Sunday, February 28, 2016

राग नन्द : SWARGOSHTHI – 259 : RAG NAND


स्वरगोष्ठी – 259 में आज

दोनों मध्यम स्वर वाले राग – 7 : राग नन्द

कुमार गन्धर्व और मदन मोहन का राग नन्द





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों की चर्चा कर रहे हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। संगीत के सात स्वरों में ‘मध्यम’ एक महत्त्वपूर्ण स्वर होता है। हमारे संगीत में मध्यम स्वर के दो रूप प्रयोग किये जाते हैं। स्वर का पहला रूप शुद्ध मध्यम कहलाता है। 22 श्रुतियों में दसवाँ श्रुति स्थान शुद्ध मध्यम का होता है। मध्यम का दूसरा रूप तीव्र या विकृत मध्यम कहलाता है, जिसका स्थान बारहवीं श्रुति पर होता है। शास्त्रकारों ने रागों के समय-निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किये हैं। इन्हीं में से एक सिद्धान्त है, “अध्वदर्शक स्वर”। इस सिद्धान्त के अनुसार राग का मध्यम स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार राग में यदि तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति हो तो वह राग दिन और रात्रि के पूर्वार्द्ध में गाया-बजाया जाएगा। अर्थात, तीव्र मध्यम स्वर वाले राग 12 बजे दिन से रात्रि 12 बजे के बीच ही गाये-बजाए जा सकते हैं। इसी प्रकार राग में यदि शुद्ध मध्यम स्वर हो तो वह राग रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच का अर्थात उत्तरार्द्ध का राग माना गया। कुछ राग ऐसे भी हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वर प्रयोग होते हैं। इस श्रृंखला में हम ऐसे ही रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की छ्ठी कड़ी में आज हम राग नन्द के स्वरूप की चर्चा करेंगे। साथ ही सबसे पहले हम आपको अप्रतिम संगीतज्ञ पण्डित कुमार गन्धर्व के स्वरों में राग नन्द का एक खयाल सुनवाते हैं। इसके बाद इसी राग पर आधारित फिल्म ‘मेरा साया’ से मदनमोहन का संगीतबद्ध किया और लता मंगेशकर का गाया मधुर गीत भी प्रस्तुत करेंगे।


दो मध्यम अरु शुद्ध स्वर, आरोहण रे हानि,
स-प वादी-संवादी तें, नन्द राग पहचानि।

ज के अंक में हमने आपके लिए दोनों मध्यम स्वरों से युक्त, अत्यन्त मोहक राग ‘नन्द’ चुना है। इस राग को नन्द कल्याण, आनन्दी या आनन्दी कल्याण के नाम से भी पहचाना जाता है। यह कल्याण थाट का राग माना जाता है। यह षाडव-सम्पूर्ण जाति का राग है, जिसके आरोह में ऋषभ स्वर का प्रयोग नहीं होता। इसके आरोह में शुद्ध मध्यम का तथा अवरोह में दोनों मध्यम का प्रयोग किया जाता है। इसका वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम माना जाता है। यह राग कामोद, हमीर और केदार के निकट होता है अतः गायन-वादन के समय राग नन्द को इन रागों से बचाना चाहिए। राग नन्द से मिल कर राग नन्द भैरव, नन्द-भैरवी, नन्द-दुर्गा और नन्द-कौंस रागों का निर्माण होता है।

पण्डित कुमार गन्धर्व
राग नन्द की सार्थक अनुभूति कराने के लिए आज हम आपको पण्डित कुमार गन्धर्व के स्वर में एक बन्दिश सुनवाएँगे। पण्डित कुमार गन्धर्व का जन्म आठ अप्रैल, 1924 को बेलगाम, कर्नाटक के पास सुलेभवी नामक स्थान में एक संगीत-प्रेमी परिवार में हुआ था। माता-पिता का रखा नाम तो था शिवपुत्र सिद्धरामय्या कोमकलीमठ, किन्तु आगे चल कर संगीत-जगत ने उसे कुमार गन्धर्व के नाम से पहचाना। जिन दिनों कुमार गन्धर्व ने संगीत-जगत में पदार्पण किया, उन दिनों भारतीय संगीत दरबारी जड़ता से प्रभावित था। कुमार गन्धर्व, पूर्णनिष्ठा और स्वर-संवेदना से एकाकी ही संघर्षरत हुए। उन्होने अपनी एक निजी गायन-शैली विकसित की, जो हमें भक्ति-पदों के आत्म-विस्मरणकारी गायकी का स्मरण कराती थी। वे मात्र एक साधक ही नहीं अन्वेषक भी थे। उनकी अन्वेषण-प्रतिभा ही उन्हें भारतीय संगीत का कबीर बनाती है। उनका संगीत इसलिए भी रेखांकित किया जाएगा कि वह लोकोन्मुख रहा है। कुमार गन्धर्व ने अपने समय में गायकी की बँधी-बँधाई लीक से अलग हट कर अपनी एक भिन्न शैली का विकास किया। 1947 से 1952 के बीच वे फेफड़े के रोग से ग्रसित हो गए। चिकित्सकों ने घोषित कर दिया की स्वस्थ हो जाने पर भी वे गायन नहीं कर सकेंगे, किन्तु अपनी साधना और दृढ़ इच्छा-शक्ति के बल पर संगीत-जगत को चमत्कृत करते हुए संगीत-मंचों पर पुनर्प्रतिष्ठित हुए। अपनी अस्वस्थता के दौरान कुमार गन्धर्व, मालवा अंचल के ग्राम्य-गीतों का संकलन और प्राचीन भक्त-कवियों की विस्मृत हो रही रचनाओं को पुनर्जीवन देने में संलग्न रहे। आदिनाथ, सूर, मीरा, कबीर आदि कवियों की रचनाओं को उन्होने जन-जन का गीत बनाया। वे परम्परा और प्रयोग, दोनों के तनाव के बीच अपने संगीत का सृजन करते रहे। कुमार गन्धर्व की सांगीतिक प्रतिभा की अनुभूति कराने के लिए अब हम आपको उनके प्रिय राग नन्द के स्वरों में एक बन्दिश सुनवाते हैं। तीनताल में निबद्ध इस खयाल के बोल हैं- “राजन अब तो आजा रे...”


राग नन्द : ‘राजन अब तो आजा रे...’ : पण्डित कुमार गन्धर्व 




राग नन्द में तीव्र मध्यम स्वर का अल्प प्रयोग अवरोह में पंचम स्वर के साथ किया जाता है, जैसा कि कल्याण थाट के अन्य रागों में किया जाता है। राग नन्द में राग बिहाग, कामोद, हमीर और गौड़ सारंग का सुन्दर समन्वय होता है। यह अर्द्ध चंचल प्रकृति का राग होता है। अतः इसमें विलम्बित आलाप नहीं किया जाता। साथ ही इस राग का गायन मन्द्र सप्तक में नहीं होता। इस राग का हर आलाप अधिकतर मुक्त मध्यम से समाप्त होता है। आरोह में ही मध्यम स्वर पर रुकते हैं, किन्तु अवरोह में ऐसा नहीं करते। राग नन्द में पंचम और ऋषभ स्वर की संगति बार-बार की जाती है। आरोह में धैवत और निषाद स्वर अल्प प्रयोग किया जाता है, इसलिए उत्तरांग में पंचम से सीधे तार सप्तक के षडज पर पहुँचते है।

लता मंगेशकर और मदन मोहन
भारतीय संगीत के इस बेहद मनमोहक राग नन्द के सौन्दर्य का आभास कराने के लिए अब हम आपको इस राग पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाएँगे। लता मंगेशकर के सुरों और मदनमोहन के संगीत से सजे अनेक गीत कर्णप्रियता और लोकप्रियता की सूची में आज भी शीर्षस्थ हैं। इस सूची में 1966 में प्रदर्शित फिल्म ‘मेरा साया’ का एक गीत है- ‘तू जहाँ जहाँ चलेगा मेरा साया साथ होगा...’। राजा मेंहदी अली खाँ की गीत-रचना को मदनमोहन ने राग नन्द के आकर्षक स्वरों पर आधारित कर लोचदार कहरवा ताल में ढाला है। मदनमोहन से इस गीत को राग नन्द में निबद्ध किये जाने का आग्रह स्वयं लता मंगेशकर जी ने किया था। न जाने क्यों, हमारे फिल्म-संगीतकारों ने इस मनमोहक राग का प्रयोग लगभग नहीं के बराबर किया। आप यह गीत सुनिए और राग नन्द के सौन्दर्य में खो जाइए। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। और हाँ, इस अंक की संगीत पहेली को हल करने का प्रयास करना न भूलिएगा।


राग नन्द : ‘तू जहाँ जहाँ चलेगा...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – मेरा साया 





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 259वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 260वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह किस राग पर आधारित गीत है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत के गायक और गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 5 मार्च, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 261वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 257 की संगीत पहेली में हमने आपको 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘हमदर्द’ के एक रागमाला गीत का एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – गौड़ सारंग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक-गायिका – मन्ना डे और लता मंगेशकर

इस बार की संगीत पहेली में पाँच प्रतिभागी सही उत्तर देकर विजेता बने हैं। ये विजेता हैं - जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी श्रृंखला ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ का रसास्वादन कर रहे हैं। श्रृंखला के सातवें अंक में हमने आपसे राग नन्द पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पास हर सप्ताह आपकी फरमाइशे आती हैं। हमारे कई पाठकों ने ‘स्वरगोष्ठी’ में दी जाने वाली रागों के विवरण के प्रामाणिकता की जानकारी माँगी है। उन सभी पाठकों की जानकारी के लिए बताना चाहूँगा कि रागों का जो परिचय इस स्तम्भ में दिया जाता है, वह प्रामाणिक पुस्तकों से पुष्टि करने का बाद ही लिखा जाता है। यह पुस्तकें है; संगीत कार्यालय, हाथरस द्वारा प्रकाशित और श्री वसन्त द्वारा संकलित और श्री लक्ष्मीनारायण गर्ग द्वारा सम्पादित ‘राग-कोष’, संगीत सदन, इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित और श्री हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव द्वारा लिखित पुस्तक ‘राग परिचय’ तथा आवश्यकता पड़ने पर पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे के ग्रन्थ ‘क्रमिक पुस्तक मालिका’। हम इन ग्रन्थों से साभार पुष्टि करके ही आप तक रागों का परिचय पहुँचाते हैं। आप भी अपने विचार, सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  





Saturday, February 27, 2016

BAATON BAATON MEIN -16: INTERVIEW OF SOUTH STYLE ICON & MODEL ABHI PRASAD

बातों बातों में - 16

दक्षिण युवा स्टाइल आइकन अभि प्रसाद से बातचीत 


"मेरे लिए शिक्षा प्राथमिकता है और मॉडलिंग् मेरा प्यार है! "  




नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रृंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज इस स्तंभ में हम आपके लिए लेकर आए हैं दक्षिण भारत के बेंगलुरु स्थित युवा स्टाइल आइकन अभि प्रसाद से टेलीफ़ोन पर की हुई दीर्घ बातचीत के सम्पादित अंश। अभि प्रसाद दक्षिण के जाने-माने फ़ैशन मॉडल हैं और बहुत जल्द दक्षिण फ़िल्म जगत में बतौर नायक पदार्पण करने जा रहे हैं।


    


अभि, नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है आपका ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ पर!

नमस्कार, और शुक्रिया आपका मुझे अपने मैगज़ीन में जगह देने के लिए।

सबसे पहले तो मैं अपने पाठकों को यह बता दूँ कि अभिलाश प्रसाद, जो अभि प्रसाद के नाम से मशहूर हैं, उन्होंने बहुत कम उम्र में बहुत लोकप्रियता हासिल कर ली है, यूथ स्टाइल आइकन के रूप में वो युवा-वर्ग में फ़ेमस हैं। उन्होंने मॉडेलिंग् और विज्ञापन जगत में सफलता प्राप्त तो की ही है, साथ ही देश-विदेश के फ़ैशन शोज़ की शान भी बने हैं, कई शोज़ में उन्हें गेस्ट ऑफ़ ऑनर के रूप में आमन्त्रित किया गया है। एक सुपर मॉडल और एक सफल फ़िल्म अभिनेता के रूप में अभि अपने आप को स्थापित होता देखना चाहते हैं। तो आइए, अभि से सवाल-जवाब का सिलसिला शुरू करते हैं।

आपको शुक्रिया इस तारिफ़ के लिए!

अभि, सबसे पहले तो यह बताइए कि आपकी पैदाइश कहाँ की है? अपने परिवार के बारे में कुछ बताइए?


मंज़िल पर है अभि की निगाह
मेरा जन्म केरल में हुआ और वहीं मैं पला-बढ़ा। हम मूलत: केरल से हैं, हमारे पूर्वज वहीं से ताल्लुख रखते हैं। मेरे पिताजी विदेश में कारोबार करते हैं, इस सूत्र से वो बाहर ही रहते हैं। मेरी माँ सरकारी नौकरी में है। मेरा एक छोटा भाई भी है जो अभी पढ़ाई कर रहा है। बस इतना सा है मेरा परिवार। हमारा परिवार एक रूढ़िवादी हिन्दू परिवार है।

तो रुढ़िवादी परिवार होने की वजह से आपको इस मॉडलिंग् और अभिनय के क्षेत्र में उतरते समय बाधाओं का सामना नहीं करना पड़ा?

जी नहीं, मुझे मेरे माता-पिता से इस ओर सहयोग मिला। मेरे पिताजी विदेश में रहते हैं, शायद यह भी एक कारण है कि वो यह समझते हैं कि आज के युग में बच्चा जो करना चाहता है, जो बनना चाहता है, उसे उसी दिशा में बढ़ावा देना चाहिए।

अपने बचपन और स्कूल के दिनों के बारे में बताइए? किस तरह के बच्चे थे आप?

मेरी शुरुआती शिक्षा केरल में ही हुई, पर हाइ स्कूल के समय मैं विदेश चला गया था। फिर उसके बाद मैं वापस केरल आकर यहीं से अपनी पढ़ाई पूरी की। Software Engineer की पढ़ाई पूरी। मैं बचपन से ही बहुत सक्रीय रहा, शर्मिला नहीं था बिल्कुल। हर तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों, जल्सों और प्रतियोगिताओं में भाग लिया करता था। इस वजह से मैं स्कूल में काफ़ी लोकप्रिय था अपने दोस्तों और शिक्षकों के बीच।

आपने विदेश का उल्लेख किया, किस देश में गए थे आप?


मिलिन्द सोमन के भक्त अभि
ओमान। वहीं मेरे पिता का व्यापार है और वो वहीं रहते हैं। इस तरह से उन्होंने मुझे वहाँ बुला लिया था कुछ समय के लिए।

क्या मॉडलिंग् का अंकुर उन्हीं दिनों आपके अन्दर अंकुरित हुआ था?

उस समय, यानी स्कूल के दिनों में तो इस तरफ़ इतना ध्यान नहीं दिया था, पर हाँ कॉलेज के समय से थोड़ा बहुत इस दिशा में मन होने लगा था। मेरे शारीरिक गठन, मुखमंडल और रूप-रंग को देख कर हर कोई मुझसे इस क्षेत्र में अपनी क़िस्मत आज़माने के लिए कहता। उससे मुझे हौसला मिलता था, आत्मविश्वास बढ़ने लगाता था। कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने के बाद मैंने मॉडलिंग् को गम्भीरता से लेना शुरू किया और अपने आप को इस क्षेत्र के लिए तैयार करने में जुट गया।

किस तरह की तैयारी की थी उस समय?

सबसे पहले तो अपने शरीर को मज़बूत बनाना, जिसके लिए मैं सुबह-शाम व्यायाम करता। खाने-पीने पर भी ख़ास ध्यान रखना पड़ता था; क्या खाना चाहिए, क्या नहीं खाना चाहिए, अपने आप पर रोक लगाना उल्टा-सीधा खाने पर, यह सब किया। फिर अपने लूक्स पर काम किया। अपने चलने के तरीके, मैनरिज़्म्स की बारीक़ियों पर ग़ौर किया। इस तरह से उस समय अपने आप को तैयार किया था।

उन दिनों आपके आइडल कौन हुआ करते थे? कौन थे आपके बचपन में आपके प्रेरणास्रोत इस क्षेत्र के?

निस्सन्देह मिलिन्द सोमन।

वाह, क्या बात है!

मिलिन्द सोमन यहाँ के शुरुआती सुपर-मॉडलों में से एक हैं। उनका काफ़ी क्रेज़ हुआ करता था। जब मैं मॉडेलिंग् की दुनिया में क़दम रख रहा था, तब मिलिन्द का काफ़ी हद तक अनुकरण किया करता था। उनके फ़ोटो शूट्स की तसवीरें देखता, कि किस तरह से वो अपने आपको प्रस्तुत करते हैं, किस तरह से देखते हैं, कैसे चलते हैं, वगेरह।

उन दिनों मिलिन्द सोमन के साथ साथ और भी कई बड़े मॉडल हुआ करते थे, तो मिलिन्द से ही आप क्यों इतने ज़्यादा मुतासिर हुए?


पूरब और पश्चिम
इसका कारण है कि मिलिन्द ना केवल एक अच्छे मॉडल हैं, बल्कि एक बहुत अच्छे और मज़बूत खिलाड़ी भी हैं। अधिकतर लोग उन्हें फ़ैशन मॉडल के रूप में जानते हैं, पर बहुत कम लोगों को उनके इस खिलाड़ी रूप के बारे में पता होगा। वो लगातार चार सालों तक राष्ट्रीय तैराक विजेता रह चुके हैं। भारत में वो लिम्का बूक ऑफ़ रेकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज करवा चुके हैं 1500 km की दूरी को 30 दिनों में दौड़ कर पूरी करने की वजह से। भारत में महिलाओं का सबसे बड़ा मैराथन, जिसे ’पिंकाथन’ के नाम से जाना जाता है, उसके वो दूत रहे। और उनकी सबसे बड़ी जो ख़ास बात है, वह यह कि वो आज भी, इस उम्र में भी बेहद सक्रीय हैं। अभी पिछले ही साल, उन्होंने ’Ironman Challenge' को 15 घण्टे और 19 मिनट में पूरी कर अपने पहले प्रयास में ही ’Ironman' की उपाधि प्राप्त की है। इस ख़िताब के लिए उन्हें कुल 16 घण्टों में 3.8 km तैराकी, 180.2 km साइकिल और 42.2 km दौड़ पूरी करनी थी जो उन्होंने किया और इस ख़िताब को हासिल किया।

वाक़ई काबिल-ए-तारिक हैं! और इस दौर के किस मॉडल को आप काफ़ी मानते हैं?

डेविड गैण्डी और केट मॉस।

डेविड गैण्डी ही क्यों?

डेविड गैण्डी मुझे बहुत पसन्द है, उनका स्टाइल और उनकी उपलब्धियाँ। 2009 में Forbes मैगज़ीन ने उन्हें तृतीय स्थान दिया विश्व भर के सफल पुरुष मॉडलों में। प्रथम स्थान मिला था मैट गॉरडन को और दूसरे पायदान पर थे सीन ओ’प्राइ। 2010 में डेविड को ’ब्रिटिश फ़ैशन काउन्सिल’ ने ’मॉडल ऑफ़ दि यीअर’ का ख़िताब दिया और 2011 में उन्हें ’फ़ेस ऑफ़ टुडे’ के लिए नामांकित किया। 2012 के अन्त में models.com ने अपने 'Money Guys' और 'Top Icons' में उन्हें स्थान दिया। 2012 में भी ’ब्रिटिश फ़ैशन काउन्सिल’ ने उन्हें ’मॉडल ऑफ़ दि यीअर’ करार दिया। 2013 में ’बिज़नेस ऑफ़ फ़ैशन’ ने 'BoF 500: The People Shaping the Global Fashion Industry' की घोषणा की जिसके तहत डेविड गैण्डी एकमात्रा पुरुष मॉडल थे 'Models & Muses' विभाग के अन्तर्गत। 2013 में Forbes ने अपनी वर्ल्ड रैंकिंग् को अपडेट करते हुए डेविड गैण्डी को द्वितीय स्थान पर ला खड़ा किया। 2014 में वो models.com के 'Super Men' और 'Sexiest Men' में शामिल हो गए। इसी साल Vogue (US) ने विश्व के ’All Time Top 10 Male Models' में डेविड को द्वितीय स्थान दिया (पहले पर थे टाइसन बेकफ़ोर्ड)। 2014 में ही स्पेन के माद्रिद में आयोजित Men of the Year Awards में उन्हें ’मॉडल ऑफ़ दि यीअर’ का पुरस्कार दिया। और अभी पिछले ही साल Yahoo! Style ने उन्हें 'Top Male Models of 2015' में शामिल किया है। कुल मिला कर पिछले कई सालों से डेविड शिखर पर विराजमान हैं और यह बात मुझे भी उर्जा प्रदान करती है।

और भारत के वर्तमान मॉडलों में आपके पसन्दीदा कौन हैं?


स्टाइल आइकन का अन्दाज़
आसिफ़ अज़ीम और शीतल मल्लार।

वही आसिफ़ अज़ीम जो हाल ही में Big Boss 7 में नज़र आए थे?

जी हाँ, बिल्कुल। आसिफ़ दरसल बांगलादेश का नागरिक है। आसिफ़ आज विश्व के श्रेष्ठ सौ मॉडलों में एक है। और तो और वो काफ़ी पढ़े लिखे भी हैं। उन्होंने ईकोनोमिक्स में एम.ए किया है। और एक अन्तर्रष्ट्रीय अभिनेता भी हैं।

अच्छा अभि, यह बताइए कि आप पढ़ाई-लिखाई में कैसे थे? आप software engineer हैं, इससे कुछ हद तक अनुमान लगाया जा सकता है कि आप अच्छे रहे होंगे। तो फिर इंजिनीयरिंग् के साथ-साथ मॉडलिंग् को प्रोफ़ेशन बनाना, यह कैसे ख़याल आया?

जी, आपने ठीक ही कहा, मैं पढ़ाई में काफ़ी अच्छा था, मैं एक मेहनती छात्र हुआ करता था, और अपनी पढ़ाई को पूरी इमानदारी से निभाता था क्योंकि शिक्षा ही मेरे लिए प्रथम प्राथमिकता रही है। यह बहुत ज़रूरी है। मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर मुंबई भाग आते हैं मॉडल या नायक बनने के लिए। इसे आप मेरा पारिवारिक पार्श्व ही समझ लीजिए कि हमारे परिवार में शिक्षा का बहुत बड़ा महत्व है, इसलिए पढ़ाई तो पूरी करनी ही थी। और जहाँ तक मॉडलिंग् का या मॉडल बनने का सवाल है, तो वह मेरा प्यार है, जिसे मैं हर हाल में पाना चाहता था। और यह प्यार हमेशा कायम रहेगा।

वाह, बहुत अच्छे तरीक़े से आपने दोनों का अन्तर स्पष्ट किया, शिक्षा प्राथमिकता है और मॉडलिंग् प्यार है।


बिल्कुल ठीक!

शिक्षा की तरफ़ जो आपका रवैया है, वह प्रशंसनीय है, हर युवा को इससे सीख लेनी चाहिए, ख़ास तौर से उन्हें जो पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि नायक या मॉडल बनने के लिए उच्च शिक्षा की क्या ज़रूरत है!

जी हाँ, शिक्षा अपनी जगह है, आप जितना पढ़ोगे, उतना ज़्यादा शिक्षित बनोगे।

आपका मॉडलिंग् करीअर कब शुरू हुआ? एक इंजिनीयर और एक मॉडल, इन दोनों को एक साथ कैसे सम्भाला शुरू शुरू में?

जैसा कि मैंने बताया था, ग्रैजुएशन के बाद ही मैंने मॉडलिंग् को गम्भीरता से लिया। दोनों को कैसे सम्भाला यह तो नहीं कह सकता पर हाँ, सम्भाल लिया। और मेदोनों के साथ पूरी-पूरी इमानदारी की। ऐसा नहीं कि मॉडल बनने के चक्कर में इंजिनीयरिंग् के काम में मन नहीं लगाया। जब तक पूरी तरह से एक क्षेत्र में सफलता नहीं मिल जाती, हमें एक बैक-अप की आवश्यकता होती है। इसलिए दोनों को साथ में लेकर चल रहा हूँ। लेकिन जल्दी ही मैं अपने सपनों के साकार होने का बेसबरी से इन्तज़ार कर रहा हूँ।

यहा बताइए कि मॉडलिंग् में आपका पदार्पण कैसे हुआ? कैसे आपको अपना पहला ब्रेक मिला?

मैं केरल में ही मॉडल बनने की तैयारी कर रहा था उस समय। और अकस्मात ही मेरी झोली में मॉडलिंग् करने का एक प्रस्ताव आ गया। हुआ यूं था कि मैं किसी फ़ंक्शन में गया हुआ था। वहाँ के एक स्थानीय डिज़ाइनर ने मुझे देखा, मेरे चलने का तरीका, चेहरा, दृष्टि, और शारीरिक गठन। कुल मिला कर सब उन्हें अच्छा लगा और उन्हें लगा कि मैं इस क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन कर सकता हूँ। वो मेरे पास आए और कहने लगे कि आप मॉडलिंग् क्यों नहीं करते? जब मैंने उनसे यह कहा कि मैं इसी दिशा में आगे बढ़ना चाहता हूँ और जिसके लिए प्रयास कर रहा हूँ, तो उन्होंने उस वक़्त तो कुछ नहीं कहा और ना ही कोई वादा किया, पर अपने अगले ही फ़ैशन शो के लिए मुझे चुना और उसमें मुझे भाग लेने का मौका दिया। बस वहीं से मेरी शुरुआत हुई बतौर प्रोफ़ेशनल मॉडल। और तब से लेकर अब तक यह यात्रा जारी है। निरन्तर प्रयास जारी है अच्छे से अच्छा काम करने का।

फिर उसके बाद आपने सफलता की सीढ़ियाँ कैसे चढ़ी?


जैसा कि मैंने बताया, निरन्तर काम करता गया। मेरे लिए कुछ भी रातों रात नहीं हुआ। मुझे अत्यन्त धैर्य के साथ एक एक कर सीढ़ी चढ़ना पड़ा, जिसके लिए मुझे काफ़ी समय, प्रयास और कठिन परिश्रम करना पड़ा। और धीरे धीरे एक के बाद एक मुझे एक्स्पोज़र मिलता चला गया।

आपने बताया कि आपकी शुरुआत एक फ़ैशन शो में बतौर रैम्प मॉडल हुई। मॉडलिंग् के और किन विधाओं में आपको काम करने का मौका मिला?

रैम्प मॉडल के साथ-साथ मुझे एक प्रिण्ट मॉडल के रूप में भी काफ़ी काम मिलता चला गया। और फिर TVC में भी आ गया।

जिन पाठकों को रैम्प, प्रिण्ट और TVC के बारे में पता नहीं है, क्या आप बताएँगे कि ये क्या हैं?

ज़रूर! रैम्प मॉडलिंग् वह होती है जिसमें मॉडल किसी फ़ैशन शो में लाइव ऑडिएन्स के सामने रैम्प पर चलते हुए अपने पोशाक का प्रदर्शन करता है। इसमें मॉडल के चलने के तौर तरीकों पर लोग ध्यान देते हैं, और पहने हुए पोशाक को आप किस तरह से कैरी करते हैं, उस पर बहुत कुछ निर्भर करता है। बड़े फ़ैशन शोज़ में काफ़ी दबाव रहता है अच्छा प्रदर्शन करने का क्योंकि लोग आपको लाइव देख रहे होते हैं। दूसरा है प्रिण्ट मॉडलिंग्। इसमें लाइव ऑडिएन्स नहीं होती। डिज़ाइनर/ डिरेक्टर और फ़ोटोग्राफ़र और कुछ तकनीकी सहायक होते हैं सेट पर जो प्रिण्ट मीडिया के लिए तसवीरें खींचते हैं, यानी कि अख़्बार, मैगज़ीन या साइन-बोर्ड के लिए विज्ञापन। यह बन्द कमरे में भी हो सकता है और आउट-डोर में भी। इसमें फ़ोटोग्राफ़र का बड़ा रोल होता है, और वो हमें निर्देश देता है कि किस तरफ़ देखना है, हाथ कैसे रखने हैं वगेरह वगेरह। और तीसरे वर्ग में आता है TVC। TVC यानी TV Commercial। टेलीविज़न पर आप जो विज्ञापन देखते हैं, उनमें जो मॉडल्स आपको दिखते हैं, वो इस वर्ग में आता है। TVC का अर्थ है audio-visual advertisements।

बहुत अच्छी तरह से आपने इन तीनों का अन्तर स्पष्ट किया। आपको इसमें से कौन सा सबसे ज़्यादा पसन्द है?


ऐसा कुछ नहीं है, ये तीनों ही अपनी अपनी जगह पे महत्वपूर्ण है। प्रिण्ट और TVC में टीम-वर्क होता है। पूरी यूनिट के योगदान से काम सफल हो पाता है, जैसे कि मैंने बताया फ़ोटोग्राफ़र, विडियोग्राफ़र, लाइटमैन आदि। रैम्प पर ’next take' या ’retake' का कोई अवसर नहीं होता। जो हो गया, सो हो गया। इसलिए बहुत ध्यान पूर्वक काम करना पड़ता है। लूक्स, ऐटिट्युड और कैसे हम अपने आप को पेश कर रहे हैं, इन बातों पर सब निर्भर करता है। अपना आकर्षण बनाए रखना पड़ता है हर क्षण। बस यही सब बातें हैं कुल मिलाकर।

बहुत ख़ूब! आपने बहुत सारे अलग अलग तरह के ब्रैण्ड्स के लिए काम किया है। कुछ के नाम गिनाते चलें?

पोशाक वर्ग में Grasim, Raymond, Celio India जैसे ब्रैण्ड्स के लिए मॉडलिंग् की है। पानीय पदार्थ वर्ग में Bacardi और Pitars जैसे नाम हैं। Green Trends और Toni and Guy जैसे ब्यूटी सालों के लिए काम किया है। Daydome Fitness, Ziggar Fuga, Philips, Malabar Gold, Volvo और TV9 जैसे ब्रैण्ड्स के लिए भी मैंने काम किया है। और अब Kingfisher।

वाह! इसका मतलब आपने केवल एक दो तरह के ब्रैण्ड्स के लिए नहीं बल्कि बहुत से अलग-अलग तरह की कंपनियों के लिए मॉडलिंग् की है। आजकल आप Kingfisher के लिए काफ़ी काम कर रहे हैं। इसके बारे में कुछ बताइए?


Kingfisher के लिए मैं अपने प्रतिपालक या परामर्शदाता और गुरू इओवेल प्रभु को धन्यवाद देना चाहता हूँ क्योंकि उन्होंने ही मुझे Kingfisher का रास्ता दिखाया था। और उनके साथ-साथ कोरीओग्राफ़र राहुल देव शेट्टी को भी धन्यवाद देता हूँ। इन लोगों के साथ काम करते हुए बहुत कुछ सीखने को मिला, एक अन्तराष्ट्रीय स्तर का परिवेश मिला जहाँ बहुत से अन्तराष्ट्रीय मॉडल्स से बातचीत करने का मौका मिला, वो लोग कैसे काम करते हैं, किस तरह का होता है उनका फ़ैशन जगत, ये सब जानने को मिला।

जिन दिग्गज डिज़ाइनरों के लिए आपने काम किया, उनके बारे में बताइए?

मैंने कई बड़े-बडए डिज़ाइनरों के लिए काम किया है जैसे कि चैतन्य राव, सुमित दासगुप्ता, कीर्ति राठौड़, हरि आनन्द, जतिन कोचर, संजना जॉन, रॉकी स्टार, मनोविरज खोसला और ऋतु कुमार। चैतन्य राव चेन्नई में स्थित हैं और तमिल व तेलुगू फ़िल्म जगत में वो एक जाना माना नाम हैं। सुमित दासगुप्ता भी एक बहुत मशहूर डिज़ाइनर हैं। उनकी बड़ी ख़ासियत यह है कि वो एक बहुत बड़े शिक्षित परिवार से ताल्लुख़ रखते हैं। उनके दादा एक ज़मीनदार होते हुए भी कपड़ों का व्यापार शुरू किया जैसे कि पटसन, खादी आदि के कपड़े। स्वाधीनता संग्राम में उन्होंने कई बड़े बड़े सेनानियों जैसे कि चित्तरंजन दास, बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को खादी के कपड़े मुफ़्त में दिया करते थे। सुमित के पिता इंजिनीयर हैं और माँ एक प्रोफ़ेसर। और वो ख़ुद भी काफ़ी पढ़े-लिखे हैं। ’सर्वमंगला’ के नाम से उनकी फ़ैशन एजेन्सी है। कीर्ति राठौड़ भी मुंबई फ़िल्म जगत से जुड़ी हुई हैं और उन्होंने अमिताभ बच्चन, शाहरुख़ ख़ान, अर्जुन कपूर, विवेक ओबेरोय, इमरान ख़ान, बोनी कपूर, सलमान ख़ान, अजय देवगन, नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी, सुशान्त सिंह, यामी गौतम, ऋषिता भट्ट, सोनाली राउत, साना ख़ान, पूनम ढिल्लों, पंकज धीर, कार्तिक तिवारी, अनुष्का शर्मा, श्रीदेवी, मन्दिरा बेदी, एजाज़ ख़ान और शक्ति कपूर जैसे कलाकारों के लिए डिज़ाइन कर चुकी हैं। हरि आनन्द भी दक्षिण स्थित डिज़ाइनर हैं जिनका दुनिया भर में नाम है।

आप केरल से हैं और जहाँ तक मुझे याद है एक बार हरि आनन्द ने कोचि में आयोजित अन्तराष्ट्रीय फ़ैशन शो में भाग लिया था और काफ़ी चर्चित हुए थे?


जी हाँ बिल्कुल! फिर जतिन कोचर भी एक बहुत बड़े डिज़ाइनर हैं। उनका मुझे यह अच्छा लगता है कि वो सिर्फ़ एक डिज़ाइनर ही नहीं हैं, बल्कि उनकी रचनात्मक्ता इतनी है कि वो ऐंकरिंग् भी कर लेते हैं, लिखते भी हैं। उनके डिज़ाइन किए कपड़े बहुत ही साधारण लेकिन उच्चस्तरीय होते हैं ताकि आम लोग उन्हें पहन कर बाहर निकल सके। उन्हें बहुत से पुरस्कार भी मिले हैं। संजना जॉन, जो अमरीका स्थित डिज़ाइनर हैं, वो मशहूर डिज़ाइनर आनन्द जॉन की बहन हैं। रॉकी स्टार ’Rocky S' के ब्रैण्ड नेम से अपना काम करते हैं। वो भारत के पहले डिज़ाइनर हैं जिन्होंने एक सुगंधी का प्रमोचन किया। Rocky S Noir Femme और Rocky s Noir Pour Hommes, इन सुगंधियों का अनावरण अर्जुन रामपाल के हाथों हुआ था। मनोविरज खोसला बेंगलुरु स्थित डिज़ाइनर हैं जिनका सिग्नेचर है ट्रेन्डी ऐण्ड हिप। और ऋतु कुमार के नाम से तो हर कोई वाकिफ़ हैं ही, उनके बारे में और क्या बताऊँ!

किसी भी मॉडल के लिए उसके फ़ोटोग्राफ़र पर बहुत कुछ निर्भर करता है। कौन हैं आपके सबसे पसन्दीदा फ़ोटोग्राफ़र?
मनपसन्द फ़ोटोग्राफ़र अमित खन्ना के कैमरे से

आपने बिल्कुल सही कहा कि फ़ोटोग्राफ़र पर बहुत कुछ निर्भर करता था। अगर वो चाहे तो काम बना भी सकता है और चाहे तो बिगाड़ भी सकता है। मैंने भारत के बहुत सारे फ़ोटोग्राफ़र्स के साथ काम किया है, पर मुझे जो सबसे ज़्यादा पसन्द हैं वो हैं अमित खन्ना।

एक समय था जब नए मॉडलों के साथ काफ़ी शोषण होता था। काम मिलने के लिए कई समझौते करने पड़ते थे बहुतों को। और अब समय के साथ-साथ लोगों ने इसे भी ’part of the game' मान लिया और अब तो यह एक आम बात हो गई है। आपका क्या ख़याल है इस बारे में?


मुझे नहीं लगता कि हर किसी को इससे गुज़रना पड़ता है। मैं यह इसलिए कह सकता हूँ क्योंकि मैं इसी इन्डस्ट्री का हिस्सा हूँ और मुझे कभी किसी ने शोषित नहीं किया। हाँ, यह बात ज़रूर है कि मुझे सफलता धीरे धीरे मिली जिसके लिए मुझे निष्ठा, स्थिरता, सपना और जोश को हमेशा बरकरार रखना पड़ा। जो लोग रातों रात स्टार बनने का सपना रखते हैं, वो अक्सर ग़लत जगह फँस जाते हैं और शिकायत करते हैं कि उनका शोषण हो गया। इस इंडस्ट्री में बहुत नकल लोग घुस गए हैं जो नवान्तुकों को बेवकूफ़ बना कर पैसे लूट लेते हैं या उनका शारीरिक शोषण करते हैं। इसलिए सही व्यक्ति को चुनने में ग़लती नहीं होनी चाहिए। और हाँ, there is no shortcut to success.

यह बहुत ही अच्छी बात बताई आपने कि सफलता का रास्ता लम्बा है, जल्द-बाज़ी में खेल बिगड़ सकता है ज़िन्दगी भर के लिए। उन मॉडल्स के लिए आप क्या सलाह देंगे जो इन नीची राहों को स्वीकार कर लेते हैं ऊँचाइयों तक पहुँचने के लिए?

यह अपने अपने विचार हैं, मैं कोई टिप्पणी नहीं कर सकता। अगर उन्हें लगता है कि वो जो कुछ कर रहे हैं, वो उनके लिए सही है, तो फिर सही है।

इस दौर में बहुत से मॉडल्स सफल टीवी व फ़िल्म अभिनेता भी बन गए हैं। आप इस राह में अग्रसर नहीं हो रहे?

जी ज़रूर! यह मेरा अगला क़दम होगा अपने करीयर का। दक्षिण के कुछ निर्देशकों के साथ मेरी बातचीत चल रही है। सही समय और सही प्रोजेक्ट जैसे ही हाथ लगेगा, मैं अभिनय जगत में क़दम रख दूँगा। इस वक़्त इससे ज़्यादा मैं कुछ और नहीं बता सकता।

अभिनय की बात चल रही है तो यह बताइए कि आपके पसन्दीदा अभिनेता-अभिनेत्रियाँ कौन कौन हैं?


निस्सन्देह अमिताभ बच्चन और रेखा। और पश्चिम की बात करें तो ब्रैड पिट्ट और मेगा फ़ॉक्स।

वाह, बहुत अच्छी पसन्द है आपकी! अच्छा अपने शारीरिक गठन को बरकरार रखने के लिए किस तरह की कसरत करते हैं आप?

मेरा फ़िटनेस रिजिम (स्वस्थ रहने की पद्धति) दूसरों से बिल्कुल अलग है। मैं अन्य बॉडी-बिल्डर्स की तरह स्टेरोएड वगेरह नहीं लेता। मैं हमेशा फ़िट रहने की कोशिश करता हूँ प्राकृतिक तरीकों से। प्राकृतिक संतुलित आहार का सेवन करता हूँ। प्रचूर मात्रा में फल, फलों के रस, और पानी पीता हूँ। जहाँ जिम में व्यायाम करने की बात है तो हर रोज़ करीब एक घण्टे जिम में रहता हूँ जिसमें बीस मिनट कार्डिओ और चालीस मिनट का वेट ट्रेनिंग् होता है। इस तरह से हमेशा सौन्दर्यात्मक रूप बनाए रखने की कोशिश करता हूँ।

और खाली समय में क्या करते हैं? आपकी रुचियाँ क्या हैं?

मुझे फ़ूटबॉल खेलने का बहुत शौक है और अब भी मैं खेलता हूँ। और मैं पेण्टिंग् भी करता हूँ।

वाह! बहुत ख़ूब! खेलकूद और कला, दोनों से आपका लगाव है यह जानकर बहुत अच्छा लगा। अच्छा यह बताइए कि आप जिस सॉफ़्टवेयर कंपनी में नौकरी करते हैं, वहाँ के आपके सहकर्मियों से आपके मॉडलिंग् के बारे में कैसी प्रतिक्रियाएँ मिलती हैं?


मेरे सहकर्मी मित्रगण मुझे भरपूर सहयोग देते हैं ताकि मैं दोनों काम अच्छी तरीके से निभा सकूँ। दोनों इंडस्ट्री एक दूसरे से बिल्कुल विपरीत हैं, फिर भी मुझे ज़्यादा परेशानी उठानी नहीं पड़ी क्योंकि मुझे अपने सहकर्मियों से पूरा पूरा सहयोग मिला। वो लोग मेरे मॉडलिंग् के काम की सराहना करते हैं और मुझे प्रोत्साहित करते हैं और उपर चढ़ने के लिए।

एक सॉफ़्टवेयर इंजिनीयर होने के नाते आपके मन में कभी यह ख़याल नहीं आया कि अमरीका जाकर एक अच्छी नौकरी के साथ सेटल हो जाऊँ?

अमरीका छुट्टियाँ बिताने के लिए अच्छा है, मुझे अपने देश से प्यार है और मैं यहीं स्थापित होना चाहता हूँ।

बहुत अच्छे! बेंगलुरू से मुंबई स्थानान्तरित होने के बारे में क्या विचार हैं? वैसे क्या फ़र्क है बेंगलुरू और मुंबई फ़ैशन जगत में?

मैंने अपनी करीअर की शुरुआत बेंगलुरू में की थी, इसलिए इस जगह से मुझे बहुत लगाव है और कई भावनाएँ जुड़ी हुई हैं। मेरा मुंबई जाना लगा रहता है काम के सिलसिले में, इस तरह से बेंगलुरू और मुंबई, दोनों जगहों के बीच संतुलन बनाए रखा हुआ हूँ। लेकिन यह सत्य है कि फ़ैशन जगत की जहाँ तक बात है, मुंबई का कोई मुक़ाबला नहीं। मुंबई हमारा फ़ैशन कैपिटल है और इस क्षेत्र में वहाँ ढेरों मौके और सुविधाएँ हैं।

नई पीढ़ी जो इस क्षेत्र में आना चाहते हैं, उन्हें आप क्या सलाह देंगे?

मैं वही बात दोहराता हूँ कि शिक्षा का कोई विकल्प नहीं है। पहले शिक्षित हो जाइए, कम से कम ग्रैजुएशन कम्प्लीट कीजिए, फिर इस क्षेत्र में क़दम रखिए। मॉडलिंग् के क्षेत्र में उतरने से पहले अपना आंकलन ख़ुद कीजिए कि क्या आप में वह बात है? कई बार ऐसा होता है कि दोस्त लोग या रिश्तेदार बढ़ा-चढ़ा कर तारीफ़ें कर देते हैं और उपर चढ़ा देते हैं, जिन्हें सुन कर वह ख़्वाबों की दुनिया में चला जाता है। यह राह आसान नहीं है, इस चमक-दमक के पीछे जो अन्धेरा है, उससे सावधान हो जाइए और सोच विचार के बाद, अपना आंकलन करने के बाद इस क्षेत्र में पूरी तैयारी के साथ उतरिए।

अभि, बहुत अच्छा लगा आपसे इतनी लम्बी बातचीत करके। बहुत बहुत धन्यवाद आपका जो अपनी व्यस्तता के बावजूद हमें इतना समय दिया। हम आपको शुभकामनाएँ देते हैं कि आप दिन दुगुनी रात चौगुनी तरक्के करें, आने वाले समय में आप सुपरमॉडल के रूप में प्रतिष्ठा पाएँ, और फ़िल्म जगत में अपना नाम रोशन करें जैसा कि आपका सपना है। बहुत बहुत धन्यवाद, नमस्कार!

आपको बहुत बहुत धन्यवाद इस मुलाक़ात के लिए, आपकी शुभकामनाओँ के लिए। नमस्कार!




आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी soojoi_india@yahoo.co.in पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





Thursday, February 25, 2016

"रसन बचे जो भुजंगन से, सो कोटिन लक्ष निछावर पावे..." रसन पिया को खिराज आज ’कहकशाँ’ में




कहकशाँ - 2
उस्ताद अब्दुल रशीद ख़ाँ (रसन पिया) को खिराज  
"रसन बचे जो भुजंगन से, सो कोटिन लक्ष निछावर पावे"



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम। दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेशकीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है हाल ही में दुनिया-ए-फ़ानी को अलविदा कहने वाले शास्त्रीय संगीत के चमकदार सितारे उस्ताद अब्दुल रशीद ख़ाँ (रसन पिया) को खिराज उन्हीं की गायी हुई एक रचना से।




'रसन पिया'

अचम्भा सा जगाती लगभग सौ बरस की पकी हुई उम्र में 
भरे-पूरे जराजीर्ण बरगद की तरह है तुम्हारा होना 
हज़ारों लोग बैठ सकते जिसकी छाया तले इत्मीनान से 
और एक कशिश जैसी कोई चीज़ सुन सकते तुम्हारी आवाज़ में 
जहाँ से राख नहीं आज भी बसन्त के पीले फूल झरते हैं

पता नहीं क्या है उस्ताद 
ठुमरी और दादरा के अंतरालों में जादू जैसा 
जहाँ बहुत कुछ अभी भी बचा है ऐसा 
जिस पर भरोसा किया जा सकता है 
और यह बात हमें परेशानी में डालती है 
ऐसे अराजक समय में सिर्फ संगीत के सहारे 
तुम कैसे अभी तक रहते चले आये अप्रतिहत

यह एक विचित्र बात है उस्ताद 
सौ बरस के महाकाव्य से लगते जीवन में तुम्हें 
गायक से साथ-साथ रसन पिया बनने की क्यों सूझी 
गोया, कविता कहे बगैर संगीत कुछ कम सुरीला लगता 
तुम्हारे सम्पन्न घराने में 
या बंदिश रचते समय तुम आसानी से पकड़ लेते 
किसी सुर को उसके सपनों के साथ............


उस्ताद अब्दुल रशीद ख़ाँ जब 104 बरस के हुए थे, तब लखनऊ के यतीन्द्र मिश्र ने उन पर 'रसन पिया' के नाम से एक लम्बी कविता लिखी थी, जो उनकी संगीत व कलाओं पर निबंधों की पुस्तक 'विस्मय का बखान' में भी शामिल है। उसी कविता की कुछ लाईने हमने उपर प्रस्तुत की।

107 वर्ष की आयु में गत 18 फ़रवरी को शास्त्रीय संगीत के स्तंभ, वयोवृद्ध और पुरोधा गायक उस्ताद
अब्दुल रशीद ख़ाँ साहब का इन्तकाल हो गया। वे उम्र के इस आख़िरी पड़ाव तक बेहद सक्रिय थे संगीत में डूबे हुए और अपने शिष्यों को संगीत सिखा रहे थे। उनकी एक शताब्दी से लम्बी रचनात्मक उपस्थिति की जितनी तारीफ़ की जाए कम होगी। वे एक बहुत बड़े बंदिशकार भी थे और 'रसन पिया' के नाम से पद लिखते व शास्त्रीय संगीत में ठुमरी और खयाल की शक्ल में गाते थे। ख़ाँ साहब का जन्म संगीतज्ञों के परिवार में हुआ था, उनके पूर्वज बहराम ख़ाँ पारम्परिक ग्वालियर घराना गायकी के गायक थे। अब्दुल रशीद साहब के ताऊ जी (पिता के बड़े भाई) बड़े युसुफ़ ख़ाँ और उनके पिता छोटे युसुफ़ ख़ाँ ने उन्हें संगीत की पहली तालीम दी। उसके बाद उनके परिवार के ही दूसरे बड़े-बुज़ुर्ग़ों नें उनमें ग्वालियर घराने की गायकी को मज़बूत किया। इनमें शामिल थे चाँद ख़ाँ, बरख़ुरदार ख़ाँ और महताब ख़ाँ। लेकिन अब्दुल रशीद ख़ाँ ने आगे चलकर अपना अलग स्टाइल इख़ितियार किया और अपने आप को भीड़ से अलग किया। अपने लम्बे सफ़र में उन्हें असंख्य पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमें पद्मभूषण, संगीत नाटक अकादमी, रस सागर, काशी स्वर-गंगा, ITC, और दिली सरकार द्वारा प्रदत्त Lifetime Achievement पुरस्कार शामिल हैं।

आइए आज ’रसन पिया’ को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं उन्हीं के द्वारा स्वरबद्ध एक शिव रचना से जिसे कोलकाता स्थित ITC- Sangeet Research Academy ने वर्ष 2011 में रेकॉर्ड किया था। गायन में उनका साथ दिया है शुभमय भट्टाचार्य ने, हारमोनियम पर संगत है अनिर्बान दास की, तानपुरे पर शुभमय भट्टाचार्य और पम्पा मुखर्जी तथा तबले पर हैं पंडित समर साहा

 बेदी मे बैठी जपे शिउ शंकर।
गौरा की भांवर कौन करावे।
नागिन की फुफकारन से
कि नावन नेग नगीच न आवे।
पंडित थर थर कांप रहे 
कि को गठ बंधन गाँठ जुरावे।
’रसन’ बचे जो भुजंगन से
सो कोटिन लक्ष निछावर पावे।

बम-बम बम-बम भोला भोला
जटा धर भभूत रमाए
आए खाए भंग का गोला
पुन्य त्रिशूल गड़े रुनडन माला
खाल बिछाए बाघम्बर की
देहो दरस मोहे अनमोला





’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


आलेख व प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, February 21, 2016

राग गौड़ सारंग : SWARGOSHTHI – 258 : RAG GAUR SARANG


स्वरगोष्ठी – 258 में आज

दोनों मध्यम स्वर वाले राग – 6 : राग गौड़ सारंग

इस राग में सुनिए पन्नालाल घोष और अनिल विश्वास की रचनाएँ




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों की चर्चा कर रहे हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। संगीत के सात स्वरों में ‘मध्यम’ एक महत्त्वपूर्ण स्वर होता है। हमारे संगीत में मध्यम स्वर के दो रूप प्रयोग किये जाते हैं। स्वर का पहला रूप शुद्ध मध्यम कहलाता है। 22 श्रुतियों में दसवाँ श्रुति स्थान शुद्ध मध्यम का होता है। मध्यम का दूसरा रूप तीव्र या विकृत मध्यम कहलाता है, जिसका स्थान बारहवीं श्रुति पर होता है। शास्त्रकारों ने रागों के समय-निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किये हैं। इन्हीं में से एक सिद्धान्त है, “अध्वदर्शक स्वर”। इस सिद्धान्त के अनुसार राग का मध्यम स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार राग में यदि तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति हो तो वह राग दिन और रात्रि के पूर्वार्द्ध में गाया-बजाया जाएगा। अर्थात, तीव्र मध्यम स्वर वाले राग 12 बजे दिन से रात्रि 12 बजे के बीच ही गाये-बजाए जा सकते हैं। इसी प्रकार राग में यदि शुद्ध मध्यम स्वर हो तो वह राग रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच का अर्थात उत्तरार्द्ध का राग माना गया। कुछ राग ऐसे भी हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वर प्रयोग होते हैं। इस श्रृंखला में हम ऐसे ही रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की छ्ठी कड़ी में आज हम राग गौड़ सारंग के स्वरूप की चर्चा करेंगे। साथ ही सबसे पहले सुप्रसिद्ध बाँसुरी वादक पण्डित पन्नालाल घोष की बाँसुरी पर राग गौड़ सारंग की के स्वर में एक अनूठी रचना सुनेगे, और फिर इसी राग के स्वरों में पिरोया 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘हमदर्द’ का एक गीत मन्ना डे और लता मंगेशकर की युगल आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे।

स श्रृंखला में अभी तक आपने जो राग सुने हैं, वह सभी कल्याण थाट के राग माने जाते हैं और इन्हें रात्रि के पहले प्रहर में ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। दोनों मध्यम स्वर स्वर से युक्त आज का राग, ‘गौड़ सारंग’ भी कल्याण थाट का माना जाता है, किन्तु इस राग के गायन-वादन का समय रात्रि का प्रथम प्रहर नहीं बल्कि दिन का दूसरा प्रहर होता है। राग गौड़ सारंग में दोनों मध्यम के अलावा सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इस राग के आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं, इसीलिए इसे सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। परन्तु इसमे आरोह और अवरोह के सभी स्वर वक्र प्रयोग किये जाते है, इसलिए इसे वक्र सम्पूर्ण जाति का राग माना जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है।

पन्नालाल घोष
प्राचीन ग्रन्थकार राग कामोद, केदार और हमीर की तरह राग गौड़ सारंग को भी बिलावल थाट का राग मानते थे, क्योंकि तब इस राग में तीव्र मध्यम स्वर प्रयोग नहीं किया जाता था। परन्तु जब से इन रागों में दोनों मध्यम का प्रयोग होने लगा, तब से इन्हें कल्याण थाट का राग माना जाने लगा। राग गौड़ सारंग के आरोह और अवरोह में तीव्र मध्यम स्वर का अल्प प्रयोग केवल पंचम स्वर के साथ किया जाता है। शुद्ध मध्यम स्वर आरोह और अवरोह दोनों में किया जाता है। राग की रंजकता को बढ़ाने के लिए कभी-कभी अवरोह में कोमल निषाद का अल्प प्रयोग राग केदार और हमीर की तरह राग गौड़ सारंग में भी किया जाता है। इस राग का चलन वक्र होता है। किन्तु तानों में वक्रता कम की जाती है। राग गौड़ सारंग का उदाहरण हम आपको बाँसुरी पर सुनवाएँगे। बाँसुरी वाद्य को शास्त्रीय मंच पर प्रतिष्ठित कराने वाले सुविख्यात बाँसुरी वादक पण्डित पन्नालाल घोष से अब हम इस राग में निबद्ध एक मनोहारी रचना सुनवा रहे हैं। 24 जुलाई, 1911 को अविभाजित भारत के बारिसाल, पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में जन्में पन्नालाल घोष का एक और नाम था, अमलज्योति घोष। परन्तु अपने संगीतज्ञ जीवन में वह अपने पुकारने के नाम से ही विख्यात हुए। इनके पिता अक्षय कुमार घोष स्वयं एक संगीतज्ञ थे और सितार बजाते थे। पन्ना बाबू को बचपन में अपने पिता से ही सितार वादन की शिक्षा मिली थी। जब वे कुछ बड़े हुए तो उनके हाथ कहीं से एक बाँसुरी मिल गई। उन्होने बाँसुरी पर अपने सितार पर सीखे हुए तंत्रकारी कौशल की नकल करना शुरू किया। एक बार एक सन्यासी ने सुन कर बालक पन्नालाल को भविष्य में महान बाँसुरी वादक बनने का आशीर्वाद दिया। आगे चल कर शास्त्रीय संगीत के मंच पर उन्होने बाँसुरी वाद्य को प्रतिष्ठा दिलाई। लीजिए, अब आप पण्डित पन्नालाल घोष से बाँसुरी पर बजाया राग गौड़ सारंग की तीनताल में निबद्ध एक रचना सुनिए।


राग गौड़ सारंग : तीनताल में निबद्ध एक रचना : पण्डित पन्नालाल घोष 




अनिल विश्वास और लता मंगेशकर
सुप्रसिद्ध फिल्म संगीतकार अनिल विश्वास ने 1953 की फिल्म ‘हमदर्द’ के लिए एक रागमाला गीत तैयार किया था, जिसमें चार अन्तरे चार अलग-अलग रागों में स्वरबद्ध थे। इन्हीं में से एक अन्तरा राग गौड़ सारंग में था। आज हम आपको वही अन्तरा सुनवा रहे हैं। पन्नालाल घोष और अनिल विश्वास परस्पर मित्र भी थे और सम्बन्धी भी। हमारे साथी, फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार और स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी ने एक साक्षात्कार में अनिल विश्वास के व्यक्तित्व और कृतित्व को उभारा था। उसी साक्षात्कार का कुछ अंश हम आपके लिए प्रस्तुत करते हैं। 
पन्नालाल घोष बाद में अनिल बिस्वास के बहनोई बने, पहले से ही दोनों बहुत अच्छे मित्र थे। अपने परम मित्र और बहनोई को याद करते हुए विविध भारती के ’संगीत सरिता’ में अनिल दा ने कुछ इस तरह से उनके बारे में बताया था साक्षात्कार लेने वाले सितार वादक तुषार भाटिया को – “पन्नालाल घोष बाँसुरी को कॉनसर्ट के स्तर पर लाने का श्रेय जाता है, अभी तक उन्हीं को पिता माना जाता है। कुछ हमारी पुरानी बातें हमें याद आ जाती हैं। तुमको मालूम नहीं होगा कि पन्ना से पहले मैं बाँसुरी बजाता था। तो एक दिन ऐसा हुआ कि माँ तीरथ से वापस आईं, जब गईं तब मैं बच्चे की आवाज़ में बोलता था, वापस आईं तो मैं मर्द की आवाज़ में बोलने लगा। तो उन्होंने आकर देखा कि हमारी कुलुंगी के उपर, क्या कहते हैं उसको, वह बाँसुरी रखी हुई है, उन्होंने सारे उठाके फेंक दिए और कहा कि यह तेरी आवाज़ को क्या हो गया? मैंने जाकर पन्ना को कहा कि मेरी बाँसुरी तो गई, अब क्या होगा? उन्होंने कहा कि मैं पकड़ लेता हूँ!” अनिल दा ने एक आश्चर्य करने वाले तथ्य को भी उजागर किया कि पन्नालाल घोष बाँसुरी से पहले सितार बजाते थे और उनके पिता (अक्षय घोष) एक बहुत अच्छे सितार वादक थे। तो इस तरह से बाँसुरी बजाने के शौकीन अनिल बिस्वास बन गए मशहूर संगीतकार और सितार बजाने के शौकीन पन्नालाल घोष बन गए मशहूर बाँसुरी वादक। दोनों एक दूसरे से इतना प्यार करते थे कि एक बाद जब अनिल बिस्वास को रेडियो पर पहली बार गायन रेकॉर्ड करने के लिए रेकॉर्डिंग्‍ रूम में भेजा गया तो बाहर प्रतीक्षा कर रहे पन्नालाल घोष पसीना-पसीना हो गए इस घबराहट में कि उनका दोस्त कैसा परफ़ॉर्म करेगा! अनिल दा ने उस साक्षात्कार में यह भी बताया कि पन्ना बाबू का पहला व्यावयासिक वादन अनिल दा के रेकॉर्डिंग्‍ में ही बजाया था, और जब तक वो बम्बई में रहे, अनिल दा के हर फ़िल्म में वो ही बाँसुरी बजाया करते थे। 
 पार्श्वगायक मन्ना डे और लता मंगेशका के गाये, राग गौड़ सारंग के स्वरों में पिरोए फिल्म हमदर्द के इस गीत में पण्डित पन्नालाल घोष की बाँसुरी के अलावा पण्डित रामनारायण की सारंगी का भी योगदान था। तीनताल में निबद्ध यह गीत अब आप सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग गौड़ सारंग : “ऋतु आए ऋतु जाए सखी री...” : मन्ना डे और लता मंगेशकर फिल्म – हमदर्द 





संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 258वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग पर आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 260वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका का नाम हमे बता सकते हैं?

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 27 फरवरी, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 260वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 256 की संगीत पहेली में हमने आपको 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘कोहिनूर’ से राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग - हमीर, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक – मुहम्मद रफी (और उस्ताद अमीर खाँ)।

इस बार की पहेली में कुल पाँच प्रतिभागियों ने सही उत्तर दिया है। हमारे नियमित प्रतिभागी विजेता हैं- चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी श्रृंखला ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ का रसास्वादन कर रहे हैं। श्रृंखला के छठे अंक में हमने आपसे राग गौड़ सारंग पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें शीघ्र भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र



Saturday, February 20, 2016

"सदियों से दुनिया में यही तो क़िस्सा है....", इस गीत के बनने की कहानी से श्रद्धांजलि स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली को!


एक गीत सौ कहानियाँ - 76
 

'सदियों से दुनिया में यही तो क़िस्सा है...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 76-वीं कड़ी में आज श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं जानेमाने शायर और फ़िल्मी गीतकार निदा फ़ाज़ली को जिनका 8 फ़रवरी 2016 को निधन हो गया। बताने जा रहे हैं उनके लिखे वर्ष 1981 की फ़िल्म ’बीवी ओ बीवी’ के लोकप्रिय गीत "सदियों से दुनिया में यही तो क़िस्सा है..." के बारे में जिसे किशोर कुमार ने गाया था। संगीत राहुल देव बर्मन का। 

8 फ़रवरी चले गए निदा फ़ाज़ली अपनी अन्तिम यात्रा पर। और पीछे रह गईं उनकी लिखी ग़ज़लें, गीत, शायरी
Nida Fazli
जो किसी धरोहर से कम नहीं। जब एक बार किसी रेडियो कार्यक्रम के उद्‍घोषक ने निदा साहब से मुलाक़ात के सवालात शुरू करना चाहा, तब निदा साहब ने अपनी शायराना अंदाज़ में कहा, "एक साथ बहुत सारे सवालात, और उन सब सवालातों का जवाब एक शेर - अब जहाँ भी हैं वहीं तक लिखो रुदाद-ए-सफ़र, हम तो निकले थे कहीं और ही जाने के लिए। किसी मंज़र पर बहुत देर तक आँख को ठहरने की इजाज़त वक़्त ने नहीं दी, इनमें मंज़रों का क़सूर नहीं है, क़सूर उस सुलूग का है जो ज़िन्दगी ने मेरे साथ किया।" आज निदा साहब के गुज़र जाने के बाद उनकी कही ये बातें याद आ गईं। यूं तो निदा साहब ने एक से एक अच्छा गीत लिखा है हिन्दी फ़िल्मों के लिए, जिस गीत के बनने की कहानी आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं, वह है कमचर्चित हास्य फ़िल्म ’बीवी ओ बीवी’ से। यह फ़िल्म इस बात के लिए महत्वपूर्ण थी कि इसे निर्माता थे शोमैन राज कपूर। हालाँकि फ़िल्म को निर्देशित उन्होंने नहीं बल्कि राहुल रवैल ने किया था। संजीव कुमार, रणधीर कपूर, पूनम ढिल्लों अभिनीत यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर बुरी तरह से असफल रही। फ़िल्म के गीतों की वजह से फिर कुछ हद तक राज कपूर की मान बची रही। किशोर कुमार की एकल आवाज़ में "गोरी हो काली हो या नख़रेवाली हो...", "वक़्त से पहले क़िस्मत से ज़्यादा..." और "सदियों से दुनिया में यही तो क़िस्सा है..." जैसे गीत उस दौर युवाओं के होठों पर चढ़ गया था। "मेरी बुलबुल यूं ना हो गुल इस क़दर..." (किशोर - लता) और "पैसे का खेल निराला..." (रफ़ी - आशा) फ़िल्म के दो युगल गीत थे जो लोगों के दिलों को छू नहीं सके। राज कपूर की फ़िल्मों में संगीत का क्या महत्व और स्तर होता है, इससे हम वाक़िफ़ हैं, पर इस फ़िल्म के गीत-संगीत को सुन कर राज कपूर की उपस्थिति नज़र नहीं आती।


ख़ैर, हम याद कर रहे हैं निदा फ़ाज़ली साहब को। इस फ़िल्म में उनका लिखा "सदियों से दुनिया में..." गीत ख़ूब
The Musical Team of 'Biwi O Biwi' (Photo Courtesy: K C Pingle)
लोकप्रिय हुआ था। इसी गीत के बनने की कहानी उन्हीं की ज़ुबानी पढ़िए। "मुझे याद है कि मैं राहुल देव बर्मन के साथ एक गाना लिख रहा था। गाना तैयार हो चुका था और फ़िल्म का नम था ’बीवी ओ बीवी’। फ़ाइनल रिहर्सल हो रहा था और अगले ही दिन गाना रेकॉर्ड होने वाला था। तो क्या देखते हैं कि दोपहर के दो बजे राज कपूर साहब हाथ में भेजपुरी लेकर अन्दर दाख़िल हुए और अपने स्टाइल में बैठ कर गाने की तारिफ़ की। जब रिहर्सल ख़त्म हो गया तो उन्होंने मुझे अपने क़रीब बुलाया। पूछा कि आपको यह सिचुएशन किसने बताई थी? मैंने कहा रणधीर कपूर ने। कहने लगे कि बहुत अच्छे! फिर कहने लगे कि कल अगर आपको फ़ुरसत हो तो हमारे कॉटेज में आ जाइए चेम्बुर में, मैं आपको एक सिचुएशन सुनाना चाहता हूँ। आर. डी. ने मुझे आँख मारी, बताना चाहा कि यह गाना ख़त्म हो गया, ट्युन तुम्हारे ज़हन में है और तुम जा रहे हो कल। अगर तुम वहाँ पर एक्स्टेम्पोर गाना लिख दो तो यह गाना रेकॉर्ड होगा वरना नहीं होगा। राज कपूर ने कम से कम आधा घंटा तो अपने नॉस्टल्जिया में सर्च किया कि व्यजयन्तीमाला ये थीं, और नरगिस ये थीं, फ़लानी ये थीं और उनसे ये हुआ वो हुआ, वगेरह वगेरह वगेरह वगेरह। और फिर आख़िर में तीन लाइन उन्होंने बोली, कि भाई सिचुएशन तो इतनी सी है, अंग्रेज़ी में बोलने लगे कि there is a girl, there is a boy, there will be a girl, there will be a boy, there was a girl, there was a boy, and that is the whole life। मेरे ज़हन में ट्युन थी, मैंने बोला कि राज साहब, आपने तो पूरा गाना ही बोल दिया! बोले, "वो कैसे जी?" मैंने कहा "सदियों से दुनिया में यही तो क़िस्सा है, एक ही तो लड़की है, एक ही तो लड़का है, जब भी ये मिल गए प्यार हो गया"। कहने लगे "यही हमें चाहिए था जी!" उसी दिन यह गाना पूरा होकर रेकॉर्ड हुआ और सभी को पसन्द आया।" लीजिए, अब आप इसी गीत का वीडियो देखिए। 


फिल्म - बीवी ओ बीवी : "सदियों से दुनिया में..." : किशोर कुमार : गीतकार - निदा फाजली


अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




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