Sunday, November 29, 2015

रुद्रवीणा और उस्ताद असद अली खाँ : SWARGOSHTHI – 246 : RUDRAVEENA & USTAD ASAD ALI KHAN



स्वरगोष्ठी – 246 में आज

संगीत के शिखर पर – 7 : उस्ताद असद अली खाँ

वैदिक तंत्रवाद्य रुद्रवीणा के साधक उस्ताद असद अली खाँ




रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की सातवीं कड़ी में हम आज हम वैदिककालीन तंत्रवाद्य रुद्रवीणा अनन्य साधक उस्ताद असद अली खाँ की संगीत साधना के व्यक्तित्व और कृतित्व की संक्षिप्त चर्चा कर रहे हैं। आज हम आपको उस्ताद असद अली खाँ द्वारा रुद्रवीणा पर बजाया ध्रुपद अंग में राग आसावरी और आभोगी की रचनाएँ सुनवाएँगे।


वैदिककालीन वाद्य रूद्रवीणा को परम्परागत रूप से आधुनिक संगीत जगत में प्रतिष्ठित कराने वाले अप्रतिम कलासाधक उस्ताद असद अली खाँ जयपुर बीनकार की बारहवीं पीढ़ी के कलासाधक थे। यह घराना जयपुर के सेनिया घराने का ही एक हिस्सा है। असद अली खाँ का जन्म 1937 में अलवर रियासत (राजस्थान) में हुआ था। परन्तु उनके संगीत की शिक्षा-दीक्षा रामपुर में हुई। उनके पिता उस्ताद सादिक अली खाँ रामपुर दरबार में रूद्रवीणा के प्रतिष्ठित वादक थे। उनके प्रपितामह उस्ताद रज़ब अली खाँ जयपुर घराने के दरबारी वीणावादक थे तथा रूद्रवीणा के साथ-साथ सितार और दिलरुबावादन में भी दक्ष थे। असद अली खाँ के पितामह उस्ताद मुशर्रफ अली खाँ को भी जयपुर के दरबारी वीणावादक के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त थी।

आज हम जिसे संगीत का जयपुर घराना के नाम से पहचानते हैं, उसकी स्थापना में असद अली खाँ के प्रपितामह (परदादा) उस्ताद राजब अली खाँ का योदान रहा है। उस्ताद रजब अली खाँ जयपुर दरबार के केवल संगीतज्ञ ही नहीं; बल्कि महाराजा मानसिंह के गुरु भी थे। महाराजा ने उन्हें जागीर के साथ ही एक विशाल हवेली दे रखी थी तथा उन्हें किसी भी समय बेरोक-टोक महाराजा के महल में आने-जाने की स्वतन्त्रता थी। असद अली खाँ के दादा जी उस्ताद मुशर्रफ अली खाँ ने भी जयपुर दरबार में वही प्रतिष्ठा प्राप्त की। वीणावादकों का यह घराना ध्रुवपद संगीत के खण्डहार वाणी में वादन करता रहा है; जिसका पालन उस्ताद असद अली खाँ ने भी किया और अपने शिष्यों को भी इसी वाणी की शिक्षा दी। ध्रुवपद संगीत में चार वाणियों का वर्गीकरण तानसेन के समय में ही हो चुका था। ‘संगीत रत्नाकर’ ग्रन्थ में यह वर्गीकरण शुद्धगीत, भिन्नगीत, गौड़ीगीत और बेसरागीत नामों से हुआ है; जिसे आज गौड़हार वाणी, डागर वाणी, खण्डहार वाणी और नौहार वाणी के नाम से जाना जाता है। उस्ताद असद अली खाँ और उनके पूर्वजों का वादन खण्डहार वाणी का था। इसके अलावा खाँ साहब दूसरी वाणियों की विशेषताओं को प्रदर्शित करने से नहीं हिचकते थे। ध्रुवपद अंग में वीणावादन का चलन कम होने के बावजूद उन्होंने परम्परागत वादन शैली से कभी समझौता नहीं किया। आइए, उनकी वादन शैली की सार्थक अनुभूति करते हैं। इस प्रस्तुति में उस्ताद असद अली खाँ ने ध्रुवपद अंग में राग आसावरी के स्वरों में लयबद्ध किन्तु तालरहित झाला और फिर चौताल में एक बन्दिश का वादन किया है। नाथद्वारा परम्परा के पखावज वादक पण्डित डालचन्द्र शर्मा ने पखावज पर संगति की है।


राग आसावरी : रुद्रवीणा पर झाला और चौताल में बन्दिश : उस्ताद असद अली खाँ





उस्ताद असद अली खाँ ने अपने पिता उस्ताद सादिक अली खाँ से रामपुर दरबार में लगभग 15 वर्षों तक रूद्रवीणा के वादन की शिक्षा ग्रहण की, और फिर प्रतिदिन कई घण्टों तक निरन्तर रियाज करके उन्होंने इस वैदिककालीन वाद्य को सिद्ध कर लिया। उन्होंने ध्रुवपद अंग में रूद्रवीणा की ‘खान दरबारी’ शैली विकसित की और उस शैली को यही नाम दिया। खाँ साहब 17 वर्षों तक दिल्ली विश्वविद्यालय में संगीत के प्रोफ़ेसर रहे। वे आजन्म अविवाहित रहे। अपने भतीजे अली जाकी हैदर को उन्होंने दत्तक पुत्र बना लिया था और उन्हें रूद्रवीणा वादन में प्रशिक्षित किया था। अली जाकी के अलावा अन्य कई शिष्यों को भी उन्होंने संगीत शिक्षा दी है; जो इस परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। भारतीय शास्त्रीय संगीत का प्रचार-प्रसार करने में संलग्न संस्था ‘स्पीक मैके’ के साथ जुड़ कर खाँ साहब ने स्कूल-कालेज के विद्यार्थियों के बीच रुद्रवीणा से नई पीढ़ी को परिचित कराने का अभियान चलाया था, जो खूब सफल रहा। नई पीढी को रूद्रवीणा की वादन शैली से परिचित कराने के साथ-साथ उस्ताद असद अली खाँ उन्हें यह बताना नहीं भूलते थे कि यह तंत्रवाद्य विश्व का सबसे प्राचीन वाद्य है और ध्वनि के वैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आज भी खरा उतरता है। वे भगवान शिव को रूद्रवीणा का निर्माता मानते थे। उस्ताद असद अली खाँ को अनेक सम्मान और पुरस्कार से नवाज़ा गया था; जिनमें 1977 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2008 में पद्मभूषण सम्मान, तानसेन सम्मान आदि प्रमुख हैं। 14 जून, 2011 को उनके निधन से भारतीय संगीत जगत में रिक्तता तो आई है; किन्तु यह विश्वास भी है कि उनके शिष्यगण रुद्रवीणा वादन की वैदिककालीन परम्परा को आगे बढ़ाएँगे। इस आलेख को विराम देने से पहले लीजिए सुनिए, उस्ताद असद अली खाँ का रूद्रवीणा पर बजाया राग आभोगी में एक ध्रुवपद बन्दिश। पखावज संगति वरिष्ठ पखावजी पण्डित गोपाल दास ने की है। आप यह रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग आभोगी : ध्रुपद बन्दिश : उस्ताद असद अली खाँ






संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 246वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक तंत्रवाद्य पर वाद्य संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 250वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह किस राग की झलक प्रस्तुत करता है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप संगीत वाद्य को पहचान रहे हैं? यदि हाँ, तो हमें उस वाद्य का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 5 दिसम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 248वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 244 की संगीत पहेली में हमने आपको सुविख्यात गायक उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ की आवाज़ में प्रस्तुत दादरा का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दादरा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं- पहली बार ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली में भाग लेने वाले प्रतिभागी, चेरीहिल (एन.जे.) से प्रफुल्ल पटेल। प्रफुल्ल जी, संगीत प्रेमियों की इस महफिल में हार्दिक स्वागत है। हमारे अन्य नियमित प्रतिभागी हैं, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ का यह सातवाँ अंक था। इस अंक में हमने प्राचीन तंत्रवाद्य रुद्रवीणा वादक उस्ताद असद अली खाँ के व्यक्तित्व और उनके वादन पर संक्षिप्त प्रकाश डालने का प्रयत्न किया है। अगले अंक में हम भारतीय संगीत की किसी अन्य विधा के किसी शिखर व्यक्तित्व के कृतित्व पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  





Saturday, November 28, 2015

बातों बातों में - 14 : गीतकार असद भोपाली के बारे में उनके सुपुत्र ग़ालिब असद भोपाली से बातचीत



बातों बातों में - 14

गीतकार असद भोपाली के बारे में उनके बेटे ग़ालिब असद भोपाली से बातचीत

जो बिक ही नहीं पाई वो वैसे भी किसी काम की नहीं...



नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रृंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। इस बार हम आपके लिए लेकर आए हैं जाने-माने गीतकार असद भोपाली के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में उनके बेटे गालिब असद भोपाली से की गई लम्बी बातचीत के सम्पादित अंश। इनसे बातचीत की है कृष्णमोहन मिश्र ने। 



असद भोपाली
फिल्म-जगत में कुछ ऐसे भी सृजनशील रचनाकार हुए हैं, जिन्होने गुणबत्ता से कभी भी समझौता नहीं किया, चाहे फिल्म उन्हें किसी भी श्रेणी की मिली हो। फिल्म-जगत के एक ऐसे ही प्रतिभावान, स्वाभिमानी और संवेदनशील शायर-गीतकार असद भोपाली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर “बातों बातों में” के इस अंक में हम चर्चा करेंगे। पिछले दिनों फिल्म और टेलीविज़न धारावाहिक के पटकथा, संवाद और गीत लेखक ग़ालिब खाँ से हमारा सम्पर्क हुआ। मालूम हुआ कि अपने समय के चर्चित गीतकार असद भोपाली के आप सुपुत्र हैं। अपने स्वाभिमानी पिता से ही प्रेरणा पाकर ग़ालिब खाँ फिल्म और टेलीविज़न के क्षेत्र में सफलतापूर्वक सक्रिय हैं। हमने ग़ालिब साहब से अनुरोध किया कि वो अपने पिता असद भोपाली के बारे में हमारे साथ बातचीत करें। अपनी व्यस्तता के बावजूद उन्होने हमसे बातचीत की। प्रस्तुत है चार दशकों तक फिल्म-गीतकार के रूप में सक्रिय श्री असद भोपाली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर उनके सुपुत्र ग़ालिब खाँ से किये गये साक्षात्कार के सम्पादित अंश।

ग़ालिब असद भोपाली
कृष्णमोहन- ग़ालिब खाँ साहब, “रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के इस मंच पर हम आपका हार्दिक स्वागत करते हैं।

ग़ालिब खाँ- धन्यवाद। आपने इस मंच पर मुझे अपने पिता जी के बारे में कुछ कहने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ।

कृष्णमोहन- ग़ालिब साहब, करोड़ों फिल्म संगीत प्रेमी आपके पिता को असद भोपाली के नाम से जानते हैं। हम उनका वास्तविक नाम जानना चाहते हैं साथ ही यह भी जानना चाहेंगे कि आपके खानदान का सम्बन्ध भोपाल से किस प्रकार से जुड़ा हुआ है?

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता असद उल्लाह खाँ का जन्म 10 जुलाई 1921 को भोपाल में हुआ था। उनके पिता यानि मेरे दादा मुंशी अहमद खाँ का भोपाल के आदरणीय व्यक्तियों में शुमार था। वे एक शिक्षक थे और बच्चों को अरबी-फारसी पढ़ाया करते थे। पूर्व राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा भी उनके शिष्यों में से एक थे। वो घर में ही बच्चों को पढ़ाया करते थे, इसीलिए मेरे पिताजी भी अरबी-फारसी के साथ साथ उर्दू में भी वो महारत हासिल कर पाए जो उनकी शायरी और गीतों में हमेशा झलकती रही। उनके पास शब्दों का खज़ाना था। एक ही अर्थ के बेहिसाब शब्द हुआ करते थे उनके पास। इसलिए उनके जाननेवाले संगीतकार उन्हें गीत लिखने की मशीन कहा करते थे।

कृष्णमोहन- फिल्म-जगत में आने से पहले एक शायर के रूप वो कितने लोकप्रिय थे?

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता को शायरी का शौक़ किशोरावस्था से ही था। उस दौर में जब कवियों और शायरों ने आज़ादी की लड़ाई में अपनी कलम से योगदान किया था, उस दौर में उन्हें भी अपनी क्रान्तिकारी लेखनी के कारण जेल की हवा खानी पड़ी थी।

कृष्णमोहन- इसका अर्थ हुआ कि असद भोपाली साहब स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी भी थे।

ग़ालिब खाँ- जी हाँ, आज़ादी की लड़ाई में हर वर्ग के लोगों ने हिस्सा लिया था। इनमें साहित्यकारों की भी भूमिका रही है। मेरे पिता ने एक बुद्धिजीवी के रूप में इस लड़ाई में अपना योगदान किया था। क्रान्तिकारी लेखनी के कारण अँग्रेजी सरकार ने उन्हें जेल में बन्द कर दिया था। ये और बात है कि अँग्रेज़ जेलर भी उनकी 'गालिबी' का प्रशंसक हो गया था। (जी हाँ; वो अँग्रेज़ जेलर शायरी को 'गालिबी' कहा करता था)। जेल से छूटने के बाद मेरे पिता मुशायरों में हिस्सा लेते रहे।

कृष्णमोहन- स्वतन्त्रता संग्राम में अपनी लेखनी से योगदान करने वाले शायर असद भोपाली साहब फिल्मी दुनिया में कैसे पहुंचे?

सुरैया
ग़ालिब खाँ- तब देश आज़ाद हो चुका था। उन दिनों हर छोटे-बड़े मुशायरे में उन्हें सम्मान से बुलाया जाता था। इसी शायरी ने उन्हें फिल्मनगरी मुम्बई (तत्कालीन बम्बई) पहुँचा दिया। हुआ यूँ कि भोपाल टाकीज कि तरफ से एक मुशायरे का आयोजन किया गया था और शायरों की जबान में कहा जाए तो उन्होंने ये ‘मुशायरा लूट लिया’ था। नतीजा ये हुआ कि भोपाल टाकिज के मैनेजर मिस्बाह साहब ने उन्हें पाँच सौ रूपये दिये और फाजली ब्रदर्स का पता दिया, जिन्हें अपनी नयी फिल्म के गीतों के लिए एक माहिर शायर कि दरकार थी। वो सन 1949 में बम्बई आये और हमेशा के लिए यहीं के होकर रह गए। 'दुनिया' उनकी पहली फिल्म थी। संगीतकार थे सी. रामचन्द्र और मुख्य भूमिकाओं में करण दीवान, सुरैया, और याकूब जैसे महान कलाकार थे। इस फिल्म का गीत “अरमान लुटे दिल टूट गया...” लोकप्रिय भी हुआ था।

कृष्णमोहन- ग़ालिब साहब, 1949 में प्रदर्शित फिल्म ‘दुनिया’ में आपके पिता असद भोपाली के लिखे इस पहले गीत को क्यों न हम श्रोताओं को सुनवाते चलें? 

ग़ालिब खाँ- ज़रूर, मेरे पिता के इस पहले फिल्मी गीत को श्रोताओं को ज़रूर सुनवाइए। 


फिल्म – दुनिया : “अरमान लुटे दिल टूट गया...” : गायिका - सुरैया 


 
कृष्णमोहन- बहुत दर्द भरा गीत है। अब आपसे हम यह जानना चाहेंगे कि फिल्म-जगत में स्थापित हो जाने के बाद असद साहब के शुरुआती दौर का सबसे लोकप्रिय गीत कौन सा है? 

ग़ालिब खाँ- शुरुआती दौर में उन्होंने संगीतकार श्यामसुन्दर और हुस्नलाल भगतराम जैसे नामी संगीतकारों के साथ काम किया था। बी.आर. चोपड़ा द्वारा निर्देशित सफलतम फिल्म 'अफसाना' के गीतों से उन्होने अपनी लेखनी का लोहा भी मनवा लिया। फिल्म का एक गीत -“किस्मत बिगड़ी दुनिया बदली, फिर कौन किसी का होता है, ऐ दुनिया वालों सच तो कहो क्या प्यार भी झूठा होता है...” आज भी लोगों को याद है। मुझे अपने पिता के लिखे गीतों में यह गीत बेहद पसंद है। कृष्णमोहन जी, क्या यह गीत हम श्रोताओं को सुनवा सकते हैं? 

कृष्णमोहन- अवश्य, मैं स्वयं आपसे यही कहना चाह रहा हूँ। तो “बातों बातों में” के प्रिय पाठकों-श्रोताओं, आप सुनिए हमारे आज के अतिथि जनाब ग़ालिब खाँ की पसन्द का गीत, जिसे उनके पिता और सुप्रसिद्ध शायर-गीतकार असद भोपाली ने 1951 में प्रदर्शित फिल्म ‘अफसाना’ के लिए लिखा था। आप यह गीत सुनें। 


फिल्म – अफसाना : “किस्मत बिगड़ी दुनिया बदली...” : गायक – मुकेश 




ग़ालिब खाँ- फिल्म ‘अफसाना’ के गीत से उन्हें लोकप्रियता तो मिली, परन्तु फिल्म की सफलता के सापेक्ष उन्हें काम नहीं मिला। उस समय के कलाकारों को काम से ज्यादा संघर्ष करना पड़ता था, उन्होंने भी किया। 1963 में प्रदर्शित फिल्म 'पारसमणि' के गीत लिखने का उन्हें प्रस्ताव मिला। यह एक फेण्टेसी फिल्म थी। फिल्म की संगीत-रचना के लिए नये संगीतकार लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल को अनुबन्धित किया गया था। मेरे पिता ने उस समय की जन-रुचि और फिल्म की थीम के मुताबिक इस फिल्म के लिए गीत लिखे थे। फिल्म ‘पारसमणि’ के गीत- "हँसता हुआ नूरानी चेहरा..." और "वो जब याद आये, बहुत याद आये..." ने लोकप्रियता के परचम लहरा दिये थे। ये गीत वर्षों बाद आज भी लोकप्रियता के शिखर पर हैं। 

कृष्णमोहन- आगे बढ़ने से पहले क्यों न हम इस फिल्म का एक गीत अपने पाठकों-श्रोताओं को सुनवाते चलें। 

ग़ालिब खाँ- जी हाँ, मेरे खयाल से हम अपने पाठकों को ‘पारसमणि’ का बेहद लोकप्रिय गीत– “हँसता हुआ नूरानी चेहरा...” सुनवाते हैं। 


फिल्म – पारसमणि : “हँसता हुआ नूरानी चेहरा...” : स्वर – लता मंगेशकर और कमल बरोट 



कृष्णमोहन- बहुत ही मधुर गीत आपने सुनवाया। ग़ालिब साहब; अब हम जानना चाहेंगे की आपके पिता असद भोपाली ने किन-किन संगीतकारों के साथ काम किया और किन संगीतकारों से उनके अत्यन्त मधुर सम्बन्ध रहे? 

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता ने संगीतकार सी. रामचन्द्र, हुस्नलाल-भगतराम, खैय्याम, हंसराज बहल, एन. दत्ता, नौशाद, ए.आर. कुरैशी (मशहूर तबलानवाज़ अल्लारक्खा), चित्रगुप्त, रवि, सी. अर्जुन, सोनिक ओमी, राजकमल, लाला सत्तार, हेमन्त मुखर्जी, कल्याणजी-आनन्दजी जैसे दिग्गज संगीतकरों के साथ काम किया। परन्तु ‘पारसमणि’ में लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल जैसे नए संगीतकारों के साथ सफलतम गीत देने के बाद नए संगीतकारों के साथ काम करने का जो सिलसिला शुरू हुआ वो अन्त तक चलता रहा। नए संगीतकारों में गणेश और उषा खन्ना के साथ वो अधिक सहज थे। संगीतकार राम लक्ष्मण उनके अन्तिम संगीतकार साथियों में से हैं, जिनके पास आज भी उनके कई मुखड़े और गीत लिखे पड़े हैं। 

कृष्णमोहन- असद भोपाली जी ने हर श्रेणी की फिल्मों में अनेक लोकप्रिय गीत लिखे हैं, किन्तु उन्हें वह सम्मान नहीं मिल सका, जो उन्हें बहुत पहले ही मिलना चाहिए था। इस सम्बन्ध में आपका और आपके परिवार का क्या मत है? 

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता ने 1949 से 1990 तक लगभग चार सौ फिल्मों में दो हज़ार से ज्यादा गीत लिखे परन्तु फिल्म ‘दुनिया’ से लेकर ‘मैंने प्यार किया’ के गीत "कबूतर जा जा जा..." तक उन्हें वो प्रतिष्ठा नहीं मिली जिसके वो हकदार थे। इस अन्तिम फिल्म के लिए ही उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर अवार्ड प्राप्त हुआ था। दरअसल इस स्थिति के लिए वो खुद भी उतने ही ज़िम्मेदार थे, जितनी ये फिल्म नगरी। कवियों और शायरों वाली स्वाभाविक अकड़ उन्हें काम माँगने से रोकती थी और जीवनयापन के लिए जो काम मिलता गया वो करना पड़ा। बस इतना ध्यान उन्होने अवश्य रखा था कि कभी अपनी शायरी का स्तर नहीं गिरने दिया। कम बजट की स्टंट फिल्मों में भी उन्होंने "हम तुमसे जुदा हो के, मर जायेंगे रो-रो के..." जैसे गीत लिखे। अपेक्षित सफलता न मिलने से या यूँ कहूँ कि उनकी असफलता ने उन्हें शराब का आदी बना दिया था और उनकी शराब ने पारिवारिक माहौल को कभी सुखद नहीं होने दिया। पर आज जब मैं उनकी स्थिति को अनुभव कर पता हूँ तो समझ में आता है कि जितना दुःख उनकी शराब ने हमें दिया उससे ज्यादा दुःख वो चुपचाप पी गए और हमें एहसास तक नहीं होने दिया। 

प्रसिद्ध शायर ग़ालिब के हमनाम (असद उल्लाह् खाँ) होने के साथ-साथ स्वभाव, संयोग और भाग्य भी उन्होंने कुछ वैसा ही पाया था। मेरे पिता के अन्तर्मन का दर्द उनके गीतों में झलकता है। दर्द भरे गीतों की लम्बी सूची में से फिल्म ‘मिस बॉम्बे’ का एक गीत मैं पाठकों को सुनवाना चाहता हूँ। 

कृष्णमोहन- दोस्तों, ग़ालिब खाँ के अनुरोध पर हम आपको 1957 की फिल्म ‘मिस बॉम्बे’ का यह गीत सुनवा रहे हैं। स्वर मोहम्मद रफी का और संगीत हंसराज बहल का है। 


फिल्म – मिस बॉम्बे : “ज़िंदगी भर ग़म जुदाई का..” : स्वर – मोहम्मद रफी


 
कृष्णमोहन- साहित्य क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों के बारे में भी हमें बताएँ। क्या उनके गीत / ग़ज़ल के संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं? 

ग़ालिब खाँ- इस मामले में भी दुर्भाग्य ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। उनकी लिखी हजारों नज्में और गजले जिस डायरी में थी वो डायरी बारिश कि भेंट चढ़ गयी। उन दिनों हम नालासोपारा के जिस घर में रहा करते थे, वह पहाड़ी के तल पर था और वहाँ मामूली बारिश में भी बाढ़ कि स्थिति पैदा हो जाती थी और ऐसी ही एक बाढ़, असद भोपाली की सारी "गालिबी" को बहा ले गयी। तब उनकी प्रतिक्रिया, मुझे आज भी याद है। उन्होने कहा था- 'जो मैं बेच सकता था मैं बेच चुका था, और जो बिक ही नहीं पाई वो वैसे भी किसी काम की नहीं थी'। एक शायर के पूरे जीवन की त्रासदी इस एक वाक्य में निहित है। 

कृष्णमोहन- आप अपने बारे में भी हमारे पाठको को कुछ बताएँ। यह भी बताएँ कि अपने पिता का आपके ऊपर कितना प्रभाव पड़ा? 

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता मिर्ज़ा ग़ालिब से कितने प्रभावित थे इसका अंदाज़ा आप इसी से लगा सकते हैं कि उन्होने मेरा नाम ग़ालिब ही रखना पसन्द किया। वो अक्सर कहते थे कि वो असदउल्लाह खाँ "ग़ालिब" थे और ये 'ग़ालिब असदउल्लाह खाँ’ है। अब ये कुछ उस नाम का असर है और कुछ धमनियों में बहते खून का, कि मैंने भी आखिरकार कलम ही थाम ली। शायरी और गीत लेखन से शुरुआत की, फिर टेलीविज़न सीरियल के लेखन से जुड़ गया। ‘शक्तिमान’ जैसे धारावाहिक से शुरुआत की। फिर ‘मार्शल’, ‘पैंथर’, ‘सुराग’ जैसे जासूसी धारावाहिकों के साथ ‘युग’, ‘वक़्त की रफ़्तार’, ‘दीवार’ के साथ-साथ ‘माल है तो ताल है’, ‘जीना इसी का नाम है’, ‘अफलातून’ जैसे हास्य धारावाहिक भी लिखे। ‘हमदम’, ‘वजह’ जैसी फिल्मो का संवाद-लेखन किया। एक फिल्म ‘भिन्डी बाज़ार इंक’ की पटकथा-संवाद लिखने का सौभाग्य मिला, जिसे दर्शकों ने काफी सराहा। बस मेरी इतनी ही कोशिश है कि मैं अपने पिता के नाम का मान रख सकूँ और उनके अधूरे सपनों को पूरा कर पाऊँ। 

कृष्णमोहन- आपका बहुत-बहुत आभार, आप “बातों बातों में” के मंच पर आए और अपने पिता असद भोपाली की शायरी के विषय में हमारे पाठकों के साथ चर्चा की। अब चलते –चलते आप अपनी पसन्द का कोई गीत हमारे पाठकों/श्रोताओं को सुनवा दें। 

ग़ालिब खाँ- ज़रूर, पाठको को मैं एक ऐसा गीत सुनवाना चाहता हूँ, जिसे जब भी मैं सुनता हूँ अपने पिता को अपने आसपास पाता हूँ। यह फिल्म ‘एक नारी दो रूप’का गीत है जिसे रफी साहब ने गाया है और संगीतकार हैं गणेश। चूँकि फिल्म चली नहीं इसलिए गीत भी अनसुना ही रह गया। आप इस गीत को सुने और मुझे इजाज़त दीजिए। 


फिल्म – एक नारी दो रूप : “दिल का सूना साज तराना ढूँढेगा...” : स्वर – मोहम्मद रफी 




आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी soojoi_india@yahoo.co.in पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



वार्ताकार : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 


Tuesday, November 24, 2015

हरिशंकर परसाई की समझौता

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" की लघुकथा "महावीर और गाड़ीवान" का पाठ सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं, हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार हरिशंकर परसाई की लघुकथा समझौता, जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

इस कहानी समझौता का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 18 सेकंड है। इस लघुकथा का गद्य हिन्दी समय पर उपलब्ध है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

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मेरी जन्म-तारीख 22 अगस्त 1924 छपती है। यह भूल है। तारीख ठीक है। सन् गलत है। सही सन् 1922 है। ।
 ~ हरिशंकर परसाई (1922-1995)

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"अंधा है क्‍या? दिखता भी नहीं।”
 (हरिशंकर परसाई की लघुकथा "समझौता" से एक अंश)


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समझौता MP3

#Twenty Fifth Story, Samjhauta; Harishankr Parsai; Hindi Audio Book/2015/25. Voice: Anurag Sharma

Sunday, November 22, 2015

आफताब-ए-मौसिकी फ़ैयाज़ खाँ : SWARGOSHTHI – 245 : USTAD FAIYAZ KHAN



स्वरगोष्ठी – 245 में आज

संगीत के शिखर पर – 6 : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ

संगीत जगत के आकाश पर चमकते सूर्य – उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ




रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरमयी श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की छठीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की छठीं कड़ी में हम आज ‘आफताब-ए-मौसिकी’ अर्थात संगीत जगत के सूर्य के नाम से विख्यात, आगरा रँगीला घराने के सिरमौर गायक उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के व्यक्तित्व और कृतित्व की संक्षिप्त चर्चा कर रहे हैं। आज हम आपको उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वरों में पहले राग तिलंग में नोम-तोम का आलाप, राग ललित में एक द्रुत खयाल और राग भैरवी का एक दादरा सुनवाएँगे।


भारतीय संगीत के प्रचलित घरानों में जब भी आगरा घराने की चर्चा होगी तत्काल एक नाम जो उभर कर हमारे सामने आता है, वह है- आफताब-ए-मौसिकी उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ का। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हम इन्हीं महान गायक कलासाधक को स्मरण कर रहे हैं। पिछली शताब्दी के पूर्वार्द्ध के जिन संगीतज्ञों की गणना हम शिखर-पुरुष के रूप में करते हैं उस्ताद फ़ैयाज़ खान उन्ही में से एक थे। ध्रुवपद-धमार, खयाल-तराना, ठुमरी-दादरा, सभी शैलियों की गायकी पर उन्हें कुशलता प्राप्त थी। प्रकृति ने उन्हें घन, मन्द्र और गम्भीर कण्ठ का उपहार तो दिया ही था, उनके शहद से मधुर स्वर श्रोताओं पर रस-वर्षा कर देते थे। फ़ैयाज़ खाँ का जन्म ‘आगरा रँगीले घराना’ के नाम से विख्यात ध्रुवपद गायकों के परिवार में हुआ था। दुर्भाग्य से फ़ैयाज़ खाँ के जन्म से लगभग तीन मास पूर्व ही उनके पिता सफदर हुसैन खाँ का इन्तकाल हो गया। जन्म से ही पितृ-विहीन बालक को उनके नाना ग़ुलाम अब्बास खाँ ने अपना दत्तक पुत्र बनाया और पालन-पोषण के साथ-साथ संगीत-शिक्षा की व्यवस्था भी की। यही बालक आगे चल कर आगरा घराने का प्रतिनिधि बना और भारतीय संगीत के अर्श पर आफताब बन कर चमका। फ़ैयाज़ खाँ की विधिवत संगीत शिक्षा उस्ताद ग़ुलाम अब्बास खाँ से आरम्भ हुई, जो फ़ैयाज़ खाँ के गुरु और नाना तो थे ही, गोद लेने के कारण पिता के पद पर भी प्रतिष्ठित हो चुके थे। फ़ैयाज़ खाँ के पिता का घराना ध्रुपदियों का था, अतः ध्रुवपद अंग की गायकी इन्हें संस्कारगत प्राप्त हुई। आगे चल कर फ़ैयाज़ खाँ ध्रुवपद के ‘नोम-तोम’ के आलाप में इतने दक्ष हो गए थे कि संगीत समारोहों में उनके समृद्ध आलाप की फरमाइश हुआ करती थी। आइए आपको भी उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वर में राग ‘तिलंग’ में नोम-तोम का आलाप सुनवाते हैं।


राग तिलंग : नोम-तोम आलाप : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ




फ़ैयाज़ खाँ के नाना का घराना खयाल गायकों का था। नाना ने बचपन से ही कठोर रियाज़ कराया। संगीत के घरानों में संगीत-शिक्षा के लिए एक कठोर व्रत का पालन शिष्य से कराया जाता है, जिसे ‘चिल्ला’ कहा जाता है। इस व्रत के अनुसार शिष्य को निरन्तर बारह वर्षों तक प्रतिदिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक संगीत का अभ्यास करना होता है। प्रशिक्षण की इस अवधि में फ़ैयाज़ खाँ ने स्वर-साधना, ध्रुवपद और होरी गायन का कठिन अभ्यास किया। 25 वर्ष की आयु तक वे लोकप्रिय होने लगे थे। उनकी गायकी पर अपने नाना ग़ुलाम अब्बास खाँ के अतिरिक्त तत्कालीन महान गायक नत्थन खाँ, जयपुर के अब्दुल खाँ और सेनिया घराने के अमीर खाँ का भी प्रभाव था। आइए अब हम आपको उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वरों में राग ललित में द्रुत तीनताल का एक खयाल सुनवाते हैं, जिसके बोल हैं –“तड़पत हूँ जैसे जल बिन मीन...”।


राग ललित : ‘तड़पत हूँ जैसे जल बिन मीन...’ : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ




पिछली शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक के चार दशकों तक उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ देश में आयोजित होने वाले संगीत समारोहों के प्राण हुआ करते थे। संगीत-प्रेमियों को सम्मोहित कर लेने की अद्भुत क्षमता उनकी गायकी में थी। उस दौर में उन्हें जनसामान्य की ओर से ‘महफिल के बादशाह’ के नाम से पुकारा जाता था। 1930 के आसपास उस्ताद ने कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर के निवास स्थान जोरासांकों ठाकुरबाड़ी में आयोजित संगीत समारोह में भाग लिया था। समारोह के दौरान वे रवीन्द्रनाथ ठाकुर से अत्यन्त प्रभावित हुए और उन्हें “हिंदुस्तान का सबसे बड़ा शायर” की उपाधि दे दी। अपने प्रभावशाली संगीत से उन्होने देश के सभी संगीत केन्द्रों में खूब यश अर्जित किया। उनकी ख्याति के कारण बड़ौदा राज-दरबार में संगीतज्ञ के रूप में उनकी नियुक्ति हुई। 1938 में उन्हे मैसूर दरबार से “आफताब-ए-मौसिकी” (संगीत के सूर्य) की उपाधि से नवाजा गया। उस्ताद की गायकी में जवारीदार स्वर, राग दरबारी का गान्धार, राग श्री का ऋषभ और अनूठी लयकारी श्रोताओं को सम्मोहित करती थी। बोलतान में गीत की पंक्तियों का चमत्कारिक प्रदर्शन किया करते थे। वे स्वर, भाषा, अर्थ, भाव, लय सभी का भरपूर आनन्द लेकर गाते थे। ध्रुवपद और खयाल गायकी में दक्ष होने के साथ-साथ ठुमरी-दादरा गायन में भी वे अत्यन्त कुशल थे। फ़ैयाज़ खाँ ने कलकत्ता (अब कोलकाता) में भैया गनपत राव और मौजुद्दीन खाँ से ठुमरी-दादरा सुना था और संगीत की इस विधा से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। ठुमरी के दोनों दिग्गजों से प्रेरणा पाकर फ़ैयाज़ खाँ ने इस विधा में भी दक्षता प्राप्त की। खाँ साहब ठुमरी और दादरा के बीच उर्दू के शे’र जोड़ कर चार चाँद लगा देते थे। इसके साथ ही टप्पे की तानों को भी वे ठुमरी गाते समय जोड़ लिया करते थे। उनके द्वारा गायी गई उपशास्त्रीय रचनाओं में- “ना बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी....”, “पानी भरे री कौन अलबेली...” आदि आज भी संगीत प्रेमियों का बीच अत्यन्त लोकप्रिय है। इस आलेख को विराम देने से पहले आइए आपको सुनवाते हैं, उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वर में राग भैरवी में निबद्ध अत्यन्त लोकप्रिय दादरा। खाँ साहब का निधन 5 नवम्बर, 1950 को हुआ था। इसी माह उनकी पुण्यतिथि भी थी, इस अवसर पर हम उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ को समस्त संगीत-प्रेमियों की ओर से श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए आज यहीं विराम लेते हैं।


राग भैरवी दादरा : ना बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...’ : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ





 संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 245वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक तंत्र-वाद्य संगीत रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इस संगीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 250 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) के विजेताओं के साथ ही वार्षिक विजेताओं की घोषणा भी की जाएगी।


1 – वाद्ययंत्र पर कौन सा राग बजाया जा रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस वाद्ययंत्र की आवाज़ है? वाद्य का नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 28 नवम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 247वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


 पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 243वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुविख्यात वायलिन-वादिका डॉ. एन. राजम् का वायलिन पर बजाया राग जोग का एक अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – जोग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – द्रुत तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य – वायलिन या बेला।

इस बार की पहेली के प्रश्नों का सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


 अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ के आज के अंक में हमने आपसे ध्रुपद, खयाल, ठुमरी, दादरा आदि सभी गान-शैली के शिखर पर प्रतिष्ठित उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के व्यक्तित्व और कृतित्व पर संक्षिप्त चर्चा की है। अगले अंक में एक अन्य विधा के शिखर पर प्रतिष्ठित व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला को हमारे अनेक पाठकों ने पसन्द किया है। हम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  





Saturday, November 21, 2015

"दिल तड़प-तड़प के कह रहा है आ भी जा..." - जानिए पोलैण्ड के उस गीत के बारे में भी जिससे इस गीत की धुन प्रेरित है


एक गीत सौ कहानियाँ - 70
 

'दिल तड़प-तड़प के कह रहा है आ भी जा...' 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 70-वीं कड़ी में आज जानिए 1958 की फ़िल्म ’मधुमति’ के गीत "दिल तड़प-तड़प के कह रहा है आ भी जा..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर और मुकेश ने गाया था। बोल शैलेन्द्र के और संगीत सलिल चौधरी का।

मैं आजकल पोलैण्ड में हूँ। कार्यालय के काम से मुझे एक महीने के लिए यहाँ रहना पड़ेगा। नवंबर का मध्य होते ही यूरोप में जाड़ा ज़ोर पकड़ चुका है। 3 डिग्री तापमान, बादलों भरा आकाश, धूप का कहीं नामोनिशान नहीं, सूर्योदय सुबह 7:30 और सूर्यास्त शाम 4 बजे, चारों तरफ़ ठण्ड और धुंधलाहट के मद्देनज़र रविवार होने के बावजूद बाहर घूमने-फिरने का ख़ास मौका नहीं मिल रहा। ऐसे में होटल के कमरे में फ़्री वाई-फ़ाई के सहारे लैपटॉप पर दफ़्तर के काम के साथ-साथ यू-ट्यूब पर गाने सुनने या फ़िल्म देखने के अलावा और कोई काम नहीं। यकायक ख़याल आया कि पोलैण्ड आने की तैयारी की भागा-दौड़ी में अगले सप्ताह का ’एक गीत सौ कहानियाँ’ लिखना तो रह ही गया था। दिल मचल उठा यह सोच कर कि अगले एक घंटे का समय इसे लिखते हुए गुज़ार दूँगा। किस गीत के बारे में लिखूँ आज? कुछ सूझ नहीं रहा। बगल के कमरे से पोलैण्ड के किसी गीत के बोल और ताल कानों पर पड़ रही है। अचानक जैसे कोई बिजली सी कौंध गई। याद आया कि फ़िल्म ’मधुमति’ में एक गीत है जो एक पोलिश (पोलैण्ड की भाषा) गीत की धुन पर आधारित है। मन रोमांच से भर उठा। कभी सोचा न था कि पोलैण्ड जैसे देश में भी मेरे क़दम पड़ेंगे। यहँ रहते हुए यहाँ की लोक-धुन से प्रेरित हिन्दी फ़िल्मी गीत का शोध निस्संदेह एक आनन्ददायक अनुभूति होगी।


"दिल तड़प-तड़प के कह रहा है आ भी जा, तू हमसे आँख ना चुरा, तुझे क़सम है आ भी जा..." गीत के कम्पोज़िशन के लिए सलिल चौधरी ने पोलैण्ड के एक लोक धुन का सहारा लिया था। इस गीत के अलावा सलिल दा ने कई बार विदेशी लोक धुनों या विदेशी आधुनिक धुनों का इस्तेमाल अपने गीतों में किया है। उदाहरण स्वरूप ’दो बिघा ज़मीन’ का "धरती कहे पुकार के..." गीत आधारित था लेव निपर द्वारा स्वरबद्ध 'Meadowlands' पर। ’तांगेवाली’ फ़िल्म का "हल्के हल्के चलो साँवरे..." गीत प्रेरित था ’The Wedding Samb” से। फ़िल्म ’छाया’ के "इतना ना मुझसे..." तो सर्वविदित है कि यह मोज़ार्ट के एक सिम्फ़नी से प्रेरित है। फ़िल्म ’माया’ का "ज़िन्दगी क्या है सुन मेरे यार..." चार्ली चैपलिन के 1951 की फ़िल्म ’Limelight' के थीम से प्रेरित था। ’मेमदीदी’ फ़िल्म का "बचपन बचपन..." आधारित था नर्सरी राइम 'A-Tisket, A-Tasket' से जबकि ’हाफ़ टिकट’ का "आँखों में तुम..." 1948 के चार्टबस्टर 'Buttons and Bows' से प्रेरित था। "दिल तड़प-तड़प के..." जिस मूल गीत के धुन पर आधारित है वह गीत है "Szla dzieweczka do gajeczka" जिसका उच्चारण है "shwah jeh-vehtch-ka duh lah-sech-kah"। मूल लोक गीत का रिदम धीमा है ("दिल तड़प-तड़प..." का रिदम इससे थोड़ा तेज़ है), जबकि इस पोलिश लोक गीत के आधुनिक संस्करण भी बने हैं जिनकी रिदम काफ़ी तेज़ है। "Szla dzieweczka do gajeczka" दरसल एक कहानी है जो गीत के माध्यम से कही गई है। यह कहानी है एक युवती की जो जंगल में जाती है फल तोड़ने के लिए। वहाँ उसकी मुलाक़ात एक नौजवान शिकारी से होती है जो जंगल में अपना रास्ता भटक गया है। नौजवान युवती से दो चीज़ें माँगता है - खाना और प्यार। युवती का जवाब है कि वह सारा खाना ख़ुद खा चुकी है और जहाँ तक प्यार का सवाल है तो हालाँकि नौजवान शिकारी बहुत ही ख़ूबसूरत है पर उसके मन में अभी तक उसका पहला प्यार हावी है जिसे वो भुला नहीं पा रही है। बस इतनी सी है इस गीत की कहानी। और हाँ "Szla dzieweczka" का शाब्दिक अर्थ है "चलती हुई लड़की"। 


"Szla dzieweczka" गीत पोलैण्ड के दक्षिण-पश्चिम प्रान्त सिलेसिआ (Silesia) में उत्पन्न हुआ था; यह प्रान्त शताब्दियों से जर्मनी के अधीन हुआ करता था जहाँ पोलिश लोग अल्पसंख्यक हुआ करते थे। यहाँ के लोकगीत और लोकनृत्य साधारण और सरल हुआ करते थे। इस गीत पर शोध करते हुए कार्तिक एस. का लिखा एक ब्लॉग मिला जहाँ इसके बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराई गई है। कार्तिक लिखते हैं कि उनके पिता ने उन्हें यह जानकारी दी थी कि "दिल तड़प-तड़प के..." गीत की धुन से मिलती जुलती धुन उन्होंने एक वृत्तचित्र 'Music and dances of Silesia' में सुना है जो Polish World War II के पार्श्व पर बनी Andrez Wajda की क्लासिक फ़िल्म 'Kanal' के साथ जोड़ी गई है। कार्तिक को सुन्दर श्रीनिवासन के ब्लॉग से भी यह पता चला कि ’मधुमति’ का यह गीत किसी विदेशी गीत से प्रेरित है। फिर सुन्दर की सहायता से कार्तिक ने बैंगलोर में ’रेडियो सिटी’ की RJ शीतल अय्यर से सम्पर्क किया जिनके भाई का पोलिश मूल की लड़की से विवाह हुआ है। इस तरह से शीतल अय्यर के भाभी को जब ’मधुमति’ का गीत सुनवाया गया तो उन्होंने तुरन्त "Szla dzieweczka" की धुन को पहचान लिया।

कार्तिक ने इस गीत के बारे में अधिक जानकारी के लिए कई पोलिश म्युज़िक फ़ोरम्स में लिखा था, और कार्तिक को आश्चर्य-चकित करते हुए University of Southern California के Polish Music Center के निर्देशन मिस वान्डा विल्क (Wanda Wilk) ने जवाब देते हुए कई महत्वपूर्ण तथ्य इस गीत के दिए। मिस विल्क के ही शब्दों में - 


Ms. Wanda Wilk
"The song is a very popular folk-song that originated in the Silesian (South-Western) part of Poland i.e., from the regions of Slask Gorny (High Silesia), Cieszyn and Opole regions. The ethnographer Juliusz Roger identifies it as coming from Rybnik, which is near the Czech border. That is where the famous Polish jazz pianist, Adam Makowicz, and the famous Polish composer, Henryk Gorecki, come from. It has been very popular throughout Poland for many years, for various celebratory occasions like namesday, youth gatherings etc. It has been recorded by the professional Folk Song & Dance Ensemble, 'Slask' produced by Polskie Nagrania, by the Lira Ensemble of Chicago and by popular singers like Maryla Rodowicz and popular Polish dance bands.

As far as the pronunciation, it goes something like this...

Szla dzieweczka: shwah jeh-vehtch-ka
do laseczka: duh lah-sech-kah
do zielonego: duh zhyeh-loh-neh-go
nadeszla tam mysliweczka: nah-desh-wah tahm mih-shlee-vetch-kah
bardzo szwarnego: bahr-dzoh schwahr-neh-goh
O moj mily mysliweczku: Oh mooy mee-lyh mih-shlee-vetch-koo
dalabym ci chleba z maslem: dah-wah-bim chee hleh-bah z mahs-wem
alem juz zjadla: a-lehm yoosh zyad-wah" 

लीजिए, अब आप फिल्म 'मधुमती' का यही गीत मुकेश और लता मंगेशकर की आवाज़ में सुनिए। इसके बाद आप मूल पोलिश लोकगीत भी सुन सकते हैं। 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Tuesday, November 17, 2015

सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" की महावीर और गाड़ीवान

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में सलिल वर्मा की लघुकथा "बेटी पढ़ाओ" का पाठ सुना था।
आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं, हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" की लघुकथा महावीर और गाड़ीवान, जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

इस कहानी महावीर और गाड़ीवान का कुल प्रसारण समय 1 मिनट 51 सेकंड है। इस लघुकथा का गद्य हिन्दी समय पर उपलब्ध है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" का जन्म वसंत पंचमी, 1896 को मेदिनीपुर (पश्चिम बंगाल) में हुआ था। उनका रचनाकर्म गीत, कविता, कहानी, उपन्यास, अनुवाद, निबंध आदि विधाओं में प्रकाशित हुआ। उनका देहांत 15 अक्टूबर 1961 को इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"गाड़ीवान ऊँचे स्‍वर में चिल्‍ला-चिल्‍लाकर इस बुरे वक्‍त में देवताओं की मदद माँगने लगा।”
 (सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" की लघुकथा "महावीर और गाड़ीवान" से एक अंश)


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महावीर और गाड़ीवान MP3

#Twenty Fourth Story, Mahavir Aur Gadiwan; Suryakant Tripathi "Nirala"; Hindi Audio Book/2015/24. Voice: Anurag Sharma

Sunday, November 15, 2015

डॉ. एन. राजम् की संगीत साधना : SWARGOSHTHI – 244 : DR. N. RAJAM




स्वरगोष्ठी – 244 में आज

संगीत के शिखर पर – 5 : विदुषी एन. राजम्

डॉ. राजम् के वायलिन तंत्र बजते ही नहीं गाते भी हैं



  रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में हम तंत्रवाद्य वायलिन अर्थात बेला की विश्वविख्यात साधिका विदुषी डॉ. एन. राजम् के व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे और गायकी अंग में उनके वायलिन वादन के कुछ उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे। आज के अंक में हम डॉ. राजम् द्वारा प्रस्तुत राग जोग में खयाल, राग भैरवी का दादरा और अन्त में एक मीरा भजन का रसास्वादन गायकी अंग में करेंगे।


क बेहद सुरीला गज-तंत्र वाद्य वायलिन और इस वाद्य की स्वर-साधिका डॉ. एन. राजम् के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आज आपसे चर्चा होगी। डॉ. राजम् वायलिन जैसे पाश्चात्य वाद्य पर उत्तर भारतीय संगीत पद्यति को गायकी अंग में वादन करने वाली प्रथम महिला स्वर-साधिका हैं। उनकी वायलिन पर अब तक जो कुछ भी बजाया गया है, उसका प्रारम्भ स्वयं उन्हीं से हुआ है। गायकी अंग में वायलिन-वादन की शैली उनकी विशेषता भी है और उनका अविष्कार भी। डॉ. राजम् के पिता नारायण अय्यर कर्नाटक संगीत पद्यति के सुप्रसिद्ध वायलिन वादक और गुरु थे। वायलिन की प्रारम्भिक शिक्षा उन्हें अपने पिता से ही प्राप्त हुई। बाद में सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर से उन्हें उत्तर भारतीय संगीत पद्यति में शिक्षा मिली। इस प्रकार शीघ्र ही उन्हें संगीत की दोनों पद्यतियों में कुशलता प्राप्त हुई। पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर अपने प्रदर्शन-कार्यक्रमों में एन. राजम् को वायलिन संगति के लिए बैठाया करते थे। संगति के दौरान उनका यही प्रयास होता था कि उनके गुरु जो क्रियाएँ कण्ठ से करते हों, उन्हें यथावत वायलिन के तंत्रों पर उतारा जाए। इस साधना के बल पर मात्र 17 वर्ष की आयु में एन. राजम् गायकी अंग में वायलिन-वादन में दक्ष हो गईं। उस दौर के संगीतविदों ने गायकी शैली में वायलिन-वादन को एक नया आविष्कार माना और इसका श्रेय एन. राजम् को दिया गया। उनके गायकी अंग के वादन में जैसी मिठास और करुणा है, उसे सुन कर ही अनुभव किया जा सकता है। उनके वादन में कोई चमत्कारिक लटके-झटके नहीं, बल्कि सादगी और तन्मयता है। सुनने वालों को ऐसा प्रतीत होता है, मानो वायलिन के तंत्र बजते नहीं बल्कि गा रहे हों। लीजिए, डॉ. एन. राजम् के वायलिन को राग जोग का गायन करते हुए, आप भी सुनें और इस राग की पारम्परिक बन्दिश- ‘साजन मोरे घर आए...’ को साथ-साथ गुनगुनाते रहें। यह रचना द्रुत लय तीनताल में निबद्ध है।

राग – जोग : द्रुत लय तीनताल में खयाल रचना : डॉ. एन. राजम्




  एन. राजम् की प्रारम्भिक संगीत शिक्षा दक्षिण भारतीय कर्नाटक संगीत पद्यति में हुई थी। उन दिनों दक्षिण भारत में वायलिन प्रचलित हो चुका था, किन्तु उत्तर भारतीय संगीत में इस वाद्य का पदार्पण नया-नया ही हुआ था। एन. राजम् की आयु उस समय मात्र 12 वर्ष थी। अपने गुरु पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के मार्गदर्शन में उन्होने वायलिन को गायकी अंग में बजाने का निश्चय किया। स्वर और लय का ज्ञान तो उन्हें पहले से ही था, गुरु जी की स्वरावली का अनुसरण करते-करते वादन में भाव, रस और माधुर्य उत्पन्न करने की कठोर साधना उन्होने की। ध्रुवपद-धमार, खयाल-तराना, ठुमरी-दादरा आदि गायन की सभी विधाओं की बारीकियों का गहन अध्ययन कर वायलिन पर साध लिया। उन दिनों अधिकतर वादको ने तंत्रकारी अंग में ही वायलिन को अपनाया था। परन्तु एन. राजम् का मानना था कि सारंगी की भाँति वायलिन भी गायकी अंग के निकट है। आइए अब सुनते हैं डॉ. एन. राजम् से भैरवी में निबद्ध दादरा।

राग – भैरवी : दादरा की एक पारम्परिक रचना : डॉ. एन. राजम्




पुत्री संगीता शंकर और नातिनें नन्दनी व रागिनी के साथ एन. राजम्
  विदुषी एन. राजम् के गुरु पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर ग्वालियर घराने के थे, इसलिए स्वयं को इसी घराने की शिष्या मानतीं हैं। घरानॉ के सम्बन्ध में उनका मत है कि कलाकार को किसी एक ही घराने में बाँध कर नहीं रखा जा सकता। संगीत के कलाकार को हर घराने की अच्छाइयों का अनुकरण करना चाहिए। घरानों की प्राचीन परम्परा के अनुसार तीन पीढ़ियों तक यदि विधा की विशेषता कायम रहे तो प्रथम पीढ़ी के नाम से घराना स्वतः स्थापित हो जाता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो आने वाले समय में राजम् जी के नाम से भी यदि एक नए घराने का नामकरण हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। डॉ. राजम् को प्रारम्भिक शिक्षा अपने पिता पण्डित नारायण अय्यर से मिली। उनके बड़े भाई पण्डित टी.एन. कृष्णन् कर्नाटक संगीत पद्यति के प्रतिष्ठित और शीर्षस्थ वायलिन-वादक रहे हैं। डॉ. राजम् की एक भतीजी विदुषी कला रामनाथ वर्तमान में विख्यात वायलिन-वादिका हैं। राजम् जी की सुपुत्री और शिष्या संगीता शंकर अपनी माँ की शैली में ही गायकी अंग में वादन कर रहीं हैं। यही नहीं संगीता की दो बेटियाँ अर्थात डॉ. राजम् की नातिनें- नन्दिनी और रागिनी भी अपनी माँ और नानी के साथ मंच पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रही हैं। और अब इस अंक को विराम देने से पूर्व हम आपको विदुषी डॉ. एन. राजम् द्वारा वायलिन पर प्रस्तुत मीरा का एक लोकप्रिय भजन- ‘पायो जी मैंने रामरतन धन पायो...’ सुनवाते हैं। इस प्रस्तुति में आपको राग पहाड़ी की छाया भी मिलेगी। आप वायलिन पर यह भजन सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

मीरा भजन : “पायो जी मैंने रामरतन धन पायो...” की धुन : डॉ. एन. राजम्


 



संगीत पहेली 


  ‘स्वरगोष्ठी’ के 244वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको भारतीय संगीत के एक उस्ताद गायक की आवाज़ में प्रस्तुत कण्ठ-संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 250वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग में निबद्ध है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायक की आवाज़ को पहचान रहे हैं? यदि हाँ, तो हमें उनका नाम बताइए।

  आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 21 नवम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 246वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता


  ‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 242 की संगीत पहेली में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की आवाज़ में प्रस्तुत ठुमरी का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- जत ताल (सोलह मात्रा का ठेका), और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं- वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।



अपनी बात 


  मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ का यह पाँचवाँ अंक था। इस अंक में हमने सुविख्यात विदुषी एन. राजम् के व्यक्तित्व और उनके वायलिन वादन पर संक्षिप्त प्रकाश डालने का प्रयत्न किया है। अगले अंक में हम भारतीय संगीत की किसी अन्य विधा के किसी शिखर व्यक्तित्व के कृतित्व पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




Saturday, November 14, 2015

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 07 - जयदेव


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 07
 
जयदेव 

माँ, पिता, फूफा और छोटे भाई की मृत्यु का सामना करने के बाद जयदेव बने संगीतकार


’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक केन्द्रित है फ़िल्म जगत के जाने माने संगीतकार जयदेव पर।
  


फलता दो तरह की होती है, एक जिसमें आर्थिक सफलता, दूसरी कलात्मक सफलता। इन दो सफलताओं का एक दूसरे से संबंध है भी और नहीं भी। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि कुछ कलाकार ऐसे हुए हैं जो रचनात्मक्ता की दृष्टि से शीर्ष के कलाकार रहे पर व्यावसायिक तौर पर औरों से पीछे ही रह गए। लेकिन उनका योगदान कला के क्षेत्र में कुछ ऐसा रहा कि वो अमर हो गए। फ़िल्म जगत में भी ऐसे कई कलाकार हुए हैं जिन्हें लोगों का, उनके चाहनेवालों का बेशुमार प्यार मिला, पर उनकी आर्थिक अवस्था ख़राब ही रही ता-उम्र। ऐसे ही एक संगीतकार रहे जयदेव जिनके बनाए गीतों के रेकॉर्ड्स हज़ारों लाखों की संख्या में बिके हों पर उनके पास अपना ख़ुद का एक रेकॉर्ड प्लेयर तक नहीं था तथा आजीवन अविवाहित रहते हुए एक पेयिंग् गेस्ट की तरह रहे। आज ’तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी’ में चर्चा जयदेव के संघर्ष की, उनकी कलात्मक सफलता की, और उनकी आर्थिक दुरवस्था की। जयदेव की बहुत ही कोमल आयु में उनकी माँ की मृत्यु हो गई। माँ किसे कहते हैं, माँ का प्यार क्या होता है, जयदेव को पता भी नहीं चला। अफ़्रीका में उनका जन्म हुआ था जहाँ उनके पिता केनिया के नईरोबी में व्यवसाय करते थे। थोड़ा बड़ा होने पर जब शिक्षा-दीक्षा की बात आई तो जयदेव के पिता ने उन्हें भारत भेज दिया उनके फूफा के पास। इस तरह से माँ और पिता, दोनों से दूर हो गए नन्हे जयदेव। संगीत और फ़िल्मों में उनकी दिलचस्पी को देखते हुए उनके फूफा ने उन्हें बम्बई जाने की अनुमति दी। बम्बई आकर जयदेव ने वाडिया फ़िल्म कंपनी की आठ फ़िल्मों में बाल कलाकार की भूमिकाएँ निभाईं और एक फ़िल्म में दो गीत भी गाए। 

जयदेव का जीवन कुछ हद तक पटरी पर आने लगी थी कि तभी एक और बिजली उनके जीवन में गिर पड़ी। 1936 में उनके फूफा चल बसे जिसके चलते जयदेव को लुधियाना लौटना पड़ा। एक वर्ष के अन्दर वे फिर से बम्बई पहुँच गए और कृष्ण राव चोंकर से संगीत की शिक्षा ग्रहण की। 1940 में जब उनके बीमार पिता अफ़्रीका से भारत लौट आए, तब अपने पिता की देख-रेख के लिए जयदेव को बम्बई छोड़ कर पुन: लुधियाना लौटना पड़ा। छुटपन से एक के बाद एक पारिवारिक कारणों से जयदेव का करीयर बन-सँवर नहीं पा रहा था। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। 1943 तक पिता का देखभाल करते रहे और इसी वर्ष पिता की मृत्यु के बाद उन पर अपनी बहन की शादी निपटाने का ज़िम्मा आन पड़ा। यह फ़र्ज़ भी उन्होंने अदा की। पिता और बहन का दायित्व समाप्त कर जयदेव अलमोड़ा में उदय शंकर की वाद्यशाला में कुछ समय रहे, फिर लखनऊ में उस्ताद अली अकबर ख़ाँ से सरोद सीखा। पर लखनऊ प्रवास के दौरान जयदेव बीमार पड़ गए जिसकी वजह से उन्हें अपनी बहन के घर शिमला जाना पड़ा स्वास्थ्य-सुधार के लिए। कहते हैं पापी पेट का सवाल है, और इसी के जवाब के लिए जयदेव स्वस्थ हो कर दिल्ली में एक बैंक में नौकरी कर ली। 1946 में जयदेव ने अपने छोटे भाई का विवाह भी सम्पन्न किया। जयदेव का बुरा वक़्त अभी गया नहीं था। जिस छोटे भाई को वो सबसे ज़्यादा प्यार करते थे, उस भाई का विवाह के एक ही वर्ष के अन्दर निधन हो गया। इससे जयदेव को बहुत गहरा सदमा पहुँचा।

छोटे भाई की मृत्यु के दुख से बाहर निकलने के बाद जयदेव फिर एक बार संगीत की तरफ़ मुड़े और रेडियो पर गाने लगे। जब अली अकबर ख़ाँ ने ’नवकेतन’ की दो फ़िल्मों ’आँधियाँ’ तथा ’हमसफ़र’ में संगीत दिया तो उन्होंने जयदेव को अपना सहायक बना लिया। 1935-36 में करीयर शुरू करने के बावजूद एक स्वतंत्र संगीतकार बनने में उन्हें 20 वर्ष लग गए और उनके स्वतन्त्र संगीत से सजी पहली फ़िल्म 1955 में आई ’जोरू का भाई’। सचिन देव बर्मन के सहायक के रूप में भी वो काम करते रहे। जिस फ़िल्म से जयदेव को प्प्रसिद्धि मिली, वह थी ’हम दोनों’ (1961)। फिर इसके बाद जयदेव ने एक से एक सुरीली फ़िल्में हमें दी और जल्दी ही लोगों को पता चल गया कि जयदेव किस स्तर के संगीतकार हैं। ’मुझे जीने दो’, ’रेशमा और शेरा’, ’आलाप’, ’घरौन्दा’, ’तुम्हारे लिए’, ’दूरियाँ’, ’गमन’, ’प्रेम पर्बत’, ’अनकही’ जैसी तमाम उत्कृष्ट संगीत वाली फ़िल्मों ने जयदेव को संगीत रसिकों के दिलों में बसा लिया। लम्बे समय तक पारिवारिक कारणों से लड़ते हुए आख़िरकार उन्होंने फ़िल्म-संगीत जगत में अपना नाम बना ही लिया। पर अफ़सोस की बात है कि इतने प्रतिभाशाली होते हुए और इतना उत्कृष्ट संगीत देने के बावजूद उन्हें ज़्यादा व्यावसायिक सफलता नहीं मिली और ना ही कभी बड़े बैनर के फ़िल्मों में संगीत देने का मौका मिला। उनकी अन्तिम रेकॉर्डिंग् फ़िराक़ गोरखपुरी की ग़ज़लों की थी। ’हम भी फ़िराक़ इंसान थे...’ को रेकॉर्ड करते समय वे अभिभूत हो गए और बोल उठे कि अब जिस काम को मैं वर्षों से पूरा करना चाहता था, वह पूरा हो गया... अब मौत बेशक़ मुझे ले जाए। उस समय क्या पता था कि हफ़्ते-भर के भीतर सचमुच मौत उन्हें ले जायेगी! ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ करती है जयदेव जी के प्रतिभा और संगीत साधना को विनम्र नमन।


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



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