमिकों के संघर्ष के मुद्दे उठाए गए थे। फ़िल्म में ख़ैयाम का संगीत था और गीत लिखे शहरयार और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने। गीतों की एक और ख़ासियत यह भी थी कि तीन गीत शबाना आज़मी ने गाए। ’गमन’ और ’उमराव जान’ के बाद मुज़फ़्फ़र अली के साथ फ़ारुख़ शेख की यह तीसरी फ़िल्म थी। और अब एक नज़र उन दो नग़मों पर जिन्हें फ़ैज़ ने लिखे। पहली ग़ज़ल है शबाना आज़मी की आवाज़ में "मैं राह कब से नई ज़िन्दगी की तकती हूँ, हर एक क़दम पे हर एक मोड़ पे संभलती हूँ"। किसी ज़माने में ख़ुशहाल ज़िन्दगी जीने वाली जब संघर्ष से गुज़रती है तो उसकी मुंह से वैसे ही बोल निकल पड़ते हैं जैसा कि फ़ैज़ ने लिखा है - "किया है जश्न कभी डूबते सितारों का, कभी मैं एक किरण के लिए भटकती हूँ, मैं ख़ुद को देख के हैरान होने लगती हूँ, मैं कहाँ आइने की ज़ुबां समझती हूँ"। क्या ख़ूब निभाया है शबाना आज़मी ने इस ग़ज़ल को! इसे सुनते हुए हैरानी होती है कि आख़िर क्यों उनकी आवाज़ में और गीत सुनाई नहीं दिए हमें। फ़ैज़ की लिखी फ़िल्म की दूसरी ग़ज़ल है "कब याद में तेरा साथ नहीं, कब हाथ में तेरा हाथ नहीं, सत शुक्र के अपनी रातों में, अब हिज्र की कोई रात नहीं"। ख़ैयाम साहब और उनकी बेगम जगजीत कौन ने क्या ख़ूब गाया है इस ग़ज़ल को। अनिल बिस्वास और मदन मोहन के बाद ख़ैयाम साहब ही एक ऐसे संगीतकार हुए जिन्होंने फ़िल्मी ग़ज़लों को एक ख़ास जगह दी।


20 नवंबर 1984 को फ़ैज़ इस फ़ानी दुनिया को छोड़ गए, लेकिन 90 के दशक में भी उनकी रचनाएँ हिंदी फ़िल्मों में आती रहीं। 1993 की फ़िल्म ’मुहाफ़िज़’ में उस्ताद सुल्तान ख़ाँ और ज़ाकिर हुसैन का संगीत था। अनीता देसाई की लिखी 1984 की ’बूकर प्राइज़’ नामांकित उपन्यास ’इन कस्टडी’ पर आधारित इस फ़िल्म को इस्माइल मर्चैण्ट ने निर्देशित किया था। फ़िल्म के सभी छह गीत फ़ैज़ के लिखे हुए थे। पहली ग़ज़ल शंकर महादेवन की आवाज़ में "नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं, क़रीब उनके आने के दिन आ रहे हैं"। पहली मुलाक़ात या बहुत दिनों के बाद अपनी प्रेमिका से मुलाक़ात की ख़ुशी को किस मासूमियत लेकिन असरदार तरीके से इस ग़ज़ल में व्यक्त किया गया है, इसे सुनते हुए अंदाज़ा लगाया जा सकता है। दूसरा नग़मा हरिहरन की आवाज़ में है - "आज बाज़ार में पाँवजोला चलो, चश्म-ए-नम जान सोरीदा काफ़ी नहीं, तोहमत-ए-इश्क़ को सीदा काफ़ी नहीं, आज बाज़ार में पाँवजोला चलो"। इसके अंत में फ़ैज़ लिखते हैं - "इनका दम साँस अपने सिवा कौन है, सहर-ए-जाना में अब बासफ़ा कौन है, दश्त-ए-क़ातिल के साया रहा कौन है, रख़्त-ए-दिल बांध लो दिल फ़िगारो चलो, फिर हमीं क़त्ल हो आएँ यारों चलो"। ऐसे थे फ़ैज़! इसी तरह सुरेश वाडकर की आवाज़ में फ़ैज़ की एक और कविता है "आज इक हर्फ़ को फिर ढूंढता फिरता है ख़्याल, मद भरा हर्फ़ कोई, ज़हर भरा हर्फ़ कोई, दिलनशी हर्फ़ कोई, कहर भरा हर्फ़ कोई, आज इक हर्फ़ को फिर ढूंढता फिरता है ख़्याल"। कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ में ग़ज़ल है "ऐ जज़्बा-ए-दिल अगर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए, मंज़िल के लिए दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए"। कविता की ही आवाज़ में फ़िल्म की एक और ग़ज़ल है "राज़-ए-उल्फ़त छुपा के देख लिया, दिल बहुत कुछ जला के देख लिया, और क्या देखने को बाक़ी है, आपसे दिल लगा के देख लिया"। वर्ष 2005 में फ़िल्म '99.9 FM' में फ़ैज़ की बस एक रचना को लिया गया था - "ये मुझे अज़ीज़ भी नापसन्द"। दुर्भाग्यवश इस गीत या ग़ज़ल की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं हो पायी है। इसी साल ’सहर’ नाम की क्राइम थ्रिलर फ़िल्म आई थी जिसमें संगीतकार थे डैनिएल बी. जॉर्ज और गीत लिखे स्वानन्द किरकिरे ने। लेकिन फ़िल्म के शीर्षक को ध्यान में रखते हुए फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की उन मशहूर चार पंक्तियों को रखा गया था - "ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शब-ग़ज़ीदा सहर, वो इन्तज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं"। पंकज कपूर की असरदार आवाज़ में ये चार पंक्तियाँ सुनने में कमाल की लगती है।

वर्तमान दशक में भी फ़ैज़ मौजूद हैं फ़िल्म जगत में। 2012 की मीरा नाइर निर्देशित चर्चित अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म ’The Reluctant Fundamentalist’ प्रदर्शित हुई थी। 9/11 के हादसे के बाद अमरीका में एक आम मुसलमान की ज़िन्दगी किस तरह की हो गई थी, इस पर आधारित थी इस फ़िल्म की कहानी। फ़िल्म में मुख्य संगीतकार थे मैकल ऐन्ड्रिउस, लेकिन फ़ैज़ की एक रचना को शामिल करने के लिए आतिफ़ असलम को अतिथि संगीतकार के रूप में चुना गया और आतिफ़ ने ही इस गीत को गाया। आतिफ़ की आवाज़ में "मोरी अरज सुनो दस्तगीर पीर, रब्बा सचिया, तू ते अखिया सी, जाओ बन्दिया जग दा शाह एन तू, साडिया नेमतान तेरिया दौलताने, साडा नैब थे अलीजा हैं तू"। फ़्युज़न आधारित इस सूफ़ी नग़में में ऊपरवाले से दुआएँ मांगी जा रही है हिफ़ाज़त की। ऊपरवाले को मासूम धमकी भी दी जा रही है कि अगर उसने हिफ़ाज़त नहीं की तो वो किसी और ख़ुदा को चुन लेगा। प्रेम अपने शुद्धतम रूप में सुनाई देता है इस गीत में। यूं तो आतिफ़ असलम के बहुत से सुपरहिट गीत हमने सुने हैं, लेकिन इस गीत की बात ही कुछ और है। अफ़सोस इस बात का है कि इस गीत को लोगों ने ज़्यादा नहीं सुना। आतिफ़ की तरह ख़ुशक़िस्मत अरिजीत सिंह भी हैं जिन्हें भी फ़ैज़ को गाने का मौक़ा मिला। फ़िल्म थी 2014 की ’हैदर’। विशाल भारद्वाज के संगीत में और अरिजीत की आवाज़ में "गुलों में रंग भरे" को सुनना बड़ा ही सुकूनदायक होता है। "बड़ा है दर्द का रिश्ता, तुम्हारे नाम पे आएंगे ग़म गुज़ार चले, गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले। चले भी आओ के गुलशन का कारोबार चले, गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले"। इस ग़ज़ल के बाद इसी फ़िल्म में रेखा भारद्वाज की आवाज़ में भी फ़ैज़ की एक नज़्म है जो बेमिसाल है। फ़ैज़ इसमें लिखते हैं - "आज के नाम और आज के ग़म के नाम, आज का ग़म के है ज़िन्दगी के भरे, गुलिस्ताँ से ख़फ़ा, जर्द पत्तों का बन, जर्द पत्तों का बन जो मेरा देश है, दर्द की अंजुमन जो मेरा देश है, उन दुखी माँओं के नाम, रात में जिनके बच्चे बिलखते हैं, और नींद की मार खाए हुए बाज़ुओं से संभलते नहीं, दुख बताते नहीं, मिन्नतों जारियों से बहलाते नहीं, उन हईनाओं के नाम, उन हसीनाओं के नाम..."। यह एक ऐसी नज़्म है जिसे सुनते हुए आपकी आँखें नम हुए बिना नहीं रह पाएंगी।

2016 में फ़िल्म आई थी ’बुद्धा इन अ ट्रैफ़िक जाम’। इस फ़िल्म का गीत-संगीत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी है। "बेकार कुत्ते..." रोहित शर्मा द्वारा स्वरबद्ध 2013 के ऐल्बम ’स्वांग’ की एक रचना है जो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी से प्रेरित है जिसे नए बोलों से संवारा है रविन्दर रंढवा ने। पंकज बदरा और रोहित ने इसे गाया है। एक और फ़ैज़ ऐडप्टेशन "चन्द रोज़..." जिसे पल्लवी जोशी ने गाया है। शास्त्रीय गायन में सारी त्रुटियों के बावजूद पल्लवी की आवाज़ में यह गीत सुनने में अच्छा लगा। जी हाँ, ये वही पल्लवी जोशी हैं जिन्हें आप बरसों पहले दूरदर्शन के धारावाहिकों में देखा करते थे। फ़ैज़ लिखते हैं "ये तेरी हुस्न से लिपटी हुई आलम की गर्द, अपनी दो रोज़ जवानी की शिकस्तों का शुमार, चांदनी रातों का बेकार दहकता हुआ दर्द, दिल की बेसुद तड़प जिस्म की मायूस पुकार, चंद रोज़ और मेरी जान फ़कत चंद रोज़..."। तो यहाँ आकर पूरी होती है फ़िल्मों में फ़ैज़ का सफ़र। हमें पूरी उम्मीद है कि इसी तरह से आने वाले सालों में भी फ़ैज़ हमारी फ़िल्मों के गीतों में लगातार आते रहेंगे।



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, February 18, 2018

राग वृन्दावनी सारंग : SWARGOSHTHI – 357 : RAG VRIDAVANI SARANG




स्वरगोष्ठी – 357 में आज

पाँच स्वर के राग – 5 : “सावन आए या न आए…”

अश्विनी भिड़े से राग वृन्दावनी सारंग की बन्दिश तथा रफी और आशा से श्रृंगाररस का गीत सुनिए





आशा  भोसले और मुहम्मद रफी
अश्विनी भिड़े देशपाण्डे
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पाँच स्वर के राग” की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनमें केवल पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में रागों के गायन अथवा वादन की प्राचीन परम्परा है। संगीत के सिद्धान्तों के अनुसार राग की रचना स्वरों पर आधारित होती है। विद्वानों ने बाईस श्रुतियों में से सात शुद्ध अथवा प्राकृत स्वर, चार कोमल स्वर और एक तीव्र स्वर; अर्थात कुल बारह स्वरो में से कुछ स्वरों को संयोजित कर रागों की रचना की है। सात शुद्ध स्वर हैं; षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। इन स्वरों में से षडज और पंचम अचल स्वर माने जाते हैं। शेष में से ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वरों के शुद्ध स्वर की श्रुति से नीचे की श्रुति पर कोमल स्वर का स्थान होता है। इसी प्रकार शुद्ध मध्यम से ऊपर की श्रुति पर तीव्र मध्यम स्वर का स्थान होता है। संगीत के इन्हीं सात स्वरों के संयोजन से रागों का आकार ग्रहण होता है। किसी राग की रचना के लिए कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वर की आवश्यकता होती है। जिन रागों में केवल पाँच स्वर का प्रयोग होता है, उन्हें औड़व जाति, जिन रागों में छः स्वर होते हैं उन्हें षाडव जाति और जिनमें सातो स्वर प्रयोग हों उन्हें सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। रागों की जातियों का वर्गीकरण राग के आरोह और अवरोह में लगने वाले स्वरों की संख्या के अनुसार कुल नौ जातियों में किया जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। ऐसे रागों को औड़व-औड़व जाति का राग कहा जाता है। श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग वृन्दावनी सारंग का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वरों में राग वृन्दावनी सारंग की एक बन्दिश के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। राग दुर्गा के स्वरों का फिल्मी गीतों में भी उपयोग किया गया है। राग वृन्दावनी सारंग के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1966 में प्रदर्शित फिल्म “दिल दिया दर्द लिया” से एक नौशाद का स्वरबद्ध किया एक विख्यात गीत –“सावन आए या न आए…”, आशा भोसले और मुहम्मद रफी के युगल स्वर में सुनवा रहे हैं।



फिल्म संगीत में रागों का सर्वाधिक उपयोग यदि किसी संगीतकार ने किया है, तो वह हैं, नौशाद अली। फिल्म संगीत के क्षेत्र में नौशाद को उनके समय तक सर्वाधिक प्रतिष्ठा प्राप्त थी। नौशाद पहले संगीतकार थे जिन्होने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व के बल पर फिल्म जगत में संगीतकार का दर्जा भी नायक या निर्देशक के समकक्ष ला खड़ा किया। नौशाद ऐसे संगीतकार थे, जिन्होने फिल्मों में अपनी रचनाएँ भारतीय संगीत पद्धति के अन्तर्गत विकसित की। उन्होने राग आधारित स्वरक्रम के साथ कभी तो विशुद्ध शास्त्रीय बन्दिशें सृजित की तो कभी शास्त्रीय संगीत के आधार में लोकसंगीत के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए बहुत ही सरस और मीठे गीत रचे। ऐसा ही एक राग आधारित गीत आज हम आपको सुनवा रहे हैं। 1966 में दिलीप कुमार और वहीदा रहमान अभिनीत फिल्म “दिल दिया दर्द लिया” प्रदर्शित हुई थी। फिल्म के गीतकार शकील बदायूनी और संगीतकार नौशाद थे। फिल्म में नौशाद के स्वरबद्ध कई राग आधारित गीत हैं। इनमें से एक गीत –“सावन आए या न आए...” राग वृन्दावनी सारंग के स्वरों पर आधारित इतनी विराट और कसी हुई रचना है कि फिल्मी गीतों में राग का इतना सफल रूपान्तरण बहुत कठिनाई से परिलक्षित होता है। आइए सुनते हैं, राग वृन्दावनी सारंग पर आधारित यह फिल्मी गीत।

वृन्दावनी सारंग : “सावन आए या न आए...” : मुहम्मद रफी और आशा भोसले : फिल्म – दिल दिया दर्द लिया


वर्ज्य करे धैवत गान्धार, गावत काफी अंग,
दो निषाद रे प संवाद, है वृन्दावनी सारंग।

राग वृन्दावनी का सम्बन्ध काफी थाट से माना जाता है। इस राग में गान्धार और धैवत स्वर वर्जित होता है। अतः इसकी जाति औड़व-औड़व होती है। राग के आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। अन्य स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। कुछ विद्वान राग वृन्दावनी सारंग को खमाज ठाट का राग मानते हैं, किन्तु इसे काफी ठाट का राग मानना उचित है। “राग परिचय” ग्रन्थ के लेखक हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव के अनुसार किसी भी राग का थाट निश्चित करने के लिए स्वर से अधिक महत्वपूर्ण राग का स्वरूप होता है। स्वरूप की दृष्टि से क्याह राग, खमाज की तुलना में काफी थाट के अधिक समीप है। सारंग के कई प्रकार हैं, जैसे शुद्ध सारंग, मियाँ की सारंग, मध्यमादि सारंग आदि। इस राग की रचना उत्तर प्रदेश के एक लोकगीत के आधार पर हुई है। साधारण बोल-चाल की भाषा में राग सारंग का अर्थ वृन्दावनी सारंग ही माना जाता है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपको सुविख्यात गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वर में इस राग की एक बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। रचना के बोल हैं, -“सखी री मोरा जिया बेकल होत...”। यह रचना मध्यलय, मत्तताल में निबद्ध है।

वृन्दावनी सारंग : “सखी री मोरा जिया बेकल होत...” : अश्विनी भिड़े देशपाण्डे


संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 357वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 360वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।






1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 24 फरवरी, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 358वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 355वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1960 में प्रदर्शित फिल्म “बंजारिन” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – दुर्गा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल व कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मुकेश और लता मंगेशकर

“स्वरगोष्ठी” की पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

चाँद परदेशी (बीच में) और लक्ष्मीनारायण सोनी (दाहिने)
मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर पिछले अंक में आपने राग दुर्गा का परिचय प्राप्त किया था। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने लिए उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ के स्वर में राग दुर्गा के एक द्रुत खयाल का रसास्वादन किया था। इसके साथ ही आपने फिल्म “बंजारिन” से राग दुर्गा के स्वरों में पिरोया एक चर्चित गीत लता मंगेशकर और मुकेश के युगल स्वर में सुना था। इस अंक में हम संगीतकार चाँद परदेशी का चित्र उपलब्ध न होने के कारण प्रकाशित नहीं कर सके थे। हमने अपने पाठको से अनुरोध किया था कि यदि उनके पास चाँद परदेशी का कोई चित्र हो तो हमे भेजें। हमे बड़ी खुशी है कि हमारे अनुरोध का मान रखते हुए बीकानेर, राजस्थान के लक्ष्मीनारायण सोनी ने संगीतकार चाँद परदेशी का एक चित्र हमारे “स्वरगोष्ठी” के पाठकों के लिए भेजा है। श्री सोनी स्वयं संगीत और रंगमंच के कुशल कलाकार हैं और संगीत-शिक्षण से सम्बन्धित रहे हैं। संगीत और रंगमंच के क्षेत्र में उन्हें अनेक मान-सम्मान से अलंकृत किया जा चुका है। चाँद परदेशी से भी उनकी मित्रता रही है। चित्र में आगे की पंक्ति में बीच में चाँद परदेशी हैं और उनके दाहिने सफ़ेद कमीज में स्वयं लक्ष्मीनारायण सोनी बैठे हैं। चित्र के अन्य महानुभावों का परिचय हमें उपलब्ध नहीं हो सका है। यह चित्र उपलब्ध कराने के लिए हम लक्ष्मीनारायण सोनी का आभार व्यक्त करते है।

“स्वरगोष्ठी” के इस अंक में आपने राग वृन्दावनी सारंग का परिचय प्राप्त किया और इस राग में आपने दो रचनाएँ सुनी। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक में पाँच स्वर के एक अन्य राग पर आपसे चर्चा करेंगे। इस नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग वृन्दावनी सारंग : SWARGOSHTHI – 357 : RAG VRIDAVANI SARANG : 18 Feb., 2018

Monday, February 12, 2018

चित्रकथा - 55: फ़िल्म जगत के दो महान गिटार वादकों का निधन

अंक - 55

फ़िल्म जगत के दो महान गिटार वादकों का निधन


गोरख शर्मा और भानु गुप्त




रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! स्वागत है आप सभी का ’चित्रकथा’ स्तंभ में। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें हम लेकर आते हैं सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े विषय। श्रद्धांजलि, साक्षात्कार, समीक्षा, तथा सिनेमा के विभिन्न पहलुओं पर शोधालेखों से सुसज्जित इस साप्ताहिक स्तंभ की आज 55-वीं कड़ी है।

26 और 27 जनवरी 2018 को फ़िल्म जगत के दो सुप्रसिद्ध गिटार वादकों का निधन हो गया। संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के प्यारेलाल के भाई गोरख शर्मा के 26 जनवरी को और राहुल देव बर्मन टीम के भानु गुप्त के 27 जनवरी को निधन हो जाने से फ़िल्म-संगीत जगत के दो चमकते सितारे हमेशा के लिए डूब गए। भले हम इन दोनों कलाकारों को मुख्य रूप से फ़िल्मी गीतों में उनके गिटार के टुकड़ों से जानते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि इन दोनों ने गिटार के अलावा भी कई और साज़ों पर भी अपने अपने हाथ आज़माए हैं। जहाँ गोरख शर्मा ने मैन्डोलीन और कई अन्य तार वाद्यों पर अपनी जादुई उंगलियाँ चलाईं, वहीं भानु गुप्त ने हार्मोनिका (माउथ ऑर्गन) में महारथ हासिल की। आइए, आज ’चित्रकथा’ में गोरख शर्मा और भानु गुप्त को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके जीवन पर एक नज़र डालते हैं और याद करते हैं उन गीतों को जिन्हें उन्होंने अपनी कला से अमर बना दिया है। आज का यह अंक गोरख शर्मा और भानु गुप्त की पुण्य स्मृति को समर्पित है।





गोरख शर्मा और भानु गुप्त


नवरी 2018 का महीना संगीत जगत के लिए बेहद दुर्भाग्यजनक रहा। संतूर वादक पंडित उल्हास बापट, सरोद वादक पंडित बुद्धदेब दासगुप्ता, और फ़िल्म संगीत में रेसो-रेसो के जनक अमृतराव काटकर कके बाद अब गिटार वादक गोरख शर्मा और भानु गुप्त। गोरख शर्मा का नाम फ़िल्म जगत में भला कौन नहीं जानता! बेस गिटार को हिन्दी फ़िल्म संगीत में लाने वाले गुणी कलाकारों में उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। 28 दिसंबर 1946 को जन्में गोरख रामप्रसाद शर्मा सुप्रसिद्ध ट्रम्पेट वादक पंडित रामप्रसाद शर्मा के पुत्र और सुप्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के प्यारेलाल शर्मा के छोटे भाई थे। 1960 से लेकर 2002 के बीच गोरख शर्मा ने लगभग 500 फ़िल्मों में लगभग 1000 गीतों में तरह तरह के वाद्य बजाए और इन तमाम सदाबहार गीतों को अलंकृत किया। प्यारेलाल, गणेश, आनन्द और महेश (महेश-किशोर जोड़ी वाले) ही की तरह गोरख शर्मा ने भी संगीत का मूल पाठ अपने पिता से ही सीखा। उन्हीं से उन्होंने तरह तरह के तार-वाद्यों को बजाने की कला सीखी। मैन्डोलीन, मैन्डोला, रुबाब, और कई प्रकार के गिटार जैसे कि ऐकोस्टिक, जैज़, ट्वेल्व स्ट्रिंग् और इलेक्ट्रिक गिटार सहित बेस गिटार में उन्होंने महारथ हासिल की। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि गोरख शर्मा को ही बेस गिटार को हिन्दी फ़िल्मी गीतों में लाने का श्रेय जाता है। वैसे गोरख जी ने अपना संगीत सफ़र शुरु किया था बतौर मैन्डोलीन वादक। इसके नोटेशन उन्होंने अपने पिता से सीखे। उन्ही दिनों में विदेशी साज़ों का भी चलन शुरु हो चुका था और गिटार को ख़ास तौर पर ख़ूब लोकप्रियता मिल रही थी। इसलिए गोरख जी ने भी सोचा कि क्यों ना इस पर भी हाथ आज़माया जाए। अत: उस ज़माने क मशहूर गिटार वादक ऐनिबल कैस्ट्रो से उन्होंने गिटार सीखना शुरु कर दिया और मैन्डोलीन का ज्ञान होने की वजह से कुछ ही समय में इस कला में भी निपुण हो गए। अपने करीयर के शुरुआती सालों में गोरख शर्मा ’बाल सुरील कला केन्द्र’ का हिस्सा हुआ करते थे। यह एक ऐसी संस्था थी जो महाराष्ट्र के छोटे शहरों में घूम-घूम कर कार्यक्रम पेश किया करती। कलाकारों के इस समूह में शामिल थे मीना मंगेशकर, उषा मंगेशकर, हृदयनाथ मंगेशकर, लक्ष्मीकान्त कुड़लकर, प्यारेलाल, गणेश, आनन्द आदि।

प्यारेलाल और गोरख शर्मा
60 के दशक में जब लक्ष्मीकान्त और प्यारेलाल ने अपनी जोड़ी बना कर फ़िल्म संगीत निर्देशन में उतरे, तब गोरख शर्मा को इस जोड़ी के गीतों में मैन्डोलीन बजाने का मौका मिला। मात्र 14 वर्ष की आयु में उन्हें संगीतकार रवि ने संगीत निर्देशन में ’चौधहवीं का चाँद’ फ़िल्म के मशहूर शीर्षक गीत में मैन्डोलीन बजाने का सुअवसर मिला। शंकर-जयकिशन और कल्याणजी-आनन्दजी के कई गीतों में भी उन्होंने मैन्डोलीन बजाए। जल्दी ही गोरख शर्मा बन गए लक्ष्मी-प्यारे के सहायक संगीतकार और इस जोड़ी के साथ उन्होंने 1966 से लेकर अन्त तक तकरीबन 475 फ़िल्मों में काम किया। Cine Musicians Association (CMA) में गोरख शर्मा का नाम सम्मान से लिया जाता था, और उस ज़माने में जहाँ साज़िन्दों को CMA द्वारा दिए गए ग्रेड के अनुसार वेतन मिला करते थे, वहाँ पंडित शिव कुमार शर्मा और पंडित हरिप्रसाद चौरसिया के साथ गोरख शर्मा को सर्वोच्च ग्रेड का वेतन मिलता था। यह उनकी कला का ही सम्मान था। जैसा कि हमने उपर कहा है कि गोरख शर्मा ने लगभग 1000 गीतों में साज़ बजाए हैं< लेकिन एक गीत जो उनकी ख़ास पहचान बना हुआ है, वह है 1980 की फ़िल्म ’कर्ज़’ का गीत "एक हसीना थी, एक दीवाना था"। सभी जानते हैं कि यह गीत फ़िल्म का थीम सॉंग् रहा है जिसका फ़िल्म की कहानी पर गहरा प्रभाव है। इसी गीत का प्रील्युड म्युज़िक फ़िल्म का थीम म्युज़िक भी है, और इन सब के पीछे अगर किसी का हाथ है तो वह सिर्फ़ और सिर्फ़ गोरख शर्मा का। गोरख जी के निधन पर फ़िल्म ’कर्ज़’ के नायक ॠषि कपूर ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए इस थीम म्युज़िक का ज़िक्र किया है।

गोरख शर्मा के संगीत के टुकड़ों से सजे कुछ और सुपरहिट गीत हैं - "मेरे महबूब क़यामय होगी" (Mr. X in Bombay, 1964), "नज़र ना लग जाए किसी की राहों में" (Night in London, 1967), "मैं शायर तो नहीं" (Bobby, 1973), "रुक जाना नहीं तू कहीं हार के" (इम्तिहान, 1974), "आओ यारों गाओ" (हवस, 1974), "My name is Anthony Gonsalves" (अमर अक्बर ऐन्थनी, 1977), "डफ़ली वाले डफ़ली बजा" (सरगम, 1979), "हम बने तुम बने एक दूजे के लिए" (एक दूजे के लिए, 1981), "सासों की ज़रूरत है जैसे" (आशिक़ी, 1990), "सनम मेरे सनम क़सम तेरी क़सम" (हम, 1991), "जाओ तुम चाहे जहाँ, याद करोगे वहाँ" (नरसिम्हा, 1991), "जादू तेरी नज़र, ख़ुशबू तेरा बदन" (डर, 1993)। BBC के एक साक्षात्कार में जब एक बार गोरख शर्मा से यह पूछा गया कि बड़े भाई की तरह उन्होंने संगीत निर्देशन में हाथ क्यों नहीं आज़माया, तो उनका जवाब था - "मैं उन दिनों मैन्डोलिन और गिटार की परफार्मेंस और उनकी रिकॉर्डिंग में इतना व्यस्त रहता था कि संगीत निर्देशन के लिए वक़्त ही नहीं मिल पता था।" बीते ज़माने को याद करते हुए गोरख जी ने आगे उस साक्षात्कार में बताया, ''उस समय अंग्रेज़ी संगीतकारों का दबदबा था, लेकिन बहुत कम लोग अंग्रेज़ी में संगीत (स्टाफ नोटेशन) पढ़ पाते थे, जिसकी वजह से उन्हें काम नहीं मिल पता था। अपने स्टॉफ़ में मैं उन चुनिंदा लोगों में से था, जो स्टॉफ़ नोटेशन पढ़ लेता था। हालांकि़, इसका श्रेय मेरे संगीतकार पिता पंडित रामप्रसाद शर्मा उर्फ़ 'बाबाजी' को जाता है।'' बीते दिनों को याद करते हुए वे आगे कहते हैं, "तब पूरा दिन रिकॉर्डिंग चलती थी और 70 से 100 संगीतकारों को एक साथ एक गाने की सही धुन निकालनी होती थी। किसी एक से भी चूक हो जाती तो सबको दोबारा फिर से बजाना पड़ता था। तब एसी (AC) तो होते नहीं थे, तो हम एक बंद कमरे में घंटों रिकॉर्डिंग करने के बाद तुरंत सारे खिड़की दरवाज़ें खोल देते थे या सब पंखे के आगे खड़े हो जाते।'' गोरख शर्मा के इस दुनिया से जाने से फ़िल्म संगीत जगत का एक चमकता सितारा हमेशा के लिए अस्त हो गया।


भानु गुप्त भी एक ऐसे साज़िन्दे थे जिनका फ़िल्म जगत में बहुत नाम था। ख़ास कर राहुल देव बर्मन की टोली में वो एक महत्वपूर्ण महारथी थे। माउथ ऑर्गन (हारमोनिका) और गिटार के वो जाने-माने वादक थे। भले उनका नाम राहुल देव बर्मन के साथ लिया जाता है, यह भी सच है कि उन्होंने कई अन्य संगीतकारों के साथ भी काम किया है। भानु गुप्त का जन्म 1932 में बर्मा (अब म्यानमार) की राजधानी रंगून में हुआ जहाँ बचपन में उन्होंने माउथ ऑरगन बजाना ब्रिटिश नाविकों से सीखा। जापानी भाषा जानने की वजह से मात्र 12 वर्ष की आयु में ही उन्हें जापानी आर्मी में अंग्रेज़ी भाषान्तरकार की नौकरी मिल गई। बचपन में उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध को बर्मा में रहते हुए बहुत करीब से देखा था भानु गुप्त ने। वो और उनका पूरा परिवार सुभाष चन्द्र बोस और उनके INA के साथ काम किया। 15 वर्ष की आयु में युवा भानु को एक प्लास्टिक हारमोनिका उपहार में मिला जिसे उन्होंने ख़ुद ही बजाना सीख लिया। पहली धुन जो उन्होंने उस पर बजाना सीखी, वो थी हमारी राष्ट्रगान की धुन। बर्मा में युद्ध गम्भीर रूप धारण करने की वजह से वो परिवार के साथ भारत आ गए और पश्चिम बंगाल के हूगली ज़िले के वैद्यबाटी नामक जगह में बस गए। ऑयल टेक्नोलोजी में पढ़ाई पूरी की और नौकरी भी करने लगे। भानु शुरु से ही एक अच्छे खिलाड़ी थे। नदियों को तैर कर पार कर जाना, बॉक्सिंग् और क्रिकेट खेलना उनके शौक थे। 18 वर्ष के होते ही भानु Calcutta League में First Division Cricket खेलने लगे। उन्होंने बापु नादकरनी, पंकज राय और वेस्ट इंडीज़ के रॉय गिलक्रिस्ट के साथ खेला हुआ है। आज भी कोलकाता के ’कालीघाट क्लब’ में उनका नाम उस क्लब के स्वर्णिम खिलाड़ियों की लिस्ट में लिखा हुआ है।

क्रिकेट खेलते हुए भानु गुप्त कोलकाता के नाइट क्लबों और कैबरे में आय दिन हारमोनिका बजाया करते थे जिससे थोड़ी बहुत आमदनी हो जाती थी। धीरे-धीरे उनके सामने यह सवाल खड़ा हो गया कि आगे क्रिकेट पर ध्यान देना है या संगीत पर। उन्होंने संगीत को चुना और एक संगीतज्ञ बनने का सपना लेकर 1959 में वो अपने परिवार के इच्छा के ख़िलाफ़ जाकर कोलकाता से बम्बई चले आए। हारमोनिका में उनके हुनर से प्रभावित हो कर संगीतकार सी. रामचन्द्र ने उन्हें पहली बार फ़िल्म ’पैग़ाम’ में बजाने का मौका दिया। जल्दी ही बिपिन दत्त (बिपिन-बाबुल जोड़ी के) के साथ वो काम करने लगे और आगे चल कर सलिल चौधरी के साथ जुड़े और वो एक ’हिन्दु हारमोनिका प्लेयर’ के नाम से पहचाने जाने लगे, क्योंकि उन दिनों लगभग सभी हारमोनिका वादक इसाई हुआ करते थे। सलिल दा के साथ किसी रेकॉर्डिंग् के दौरान भानु गुप्त की नज़र पड़ी एक पुराने एडुसोनिया गिटार पर, जिस पर "made by Braganzas of Free School Street, Kolkata" लिखा हुआ था। उपेक्षित स्थिति में पड़े इस गिटार को प्यार से उठा कर उन्होंने इसके तारों को छेड़ना शुरु किया और इसे सीखने में जुट गए। संगीत की समझ तो थी ही, इसलिए ज़्यादा समय नहीं लगा सीखने में। उन दिनों भानु गुप्त संगीतकार जोड़ी सोनिक-ओमी के पड़ोसी हुआ करते थे। सोनिक ओमी के वहाँ संगीतकार मदन मोहन का भी आना-जाना लगा रहता था। एक दिन जब भानु गुप्त गिटार बजा रहे थे, तब मदन मोहन ने उन्हें बजाते हुए सुना, प्रभावित हुए और सोनिक-ओमी के सहयोग से भानु से मुलाक़ात की। 1963 की किसी फ़िल्म में मदन मोहन ने भानु गुप्त को गिटार बजाने का मौका दिया। यह वह समय था जब राहुल देव बर्मन फ़िल्म जगत में बतौर स्वतन्त्र संगीतकार अपने पांव जमाने की कोशिश में लगे थे। उन्हें एक गिटारिस्ट की तलाश थी। ऐसे में भानु गुप्त को बुलाया गया और बाकी अब इतिहास बन चुका है। पंचम के साथ भानु गुप्त का साथ पंचम की मृत्यु तक, यानी 1994 तक रहा। 

पंचम और भानु दा
पंचम के जाने के बाद भानु गुप्त ने अनु मलिक, बप्पी लाहिड़ी और नदीन-श्रवण जैसे संगीतकारों के साथ काम किया। जिस तरह से गोरख शर्मा को हम ’कर्ज़’ के थीम के लिए जानते हैं, उसी तरह से भानु गुप्त को हम जानते हैं ’शोले’ फ़िल्म के ’गिटार थीम’ और ’हारमोनिका थीम’ के लिए। हारमोनिका थीम का दृश्य वह दृश्य है जहाँ जया भादुड़ी (बच्चन) दीया जला रही होती हैं और अमिताभ बच्चन अपना माउथ ऑरगन बजा रहे होते हैं। ’शोले’ के ही सदाबहार गीत "महबूबा महबूबा" में भी भानु गुप्त ने गिटार बजाया है। पंचम के जिस गीत में भानु गुप्त ने पहली बार बजाया, वह गीत था फ़िल्म ’तीसरी मंज़िल’ का "देखिये साहिबों..."। पंचम के कुछ और महत्वपूर्ण गीत जिनमें भानु गुप्त का गिटार सुनाई दिया, वो हैं "एक चतुर नार" (पड़ोसन, 1968), "चिंगारी कोई भड़के" (अमर प्रेम, 1972), "यादों की बारात निकली है आज" (यादों की बारात, 1973), "सुनो, कहो, सुना कहा" (आप की क़सम, 1974), "एक मैं और एक तू" (खेल खेल में, 1975), "तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई शिकवा तो नहीं" (आंधी, 1975), "ऐसे ना मुझे तुम देखो" (Darling Darling, 1977), "क्या यही प्यार है" (Rocky, 1981), "ये कोरी करारी" (समुन्दर, 1986), "कुछ ना कहो कुछ भी ना कहो" (1942 A Love Story, 1994)। जानेमाने फ़िल्म इतिहासकार बालाजी विट्टल के साथ एक साक्षात्कार में भानु जी ने एक बार पंचम के काम करने के तरीकों के बारे में बताया था कि पंचम किसी भी चीज़ में से संगीत बाहर निकाल लेते थे। उदाहरण स्वरूप, एक बार एक डिफ़ेक्टिव सीलिंग् फ़ैन से तालबद्ध तरीके से चरमराहट की आवाज़ निकल रही थी और उसी से प्रेरित होकर बनी ’आप की क़सम’ फ़िल्म की "सुनो कहो कहा सुना" गीत की धुन। इसी तरह एक बार भानु दा ने गिटार पर ग़लत उंगली फेर दिया जिससे उत्पन्न हो गया "चिंगारी कोई भड़के" के प्रील्युड की धुन। भानु दा एक बार पैक अप के समय यूंही गिटार पर एक धुन बजा रहे थे, और वही धुन बन गई "एक मैं और एक तू" की धुन। "महबूबा महबूबा" में बोतल का प्रयोग या फिर ’तीसरी मंज़िल’ में दरवाज़ा खुलने की आवाज़, ये सब करामात पंचम के दिमाग़ से ही निकले थे। भानु दा ने बालाजी विट्टल को यह भी बताया कि पंचम कभी भी अपने साज़िन्दों और संगीतज्ञों के काम को सराहना नहीं भूलते थे। जब लता जी ने "क्या यही प्यार है" की धुन के लिए पंचम पर उनके दुर्लभ प्रशंसा बरसाईं तो पंचम ने तुरन्त भानु दा की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि "यह धुन इसने बनाया है!" इसी तरह से जब पंचम ने नासिर हुसैन को बताया कि ’यादों की बारात’ का शीर्षक गीत दरसल भानु ने बनाया है तो नासिर साहब ने उन्हें एक दुर्लभ Scotch Whisky से पुरस्कृत किया।

गोरख शर्मा और भानु गुप्त तो चले गए पर पीछे छोड़ गए वाद्य संगीत की एक ऐसी धरोहर जो आने वाले लम्बे समय तक इस दौर के साज़िन्दों और संगीतज्ञों को लाभान्वित करते रहेंगे और हम सुधी श्रोताओं के कानों और दिलों में अमृत घोलते रहेंगे। ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ की ओर से स्वर्गीय गोरख शर्मा और स्वर्गीय भानु गुप्त को विनम्र श्रद्धा-सुमन!



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



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