Sunday, January 28, 2018

राग तिलंग : SWARGOSHTHI – 354 : RAG TILANG




स्वरगोष्ठी – 354 में आज

पाँच स्वर के राग – 2 : “लगन तोसे लागी बलमा…”

इन्दुबाला देवी से तिलंग की एक प्राचीन ठुमरी और लता मंगेशकर से फिल्मी गीत सुनिए




मदन मोहन
इन्दुबाला देवी
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी नई श्रृंखला – “पाँच स्वर के राग” की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों पर चर्चा करेंगे जिनमें केवल पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में रागों के गायन अथवा वादन की प्राचीन परम्परा है। संगीत के सिद्धान्तों के अनुसार राग की रचना स्वरों पर आधारित होती है। विद्वानों ने बाईस श्रुतियों में से सात शुद्ध अथवा प्राकृत स्वर, चार कोमल स्वर और एक तीव्र स्वर; अर्थात कुल बारह स्वरो में से कुछ स्वरों को संयोजित कर रागों की रचना की है। सात शुद्ध स्वर हैं; षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। इन स्वरों में से षडज और पंचम अचल स्वर माने जाते हैं। शेष में से ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वरों के शुद्ध स्वर की श्रुति से नीचे की श्रुति पर कोमल स्वर का स्थान होता है। इसी प्रकार शुद्ध मध्यम से ऊपर की श्रुति पर तीव्र मध्यम स्वर का स्थान होता है। संगीत के इन्हीं सात स्वरों के संयोजन से रागों का आकार ग्रहण होता है। किसी राग की रचना के लिए कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वर की आवश्यकता होती है। जिन रागों में केवल पाँच स्वर का प्रयोग होता है, उन्हें औड़व जाति, जिन रागों में छः स्वर होते हैं उन्हें षाडव जाति और जिनमें सातो स्वर प्रयोग हों उन्हें सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। रागों की जातियों का वर्गीकरण राग के आरोह और अवरोह में लगने वाले स्वरों की संख्या के अनुसार कुल नौ जातियों में किया जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे रागों पर चर्चा करेंगे जिनके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। ऐसे रागों को औड़व-औड़व जाति का राग कहा जाता है। श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग तिलंग का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही पिछली शताब्दी की मशहूर गायिका इन्दुबाला देवी के स्वर में एक पुरानी ठुमरी रिकार्डिंग के माध्यम से राग के उपशास्त्रीय स्वरूप का दर्शन कराने का प्रयास करेंगे। अनेक फिल्मी गीतों में राग तिलंग का प्रयोग किया गया है। इस राग पर आधारित 1957 में प्रदर्शित फिल्म “देख कबीरा रोया” से एक गीत –“लगन तोसे लागी बलमा…”, लता मंगेशकर के स्वर में सुनवा रहे हैं।



राग तिलंग की रचना खमाज थाट से मानी गई है। खमाज थाट के स्वर होते हैं- सा, रे, ग, म, प, ध, नि॒। इस थाट में निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस थाट का आश्रय राग ‘खमाज’ कहलाता है। खमाज थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ अन्य प्रमुख राग है- झिंझोटी, तिलंग, रागेश्वरी, गारा, देस, जैजैवन्ती, तिलक कामोद आदि। खमाज थाट इन्हीं रागों में से एक राग तिलंग में आज हम आपको दो रचनाओं का रसास्वादन करा रहे हैं। पहले आप सुनिए, राग तिलंग पर आधारित एक फिल्म संगीत। यह गीत हमने 1957 में प्रदर्शित फिल्म “देख कबीरा रोया” से लिया है। अनीता गुहा, अमिता, अनूप कुमार, शुभा खोटे और दलजीत अभिनीत इस फिल्म में इस गीत के साथ ही कई गीत राग आधारित थे। फिल्म का संगीत सुप्रसिद्ध संगीतकार मदन मोहन ने तैयार किया है। गीतकार हैं, राजेन्द्र कृष्ण। राग तिलंग के अनुकूल स्वरों में लता मंगेशकर ने गीत –“लगन तोसे लागी बलमा...” का अत्यन्त मधुर गायन किया है। लीजिए पहले आप राग तिलंग पर आधारित यह गीत सुनिए।

राग तिलंग : “लगन तोसे लागी बलमा...” : लता मंगेशकर : फिल्म – देख कबीरा रोया



द्वितीय प्रहर निशि रे ध वर्जित, गावत तिलंग राग,
ग नी स्वर संवाद करत, रखियत खमाज थाट।
राग तिलंग को खमाज थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग में ऋषभ और धैवत वर्जित होता है। राग की जाति औड़व-औड़व होती है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में शुद्ध निषाद, किन्तु अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। राग तिलंग के गायन-वादन का उपयुक्त समय रात्रि का दूसरा प्रहर माना जाता है। यद्यपि राग तिलंग में ऋषभ स्वर वर्जित होता है, फिर भी राग के सौन्दर्य-वृद्धि के लिए कभी-कभी तार सप्तक के अवरोह में ऋषभ स्वर का प्रयोग कर लिया जाता है। यह श्रृंगार रस प्रधान, चंचल प्रकृति का राग होता है, अतः इसमें छोटा खयाल, ठुमरी और सुगम संगीत की रचनाएँ अधिक मिलती हैं। यह पूर्वांग प्रधान राग होता है। राग तिलंग से मिलता-जुलता राग खमाज होता है। दोनों रागों में भेद को स्पष्ट करने के लिए कुछ तथ्यों को जानना आवश्यक है। दोनों रागों में पर्याप्त समानता है, किन्तु एक अन्तर के कारण राग तिलंग और खमाज में अन्तर आ जाता है। दोनों राग खमाज थाट से सम्बद्ध होता है और दोनों के आरोह में शुद्ध निषाद तथा अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। दोनों रागों में वादी और संवादी क्रमशः गान्धार और निषाद स्वर होते हैं और दोनों पूर्वांग प्रधान राग होते हैं। परन्तु राग खमाज के अवरोह में शुद्ध ऋषभ स्वर का भी प्रयोग किया जाता है, जिस कारण राग की जाति बदल जाती है। अर्थात राग तिलंग औडव-औडव जाति का राग है, जबकि राग खमाज औडव-षाड़व का राग है। हम यह भी कह सकते हैं कि राग खमाज अपने थाट का आश्रय राग है, जबकि राग तिलंग जन्य राग होता है। राग तिलंग में अधिकतर ठुमरी गायी जाती है। एक शताब्दी से भी पहले व्यावसायिक गायिकाओं द्वारा गायी गई ठुमरियों का स्वरूप कैसा होता था, इसका अनुभव कराने के लिए अब हम आपको पिछली शताब्दी की गायिका इन्दुबाला देवी के स्वर में राग तिलंग की एक ठुमरी सुनवाते है। भारत में ग्रामोफोन रिकार्ड के निर्माण का आरम्भ 1902 से हुआ था। सबसे पहले ग्रामोफोन रिकार्ड में उस समय की मशहूर गायिका गौहर जान की आवाज़ थी। संगीत की रिकार्डिंग के प्रारम्भिक दौर में ग्रामोफोन कम्पनी को बड़ी कठिनाई से गायिकाएँ उपलब्ध हो पातीं थीं। प्रारम्भ में व्यावसायिक गायिकाएँ ठुमरी, दादरा, कजरी, होरी, चैती आदि रिकार्ड कराती थीं। 1902 से गौहर जान ने जो सिलसिला आरम्भ किया था, 1910 तक लगभग 500 व्यावसायिक गायिकाओं ने अपनी आवाज़ रिकार्ड कराई। इन्हीं में एक गायिका इन्दुबाला देवी भी थीं। आइए अब हम इन्हीं की आवाज़ में राग तिलंग की ठुमरी सुनते हैं। ठुमरी के बोल हैं, -“तुम काहे को नेहा लगाए...”। आप यह ठुमरी सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग तिलंग : “तुम काहे को नेहा लगाए...” : ठुमरी : इन्दुबाला देवी



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 354वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक सुविख्यात और रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा दो प्रश्न का उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 360वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा के साथ ही उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस सुपरिचित पार्श्वगायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 3 फरवरी, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 356वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 352वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1961 में प्रदर्शित फिल्म “भाभी की चूड़ियाँ” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – भूपाली, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

वर्ष 2018 की इस प्रथम पहेली क्रमांक 352 का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल। पहेली के इन दोनों विजेताओं को "रेडियो प्लेबैक इण्डिया" की ओर से हार्दिक बधाई। हमारे पिछले कई महाविजेताओं ने इस पहेली में भाग नहीं लिया। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे नियमित महाविजेता इस अंक में विराम देकर अन्य प्रतिभागियों से आगे निकालना चाहते हैं। इस पहेली प्रतियोगिता हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रो,  ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” के इस दूसरे अंक में आपने राग तिलंग का परिचय प्राप्त किया। इसके साथ ही राग के उपशास्त्रीय स्वरूप को समझने लिए रिकार्डिंग के प्रारम्भिक दौर की सुप्रसिद्ध गायिका इन्दुबाला देवी स्वर में राग तिलंग की एक ठुमरी का रसास्वादन कराया। राग तिलंग के स्वरों का उपयोग करते हुए अनेक फिल्मी गीत भी रचे गए हैं। आज आपने फिल्म “देख कबीरा रोया” से राग तिलंग पर आधारित एक गीत सुविख्यात गायिका लता मंगेशकर के स्वर में सुना। अगले अंक में पाँच स्वर के एक अन्य राग पर आपसे चर्चा करेंगे। इस नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, January 27, 2018

चित्रकथा - 53: पंचम के दो महारथियों का निधन

अंक - 53

पंचम के दो संगीत महारथियों का निधन


पंडित उल्हास बापट और अमृतराव काटकर 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! स्वागत है आप सभी का ’चित्रकथा’ स्तंभ में। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें हम लेकर आते हैं सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े विषय। श्रद्धांजलि, साक्षात्कार, समीक्षा, तथा सिनेमा के विभिन्न पहलुओं पर शोधालेखों से सुसज्जित इस साप्ताहिक स्तंभ की आज 53-वीं कड़ी है।

4 जनवरी 2018 को सुप्रसिद्ध संतूर वादक पंडित उल्हास बापट और 15 जनवरी 2018 को फ़िल्मी गीतों में रेसो रेसो वाद्य के भीष्म पितामह व जाने-माने संगीत संयोजक व वादक श्री अमृतराव काटकर का निधन हो गया। संयोग की बात है कि इन दोनों संगीत महारथियों ने संगीतकार राहुल देव बर्मन के साथ लम्बा सफ़र तय किया, और उससे भी आश्चर्य की बात यह है कि 4 जनवरी को राहुल देव बर्मन की भी पुण्यतिथि है। इस दुनिया-ए-फ़ानी को छोड़ कर जाने के लिए इन दोनों शिल्पियों ने साल का लगभग वही दिन चुना जिस दिन पंचम इस दुनिया को छोड़ गए थे। आइए आज ’चित्रकथा’ में पंडित उल्हास बापट और श्री अमृतराव काटकर को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए राहुल देव बर्मन के साथ उनके संगीत सफ़र पर नज़र डालें।




संतूर एक ऐसा वाद्य है जो रुद्र वीणा, सितार, सरोद और सारंगी जितना पुराना नहीं है। और यही कारण है कि संतूर के घराने नहीं बने जिस वजह से संतूर वादकों के पास खुला मैदान है प्रयोगों के लिए। पंडित शिव कुमार शर्मा का नाम संतूर में सर्वोपरि ज़रूर  है लेकिन बीते दशकों में कुछ और बड़े कलाकार भी हुए हैं इस वाद्य के। इनमें एक महत्वपूर्ण नाम पंडित उल्हास बापट का है जिन्होंने संतूर में एक नई धारा लेकर आए। 67 वर्ष की आयु में उनके इस दुनिया से चले जाने से संतूर जगत को ऐसी क्षति पहुँची है जिसकी भरपाई होना मुश्किल है। पंडित बापट ने अपना संगीत सफ़र तबले से शुरु किया रमाकान्त म्हापसेकर के पास। 1973 में एक दिन अचानक उन्होंने एक साज़ों की दुकान में संतूर वाद्य को देखा और बिना कुछ सोचे उसे ख़रीद लाए। बिना किसी औपचारिक गुरु के, पंडित बापट ने अपने आप ही उसे बजाना शुरु किया हारमोनियम के नियमों को ध्यान में रख कर। आगे चल कर उन्होंने विभिन्न रागों को बजाया और यही नहीं रागों को आपस में मिला कर यौगिक रागों का सृजन किया। उन्होंने संतूर के कलमों में कुछ ऐसे बदलाव किए जिससे दो मींड के बीच जो अन्तराल या ख़ाली जगह होता था, वो ग़ायब हो गया। यही नहीं, पंडित जी ने कलमों के अन्त में एक मेटल स्ट्रिप भी जोड़ा जिससे कि दोनों में से किसी एक को संतूर के तार से घिसते हुए दूसरे को तार पर मारा जा सके। पंडित उल्हास बापट शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान ततो दिया ही है, साथ ही साथ फ़िल्म संगीत में उनके योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता। ख़ास तौर से राहुल देव बर्मन के साथ उन्होंने एक लम्बी पारी खेली और पंचम के तमाम यादगार गीतों को अपने दिलकश संतूर के टुकड़ों से सजाया।

पंचम के तमाम गीतों में हमने संतूर के यादगार टुकड़े सुने हैं, लेकिन हम में से शायद बहुत कम ही लोग ऐसे होंगे जिन्हें पता होगा कि इन टुकड़ों को दरसल पंडित उल्हास बापट ने बजाया है। पंचम के साथ पंडित बापट का सफ़र शुरु हुआ था 1978 की फ़िल्म ’घर’ से। पंडित शिव कुमार शर्मा ने भी पंचम के साथ काम किया है जिसमें "काली पलक तेरी गोरी", "करवटें बदलते रहे सारी रात हम", "प्यार के दिन आए काले बादल छाये", "ये लड़का हाय अलाह कैसा है दीवाना" जैसे गीत शामिल हैं। पंडित बापट के बजाए गीतों में "राह पे रहते हैं यादों पे बसर करते हैं" (नमकीन),  "हुज़ूर इस क़दर भी ना इतरा के चलिए" (मासूम), "मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है" (इजाज़त), "जाने क्या बात है, नींद नहीं आती" (सनी), "तेरे लिए पलकों की झालर बुनूँ" (हरजाई), "रिमझिम रिमझिम रुमझुम रुमझुम" (1942 A Love Story), "प्यार हुआ चुपके से" (1942 A Love Story), "सीली हवा छू गई" (लिबास) जैसे यादगार गीत शामिल हैं। पंडित उल्हास बापट एक ऐसे संतूर वादक थे जिन्हे क्रोमेटिक ट्युनिंग् की महारथ हासिल थी। 12 सुरों को अगर लगातार बजाया जाता रहे तो वो क्रोमेटिक ट्युनिंग् जैसा सुनाई देता है। पंडित बापट अकेले ऐसे कलाकार रहे जो संतूर पर इस तरह की ट्युनिंग् कर पाते थे और यही कारण था कि वो किसी भी स्केल के गीत को आसानी से संतूर पर बजा लेते थे, जो सामान्यत: संतूर पर बहुत मुश्किल होता है। उदाहरण के तौर पर 1981 की फ़िल्म ’ज़माने को दिखाना है’ के मशहूर गीत "दिल लेना खेल है दिलदार का" शुरु होता है डी स्केल से और पंडित जी का संतूर आता है सी-स्केल पर। लेकिन क्योंकि वो एक क्रोमेटिक ट्युनर थे, वो दोनो सेक्शन बजा लेते थे। 

क्रोमेटिक ट्युनिंग् जैसी मुश्किल विधा के अलावा पंडित उल्हास बापट ने संतूर की एक तकनीक का आविष्कार भी किया जिसका पेटेण्ट उनके पास है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में इसे मींड कहा जाता है जिसमें एक सुर से दूसरे सुर पर बिना अन्तराल के जाया जा सकता है। संतूर के कलमों में कुछ बदलाव करके पंडित बापट ने मींड को संतूर में साकार किया और पहली बार 1982 की फ़िल्म ’अंगूर’ के गीत "होठों पे बीती बात" में प्रयोग किया। यह पहला अवसर था कि जब पंचम ने उन्हें अपने गीत में मींड तकनीक प्रयोग करने का मौका दिया। इस गीत में यह प्रयोग इतना खरा उतरा कि पंचम ने चिल्लाते हुए कहा, "यह लड़का ने क्या कमाल किया है, संतूर पे मींड लाया है!" पंचम ख़ुद भी एक प्रयोगधर्मी संगीतकार थे, इसलिए पंडित बापट के साथ उनकी ट्युनिंग् ख़ूब जमी। 1987 के प्राइवेट ऐल्बम ’दिल पड़ोसी है’ में भी इसी मींड पद्धति का प्रयोग किया गया है। पंचम के अलावा पंडित बापट ने कई और संगीतकारों के गीतों में भी बजाया है जिनमें एक उल्लेखनीय नाम है रवीन्द्र जैन का। उनके साथ पहली बार 1979 की फ़िल्म ’सुनैना’ के पार्श्व-संगीत में उन्होंने बजाया। ’राम तेरी गंगा मैली’ के गीतों और पार्श्व-संगीत में भी पंडित बापट के सुमधुर संतूर के पीसेस सुनाई देते हैं। रवीन्द्र जैन के साथ उन्होंने लगभग 40 फ़िल्मों में काम किया है। पंडित उल्हास बापट ने 2004 की फ़िल्म ’वीर ज़ारा’ में भी बजाया, फ़िल्म के मुख्य गीत "तेरे लिए हम हैं जिये" के शुरुआती संगीत में ही उनके संतूर की ध्वनियों ने ऐसा समा बांधा कि सुनने वाले उसमें बहते चले गए। एक लम्बी बीमारी के बाद पंडित बापट इस दुनिया-ए-फ़ानी से कूच कर गए, पर पीछे छोड़ गए संतूर और संगीत का एक ऐसा ख़ज़ाना जो आने वाली पीढ़ियों को मार्ग दिखाता रहेगा। पंडित उल्हास बापट की पुण्य स्मृति को ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ का विनम्र नमन!


राहुल देव बर्मन के संगीत में कई महत्वपूर्ण साज़िन्दों, संगीत संयोजकों और सहायकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। मारुति राव, होमी मुल्ला, रणजीत गज़मर, बासुदेव चक्रबर्ती, मनोहारी सिंह, फ़्रैंको वाज़, रमेश अय्यर के साथ साथ एक महत्वपूर्ण नाम अमृतराव काटकर का भी है। अमृतराव काटकर एक ऐसे संगीत शिल्पि थे जो पंचम के साथ शुरु से ही जुड़े हुए थे और पंचम के ’रेसो-रेसो’ (Reso Reso) नामक वाद्य में जान फूंकने का श्रेय अमृतराव को जाता है। 15 जनवरी 2018 को अमृतराव काटकर के इस दुनिया-ए-फ़ानी से चले जाने से पंचम बैण्ड का एक और महत्वपूर्ण सदस्य हमसे बिछड़ गया। पंचम के गीतों में इस वाद्य का जितना प्रयोग हुआ, शायद ही किसी अन्य संगीतकार के गीतों में उससे पहले हुआ होगा। और इस दिशा में अमृतराव साहब का महत्वपूर्ण योगदान रहा। रेसो-रेसो मूलत: एक अफ़्रीकन वाद्य है जिसे ’स्क्रेपर’ (scraper) भी कहा जाता है। इस वाद्य को अतिरिक्त या सहायक रीदम के तौर पर प्रयोग किया जाता है जिससे कि मूल ताल या रीदम को अतिरिक्त धार या तिगुना गति मिल जाती है। रेसो वाद्य खोखले बाँस का बना होता है, एक पाइप के आकार में। निर्धारित दूरियों पर स्केल चिन्हित किया जाता है। जब इसका इस्तमाल कंघी जैसे किसी सपाट स्ट्रिप के साथ किया जाता है तो इससे बहुत ही तीक्ष्ण ध्वनि उत्पन्न होती है। इस अतिरिक्त रीदम को ’साइड रीदम’ भी कहा जाता है। पंचम के गीतों में साइड रीदम के लिए रेसो के अलावा खंजिरी, कब्बाज़ आदि का प्रयोग भी काफ़ी हुआ है। उनके गीतों में रेसो का प्रयोग 1965 की फ़िल्म ’तीसरी मंज़िल’ के गीतों से ही शुरु हो गया था। "आजा आजा मैं हूँ प्यार तेरा", "ओ मेरे सोना रे" और "ओ हसीना ज़ुल्फ़ों वाली" में रेसो का साइड रीदम में इस्तमाल महसूस किया जा सकता है। लेकिन जिस गीत में रेसो का प्रयोग सबसे ज़्यादा प्रॉमिनेण्ट रहा, वह था "मेरे सामने वाली खिड़की में"। इस गीत की शुरुआत में किशोर कुमार के आलाप और उन सात खंबों के बाद रेसो ही पूरे रीदम पर हावी रहता है। यूं तो रेसो को मुख्य रीदम के सहारे के रूप में प्रयोग किया जाता है, लेकिन पंचम ने उल्टा रुख़ अपनाया और रेसो को ही रीदम का मुख्य वाद्य बना लिया। ’पड़ोसन’ के इस गीत में केश्टो मुखर्जी द्वारा झाड़ू पर कंघी बजाने वाले जगह में दरसल रेसो पर कंघी पा प्रयोग होता है।

पंचम के गीतों में रेसो के महत्वपूर्ण प्रयोग के बारे में हमने जाना, लेकिन इन सब के पीछे जिस व्यक्ति का सबसे बड़ा योगदान रहा है, वो अमृतराव काटकर हैं, जिन्हें सभी प्यार से अमृत काका कह कर बुलाते थे। वो असल में एक तबला वादक थे लेकिन पंचम और उनके रीदम सेक्शन के प्रमुख मारुतिराव कीरजी ने उन्हें रेसो वादक बना दिया। अमृतराव ने इस चुनौती को स्वीकार किया और जल्दी ही उन्होंने एक अपना अलग स्टाइल बना लिया रेसो के इस्तमाल का। उन्होंने इस विधा में ऐसी महारथ हासिल की कि आज वो भारत के शीर्ष के रेसो वादक के रूप में जाने जाते हैं। एक तबला वादक को रेसो वादक के रूप में स्थापित करने में पंचम और उनके गीतों का बड़ा हाथ रहा है। कंघी बजाने जैसी आवाज़ें पंचम के गीतों में कई बार सुनने को मिला है, जो रेसो की ध्वनियाँ हैं, और इन सबके पीछे हैं अमृतराव काटकर। ’कटी पतंग’ के "मेरा नाम है शबनम" गीत तो पूर्णत: रेसो और बॉंगो पर आधारित है। फ़िल्म ’सागर’ का गीत "सच मेरे यार है" भी तो रेसो से ही शुरु होता है। अमृतराव ने 1982-83 के आसपास रेसो के प्रयोग में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया। गीत था ’सनम तेरी कसम’ का "जानेजाँ ओ मेरी जानेजाँ"। पारम्परिक बाँस के बने रेसो के स्थान पर वो लेकर आए धातु से बना रेसो। गीत के दूसरे इन्टरल्युड संगीत में इस नए रेसो को सुना व महसूस किया जा सकता है। 

यूं तो एक अफ़्रीकन साज़ होने की वजह से रेसो का इस्तमाल साधारणत: उन गीतों में होता है जो तेज़ गति या तेज़ रीदम का हो, या कैबरे किस्म का कोई गीत हो, लेकिन पंचम और अमृतराव ने मिल कर रेसो को शास्त्रीय संगीत आधारित रचनाओं में भी प्रयोग किया और इस तरह के गीतों को एक नया रूप मिला। ’ख़ूबसूरत’ फ़िल्म के गीत "पिया बावरी पी कहाँ", ’अमर प्रेम’ के गीत "चिंगारी कोई भड़के तो सावन उसे बुझाये", ’जुर्माना’ के गीत "सावन के झूले पड़े तुम चले आओ" और ’महबूबा" के गीत "मेरे नैना सावन भादों" में रेसो का प्रयोग करके इन दोनों ने सभी को चमत्कृत कर दिया। कितने आश्चर्य की बात है कि पंचम की पुण्यतिथि 4 जनवरी है और उनके ये दिग्गज साज़िंदे भी जनवरी के महीने में ही इस फ़ानी दुनिया को छोड़ कर जा रहे हैं। 4 जनवरी को पंडित उल्हास बापट और 15 जनवरी को अमृतराव काटकर के चले जाने से यूं लगा कि जैसे ये दोनों पंचम से ही फिर एक बार मिलने के लिए अपनी अपनी अनन्त यात्रा पर निकल पड़े हों। इन दो महान संगीत साधकों को ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ करती है झुक कर सलाम!


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Tuesday, January 23, 2018

रोटी या पाप: विष्णु प्रभाकर

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में दूधनाथ सिंह की कहानी सरहपाद का निर्गमन का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं विष्णु प्रभाकर की "रोटी या पाप", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 33 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानी, उपन्यास, नाटक, धारावाहिक, प्रहसन, झलकी, एकांकी, या लघुकथा को स्वर देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।


मेरे जीने के लिए सौ की उमर छोटी है
~विष्णु प्रभाकर (12 जून 1912 - 11 अप्रैल 2009)



हर सप्ताह यहीं पर सुनिए एक नयी कहानी

"सेठ शांतिलाल की मोटर वहाँ आकर रुक चुकी थी।"
(विष्णु प्रभाकर की "रोटी या पाप" से एक अंश)


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रोटी या पाप mp3

#Third Story: Roti Ya Paap; Author: Vishnu Prabhakar; Voice: Anurag Sharma; Hindi Audio Book/2018/3.

Sunday, January 21, 2018

राग भूपाली : SWARGOSHTHI – 353 : RAG BHUPALI




स्वरगोष्ठी – 353 में आज

पाँच स्वर के राग – 1

भूपाली की बन्दिश 'तू करीम करतार जगत को...' और फिल्म गीत 'ज्योतिकलश छलके...' सुनिए




उस्ताद राशिद खाँ
लता मंगेशकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी नई श्रृंखला – “पाँच स्वर के राग” की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों पर चर्चा करेंगे जिनमें केवल पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में रागों के गायन अथवा वादन की प्राचीन परम्परा है। संगीत के सिद्धान्तों के अनुसार राग की रचना स्वरों पर आधारित होती है। विद्वानों ने बाईस श्रुतियों में से सात शुद्ध अथवा प्राकृत स्वर, चार कोमल स्वर और एक तीव्र स्वर; अर्थात कुल बारह स्वरो में से कुछ स्वरों को संयोजित कर रागों की रचना की है। सात शुद्ध स्वर हैं; षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। इन स्वरों में से षडज और पंचम अचल स्वर माने जाते हैं। शेष में से ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वरों के शुद्ध स्वर की श्रुति से नीचे की श्रुति पर कोमल स्वर का स्थान होता है। इसी प्रकार शुद्ध मध्यम से ऊपर की श्रुति पर तीव्र मध्यम स्वर का स्थान होता है। संगीत के इन्हीं सात स्वरों के संयोजन से रागों का आकार ग्रहण होता है। किसी राग की रचना के लिए कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वर की आवश्यकता होती है। जिन रागों में केवल पाँच स्वर का प्रयोग होता है, उन्हें औड़व जाति, जिन रागों में छः स्वर होते हैं उन्हें षाडव जाति और जिनमें सातो स्वर प्रयोग हों उन्हें सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। रागों की जातियों का वर्गीकरण राग के आरोह और अवरोह में लगने वाले स्वरों की संख्या के अनुसार कुल नौ जातियों में किया जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे रागों पर चर्चा करेंगे जिनके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। ऐसे रागों को औड़व-औड़व जाति का राग कहा जाता है। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग भूपाली का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन कराने के लिए सुप्रसिद्ध विद्वान उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में इस राग की एक खयाल रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। अनेक फिल्मी गीतों में राग भूपाली का प्रयोग किया गया है। इस राग पर आधारित 1961 में प्रदर्शित फिल्म “भाभी की चूड़ियाँ” से एक गीत –“ज्योतिकलश छलके...” लता मंगेशकर के स्वर में सुनवा रहे हैं।



संगीतकार सुधीर फडके
राग भूपाली, कल्याण थाट का आश्रय राग माना जाता है। संगीत के ग्रन्थों में यह राग भूप या भोपाली नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। राग भूपाली औड़व जाति का राग है, जिसमें मध्यम और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। राग भूपाली का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। रात्रि का पहला प्रहर इस राग के गायन-वादन का समय होता है। अब हम आपको राग भूपली के स्वरों में पिरोया एक मधुर फिल्मी गीत- ‘ज्योतिकलश छलके...’ सुनवाते हैं। यह गीत 1961 में प्रदर्शित फिल्म ‘भाभी की चूड़ियाँ’ से है, जिसे लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। इसके संगीतकार सुधीर फडके और गीतकार हैं पण्डित नरेन्द्र शर्मा। जाने-माने संगीत समीक्षक और ‘संगीत’ मासिक पत्रिका के परामर्शक डॉ. मुकेश गर्ग ने इस गीत पर एक सार्थक टिप्पणी की है, जिसे आज हम इस गीत के साथ रेखांकित कर रहे हैं। “सुधीर फड़के और नरेन्द्र शर्मा की कालजयी कृति। कैसे अद्भुत कम्पोजर और गायक थे सुधीर फड़के! रचना के बीच में उनके बोल-आलाप बताते हैं कि शब्दों को वह सिर्फ़ धुन में नहीं बाँधते, शब्द की सीमा से परे जा कर उसके अर्थ का अपनी गायकी से विस्तार भी करते हैं। इसी गीत को जब लता मंगेशकर गाती हैं तो हमें दाँतों-तले उँगली दबानी पड़ती है। सुधीर जी तो इसके संगीत-निर्देशक थे। इसलिए अपनी गायकी के अनुसार उन्होंने उसे रचा और गाया भी। पर लता दूसरे की रचना को कण्ठ दे रही हैं। ऐसी स्थिति में उन्होंने सुधीर जी की रचना में सुरों के अन्दर जो बारीक़ कारीगरी की है वह समझने से ताल्लुक़ रखती है। सुरों की फेंक, ऊर्जा, कोमलता और सूक्ष्म नक़्क़ाशी के कलात्मक मेल का यह स्तर हमें सिर्फ़ लता मंगेशकर में देखने को मिलता है। अन्य सभी गायिकाएँ तो उन्हें बस छूने की कोशिश ही कर पाती हैं।“ आइए, अब आप राग भूपाली में पिरोया यह मधुर फिल्मी गीत सुनिए।

राग भूपाली : “ज्योतिकलश छलके...” : लता मंगेशकर : फिल्म – भाभी की चूड़ियाँ


थाट कल्याण म नी वर्जित, मानत ग स्वर वादी,
प्रथम प्रहर निशि गाइए, धैवत स्वर संवादी।

रात्रि के प्रथम प्रहर में गाने-बजाने के लिए उपयुक्त राग भूपाली, कल्याण थाट का राग माना जाता है। इसके आरोह और अवरोह में मध्यम और निषाद स्वर वर्जित होता है। अर्थात यह औड़व-औड़व जाति का राग है। राग भूपाली का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। यह राग पूर्वांग प्रधान है, अर्थात इसका चलन अधिकतर मन्द्र और मध्य सप्तकों के पहले भाग में होता है। इन्हीं स्वरों को यदि उत्तरांग प्रधान कर दिया जाय तो यह राग देशकार का स्वरूप बन जाता है। राग भूपाली और देशकार में एक सा ही स्वर प्रयोग किया जाता है, परन्तु वादी-संवादी स्वरों के बदल जाने से राग बदल जाता है। भूपाली में वादी-संवादी क्रमशः गान्धार और धैवत होता जबकि देशकार में धैवत और गान्धार हो जाता है। राग भूपाली में गान्धार और पंचम स्वर पर न्यास होता है, किन्तु धैवत पर कभी भी न्यास नहीं होता, जबकि राग देशकार में पंचम, धैवत और तार सप्तक के षडज पर न्यास होता है, किन्तु गान्धार स्वर पर कभी भी न्यास नहीं होता। दोनों रागों में समान स्वर लगने के बावजूद पूर्वांग और उत्तरांग प्रधान होने के कारण दोनों रागों में अन्तर हो जाता है। राग भूपाली के शास्त्रीय स्वरूप का अनुभव करने के लिए आइए, अब हम इस राग की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद राशिद खाँ से सुनते हैं। तीनताल में निबद्ध इस खयाल रचना के बोल हैं, “तू करीम करतार जगत को...”। आप यह बन्दिश सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।

राग भूपाली : “तू करीम करतार जगत को...” : उस्ताद राशिद खाँ




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 353वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा दो प्रश्न का उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 360वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा के साथ ही उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।






1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस सुपरिचित पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 27 जनवरी, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 355वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 351वीं कड़ी में हमने आपके लिए कोई भी पहेली नहीं दी थी। इस अंक में पहेली न पूछे जाने के कारण हम पहेली का सही हल और विजेताओं के नाम की घोषणा नहीं कर रहे हैं। 354वें अंक से हम पिछली पहेली का हल और विजेताओं के नाम पूर्ववत प्रकाशित करेंगे।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ हो चुकी नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” के इस अंक में आपने राग भूपाली का परिचय प्राप्त किया। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने लिए उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में इस राग की एक बन्दिश का रसास्वादन किया। राग भूपाली के स्वरों का उपयोग करते हुए अनेक फिल्मी गीत भी रचे गए हैं। आज आपने फिल्म “भाभी की चूड़ियाँ” से राग भूपली पर आधारित गीत भी सुना। अगले अंक में पाँच स्वर के किसी अन्य राग पर आपसे चर्चा करेंगे। इस नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, January 20, 2018

चित्रकथा - 52: वर्ष 2017 के श्रेष्ठ फ़िल्मी गीत

अंक - 52

वर्ष 2017 के श्रेष्ठ फ़िल्मी गीत


"मैं फिर भी तुमको चाहूंगा..." 




’रेडियो प्लेबैक इन्डिया’ के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! मित्रों, आज मेरी और आपकी यह मुलाक़ात वर्ष 2018 की पहली मुलाक़ात है, इसलिए सबसे पहले मैं आप सभी को नववर्ष 2018 की हार्दिक शुभकमानाएँ देता हूँ, और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि यह वर्ष आप सभी के जीवन में सफलता, उत्तर स्वास्थ्य और ख़ुशियाँ ले आए। वर्ष 2017 के समाप्त होते ही ’चित्रकथा’ का भी एक वर्ष पूरा हो गया। मुझे बेहद ख़ुशी है कि आप सभी को यह स्तंभ पसंद आया और समय-समय पर अपनी मूल्यवान प्रतिक्रियाओं से इस स्तंभ को और भी बेहतर बनाने के लिए मेरा हौसला अफ़ज़ाई किया। मैं आपको आश्वस्त करता हूँ कि वर्ष 2018 में भी इस स्तंभ में आप बहुत से रोचक लेख पढ़ पाएंगे जो फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत के अलग अलग पहलुयों को उजागर करेंगे। लेकिन आज ’चित्रकथा’ की इस साल की पहली कड़ी में हम ज़रा पीछे मुड़ कर देखना चाहेंगे। 2017 में प्रकाशित ’चित्रकथा’ के अंकों पर ग़ौर किया जाए तो हम पाएंगे कि इन्हें हम चार भागों में बाँट सकते हैं। पहले भाग में वो तमाम श्रद्धांजलि के अंक आते हैं जिन कलाकारों का पिछले वर्ष निधन हुआ है। इनमें शामिल हैं अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ान, किशोरी अमोनकर, पंडित जयराम आचार्य, विनोद खन्ना, उस्ताद रईस ख़ान, रीमा लागू, रॉजर मूर, सबिता चौधरी, शिवराज, चेस्टर बेनिंग्टन, क्रिस कॉरनेल, इन्दर कुमार, ज़फ़र गोरखपुरी, शकीला और मीना कपूर। इनके अलावा जिन प्रयात कलाकारों पर हम श्रद्धांजलि एपिसोड प्रकाशित नहीं कर सके, उन्हें हमने साल के अन्त में विशेषांक ’बिछड़े सभी बारी बारी’ में याद किया। इनमें शामिल हैं ओम पुरी, टॉम ऑल्टर, कुन्दन शाह, लेख टंडन, राम मुखर्जी, मोहन कुमार, श्यामा, बहादुर नानजी और शशि कपूर। 

’चित्रकथा’ के दूसरे भाग में आता है 2017 में प्रदर्शित हिन्दी फ़िल्मों के गीत-संगीत की समीक्षा के चार एपिसोड्स - जनवरी से मार्च, अप्रैल से जून, जुलाई-अगस्त तथा सितंबर से दिसंबर। तीसरा हिस्सा है ’फ़िल्म जगत के इस दशक के नवोदित नायक’ श्रॄंखला जिसकी कुल आठ कड़ियाँ प्रकाशित हुई हैं पिछले साल। 2018 में भी यह श्रॄंखला जारी रहेगी। और 2017 के ’चित्रकथा’ के चौथे भाग में शामिल हैं फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत के विभिन्न पहलुयों पर शोधालेख, जिनमें उल्लेखनीय रहे - "बिमल राय की मृत्यु की अजीबोग़रीब कहानी", "महेन्द्र कपूर के गाए देशभक्ति फ़िल्मी गीत", "आशा भोसले के बाद ओ.पी. नय्यर की पार्श्वगायिकाएँ", "गुलज़ार के गीतों में विरोधाभास", "फ़िल्मी गीतों में I love you", "शकील बदायूनी के लिखे होली गीत", "फ़िल्मों में ’मेरा रंग दे बसन्ती चोला’", "1997 की तीन फ़िल्मों में तीसरे लिंग का सकारात्मक चित्रण", "अप्रैल फ़ूल पर बनी देश विदेश की फ़िल्में", "नक्श ल्यालपुरी के लिखे 60 मुजरे", "फ़िल्म-संगीत में उत्तर प्रदेश का लोक संगीत", "ॠषिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों में मुकेश के गाए गीत", "हाल के फ़िल्मी गीतों में शास्त्रीय रागों की छाया", "रामायण पर बनी पाँच हिन्दी फ़िल्में", "फ़िल्म संगीत में भाई-बहन की जोड़ियाँ", "फ़िल्मी गीतों में पहेलियाँ", "हिन्दी फ़िल्मों में मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लें", और "फ़िल्मी गीतों में मुहावरों का प्रयोग"। इनके अलावा गुज़रे ज़माने की अदाकारा आशालता बिस्वास की पुत्री शिखा बिस्वास वोहरा से बातचीत और गुज़रे ज़माने के संगीतकार बसन्त प्रकाश के पुत्र ऋतुराज सिसोसिया से बातचीत भी प्रकाशित हुई।




मित्रों, आज हम ’चित्रकथा’ में पिछले साल पर नज़र डाल रहे हैं। तो क्यों ना पिछले साल की फ़िल्मों के कुछ अच्छे गीतों को दोबारा सुन लिया जाए। इसके लिए हमने ’रेडियो प्लेबैक इन्डिया’ के सदस्यों से उनकी पसन्द जानने की कोशिश की। सजीव सारथी, संज्ञा टंडन, पूजा अनिल और आपके इस दोस्त सुजॉय चटर्जी की मिली-जुली पसन्द को ध्यान में रखते हुए हम वर्ष 2017 के 25 श्रेष्ठ गीतों की सूची पर पहुँचे। ये 25 गीत किसी पायदान रूपी क्रम में नहीं सजाए गए हैं, और ना ही हम किसी काउन्टडाउन के स्वरूप में इन्हें पेश कर रहे हैं। बस यूं समझ लीजिए कि ’रेडियो प्लेबैक इन्डिया’ के सदस्यों द्वारा चुने गए वर्ष 2017 की ये श्रेष्ठ रचनाएँ हैं। तो आइए वर्ष 2018 के ’चित्रकथा’ स्तंभ की पहली कड़ी में नज़र डालें बीते बरस 2017 के श्रेष्ठ हिन्दी फ़िल्मी गीतों पर। गीत के बोल पर क्लिक करके इन गीतों को सुना जा सकता है।

1. एन्ना सोणा तैणु रब ने बनाया

फ़िल्म - ओके जानू
गायक - अरिजीत सिंह
गीतकार - गुलज़ार
संगीतकार - ए. आर. रहमान


2. ज़ालिमा

फ़िल्म - रईस
गायक - अरिजीत सिंह, हर्षदीप कौर
गीतकार - अमिताभ भट्टाचार्य
संगीतकार - JAM8


3. ओ रे रंगरेज़ा

फ़िल्म - जॉनी एल एल बी 2
गायक - सुखविंदर सिंह, मुर्तुज़ा मुस्तफ़ा, क़ादिर मुस्तफ़ा
गीतकार - जुनैद वासी
संगीतकार - विशाल खुराना


4. बावरा मन राह ताके तरसे रे

फ़िल्म - जॉनी एल एल बी 2
गायक - जुबिन नौटियाल, नीति मोहन, रीक चक्रवर्ती
गीतकार - जुनैद वासी
संगीतकार - चिरंतन भट्ट


5. ये इश्क़ है

फ़िल्म - रंगून
गायक - अरिजीत सिंह
गीतकार - गुलज़ार
संगीतकार - विशाल भारद्वाज


6. तूने ही मुझे बरबाद किया है

फ़िल्म - अनारकली ऑफ़ आरा
गायक - स्वाति शर्मा
गीतकार - डॉ. सागर
संगीतकार - रोहित शर्मा


7. ओ रे कहारों

फ़िल्म - बेगम जान
गायक - कल्पना पटवारी, अल्तमश फ़रीदी
गीतकार - कौसर मुनीर
संगीतकार - अनु मलिक


8. तिनका तिनका

फ़िल्म - ट्युब लाइट
गायक - राहत फ़तेह अली ख़ान
गीतकार - कौसर मुनीर
संगीतकार - प्रीतम


9. ग़लती से मिसटेक

फ़िल्म - जग्गा जासूस
गायक - अरिजीत सिंह, अमित मिश्र
गीतकार - अमिताभ भट्टाचार्य
संगीतकार - प्रीतम


10. हवायें

फ़िल्म - जब हैरी मेट सेजल
गायक - अरिजीत सिंह
गीतकार - इरशाद कामिल
संगीतकार - प्रीतम


11. नज़्म नज़्म 

फ़िल्म - बरेली की बरफ़ी
गायक - ऑर्को
गीतकार - ऑर्को
संगीतकार - ऑर्को


12. बर्फ़ानी

फ़िल्म - बाबूमोशाइ बन्दूकबाज़
गायक - अरमान मलिक
गीतकार - ग़ालिब असद भोपाली
संगीतकार - गौरव दगाँवकर, देबोज्योति मिश्र, जोएल


13. मेरे रश्क़-ए-क़मर

फ़िल्म - बादशाहो
गायक - नुसरत फ़तेह अली ख़ान, राहत फ़तेह अली ख़ान
गीतकार - नुसरत फ़तेह अली ख़ान, मनोज मुन्तशिर
संगीतकार - नुसरत फ़तेह अली ख़ान, तनिष्क बागची


14. कान्हा

फ़िल्म - शुभ मंगल सावधान
गायक - शाशा तिरुपति
गीतकार - तनिष्क - वायु
संगीतकार - तनिष्क - वायु


15. मैं कौन हूँ

फ़िल्म - सीक्रेट सुपरस्टार
गायक - मेघना मिश्र
गीतकार - कौसर मुनीर
संगीतकार - अमित त्रिवेदी


16. तू बन जा गली बनारस की

फ़िल्म - शादी में ज़रूर आना
गायक - असित त्रिपाठी, शशि
गीतकार - शकील आज़मी
संगीतकार - राशिद ख़ान


17. जोगी

फ़िल्म - शादी में ज़रूर आना
गायक - यासिर देसाई, आकांशा शर्मा
गीतकार - ऑर्को
संगीतकार - ऑर्को


18. दिल दिया गल्लां

फ़िल्म - टाइगर ज़िन्दा है
गायक - आतिफ़ असलम
गीतकार - इरशाद कामिल
संगीतकार - विशाल-शेखर


19. कान्हा सो जा ज़रा

फ़िल्म - बाहूबली 2
गायक - मधुश्री
गीतकार - मनोज मुन्तशिर
संगीतकार - एम. एम. क्रीम


20. मैं फिर भी तुमको चाहूंगा

फ़िल्म - हाफ़ गर्लफ़्रेण्ड
गायक - अरिजीत सिंह, शाशा तिरुपति
गीतकार - मनोज मुन्तशिर
संगीतकार - मिथुन


21. जाने दे

फ़िल्म - क़रीब क़रीब सिन्गल
गायक - आतिफ़ असलम, विशाल मिश्र
गीतकार - राज शेखर
संगीतकार - विशाल किश्र


22. मैं तेरे क़ाबिल हूँ या तेरे क़ाबिल नहीं

फ़िल्म - क़ाबिल
गायक - जुबिन नौटियाल, पलक मुछाल
गीतकार - नासिर फ़राज़
संगीतकार - राजेश रोशन


23. माना के हम यार नहीं

फ़िल्म - मेरी प्यारी बिंदु
गायक - परिनीति चोपड़ा
गीतकार - कौसर मुनीर
संगीतकार - सचिन-जिगर


24. आए बिदेसिया मोरे द्वारे

फ़िल्म - वेडिंग् ऐनिवर्सरी
गायक - उस्ताद राशिद ख़ान, शीर्षा चक्रवर्ती
गीतकार - मानवेन्द्र
संगीतकार - अभिषेक राय


25. बाबुल मोरा नैहर छूट ही जाए

फ़िल्म - पूर्णा
गायक - अरिजीत सिंह
गीतकार - अमिताभ भट्टाचार्य
संगीतकार - सलीम-सुलेमान


तो दोस्तों, ये था इस साल का पहला ’चित्रकथा’ का अंक। आशा है वर्ष 2017 के इन चुनिन्दा गीतों को सुन कर आपको आनन्द आया होगा। अगले सप्ताह से हम ’चित्रकथा’ के सफ़र को आगे बढ़ाएंगे नए नए अंकों के साथ। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार!


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Tuesday, January 16, 2018

सरहपाद का निर्गमन: दूधनाथ सिंह

इस लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम आपको सुनवाते रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने सलिल वर्मा के स्वर में गिरिजेश राव की कहानी डेट सुनी थी।

11 जनवरी 2018, गुरुवार की रात को हिंदी के वरिष्ठ कथाकार, कवि व आलोचक दूधनाथ सिंह का 81 वर्ष की आयु में निधन हो गया। स्वर्गीय दूधनाथ सिंह लगभग एक वर्ष से प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित थे और उन्हें चार जनवरी को तबीयत बिगड़ने पर इलाहाबाद के एक निजी अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। प्रसिद्ध साहित्यकार दूधनाथ सिंह जी को विनम्र श्रद्धांजलि देते हुए आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं उनकी एक कहानी सरहपाद का निर्गमन जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

प्रस्तुत कथा का गद्य "हिंदी समय" पर उपलब्ध है। "सरहपाद का निर्गमन" का कुल प्रसारण समय 6 मिनट, 1 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिकों, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।


दूधनाथ सिंह
(17 अक्टूबर 1936 :: 11 जनवरी 2018)

सोबंथा, बलिया (उत्तर प्रदेश) में जन्मे प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार दूधनाथ सिंह की साहित्यिक यात्रा में 'निष्कासन','आखिरी कलाम', 'सपाट चेहरे वाला आदमी', 'भाई का शोकगीत' आदि उल्लेखनीय हैं। वे भारत भारती सम्मान, भारतेंदु सम्मान, शरद जोशी स्मृति सम्मान, कथाक्रम सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान आदि से सम्मानित किये गये थे।



"बोलती कहानियाँ" में हर सप्ताह सुनें एक नयी कहानी

वे उस ओर बढ़ते गए, जिधर चौदह वर्षीय वह दलित बालिका झाड़ू लगा रही थी।
(दूधनाथ सिंह की "सरहपाद का निर्गमन" से एक अंश)


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यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:


#Second Story, Author: Doodhnath Singh, Voice: Anurag Sharma, Hindi Audio Book/2018/2.

Monday, January 15, 2018

फिल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड 23 || नन्दा

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 23
Nanda


फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के 23वें एपिसोड में सुनिए कहानी खूबसूरत नंदा की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....




फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -

Sunday, January 14, 2018

वर्ष के महाविजेता - 2 : SWARGOSHTHI – 352 : MAHAVIJETA OF THE YEAR - 2




स्वरगोष्ठी – 352 में आज

महाविजेताओं की प्रस्तुतियाँ – 2

संगीत पहेली के महाविजेताओं क्षिति, हरिणा और प्रफुल्ल की प्रस्तुतियों से अभिनन्दन





क्षिति तिवारी
डी.हरिणा माधवी
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का नए वर्ष के दूसरे अंक में कृष्णमोहन मिश्र की ओर से हार्दिक अभिनन्दन है। पिछले अंक में हमने आपसे ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के बीते वर्ष की कुछ विशेष गतिविधियों की चर्चा की थी। साथ ही पहेली के चौथे और पाँचवें महाविजेता डॉ. किरीट छाया और विजया राजकोटिया से आपको परिचित कराया था और उनकी प्रस्तुतियों को भी सुनवाया था। इस अंक में भी हम गत वर्ष की कुछ अन्य गतिविधियों का उल्लेख करने के साथ ही संगीत पहेली के प्रथम, द्वितीय और तृतीय महाविजेताओं की घोषणा करेंगे और उनका सम्मान भी करेंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के पाठक और श्रोता जानते हैं कि इस स्तम्भ के प्रत्येक अंक में संगीत पहेली के माध्यम से हम हर सप्ताह भारतीय संगीत से जुड़े तीन प्रश्न देकर पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए आपसे कम से कम दो प्रश्नों का उत्तर पूछते हैं। आपके दिये गये सही उत्तरों के प्राप्तांकों की गणना दो स्तरों पर की जाती है। ‘स्वरगोष्ठी’ की दस-दस कड़ियों को पाँच सत्रों (सेगमेंट) में बाँट कर और फिर वर्ष के अन्त में सभी पाँच सत्रों के प्रतिभागियों के प्राप्तांकों की गणना की जाती है। वर्ष 2017 की संगीत पहेली में अनेक प्रतिभागी नियमित रूप से भाग लेते रहे। 349वें अंक की पहेली के परिणाम आने तक शीर्ष के पाँच महाविजेता चुने गए। चौथे और पाँचवें महाविजेता का सम्मान हम पिछले अंक में कर चुके हैं। आज के अंक में हम प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान के महाविजेताओं क्रमशः, क्षिति तिवारी, हरिणा माधवी और प्रफुल्ल पटेल का अभिनन्दन करेंगे और उनकी प्रस्तुतियाँ सुनवाएँगे।



र्ष 2017 की संगीत पहेली में सर्वाधिक 98 अंक अर्जित कर मध्यप्रदेश की क्षिति तिवारी ने प्रथम महाविजेता होने का सम्मान प्राप्त किया है। यह तथ्य भी रेखांकन के योग्य हैं कि सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाली दोनों प्रतिभागी महिलाएँ हैं और संगीत की कलाकार और शिक्षिका भी है। संगीत पहेली में प्रथम महाविजेता होने का सम्मान प्राप्त करने वाली जबलपुर, मध्यप्रदेश की श्रीमती क्षिति तिवारी की संगीत शिक्षा लखनऊ और कानपुर में सम्पन्न हुई। लखनऊ के भातखण्डे संगीत महाविद्यालय से गायन में प्रथमा से लेकर विशारद तक की परीक्षाएँ उत्तीर्ण की। बाद में इस संस्थान को विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त हुआ, जहाँ से उन्होने संगीत निपुण और उसके बाद ठुमरी गायन मे तीन वर्षीय डिप्लोमा भी प्राप्त किया। इसके अलावा कानपुर के वरिष्ठ संगीतज्ञ पण्डित गंगाधर राव तेलंग जी के मार्गदर्शन में खैरागढ़, छत्तीसगढ़ के इन्दिरा संगीत कला विश्वविद्यालय की संगीत स्नातक और स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। क्षिति जी के गुरुओं में डॉ. गंगाधर राव तेलंग के अलावा पण्डित सीताशरण सिंह, पण्डित गणेशप्रसाद मिश्र, डॉ. सुरेन्द्र शंकर अवस्थी, डॉ. विद्याधर व्यास और श्री विनीत पवइया प्रमुख हैं। क्षिति को स्नातक स्तर पर भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से ग्वालियर घराने की गायकी के अध्ययन के लिए छात्रवृत्ति भी मिल चुकी है। कई वर्षों तक लखनऊ के महिला कालेज और जबलपुर के एक दिवयांग बच्चों के विद्यालय मे माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा देने के बाद वर्तमान में जबलपुर के ‘महाराष्ट्र संगीत महाविद्यालय’ में संगीत गायन की शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं। ध्रुपद, खयाल, ठुमरी और भजन गायन के अलावा उन्होने प्रोफेसर कमला श्रीवास्तव से गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत लोक संगीत भी सीखा है, जिसे अब वह अपने विद्यार्थियों को बाँट रही हैं। क्षिति जी कथक नृत्य और नृत्य नाटिकाओं में गायन संगति की विशेषज्ञ हैं। सुप्रसिद्ध नृत्यांगना और भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय की प्रोफेसर कुमकुम धर और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कला संकाय की प्रोफेसर और नृत्यांगना विधि नागर के कई कार्यक्रमों में अपनी इस प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुकी हैं। आज के इस विशेष अंक में क्षिति तिवारी राग देश में निबद्ध एक चतुरंग प्रस्तुत कर रही हैं। संगीत के चार विभिन्न अंगों के समावेश से युक्त गीत को चतुरंग कहते हैं। तीनताल में निबद्ध इस चतुरंग के बोल हैं- “डारत मोपे रंग देखो बार बार...”। इस प्रस्तुति में तबले पर सोमनाथ सोनी और हारमोनियम पर अभिषेक पडवार ने संगति की है। लीजिए, अब आप यह चतुरंग सुनिए और प्रथम महाविजेता क्षिति तिवारी का अभिनन्दन कीजिए।

राग देश : चतुरंग : “डारत मोपे रंग देखो बार बार...” : क्षिति तिवारी


‘स्वरगोष्ठी’ की संगीत पहेली 2017 में 96 अंक प्राप्त कर चौथी महाविजेता बनीं हैं, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी। हम उन्हें सहर्ष सम्मानित करते हैं। “संगीत जीवन का विज्ञान है”, इस सिद्धान्त को केवल मानने वाली ही नहीं बल्कि अपने जीवन में उतार लेने वाली हरिणा जी दो विषयों की शिक्षिका का दायित्व निभा रही हैं। हैदराबाद के श्री साईं स्नातकोत्तर महाविद्यालय में विगत 16 वर्षो से स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं को लाइफ साइन्स पढ़ा रही हैं। इसके साथ ही स्थानीय वासवी कालेज ऑफ म्यूजिक ऐंड डांस से भी उनका जुड़ाव है, जहाँ विभिन्न आयुवर्ग के विद्यार्थियों का मार्गदर्शन भी करती हैं। हरिणा जी को प्रारम्भिक संगीत शिक्षा अपनी माँ श्रीमती वाणी दुग्गराजू से मिली। आगे चल कर अमरावती, महाराष्ट्र के महिला महाविद्यालय की संगीत विभागाध्यक्ष श्रीमती कमला भोंडे से विधिवत संगीत सीखना शुरू किया। हरिणा जी के बाल्यावस्था के एक और संगीत गुरु एम.वी. प्रधान भी थे, जो एक कुशल तबला वादक भी थे। इनके अलावा हरिणा जी ने गुरु किरण घाटे और आर. डी. जी. कालेज, अकोला के संगीत विभागाध्यक्ष श्री नाथूलाल जायसवाल से भी संगीत सीखा। हरिणा जी ने मुम्बई के अखिल भारतीय गन्धर्व महाविद्यालय से संगीत अलंकार की उपाधि प्राप्त की है। आज के इस विशेष अंक में हम ‘स्वरगोष्ठी के इस अंक के माध्यम से ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी संचालक और सम्पादक मण्डल के सदस्य, शिक्षिका और विदुषी डी. हरिणा माधवी का महाविजेता के रूप में हार्दिक अभिनन्दन करते हैं और आपको हरिणा जी की आवाज़ में राग पूरिया धनाश्री में एक द्रुत खयाल रचना सुनवाते हैं। इस खयाल रचना को हरिणा जी द्रुत एकताल में निबद्ध कर प्रस्तुत कर रही हैं। रचना के बोल हैं, -“बिन देखे चैन नाहीं...”

राग पूरिया धनाश्री : खयाल : “बिन देखे चैन नाहीं...” : डी. हरिणा माधवी



प्रफुल्ल पटेल
पहेली प्रतियोगिता में 94 अंक प्राप्त कर तीसरे महाविजेता बने हैं, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल। भारतीय शास्त्रीय संगीत में गहरी रुचि रखने वाले प्रफुल्ल पटेल न्यूजर्सी, अमेरिका में रहते हैं। साप्ताहिक स्तम्भ, ‘स्वरगोष्ठी’ को पसन्द करने वाले प्रफुल्ल जी शास्त्रीय संगीत के अलावा भारतीय लोकप्रिय संगीत भी रुचि के साथ सुनते हैं। इस प्रकार के संगीत से उन्हें गहरी रुचि है। परन्तु कहते हैं कि उन्हें पाश्चात्य संगीत ने कभी भी प्रभावित नहीं किया। पेशे से इंजीनियर भारतीय मूल के प्रफुल्ल जी पिछले पचास वर्षों से अमेरिका में रह रहे हैं। प्रफुल्ल जी स्वांतःसुखाय हारमोनियम बजाते हैं और स्वयं गाते भी है, किन्तु बताते हैं कि उनकी गायन और वादन का स्तर ‘स्वरगोष्ठी’ में प्रसारित गायन अथवा वादन जैसा नहीं है। जब हमने उनसे उनका गाया अथवा बजाया अथवा उनकी पसन्द का कोई ऑडियो क्लिप भेजने का अनुरोध किया तो उन्होने किसी एक कलाकार को चुनने में असमंजस के कारण संकोच के साथ टाल दिया। ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली में नियमित रूप से भाग लेने वाले प्रफुल्ल जी के संगीत-ज्ञान का अनुमान इस तथ्य से किया जा सकता है कि संगीत पहेली में 94 अंक अर्जित कर उन्होने वार्षिक महाविजेताओ की सूची तीसरे महाविजेता का सम्मान प्राप्त किया है। ‘स्वरगोष्ठी के आज के इस अंक के माध्यम से ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी संचालक और सम्पादक मण्डल के सदस्य, संगीत-प्रेमी प्रफुल्ल पटेल का महाविजेता के रूप में हार्दिक अभिनन्दन करते हैं और अपनी ओर से उनकी अभिरुचि का ध्यान रखते हुए हारमोनियम वाद्य का एकल वादन प्रस्तुत कर रहे हैं। वादक हैं, मिलिन्द कुलकर्णी। हारमोनियम जैसे संगति वाद्य पर श्री कुलकर्णी राग जनसम्मोहिनी में आलाप, जोड़ और झाला प्रस्तुत कर रहे हैं। आप इस मोहक वादन का रसास्वादन कीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। इस अंक से हमारी पहेली प्रतियोगिता पुनः आरम्भ हो रही है। आप सभी इसमें भाग लेना न भूलिए।

राग जनसम्मोहिनी : हारमोनियम पर एकल वादन : मिलिन्द कुलकर्णी




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 352वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा दो प्रश्न का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 360वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा भी की जाएगी।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 20 जनवरी, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 354वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 350वीं कड़ी में हमने आपके लिए कोई भी पहेली नहीं दी थी। इस अंक और अगले अंक में पहेली न पूछे जाने के कारण हम पहेली का सही हल और विजेताओं के नाम की घोषणा नहीं कर रहे हैं। 354वें अंक से हम इस अंक की पहेली का हल और विजेताओं के नाम पूर्ववत प्रकाशित करेंगे।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में भी आपने पहेली के महाविजेताओं के संगीत का रसास्वादन किया। अगले अंक से हम एक नई श्रृंखला शुरू कर रहे हैं। इस नई श्रृंखला का शीर्षक होगा “पाँच स्वर के राग”। इस श्रृंखला और आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिय

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