Sunday, May 31, 2015

आसावरी थाट के राग : SWARGOSHTHI – 221 : ASAVARI THAAT







स्वरगोष्ठी – 221 में आज

दस थाट, दस राग और दस गीत – 8 : आसावरी थाट

राग आसावरी में ‘सजन घर लागे...’ 
और 
अड़ाना में ‘झनक झनक पायल बाजे...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ की आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के रागों का वर्गीकरण करने में समर्थ मेल अथवा थाट व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग किया जाता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 में से कम से कम पाँच स्वरों की उपस्थिति आवश्यक होती है। भारतीय संगीत में ‘थाट’, रागों के वर्गीकरण करने की एक व्यवस्था है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार सात मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते है। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल का प्रचलन है, जबकि उत्तर भारतीय संगीत में दस थाट का प्रयोग किया जाता है। इन दस थाट का प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं दस थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को वर्गीकृत किया जाता है। श्रृंखला के आज के अंक में हम आपसे आसावरी थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग आसावरी में निबद्ध संगीतमार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के स्वरों में एक रचना प्रस्तुत करेंगे। साथ ही आसावरी थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत राग अड़ाना के स्वरों में निबद्ध एक फिल्मी गीत का उदाहरण उस्ताद अमीर खाँ की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे।


 


र्तमान भारतीय संगीत में रागों के वर्गीकरण के लिए ‘थाट’ प्रणाली का प्रचलन है। श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ के अन्तर्गत अब तक हमने सात थाटों का परिचय प्राप्त किया है। आज बारी है, आठवें थाट अर्थात ‘आसावरी’ की। इस थाट का परिचय प्राप्त करने से पहले आइए प्राचीन काल में प्रचलित थाट प्रणाली की कुछ चर्चा करते हैं। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलन में आ चुका था, जो उस समय के ग्रन्थ ‘संगीत-पारिजात’ और ‘राग-विबोध’ से स्पष्ट है। इसी काल में मेल की परिभाष देते हुए श्रीनिवास ने बताया है कि राग की उत्पत्ति थाट से होती है और थाट के तीन रूप हो सकते हैं- औडव (पाँच स्वर), षाड़व (छह स्वर), और सम्पूर्ण (सात स्वर)। सत्रहवीं शताब्दी के अन्त तक थाटों की संख्या के विषय में विद्वानों में मतभेद भी रहा है। ‘राग-विबोध’ के रचयिता ने थाटों की संख्या 23 वर्णित की है, तो ‘स्वर-मेल कलानिधि’ के प्रणेता 20 और ‘चतुर्दंडि-प्रकाशिका’ के लेखक ने 19 थाटों की चर्चा की है।

पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर
आज हमारी चर्चा का थाट है- ‘आसावरी’। इस थाट के स्वर होते हैं- सा, रे, ग॒, म, प ध॒, नि॒ अर्थात आसावरी थाट में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। आसावरी थाट का आश्रय राग आसावरी ही कहलाता है। राग आसावरी के आरोह में पाँच स्वर और अवरोह में सात स्वरों का उपयोग किया जाता है। अर्थात यह औडव-सम्पूर्ण जाति का राग है। इस राग के आरोह में सा, रे, म, प, सां तथा अवरोह में- सां, नि, , प, म, रे, सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। अर्थात आरोह में गान्धार और निषाद स्वर वर्जित होता है। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। दिन के दूसरे प्रहर में इस राग का गायन-वादन सार्थक अनुभूति कराता है। परम्परागत रूप से सूर्योदय के बाद गाये-बजाए जाने वाले इस राग में तीन कोमल स्वर, गान्धार, धैवत और निषाद का प्रयोग किया जाता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। अब हम आपके लिए संगीतमार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर का गाया राग आसावरी प्रस्तुत करते हैं। तीनताल में निबद्ध इस बन्दिश में आपको पण्डित बलवन्त राव भट्ट के कण्ठ–स्वर और विदुषी एन. राजम् की वायलिन संगति का आनन्द भी मिलेगा।


राग आसावरी : ‘सजन घर लागे या साडेया...’ : पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर




आसावरी थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ अन्य मुख्य राग हैं- जौनपुरी, देवगान्धार, सिन्धु भैरवी, आभेरी, गान्धारी, देसी, कौशिक कान्हड़ा, दरबारी कान्हड़ा, अड़ाना आदि। आज हम आपको राग अड़ाना में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाएँगे। राग अड़ाना, आसावरी थाट का राग है। यह षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग होता है, जिसमें गान्धार और धैवत कोमल तथा दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध गान्धार और अवरोह में शुद्ध धैवत का प्रयोग वर्जित होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में गाने-बजाने वाले राग अड़ाना का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है।

उस्ताद अमीर खाँ 
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्मों की गणना ‘मील के पत्थर’ के रूप में की जाती है। ऐसी ही एक उल्लेखनीय फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ थी जिसका प्रदर्शन 1955 में हुआ था। इस फिल्म में कथक नृत्य शैली का और राग आधारित गीत-संगीत का कलात्मक उपयोग किया गया था। फिल्म का निर्देशन वी. शान्ताराम ने और संगीत निर्देशन वसन्त देसाई ने किया था। वी. शान्ताराम के फिल्मों की सदैव यह विशेषता रही है कि उसके विषय नैतिक मूल्यों रक्षा करते प्रतीत होते है। साथ ही उनकी फिल्मों में रूढ़ियों का विरोध भी नज़र आता है। फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ में उन्होने भारतीय शास्त्रीय नृत्य और संगीत की महत्ता को रेखांकित किया था। फिल्म को इस लक्ष्य तक ले जाने में संगीतकार वसन्त देसाई का उल्लेखनीय योगदान रहा। जाने-माने कथक नर्तक गोपीकृष्ण फिल्म की प्रमुख भूमिका में थे। इसके अलावा संगीत के ताल पक्ष में निखारने के लिए सुप्रसिद्ध तबलावादक गुदई महाराज (पण्डित सामता प्रसाद) का उल्लेखनीय योगदान था। वसन्त देसाई ने सारंगीनवाज़ पण्डित रामनारायन और संतूरवादक पण्डित शिवकुमार शर्मा का सहयोग भी प्राप्त किया था। संगीतकार वसन्त देसाई की सफलता का दौर फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ से ही आरम्भ हुआ था। वसन्त देसाई की प्रतिभा सही मूल्यांकन वी. शान्ताराम ने ही किया था। प्रभात कम्पनी में एक साधारण कर्मचारी के रूप में उनकी नियुक्ति हुई थी। यहीं रह कर उन्होने अपनी कलात्मक प्रतिभा का विकास किया था। आगे चलकर वसन्त देसाई, शान्ताराम की फिल्मों के मुख्य संगीतकार बने। शान्ताराम जी ने 1955 में फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ का निर्माण किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई ने इस फिल्म में कई राग आधारित स्तरीय गीतों की रचना की थी। फिल्म का शीर्षक गीत ‘झनक झनक पायल बाजे...’ राग अड़ाना का एक मोहक उदाहरण है। इस गीत को स्वर प्रदान किया, सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ ने। आइए, सुनते हैं, राग अड़ाना पर आधारित यह गीत। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग अड़ाना : ‘झनक झनक पायल बाजे...’ : फिल्म झनक झनक पायल बाजे : उस्ताद अमीर खाँ और साथी






संगीत पहेली  


‘स्वरगोष्ठी’ के 221वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको छः दशक से भी अधिक पुरानी एक हिन्दी फिल्म के गीत का अंश एक उस्ताद गायक की आवाज में सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 230 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश में किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – यह भक्तिकाल की एक कवयित्री की रचना मानी जाती है। क्या आप उस कवयित्री को पहचान सकते हैं? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 6 जून, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 223वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 219वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको पुरानी बाँग्ला फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग बागेश्री, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- मध्यलय तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक उस्ताद अमीर खाँ। इस बार की पहेली में वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया ने पहली बार संगीत पहेली में भाग लिया और एक प्रश्न का सही उत्तर देकर एक अंक अर्जित कर लिया। हम उनका हार्दिक स्वागत करते हैं। इसके साथ ही जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका की विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने सही उत्तर दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ जारी है। अब यह श्रृंखला समापन की ओर अग्रसर है। इसके बाद हमारी अगली श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के रागों’ पर केन्द्रित रहेगी। इस श्रृंखला के लिए आप अपने पसंद के गीत, संगीत और राग की फरमाइश कर सकते हैं। अगले अंक में हम एक और थाट के साथ उपस्थित होंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों के अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फर्माइशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र    


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, May 30, 2015

चित्रशाला - 01 : फ़िल्मों में प्रेमचन्द



चित्रशाला - 01

फ़िल्मों में प्रेमचन्द




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, आज से महीने के हर पाँचवे शनिवार को हम प्रस्तुत करेंगे फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विविध पहलुओं से सम्बन्धित शोधालेखों पर आधारित श्रृंखला 'चित्रशाला'। आज इसकी पहली कड़ी में प्रस्तुत है शोधालेख – 'फ़िल्मों में प्रेमचन्द’। हमारे देश के जो प्रमुख और महान साहित्यकार हुए हैं, उनमें मुंशी प्रेमचन्द का नाम बहुत ऊँचाइयों पर आता है। 31 जुलाई 1880 को जन्मे और 8 अक्टुबर 1936 को इस दुनिया से जाने वाले प्रेमचन्द जी को उनके जीवन काल में शायद इतनी ख्याति नहीं मिली हो जितना उनके जाने के बाद उनके नाम को मिला, उनकी कृतियों को मिली। और इसके पीछे महत्वपूर्ण योगदान रहा उनकी कहानियों और उपन्यासों पर बनने वाली फ़िल्मों का भी। आइए इस लेख के माध्यम से जाने कि प्रेमचन्द जी की कौन-कौन सी कृतियों पर बनी थी फ़िल्में और पढ़ें उन फ़िल्मों से सम्बन्धित कुछ रोचक तथ्य। 




भारत में साहित्यकारों, कवियों, लेखकों की ना उस ज़माने में कोई कद्र थी, ना ही आज है। और यही कारण है कि अत्यन्त प्रतिभाशाली होते हुए भी ये लेखक, ये साहित्यकार हमेशा ग़रीबी और आर्थिक समस्याओं से जीवन भर जूझते रहे। महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द भी इसमें व्यतिक्रम नहीं रहे। उनकी साहित्यिक पत्रिका ’हंस’ और ’जागरण’ में उन्हें माली नुकसान हुआ, पत्रिका बन्द करने के कगार पर आ गई। इसके चलते प्रेमचन्द जी की आर्थिक स्थिति और भी भायानक हो गई, उनकी जेब बिल्कुल ख़ाली हो चुकी थी। इसलिए 54 वर्ष की आयु में, 31 मई 1934 को वो आ गए बम्बई नगरी फ़िल्म जगत में अपनी क़िस्मत आज़माने। फ़िल्म निर्देशक मोहन भवनानी, जिन्हें हम एम. भवनानी के नाम से जानते हैं, प्रेमचन्द को बम्बई आने का निमंत्रण दिया था। यहाँ भवनानी ने उन्हें 'अजन्ता सिनेटोन’ में स्क्रिप्ट राइटर की नौकरी दिला दी। उन्होंने 'अजन्ता सिनेटोन’ के लिए एक कहानी लिखी ’मिल मज़दूर’। 1934 में ही इस कहानी पर एम. भवनानी के निर्देशन में फ़िल्म बनी ’मज़दूर’। मिस बिब्बो, जयराज, नयमपल्ली और भुडो अडवानी इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे। फ़िल्म में प्रेमचन्द ने भी सरपंच की एक छोटी सी भूमिका निभाई थी। फ़िल्म में मज़दूरों द्वारा शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के दृश्य दिखाए गए जिस वजह से समाज के कुछ बलशाली लोगों ने ब्रिटिश सरकार के कान भर कर फ़िल्म पर रोक लगवा दी। इसके बाद 1936 में भी इसी कहानी पर 'अजन्ता सिनेटोन’ ने ही एक अन्य नाम से एक फ़िल्म दोबारा बना डाली। इस बार फ़िल्म का शीर्षक रखा गया 'ग़रीब परवर’ उर्फ़ ’दयावान’।


साल 1935 में ’अजन्ता सिनेटोन’ की बैनर तले प्रेमचन्द की एक और कहानी पर फ़िल्म प्रदर्शित हुई जिसका शीर्षक था ’नवजीवन’। इस फ़िल्म के निर्देशक भी एम. भवनानी ही थे। ’अजन्ता सिनेटोन’ के बाहर 1934 में ’महालक्ष्मी सिनेटोन’ ने प्रेमचन्द जी की मशहूर कहानी ’सेवा सदन’ पर एक फ़िल्म बना डाली जिसका नाम रखा गया ’बाज़ार-ए-हुस्न’। यह कहानी वेश्याओं की समस्याओं पर आधारित थी। इसका निर्देशन किया था नानूभाई वकील ने। यह वाक़ई रोचक बात है कि इस फ़िल्म के बनने के ठीक 80 वर्ष बाद प्रेमचन्द की इसी ’सेवासदन’ कहानी पर ’बाज़ार-ए-हुस्न’ के नाम से ही दोबारा फ़िल्म बनी। इस बार निर्माता थे ए. के. मिश्र। यह फ़िल्म 18 जुलाई 2014 को प्रदर्शित हुई थी। रेशमी घोष, जीत गोस्वामी, ओम पुरी और यशपाल शर्मा अभिनीत इस फ़िल्म की एक और ख़ास बात यह है कि इस फ़िल्म में संगीत दिया है वरिष्ठ और सुरीले संगीतकार ख़य्याम ने। तमिल फ़िल्मकार सुब्रह्मण्यम ने 1937 में सफल फ़िल्म ’बालायोगिनी’ के बाद और भी कई सामाजिक फ़िल्में बनाने का निर्णय लिया। 1938 में उन्होंने ’सेवासदन’ उर्फ़ ’बाज़ार-ए-हुस्न’ को फ़िल्मी जामा पहनाया तमिल फ़िल्म ’सेवासदनम्’ के नाम से। फ़िल्म की पटकथा उन्होने स्वयं लिखी और इसका अपने ’मद्रास यूनाइटेड आर्टिस्ट्स कॉर्पोरेशन’ बैनर तले निर्माण किया। फ़िल्म का मुख्य चरित्र एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी ने निभाया।


1934-35 के इन दो सालों में ही प्रेमचन्द जी का फ़िल्म जगत पर से जैसे विश्वास उठ गया। जो आशाएँ और सपने लेकर वो बम्बई आए थे, वो जैसे कहीं ऊब गए। उन्होंने इस बारे में एक पत्र अपने मित्र साहित्यकार ज्ञानेन्द्र को लिखा और बताया कि जिन सपनों को लेकर वो बम्बई आए थे, वो सपने बिखर गए हैं। यहाँ निर्देशक सर्वेसर्वा हैं और वो कहानी के साथ मनमर्ज़ी से फेरबदल करते हैं, बेवजह अश्लील गाने ठूस दिए जाते हैं, ये सब कोई भी ख़ुद्दार स्वाभिमानी लेखक बरदाश्त नहीं कर सकता। इस घटना के बाद प्रेमचन्द बम्बई हमेशा हमेशा के लिए छोड़ कर वापस बनारस आ गए। और एक ही वर्ष के भीतर बनारस में ही 8 अक्टुबर 1936 को उनका 56 वर्ष की अल्पायु में निधन हो गया। प्रेमचन्द चले गए, परन्तु उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी लिखी कहानियों और उपन्यासों पर फ़िल्में बनाने का सिलसिला चलता रहा। एम. भवनानी, जिनके कारण प्रेमचन्द बम्बई तशरीफ़ लाए थे, उन्होंने साल 1946 में प्रेमचन्द लिखित कहानी ’रंगभूमि’ पर एक फ़िल्म बनाई थी जिसका नाम था ’चौगान-ए-हस्ती’। 1963 में त्रिलोक जेटली ने प्रेमचन्द की अमर कृति ’गोदान’ पर इसी शीर्षक से फ़िल्म बनाई जिसमें राजकुमार और कामिनी कौशल मुख्य भुमिकाओं में थे। 1966 में सुनील दत्त और साधना को लेकर ॠषीकेश मुखर्जी ने प्रेमचन्द की एक और महत्वपूर्ण कृति ’ग़बन’ पर इसी शीर्षक से फ़िल्म बनाई।


1977 में सत्यजीत रे ने प्रेमचन्द की एक कहानी पर ’शतरंज के खिलाड़ी’ बनाई। यह कहानी लखनऊ के नवाबों के पतन की कहानी थी जिसमें एक खेल के प्रति ऑबसेशन सारे खिलाड़ियों का खा जाती है, और उन्हें एक संकट की घड़ी में अपने दायित्वों को भुला देती है। सत्यजीत रे ने प्रेमचन्द की एक और कृति ’सदगति’ पर साल 1981 में एक फ़िल्म बनाई। यह एक लघु कथा थी ग़रीब ’दुखी’ की एक तुच्छ सहायता के बदले में लकड़ी काटते-काटते थकावट से मर जाता है। 1977 में प्रेमचन्द जी की कहानी ’कफ़न’ पर प्रसिद्ध फ़िल्मकार मृणाल सेन ने तेलुगू में ’ओका ऊरी कथा’ शीर्षक से एक फ़िल्म बनाई थी जो तेलुगू में बनने वाली गिनती भर की कलात्मक फ़िल्मों में गिनी जाती है। प्रेमचन्द की कृतियों पर बनने वाली फ़िल्मों में कुछ और नाम हैं ’गोधूली’ (1977), 'पंचपरमेश्वर’ (1995) और ’गुल्ली डंडा’ (2010)

आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिए। आपके सुझावों के आधार पर हम अपने कार्यक्रम निर्धारित करते हैं। आप हमें radioplaybackindia@live.com के पते पर अपने सुझाव, समालोचना और फरमाइशें भेज सकते हैं।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी





Tuesday, May 26, 2015

काजल कुमार की लघुकथा कुत्ता

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने माधवी गणपुले के स्वर में आशा गुप्ता आशु की लघुकथा "ममता की छांव में" का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं काजल कुमार लिखित लघुकथा कुत्ता, जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

इस कहानी कुत्ता का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 40 सेकंड है। इसका गद्य कथा-कहानी ब्लॉग पर उपलब्ध है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

कवि, कथाकार और कार्टूनिस्ट काजल कुमार के बनाए चरित्र तो आपने देखे ही हैं। उनकी व्यंग्यात्मक लघुकथायेँ "एक था गधा", "ड्राइवर" और "लोकतनतर" आप पहले सुन चुके हैं। काजल कुमार दिल्ली में रहते हैं।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"दद्दा,क्या हुआ जो यूँ जेल मोल ले ली?”
 (काजल कुमार की लघुकथा "कुत्ता" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
कुत्ता MP3

#Ninth Story,  Kutta; Kajal Kumar; Hindi Audio Book/2015/09. Voice: Anurag Sharma

Sunday, May 24, 2015

काफी थाट के राग : SWARGOSHTHI – 220 : KAFI THAAT





स्वरगोष्ठी – 220 में आज

दस थाट, दस राग और दस गीत – 7 : काफी थाट

राग काफी में ‘बाँवरे गम दे गयो री...’ 
और 
बागेश्री में ‘कैसे कटे रजनी अब सजनी...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के रागों का वर्गीकरण करने में समर्थ मेल अथवा थाट व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग किया जाता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 में से कम से कम पाँच स्वरों की उपस्थिति आवश्यक होती है। भारतीय संगीत में ‘थाट’, रागों के वर्गीकरण करने की एक व्यवस्था है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार सात मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते है। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल का प्रचलन है, जबकि उत्तर भारतीय संगीत में दस थाट का प्रयोग किया जाता है। इन दस थाट का प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं दस थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को वर्गीकृत किया जाता है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे काफी थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग काफी में निबद्ध पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में एक बन्दिश प्रस्तुत करेंगे। साथ ही काफी थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत राग बागेश्री के स्वरों में निबद्ध एक बाँग्ला फिल्मी गीत का उदाहरण उस्ताद अमीर खाँ की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे।

धुनिक भारतीय संगीत में प्रचलित थाटों की श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ की आज की कड़ी में हम ‘काफी’ थाट का परिचय प्राप्त करेंगे और इस थाट के आश्रय राग ‘काफी’ और इसी थाट के अन्तर्गत आने वाले राग बागेश्री में एक फिल्मी गीत का आनन्द भी लेंगे। परन्तु उससे पहले प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में की गई थाट विषयक चर्चा की कुछ जानकारी आपसे बाँटेंगे। थाट को संस्कृत ग्रन्थों में मेल अर्थात स्वरों का मिलाना या इकट्ठा करना कहते हैं। इन ग्रन्थों में थाट अथवा मेल के विषय में जो व्याख्या की गई है, उसके अनुसार ‘वह स्वर-समूह थाट कहलाता है, जो राग-निर्मिति में सक्षम हो’। पण्डित सोमनाथ अपने ‘राग-विवोध’ के तीसरे अध्याय में मेलों को परिभाषित करते हुए लिखते हैं- ‘थाट इति भाषायाम’ अर्थात, मेल को भाषा में थाट कहते हैं। ‘राग-विवोध’ आज से लगभग चार सौ वर्ष पूर्व की रचना है। यह ग्रन्थ ‘थाट’ का प्राचीन आधार भी है। वर्तमान में प्रचलित दस थाटों का निर्धारण पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने किया है। आज हम आपसे थाट ‘काफी’ के विषय में कुछ चर्चा करेंगे। काफी थाट के स्वर होते हैं- सा, रे, ग॒, म, प, ध, नि॒। इस थाट में गान्धार और निषाद कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। काफी थाट का आश्रय राग ‘काफी’ होता है। राग ‘काफी’ में गांधार और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। इसके आरोह के स्वर हैं- सारे, म, प, धनिसां तथा अवरोह के स्वर हैं- सां नि ध, प, म, रे, सा । इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है और इसका गायन-वादन समय मध्यरात्रि होता है। राग काफी में होली और रंगोत्सव से सम्बन्धित रचनाएँ खूब निखरती हैं। आइए, सुप्रसिद्ध गायक पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में राग काफी की एक बन्दिश सुनते हैं।



राग काफी : ‘बावरे गम दे गयो री...’ : पण्डित भीमसेन जोशी



इस थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- भीमपलासी, पीलू, बागेश्री, आभोगी, चन्द्रकौंस, जोग, धानी, नीलाम्बरी, बहार, नायकी कान्हड़ा, गौड़ मल्हार आदि। राग बागेश्री भारतीय संगीत का अत्यन्त मोहक राग है। कुछ विद्वान इस राग को बागेश्वरी नाम से भी पुकारते हैं, किन्तु सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल के मतानुसार इस राग का नाम बागेश्री अधिक उपयुक्त होना चाहिए। इस राग को काफी थाट से अन्तर्गत माना जाता है। राग का एक प्रचलित स्वरूप भी है, जिसके आरोह में ऋषभ स्वर वर्जित होता है और पंचम स्वर का अल्पत्व प्रयोग किया जाता है। अवरोह में सातों स्वर प्रयोग होते हैं। इस प्रकार यह राग षाड़व-सम्पूर्ण जाति का हो जाता है। कुछ विद्वान आरोह में ऋषभ के साथ पंचम स्वर भी वर्जित करते हैं। इस राग में गान्धार और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। कर्नाटक पद्यति में इस राग के समतुल्य राग नटकुरंजी है, जिसमें पंचम स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। राग बागेश्री में यदि पंचम और कोमल निषाद का प्रयोग न किया जाए तो यह राग आभोगी की अनुभूति कराता है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। रात्रि के दूसरे प्रहर, विशेष रूप से मध्यरात्रि में इस राग का सौन्दर्य खूब निखरता है। इस राग में भक्ति और श्रृंगार रस की रचनाएँ भली लगती है। अब हम आपको राग बागेश्री में बँधी एक मोहक फिल्मी गीत का रसास्वादन कराते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद अमीर खाँ। 1960 में प्रदर्शित बाँग्ला फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ से यह गीत हमने लिया है। कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कथा पर विख्यात फिल्म-शिल्पी तपन सिन्हा के निर्देशन में फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ का निर्माण किया गया था। फिल्म की मुख्य भूमिका में सौमित्र चटर्जी और अरुन्धति देवी ने अभिनय किया था। फिल्म की कहानी के केन्द्र में एक शापित हवेली है, जिसमें एक सरकारी कारिन्दा उलझ जाता है। इस फिल्म का सर्वाधिक उललीखनीय पक्ष इसका संगीत है। मैहर परम्परा के उस्ताद अली अकबर खाँ फिल्म के संगीतकार थे। फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ में उन्होने एक गीत एक छोटा खयाल के रूप में शामिल किया था, जिसे उस्ताद अमीर खाँ और प्रतिमा बनर्जी ने राग बागेश्री में गाया था। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



राग बागेश्री : ‘कैसे कटे रजनी...’ : उस्ताद अमीर खाँ और प्रतिमा बनर्जी : फिल्म क्षुधित पाषाण




संगीत पहेली 

‘स्वरगोष्ठी’ के 220वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको छः दशक पुरानी एक लोकप्रिय हिन्दी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस गीत के अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में किस राग की झलक है?

2 – गीत के अंश में प्रयोग किये गए ताल को ध्यान से सुनिए और हमें ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत के संगीतकार कौन हैं? हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 30 मई, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 222वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता 

‘स्वरगोष्ठी’ की 218वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1960 में प्रदर्शित ऐतिहासिक फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा गया था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग सोहनी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दीपचन्दी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ। इस बार पहेली में हमारे एक नये श्रोता-पाठक, बड़ोदरा, गुजरात के केतनकुमार पताडिया की भी सहभागिता रही। केतन जी के तीनों उत्तर सही रहे। इनके अलावा हमारे नियमित प्रतिभागियों, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, रायपुर, छत्तीसगढ़ से राजश्री श्रीवास्तव और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने भी सही उत्तर दिये हैं। दिया हैं। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।



अपनी बात  

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ जारी है। इसके अन्तर्गत हम प्रत्येक अंक में भारतीय संगीत के प्रचलित दस थाट और उनके आश्रय रागों की चर्चा कर रहे हैं। साथ ही थाट से जुड़े अन्य रागों पर आधारित फिल्मी गीत भी प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें अवश्य लिखिएगा। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आगामी लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के रागों’ पर केन्द्रित होगा। यदि आपने वर्षा ऋतु के रागों पर कोई आलेख तैयार किया है या इन रागों की कोई रचना आपको पसन्द है, तो हमें swargoshthi@gmail.com पर शीघ्र भेजें। हम उसे आपके नाम और परिचय के साथ प्रकाशित / प्रसारित करेंगे। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे। 



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




Saturday, May 23, 2015

INTERVIEW OF ACTOR RAHUUL CHOWDHARY

बातों बातों में - 08

अभिनेता राहुल चौधरी से सुजॉय चटर्जी की बातचीत





नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते; काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रॄंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज मई 2015 के चौथे शनिवार के दिन प्रस्तुत है फ़िल्म और टी.वी जगत में नए-नए क़दम रखने वाले नवोदित अभिनेता राहुल चौधरी से की गई हमारी टेलीफ़ोनिक बातचीत के सम्पादित अंश। राहुल CID, Code Red, Savdhaan India Fights Back जैसे टीवी धारावाहिक तथा ’Dunno Y2 - Life is a Moment' फ़िल्म में काम कर चुके हैं।  




राहुल, नमस्कार और बहुत बहुत स्वागत है आपका ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर। अपने व्यस्त दिनचर्या में से समय निकाल कर आपने इस साक्षात्कार का हमें मौक़ा दिया, इसके लिए हम आपके शुक्रगुज़ार हैं।

आपको और आपके सभी पाठकों को मेरा नमस्कार, यह मेरी भी ख़ुशनसीबी है जो आपसे बात करने का मौक़ा मिला।


राहुल, सबसे पहले तो हम आपको बधाई देना चाहते हैं, आपकी पहली फ़िल्म ’Dunno Y 2 - Life is a Moment' बहुत जल्द प्रदर्शित होने जा रही है। 

बहुत बहुत शुक्रिया आपका!


इस फ़िल्म से आपको केवल देश में ही नहीं बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि मिलेगी ऐसी हम आशा कर रहे हैं क्योंकि जहाँ तक हमें ज्ञात है यह एक इन्डो-नॉरवेजियन फ़िल्म है।

जी, बिल्कुल सही कहा आपने, यह एक इन्डो-नॉरवेजियन को-प्रोडक्शन की फ़िल्म है और इन दोनों देशों के सिर्फ़ अभिनेता ही नहीं बल्कि निर्देशक, संगीतकर व तमाम विभागों के कलाकारों ने काम किया है। मुझे कितनी प्रसिद्धि मिलती है, वह तो फ़िल्म के प्रदर्शित होने पर ही पता चलेगी, शुभकामनाओं के लिए आपको मैं धन्यवाद देता हूँ।


राहुल, ’Dunno Y 2 - Life is a Moment' फ़िल्म की हम विस्तृत चर्चा आगे चल कर इस साक्षात्कार में करेंगे, लेकिन फ़िल्हाल शुरू हम शुरू से करना चाहते हैं, यानी कि आपके बचपन से। तो बताइये कि किस तरह का बचपन रहा आपका? कहाँ की पैदाइश है आपकी?

मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ियाबाद ज़िले के महरौली गाँव में एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ। अपने परिवार का मैं सबसे छोटा बेटा हूँ। अपने भाई-बहनों में सबसे छोटा। इसलिए आप समझ सकते हैं कि किस तरह का बचपन रहा होगा मेरा!


लाड-प्यार वाला?

जी हाँ। छोटा होने की वजह से सभी का लाडला था, और इसी कारण मेरी स्कूलिंग् बहुत सारे स्कूलों में हुई। दसवीं कक्षा तक आते-आते मैंने क़रीब छह स्कूल चेंज कर लिए थे...


एक मिनट, एक मिनट... माफ़ी चाहूँगा बीच में टोकने के लिए, पर लाडला होने और स्कूल बदलने का आपस में क्या संबंध है, मैं समझाअ नहीं?

(हँसते हुए) जी, बात ऐसी है कि लाडला होने की वजह से मैं शैतान भी एक नंबर का था। लाड-प्यार ने मुझे बिगाड़ रखा था। इसलिए स्कूल से इतनी शिकायतें आती कि स्कूल बदलने के अलाव और दूसरा कोई चारा नहीं रहता।


अच्छा अच्छा, तो यह बात है!

सब लोग बोलते थे कि यह लड़का पता नहीं आगे चलके क्या करेगा! परिवार में सब मुझे ख़ुद से ज़्यादा प्यार करते और मेरे भाई-बहनें तो कभी मुझे परेशान या रिते हुए देख ही नहीं सकते थे।


बहुत अच्छी बात है, और आप ख़ुशनसीब हैं कि ऐसे परिवार में आपका जन्म हुआ जहाँ आपको ख़ूब सारा प्यार मिला। 

उपरवाले की दुआ है, बस यही कह सकता हूँ।


जी बिल्कुल! अच्छा आपके पिताजी आपको डाँटते नहीं थे? दूसरे लोग चाहे कुछ ना बोले पर पिताजी तो ज़रूर सख़्त होते होंगे?

पापा की अगर बात करूँ तो मुझे याद है कि बचपन से ही मुझे फ़िल्में देखने का बहुत शौक था। इसलिए रात को जब सारे लोग सो जाते थे, मैं जाग-जाग कर फ़िल्में देखा करता था। इसके लिए कभी-कभी पापा से मार भी खाता था। वो अक्सर कहते रहते कि जब देखो टीवी में घुसा रहता है, क्या मिलता है इसे? उस समय मैं शायद 6th या 7th क्लास में हो‍ऊँगा, तो मैं भी उनसे कहा करता कि एक दिन देख लीजिएगा कि इसी टीवी पर मैं आपको दिखूँगा।


वाह! और वह बात आज सच भी साबित हो ही गई!

बचपन से यही मेरा सपना था जो अब जाकर हक़ीक़त का रूप ले रही है। कोशिश करने पर मेहनत ज़रूर रंग लाती है।


अच्छा, उस वक़्त कौन-कौन फ़िल्मी अभिनेता आपके आइडोल हुआ करते थे?

मैं बचपन से सलमान ख़ान का बहुत बड़ा फ़ैन रहा हूँ और आज भी हूँ। आज भी एक दिन उनक्से साथ काम करूँगा यह मेरा एक सपना है, देखें पूरा होता है या नहीं!


सलमान की कौन कौन सी फ़िल्में आप देखते थे उस ज़माने में?

उनकी हर फ़िल्म मैंने देखी है। ’मैंने प्यार किया’ और ’साजन’ से लेकर ’जुड़वा’, ’दुल्हन हम ले जाएँगे’, ’चोरी चोरी चुपके चुपके’, ’कहीं प्यार ना हो जाए’, ’तेरे नाम’, और आज के ज़माने की फ़िल्में भी, जैसे कि”बॉडी-गार्ड’, ’दबंग’, ’किक’ वगेरह!



राहुल, सलमान ख़ान ही की तरह आपका शारीरिक गठन भी बहुत ही अच्छा है, पौरुष-सम्पन्न है। क्या बचपन से ही आप अपने शारीरिक विकास पर ध्यान दिया करते थे?

देखिए मुझे बचपन से ही खेल-कूद में गहरी दिलचस्पी थी। स्कूल में स्पोर्ट्स ईवेन्ट्स में नियमित भाग लिया करता था। स्पोर्ट्स की तरफ़ बहुत ही ज़्यादा झुकाव था मेरा और मैं एक अच्छा स्पोर्ट्स मैन बनना चाहता था। हमेशा अपने स्कूल के वार्षिक खेलों में अव्वल रहता था।


फ़िल्में देखते थे, खेलकूद में भी अच्छे थे, लेकिन पढ़ाई???

जब मैं अपने दसवीं का रेज़ल्ट लेने स्कूल पहुँचा तो मेरे क्लास टीचर को विश्वास ही नहीं था कि मैं पास हो जाऊँगा, लेकिन मेरी मार्क-शीट देख कर वो हँसने लगी और बोली कि तू पास कैसे हो गया, तुझे तो खेलने से कभी टाइम ही नहीं मिलता था! (हँसते हुए)


अच्छा यह मॉडेलिंग् का सिलसिला कब और कैसे शुरू हुआ?

तब मैं कॉलेज में पढ़ रहा था। ऐसे ही एक बार मैंने मॉडेलिंग् का ऑडिशन दे दिया था नोएडा में आयोजित होने वाले एक रैम्प शो के लिए। और उसमें मैं सीलेक्ट हो गया। वह मैंने ऐसे ही मस्ती में दिया था, पर सिलसिला शुरू हो गया। मुझे एक अभिनेता बनना था और मॉडेलिंग् का रास्ता भी कुछ हद तक अभिनय जगत से जा कर मिलता था, इसलिए मैंने सोचा कि इस लाइन से जुड़ा रहूँगा तो आगे चलकर टीवी या फ़िल्मों में मौका मिल सकता है।


साधारणत: परिवार यह चाहता है कि बेटा बड़ा हो कर डॉक्टर या इन्जिनीयर बने, तो क्या आपके परिवार का भी आपसे ऐसी ही कुछ उमीद थी?

मेरा परिवार उस समय यह चाहता था कि मैं इण्डियन आर्मी जॉइन करूँ, सेना में भर्ती हो जाऊँ। बस, फिर परिवार की ख़ुशी के लिए मैंने कॉलेज छोड़ के आर्मी जॉइन कर लिया। आर्मी में भर्ती तो हो गया पर वहाँ कभी ख़ुश नहीं रह सका। जिस चीज़ की मुझे तलाश थी, वह वहाँ मुझे नहीं मिली, और मुझे एक घुटन सी महसूस होने लगी। मुझे यह अहसास हुआ कि इंसान को वही करना चाहिए या बनना चाहिए जो वह करना चाहता है, बनना चाहता है।


बिल्कुल सच बात है यह!

फिर वापस आकर अपने परिवार को मैंने अपने सपनों के बारे में बताया और उन्हें बड़ी मुश्किल से समझाया। कुछ समय बाद मैंने अर्मी छोड़ दिया। आर्मी छोड़ कर जब मैं घर वापस आया तो लोग तरह तरह की बातें करने लगे थे। गाँव में सब कॉमेन्ट्स मारते थे पर मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता था क्योंकि मुझे ख़ुद पर और अपने सपनों पर पूरा भरोसा था। परिवार ने मेरा साथ दिया। मैं ख़ुशनसीब हूँ कि मुझे मेरे परिवार ने समझा, और मैं निकल पड़ा अपने सपनों को सच साबित करने के लिए।



और फिर शुरू हुई ग्लैमर वर्ल्ड में संघर्ष, है ना?


बिल्कुल! आर्मी ड्रॉप करने के बाद मैंने अपने सपनों के तरफ़ क़दम बढ़ाना शुरू कर दिया। तभी मैंने दिल्ली के 'Elite Modelling Management School' में दाखिला ले लिया। बस उसके बाद मैंने दिली के बेस्ट फ़ोटोग्राफ़र से अपना पोर्ट-फ़ोलियो बनवाया और कुछ दिन दिल्ली में काम करने के बाद सीधे मायानगरी मुंबई पहुँच गया।


मुंबई में किसी को जानते थे आप?

जी नहीं! मुंबई शिफ़्ट तो हो गया लेकिन इससे पहले ना मैं कभी मुंबई आया था और ना ही मैं किसी को यहाँ पर जानता था। शुरू शुरू में बहुत मुश्किलें सामने आईं, फिर धीरे-धीरे रास्ता मिलता गया।


आपके परिवार से आर्थिक सहयोग मिला संघर्ष के इन दिनों में?

परिवार से मैंने आर्थिक सहयोग कभी माँगा नहीं। क्योंकि मैं उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ जाकर इस फ़ील्ड में आया, इसलिए मैं उन्हें परेशान नहीं करना चाहता था।  मैंने अपने बलबूते मुंबई में संघर्ष किया। धीरे धीरे मुझे प्रिण्ट और रैम्प पर काम मिलना शुरू हो गया, और कुछ पैसे आने लगे। जब शुरू शुरू में लोगों से मिलता था तो बहुत सारे लोग यही कहते थे कि कुछ नहीं होगा तेरा तू वापस चला जा। यहाँ आने के बाद मुझे पता चला कि यहाँ पर पहचान बनाना इतना आसन नहीं लेकिन मैंने कभी हार नहीं मानी।



कहते हैं कि यह जो ग्लैमर की दुनिया है, बड़ी नीची राहें हैं ऊँचाइयों की। आपका क्या ख़याल है?

यह आप पर निर्भर करता है कि आप किस हद को नीचा समझते हैं। अगर आपके किसी काम से किसी और को शारीरिक, मानसिक य्या आर्थिक क्षति नहीं पहुँच रही है तो ऐसा काम करने में कोई बुराई नहीं है। मुंबई जैसी शहर में किसी संघर्षरत कलाकार का बिना परिवार के आर्थिक सहयोग के इतना आसान नहीं है। ऐसे में अगर किसी को हानी पहुँचाए बग़ैर कोई काम कर लिया जाए तो इसमें बुराई क्या है!


और यहाँ होने वाले शोषण के बारे में आपके क्या विचार हैं?

शोषण उसी का होता है जो शोषित होना चाहे। यहाँ कोई किसी के साथ ज़बरदस्ती नहीं करता। अगर आपको कुछ पसन्द नहीं है तो आप साफ़ मना कर सकते हैं। यह आप पर ही निर्भर करता है कि आप क्या चाहते हैं और अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए आप कितनी कीमत चुका सकते हैं। बिल्कुल सीधा मामला है।


किन किन बड़े फ़ैशन शोज़ में आप रैम्प वाक कर चुके हैं?

मैंने बहुत सारे नामी डिज़ाइनर्स के शोज़ में रैम्प वाक किया है। Raipur Fashion Show 2014, Aqua Fashion Tour 2014, Bhopal Fashion Week, वगेरह।


अब बताइए कि अभिनय की शुरुआत कैसे हुई?

मॉडेलिंग् करते-करते यहाँ कुछ दिनों बाद एक थिएटर ग्रूप मैंने जॉइन कर लिया और अपनी ऐक्टिंग् स्किल्स को और भी बेहतर करना शुरू कर दिया। कई लोगों से मिला और फिर कुछ टीवी सीरिअल्स में छोटे-मोटे रोल करने का मौका मिला। इससे अभिनय का अनुभव होने लगा। बस उसके बाद आगे बढ़ता चला गया।



Scenes from Maharana Pratap
कौन कौन से टीवी धारावाहिकों में आप नज़र आए?

यूं तो छोटे-मोटे रोल कई किए, पर ’महाराणा प्रताप’, ’CID', 'सावधान - India Fights Back' और ’Code Red' कुछ उल्लेखनीय नाम हैं।


ये सभी धारावाहिक काफ़ी लोकप्रिय हैं। Code Red की बात करें तो इस धारावाहिक के बारे में कुछ बताना चाहेंगे?

Code Red मानव मस्तिष्क को समझने का काम करती है, यह जानना चाहती है कि जब कोई आदमी अपने आप को या किसी और को चोट पहुँचाने की कोशिश करता है तो उसके पीछे क्या-क्या कारण होती हैं, उसके दिमाग़ में क्या कुछ चल
Scenes from 'Code Red'
रहा होता है जो उसके behavioural patterns को बदल कर रख देती है। यह शो समाज में जागरूकता लाने का कम भी कर रही है, और हमें यह संदेश दे रही है कि अगर हमारी आसपास कोई ग़लत काम हो रहा है तो उसकी जानकारी सही जगह तक पहुँचाएँ। आत्महत्या, बलात्कार, बाल-शोषण जैसी सभी मानसिक समस्याओं को रोकने संबंधित जानकारी भी मिलती है इस धारावाहिक में।


अब हम बात करेंगे आपकी पहली फ़िल्म ’Dunno Y2 - Life is a Moment’ की। सबसे पहले तो यह बताइए कि आपको इस फ़िल्म में रोल कैसे मिला?

जब इस फ़िल्म की कास्टिंग् चल रही थी तो मुझे इसकी ख़बर मिली किसी सूत्र से और मैं ऑडिशन देने के लिए पहुँच गया। संजय सर (फ़िल्म के निर्देशक) को मेरा ऑडिशन पसन्द आया और मुझे एक किरदार के लिए फ़ाइनल कर लिया गया।


आपके निभाये उस किरदार के बारे में कुछ बताना चाहेंगे?

फ़िल्म के प्रदर्शित होने से पूर्व मेरा ज़्यादा कुछ कहना ठीक नहीं होगा, बस यह समझ लीजिए कि ’दिल तो पागल है’ फ़िल्म में अक्षय कुमार की जो भूमिका थी, वही भूमिका मेरी इस फ़िल्म में है। और यह कहूँगा कि यह एक अच्छा रोल था जो मैंने निभाया और फ़िल्म के लिए एक महत्वपूर्ण किरदार भी है यह। उम्मीद करता हूँ कि दर्शकों को मेरा यह रोल पसन्द आएगा।


कब प्रदर्शित हो रही है यह फ़िल्म?

इसी वर्ष, फ़िल्हाल यह सेन्सर बोर्ड के पास है। इसका ट्रेलर यू-ट्यूब पर रिलीज़ हो चुका है और फ़िल्म रिलीज़ की तारीख़ भी जल्दी ही निर्धारित हो जाएगी।



with the team of 'Dunno Y2'
यह फ़िल्म इन्डो-नॉर्वेजियन कोलाबोरेशन की फ़िल्म है। पहली ही फ़िल्म में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पे काम करने का अनुभव कैसा रहा?

बहुत ही अच्छा अनुभव था। हम सब नॉरवे गए हुए थे, काम के साथ साथ पूरी यूनिट के साथ हम सब ख़ूब मस्ती किया करते थे। संजय सर से बहुत कुछ सीखने को मिला। युवराज पराशर, कपिल शर्मा, और तमाम कलाकारों के साथ बहुत अच्छी ट्युनिंग् हो गई थी। ’Dunno Y - Na Jaane Kyun' की सफलता के बारे में तो आपको पता ही होगा। कुल 11 अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले थे उस फ़िल्म को। अब हम यही उमीद कर रहे हैं कि ’Dunno Y2 - Life is a Moment' उससे भी आगे जा निकले।


जहाँ तक मुझे ख़बर है ये फ़िल्में समलैंगिक्ता के विषय पर केन्द्रित है। अपनी पहली फ़िल्म में इस तरह के विषय वाली फ़िल्म में काम करने में आपको झिझक महसूस नहीं हुई? डर नहीं लगा कि यह करीअर के लिए आत्मघाती सिद्ध हो सकती है?

बिल्कुल नहीं। अब समय बदल चुका है, हर कोई नया प्रयोग कर रहा है, फ़ॉरमोला फ़िल्में अब नहीं बनती। आजकल पब्लिक भी हर फ़िल्म में कुछ नया देखना चाहती है। और सबसे बड़ी बात है अभिनय की। कहानी जो भे हो, विषय जो भी हो, अगर आपके अभिनय में दम है तो आप सफलता की चोटी पर पहुँच सकते हैं।


सुना है इस फ़िल्म का शीर्षक गीत लता मंगेशकर ने गाया है?

जी हाँ, यह गीत अभी रिलीज़ नहीं हुई है। यह मेरी ख़ुशनसीबी है कि मेरी पहली फ़िल्म में लता जी का गाया गीत है।


आपको इस फ़िल्म की कामयाबी के लिए बहुत सारी शुभकामनाएँ।

धन्यवाद!



अच्छा राहुल, अब यह बताइए कि अपने आप को फ़िट रखने के लिए आप दैनिक जीवन में क्या करते हैं?

फ़िटनेस के लिए मैं नियमित रूप से जिम जाता हूँ और स्विमिंग् करता हूँ। जब भे मेरे पास खाली समय होता है, मैं जिम चला जाता हूँ और हर तरह के कसरत करता हूँ। आप चाहें तो जिम को मेरा दूसरा घर भी कह सकते हैं (हँसते हुए)।


और खाने-पीने में किस तरह का ध्यान रखते हैं?

मुझे डायटिंग् करना बिल्कुल पसन्द नहीं। मैं दिल खोल के खाता हूँ और फिर दिल खोल के वर्क आउट करता हूँ।


वाह! क्या बात है! साधारणत: ग्लैमर वर्ल्ड के लोग खान-पान पर विशेष ध्यान रखते हैं पर आपसे यह जानकर हैरानी हुई। अब चलते-चलते उन युवाओं से आप क्या कहना चाहेंगे जो इस क्षेत्र में अपना करीअर बनाना चाहते हैं?

मेरा हमेशा से मानना है कि लाइफ़ में रिस्क नहीं लोगे तो अपने सपनों तक नहीं पहुँच पाओगे। लाइफ़ में जितना रिस्क उतना ही जीने और काम करने में मज़ा आता है। और एक बात, कड़ी मेहनत से किया हुआ काम का फल हमेशा मिलता है, बस फ़र्क इतना होता है कि किसी को जल्दी और किसी को देर से मिलता है, पर मिलता ज़रूर है। मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। इसलिए हमेशा ख़ुश रहा करो और अपने सपनों को जियो। और अपने परिवार को सबसे ज़्यादा प्यार करो।


बहुत ख़ूब! और बहुत बहुत शुक्रिया आपका जो हमें अपनी व्यस्तता में से इतना समय दिया और खुल कर बातचीत की। आपको एक उज्वल भविष्य के लिए ढेरों शुभकामनाएँ देते हैं, ख़ास कर आपकी आने वाली फ़िल्म के लिए। एक बार फिर बहुत बहुत धन्यवाद और नमस्कार!

धन्यवाद! नमस्कार!


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी cine.paheli@yahoo.com पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





Tuesday, May 19, 2015

आशा गुप्ता आशु लिखित लघुकथा ममता की छांव में

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में शाहिद मंसूर "अजनबी" की लघुकथा माँ तो सबकी एक-जैसी होती है का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं आशा गुप्ता आशु लिखित लघुकथा ममता की छांव में, जिसे स्वर दिया है माधवी गणपुले ने।

इस कहानी मुक्ति का कुल प्रसारण समय 4 मिनट 20 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। इसका गद्य लेखिका के फेसबुक पृष्ठ पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

माना कि अभी नहीं जागे मेरे सोये हुये नसीब!
पर एक दिन अपना होगा खुशियां होंगी करीब !!

 ~ आशा गुप्ता "आशु"

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"मुझे उस दिन का इन्तजार था जब बच्चों के पंख ताकतवर हो जाते और वो परवाज़ भरते।”
 (आशा गुप्ता "आशु" की लघुकथा "ममता की छांव में" से एक अंश)


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#Eighth Story, Mamta Ki Chhaon Mein; Asha Gupta Ashu; Hindi Audio Book/2015/08. Voice: Madhavi Ganpule

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