Tuesday, March 31, 2015

गिरिजेश राव लिखित लघुकथा मुक्ति

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में अनुराग शर्मा की लघुकथा "व्यवस्था" का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं गिरिजेश राव लिखित लघुकथा मुक्ति, जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

बोलती कहानियाँ के पाठकों के लिए गिरिजेश राव का नाम नया नहीं है। उनकी कुछ अन्य रोचक कथाओं कों यहाँ सुना जा सकता है। इस कहानी मुक्तिका कुल प्रसारण समय 2 मिनट 7 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।


प्रतिमाओं को गढ़ा जाता है उस अनुभव को मूर्त करने के लिये, मूर्ति इसीलिये कहते हैं। सूक्ष्म स्तर तक सभी नहीं जा सकते इसलिये स्थूल विग्रह का आधार दिया जाता है कि उसी बहाने जीवन सत्त्व से कुछ जुड़ाव बना रहे।
 ~ गिरिजेश राव "सनातन कालयात्री"

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"प्रात और साँझ की तरह, ऋतुओं की तरह, सृष्टि के लयबद्ध नृत्य की तरह, उपद्रवों में संतुलन की तरह, युद्ध के पश्चात शांति और शांति के पश्चात क्षरण की तरह।”
 (गिरिजेश राव की लघुकथा "मुक्ति" से एक अंश)


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मुक्ति MP3

#Sixth Story, Vyavastha; Girijesh Rao; Hindi Audio Book/2015/06. Voice: Anurag Sharma

Sunday, March 29, 2015

ठुमरी महफिलों की : SWARGOSHTHI – 212 : THUMARI



स्वरगोष्ठी – 212 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : 10 : ठुमरी

‘कौन गली गयो श्याम...’ और ‘आयो कहाँ से घनश्याम...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की एक और नवीन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धान्तों के अनुकूल जो धाराएँ थीं उन्हें स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। पिछली पिछली दो कड़ियों में हमने भारतीय संगीत की सर्वाधिक लोकप्रिय ‘ठुमरी’ शैली पर चर्चा की थी। आज के अंक में हम आपको बीसवीं शताब्दी तक महफिलों की प्रचलित ठुमरी का रसास्वादन कराते हैं। आज हम अपने समय की विख्यात गायिका रसूलन बाई की गायी राग जोगिया की ठुमरी प्रस्तुत करेंगे। इसके अलावा पार्श्वगायक मन्ना डे की आवाज़ में राग खमाज की एक फिल्मी ठुमरी भी आप सुनेगे।  




नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में लखनऊ में बोलबाँट और बोलबनाव दोनों प्रकार की ठुमरियों का प्रचलन था। 1856 में अँग्रेजों द्वारा अवध के नवाब वाजिद अली शाह को बन्दी बनाए जाने और उन्हें तत्कालीन कलकत्ता के मटियाबुर्ज नामक स्थान पर नज़रबन्द किये जाने के बाद बंगाल में भी ठुमरी का प्रचार-प्रसार हुआ। उस्ताद अलीबख्श खाँ और उस्ताद सादिक़ अली खाँ जैसे उच्चकोटि के संगीतज्ञ भी नवाब के साथ लखनऊ से कलकत्ता जा बसे थे। कुछ समय बाद उस्ताद सादिक़ अली खाँ वापस लखनऊ लौट आए। इसी अवधि में ग्वालियर के भैया गणपत राव, जो स्वयं ध्रुपद और खयाल के गायक और वीणा के कुशल वादक थे, ने भी उस्ताद सादिक़ अली खाँ से ठुमरी सीखी। भैया गणपत राव ने ठुमरी को एक नवीन स्वरूप प्रदान किया। उन्होने तत्कालीन सांगीतिक परिवेश में विदेशी वाद्य हारमोनियम को ठुमरी से जोड़ कर उल्लेखनीय प्रयोग किया। अपने लगन और परिश्रम से उन्होने हारमोनियम वादन में उल्लेखनीय दक्षता प्राप्त की। भैया गणपत राव ठुमरी के प्रभावी गायक ही नहीं बल्कि एक श्रेष्ठ ठुमरी रचनाकार भी थे। उन्होने ‘सुघरपिया’ उपनाम से अनेक ठुमरियों की रचनाएँ की थी। पूरब अंग की ठुमरी के इस अंदाज के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होने लखनऊ, बानारस, गया, पटना, कलकत्ता आदि स्थानों का भ्रमण किया और अनेक शागिर्द तैयार किये। ठुमरी के इस स्वरूप को तत्कालीन राजाओं और नवाबों के दरबार में समुजित सम्मान मिला। आगे चलकर ब्रिटिश शासन की उपेक्षात्मक नीति के कारण राज दारबारों से संगीत की परम्परा टूटने लगी तब यह ठुमरी रईसों की व्यक्तिगत महफिलों में और तवायफ़ों के कोठों पर सुरक्षित रही। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हम ठुमरी के इसी महफिली स्वरूप का आभास कराने का प्रयत्न कर रहे हैं।

बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में पूरब अंग की ठुमरी गायिकाओं में विदुषी रसूलन बाई का नाम शीर्ष पर था। पूरब अंग की उपशास्त्रीय गायकी- ठुमरी, दादरा, होरी, चैती, कजरी आदि शैलियों की अविस्मरणीय गायिका रसूलन बाई बनारस के निकट स्थित कछवाँ बाज़ार (वर्तमान मीरजापुर ज़िला) की रहने वाली थीं और उनकी संगीत शिक्षा बनारस (अब वाराणसी) में हुई थी। संगीत का संस्कार इन्हें अपनी नानी से विरासत में मिला था। रसूलन बाई के संगीत को निखारने में उस्ताद आशिक खाँ, नज्जू मियाँ और टप्पा गायकी के अन्वेषक मियाँ शोरी के खानदान के शम्मू खाँ का बहुत बड़ा योगदान था। पूरब अंग की भावभीनी गायकी की चैनदारी, बोल-बनाव के लहजे, कहन के खास ढंग और ठहराव, यह सारे गुण रसूलन बाई की गायकी में था। टप्पा तो जैसे रसूलन बाई के लिए ही बना था। बारीक मुरकियाँ और मोतियों की लड़ियों जैसी तानों पर उन्हें कमाल हासिल था। उनका पहला सार्वजनिक प्रदर्शन तत्कालीन धनंजयगढ़ के राज दरबार में हुआ था, जहाँ उपस्थित राजाओं ने उनकी गायकी को भरपूर सराहा था। इस प्रदर्शन के बाद उन्हें अनेक राजाओं और जमींदारो की माफ़िलों में आमंत्रित किया जाने लगा। उपशास्त्रीय संगीत की आजीवन साधनारत रहने वाली इस स्वरसाधिका को खयाल गायन पर भी कमाल का अधिकार प्राप्त था, परन्तु उन्होने स्वयं को उपशास्त्रीय शैलियों तक ही सीमित रखा और इन्हीं शैलियों में उन्हें भरपूर यश भी प्राप्त हुआ। ग्रामोफोन कम्पनी ने रसूलन बाई के अनेक लोकप्रिय रिकार्ड बनाए। उन्हीं की आवाज में अब आप ठुमरी गायकी का यह अंदाज सुनिए। यह ठुमरी राग जोगिया और दीपचंदी ताल में निबद्ध है।


ठुमरी राग जोगिया : ‘कौन गली गयो श्याम...’ : रसूलन बाई




कैशिकी दृश्यात्मक गीत भेद होने के कारण ठुमरी गीतों में स्त्रियोचित और श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यंजना मुख्य रूप से होती है। ऐसे ही भावों की अभिव्यक्ति के लिए ठुमरी गीतों की शब्द-योजना अधिकतर श्रृंगारपरक होती है। श्रृंगार के दोनों पक्ष, संयोग और वियोग का चित्रण ठुमरी में पाया जाता है। भावनाओं की दृष्टि से विभिन्न ठुमरी गीतों में प्रेम, भक्ति, अनुराग, हर्ष, शोक, मान, उपालम्भ, आशा, निराशा आदि अनेक स्थायी और अस्थायी मनोभावों की अभिव्यक्ति की जाती है। अधिकतर ठुमरियाँ कृष्णलीला प्रधान रची गई हैं। कृष्ण, राधा और गोपियों के प्रति ईश्वरीय भाव भी होता है तथा नायक या नायिका के रूप में लक्ष्य करके लौकिक भाव भी होता है। रसूलन बाई की गायी उपरोक्त ठुमरी में कृष्ण की बाँसुरी पर मोहित नायिका के वियोग का चित्रण है। यह भाव ईश्वरीय और मानवीय दोनों चरित्र के प्रति उद्गार हो सकता है। आज की दूसरी ठुमरी में लक्ष्य तो ‘घनश्याम’ को किया गया है किन्तु यह भी मानवीय चरित्र के प्रति ही अभिव्यक्ति है। यह भी महफ़िली ठुमरी का एक प्रकार है और बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में प्रचलित ठुमरी गायकी का प्रतिनिधित्व करती है। 1971 में ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘बुड्ढा मिल गया’ प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म के संगीतकार राहुलदेव बर्मन थे। राग खमाज और सितारखानी ताल में निबद्ध इस ठुमरी को पार्श्वगायक मन्ना डे ने अनूठे अंदाज में गाया है। आप यह ठुमरी सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ठुमरी राग खमाज : ‘आयो कहाँ ते घनश्याम...’ : मन्ना डे : फिल्म – बुड्ढा मिल गया

 


संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 212वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक वरिष्ठ गायिका की आवाज़ में कण्ठ संगीत की रचना का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 220वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – प्रस्तुति के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम बताइए।

3 – यह रचना किस शैली में है? हमे उस शैली का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 4 अप्रैल, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 214वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 210वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको महान गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वरों में प्रस्तुत ठुमरी का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा गया था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भिन्न षडज, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ। इस बार पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने दिये हैं। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी जारी श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ के अन्तर्गत हम ठुमरी गायकी पर चर्चा कर रहे हैं। आपको यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें अवश्य लिखिएगा। अगले अंक में हम आपका परिचय भारतीय संगीत की एक अन्य शैली से परिचित कराएंगे। यदि आप भी भारतीय संगीत के किसी भी विषय पर हिन्दी में लेखन की इच्छा रखते हैं तो हमसे सम्पर्क करें। हम आपकी प्रतिभा का सदुपयोग करेने। ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के आगामी अंकों में आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। आज बस इतना ही, अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  
 


Saturday, March 28, 2015

INTERVIEW OF MUSIC DIRECTOR BASANT PRAKASH'S SON RITURAJ SISODIA


 बातों बातों में - 06

विस्मृत संगीतकार बसन्त प्रकाश के पुत्र ऋतुराज सिसोदिया से सुजॉय चटर्जी की बातचीत

"रफ़्ता-रफ़्ता आप मेरे दिल के मेहमाँ हो गए..." 




नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रॄंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज मार्च 2015 के चौथे शनिवार के दिन प्रस्तुत है फ़िल्म जगत के विस्मृत संगीतकार बसन्त प्रकाश के पुत्र ऋतुराज सिसोदिया के साथ की गई हमारी लम्बी बातचीत के सम्पादित अंश।



फ़िल्म संगीत के सुनहरे युग में जहाँ एक तरफ़ कुछ संगीतकार लोकप्रियता की बुलंदियों तक पहुँचे, वहीं दूसरी तरफ़ बहुत से संगीतकार ऐसे भी हुए जो बावजूद प्रतिभा सम्पन्न होने के बहुत अधिक दूर तक नहीं बढ़ सके। आज जब सुनहरे दौर के संगीतकारों की बात चलती है तब अनिल बिस्वास, नौशाद, सी. रामचन्द्र, रोशन, सचिन देव बर्मन, ओ.पी. नय्यर, मदन मोहन, रवि, हेमन्त कुमार, कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, राहुल देव बर्मन जैसे नाम सब से पहले लिए जाते हैं। इन चमकीले नामों की चमक के सामने बहुत से नाम इस चकाचौंध में नज़रंदाज़ हो जाते हैं। ऐसा ही एक नाम है संगीतकार बसंत प्रकाश का। जी हाँ, वही बसंत प्रकाश जो 40 के दशक के सुप्रसिद्ध संगीतकार खेमचंद प्रकाश के छोटे भाई थे। खेमचंद जी की तरह बसंत प्रकाश इतने मशहूर तो नहीं हुए, पर फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने को समृद्ध करने में अपना अमूल्य योगदान दिया। आज बसंत प्रकाश जी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन यह हमारा सौभाग्य है कि उनके बेटे श्री ॠतुराज सिसोदिआ आज हमारे साथ ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ पर मौजूद हैं। 

ऋतुराज जी, बहुत बहुत स्वागत है आपका हमारे मंच पर।


बहुत बहुत धन्यवाद आपका! जिस तरह से आपने भूमिका दी है, बहुत अच्छा लगा, और मैं भी बहुत उत्सुक हूँ आपके सवालों के जवाब देने के लिए, अपने पिता और खेमचन्द जी के बारे में बताने के लिए, जिन पर मुझे बहुत बहुत गर्व है।


बड़ा ही रोमांचित अनुभव कर रहा हूँ मैं इस वक़्त। ऋतुराज जी, सबसे पहले तो हम जानना चाहेंगे खेमचंद प्रकाश और बसंत प्रकाश के संबंध के बारे में। मेरा मतलब है कि कुछ लोग कहते हैं कि बसंत जी खेमचंद जी के मानस पुत्र हैं, कोई कहता है कि वो उनके मुंहबोले भाई हैं, तो हम आपसे जानना चाहेंगे इस रिश्ते के बारे में।

बहुत अच्छा और अहम सवाल है यह। मैं आपको बताऊँ कि मेरे पिता बसंत प्रकाश जी और खेमचंद जी सगे भाई भी थे और पिता-पुत्र भी।



सगे भाई और पिता-पुत्र भी? मतलब?

यानी कि रिश्ते में तो दोनों सगे भाई ही थे, लेकिन बाद में खेमचंद जी ने व्यक्तिगत कारणों से मेरे पिता बसंत प्रकाश जी को अपने इकलौते पुत्र के तौर पर गोद लिया।



यानी कि खेमचंद जी आपके ताया जी भी हुए और साथ ही दादाजी भी!

बिल्कुल ठीक!



वैसे तो हम आज बसंत प्रकाश जी के बारे में ही चर्चा कर रहे हैं, लेकिन खेमचंद जी का नाम उनके साथ ऐसे जुड़ा हुआ है कि उनका भी ज़िक्र करना अनिवार्य हो जाता है। इसलिए बसंत प्रकाश जी पर चर्चा आगे बढ़ाने से पहले, हम आपसे खेमचंद जी के बारे में जानना चाहेंगे। क्या जानते हैं आप उनके बारे में?

जी हाँ, हर पोता अपने दादाजी के बारे में जानना चाहेगा, और मेरे पिता जी ने भी उनके बारे में मुझे बताया था। खेमचंद जी ने 'सुप्रीम पिक्चर्स' की फ़िल्म 'मेरी आँखें' के ज़रिये 1939 में फ़िल्म जगत में पदार्पण किया था। और जल्द ही नामचीन 'रणजीत' फ़िल्म स्टुडिओ ने उन्हें अनुबंधित कर लिया। लता मंगेशकर के लिए खेमचंद प्रकाश फलदायक साबित हुए और उस दौर में 'आशा', 'ज़िद्दी' और 'महल' जैसी फ़िल्मों में गीत गा कर लता जी को नई-नई प्रसिद्धी हासिल हुई थी। लेकिन खेमचंद जी की असामयिक मृत्यु ने फ़िल्म जगत में एक कभी न पूरा होने वाले शून्य को जन्म दिया।




खेमचन्द्र प्रकाश
निस्संदेह खेमचंद जी के जाने से जो क्षति हुई, वह फ़िल्म जगत की अब तक की सब से बड़ी क्षतियों में से एक है।

'तानसेन' को बेहतरीन म्युज़िकल फ़िल्मों में गिना जाता है। खेमचंद जी ने लता जी को तो ब्रेक दिया ही, साथ ही किशोर कुमार को भी पहला ब्रेक दिया "मरने की दुयाएं क्यों माँगू" गीत में। यह बात मशहूर है कि लता मंगेशकर की आवाज़ को शुरु शुरु में निर्माता चंदुलाल शाह नें रिजेक्ट कर दिया था। लेकिन खेमचंद जी ने उनके निर्णय को चैलेंज किया और उन्हें बताया कि एक दिन यही आवाज़ इस इंडस्ट्री पर राज करेगी। 'ज़िद्दी' में लता जी का गाया एक बेहद सुंदर गीत था "चंदा रे जा रे जा रे"।



बहुत ही सुन्दर रचना है यह! अच्छा ॠतुराज जी, यह बताइए कि खेमचंद जी का स्वरबद्ध कौन सा गीत आपको सब से प्रिय है?

ऐसे बहुत से गीत हैं जो मुझे व्यक्तिगत तौर पे बहुत पसंद है, लेकिन एक जो गीत जो मेरा फ़ेवरीट है, वह है फ़िल्म 'महल' का "मुश्किल है बहुत मुश्किल चाहत का भुला देना"।



वाह! यह गीत मुझे भी बहुत पसन्द है, "आएगा आनेवाला" गीत से भी ज़्यादा। ऋतुराज जी, अपने परिवार के बारे में बताइए। कौन-कौन हैं आपके परिवार में?

मेरे पिताजी बसन्त प्रकाश जी के दो विवाह रहे। उनकी पहली पत्नी का नाम स्वर्गीय छोगीदेवी, मैं और मेरी सभी बहने उन्हें बड़ी माँ कह कर बुलाते थे। उनकी दो बेटियाँ हैं प्रभा दीदी और स्वर्गीय मधु दीदी। मधु दीदी निस्सन्तान रहीं और प्रभा दीदी की दो बेटियाँ हैं। वो सभी हमारे पैत्रिक निवास स्थान सुजानगढ़ में रहते हैं। मेरे पिता का दोसरा विवाह स्वर्गीय अनीता से हुआ। इस विवाह से उनकी पाँच बेटियाँ हुईं - वैजयन्ती, लक्ष्मी, दुर्गा, शानू, सोनम, और एक बेटा, यानी कि मैं। हमारा पूरा परिवार मुंबई के मलाड में रहते हैं। मेरी माँ अनीता 1995 में गुज़र गईं, मेरे पिता 1996 में, और मेरी बड़ी माँ 1998 में इस दुनिया से चली गईं। बस इतनी सी है मेरे परिवार की दास्तान।



ॠतुराज जी, हम अब बसंत प्रकाश जी पर आते हैं; बताइए कि एक पिता के रूप में वो कैसे थे? उनकी कुछ विशेषताओं के बारे में बताएँ जिनके बारे में जान कर संगीत-रसिक अभिभूत हो जाएँ?

मेरा और मेरे पिताजी का संबंध दोस्ती का था और सिर्फ़ मेरे साथ ही नहीं, पूरे परिवार के साथ ही वो घुलमिल कर रहते थे, और एक अच्छे पिता के सभी गुण उनमें थे। परिवार का वो ख़याल रखा करते थे। बहुत ही शांत और सादे स्वभाव के थे। उनकी रचनाएँ मौलिक हुआ करती थी। उन्होंने कभी डिस्को या पाश्चात्य संगीत का सहारा नहीं लिया क्योंकि वो भारतीय शास्त्रीय संगीत में विश्वास रखते थे। राग-रागिनियों, ताल और लोक-संगीत में उनकी गहरी रुचि थी। खेमचंद जी से ही उन्होंने संगीत सीखा और संगीत और नृत्य कला की बारीकियाँ उनसे सीखी। वो थोड़े मूडी थे और उनका संगीत उनके मूड पे डिपेण्ड करता था।



कहा जाता है कि 'अनारकली' फ़िल्म के लिए पहले पहले बसंत प्रकाश जी को ही साइन करवाया गया था, लेकिन बाद में इन्होंने फ़िल्म छोड़ दी। क्या इस बारे में आप कुछ कहना चाहेंगे?


जी हाँ, यह सच बात है। 'अनारकली' के संगीत को लेकर कुछ विवाद खड़े हुए थे। एक दिन काम के अंतराल के वक़्त मेरे पिता जी फ़िल्मिस्तान स्टुडिओ में आराम कर रहे थे। उस समय निर्देशक के सहायक उस कमरे में आये और उन पर चीखने लगे। मेरे पिता जी को उस ऐसिस्टैण्ट के चिल्लाने का तरीका अच्छा नहीं लगा। उन दोनों में बहसा-बहसी हुई, और उसी वक़्त पिताजी फ़िल्म छोड़ कर आ गये। लेकिन तब तक पिताजी फ़िल्म का एक गीत रेकॉर्ड कर चुके थे। सी. रामचंद्र आकर फ़िल्म के संगीत का भार स्वीकारा और अपनी शर्त रख दी कि न केवल फ़िल्म के गानें लता मंगेशकर से गवाये जाएँगे, बल्कि मेरे पिताजी द्वारा स्वरब्द्ध गीता दत्त के गाये गीत को भी फ़िल्म से हटवा दिया जाये। शुरु शुरु में उनके इन शर्तों को फ़िल्मिस्तान मान तो गये, लेकिन आख़िर में गीता दत्त के गाये गीत को फ़िल्म में रख लिया गया। और वह गीत था "आ जाने वफ़ा"।


ॠतुराज जी, मैंने पढ़ा है कि खेमचंद जी की असामयिक मृत्यु के बाद बसंत प्रकाश जी ने उनकी कुछ असमाप्त फ़िल्मों के संगीत को पूरा किया था और इसी तरह से उनका फ़िल्म जगत में आगमन हुआ था। तो हम आपसे जानना चाहते हैं कि वह कौन सी असमाप्त फ़िल्में थीं खेमचन्द जी की जिसमें बसंत प्रकाश जी ने संगीत दिया था?

10 अगस्त 1950 को दादाजी की मृत्यु हो गई थी, और उनकी कई फ़िल्में असमाप्त थी जैसे कि 'जय शंकर', 'श्री गणेश जन्म', 'तमाशा'। 'श्री गणेश जन्म' में मन्ना डे सह-संगीतकार थे और 'तमाशा' के गीतों को मन्ना डे और एस. के. पाल ने पूरा किया था। बसंत प्रकाश जी ने 'जय शंकर' का संगीत पूरा किया और यही उनकी पहली फ़िल्म भी थी।



स्वतन्त्र संगीतकार के रूप में उनकी पहली फ़िल्म कौन सी थी?

1952 की ही फ़िल्म ’बदनाम’। यह फ़िल्मिस्तान की फ़िल्म थी जिसे डी.डी. कश्यप ने डिरेक्ट किया था; बलराज साहनी और श्यामा थे इस फ़िल्म में। इस फ़िल्म के सभी गाने हिट हुए। सबसे ज़्यादा हिट गीत था "साजन तुमसे प्यार करूँ मैं कैसे तुम्हें बतलाऊँ", लता जी की आवाज़ में। इसे HMV ने लता जी के rare gems album में शामिल किया है।



जी हाँ, यह बड़ा ही मशहूर गीत था उस ज़माने का। और फिर इस फ़िल्म में और भी कई गीत थे जैसे कि "जिया नाहीं लागे हो", "काहे परदेसिया को अपना बनाया", "घिर आई है घोर घटा"।

शंकर दासगुप्ता का गाया "यह इश्क़ नहीं आसां"।



जी जी। ऋतुराज जी, हमने सुना है बसन्त प्रकाश जी संगीत के साथ-साथ नृत्य में भी पारंगत थे?

यह सच बात है। वो संगीत, गायन और कत्थक नृत्य में माहिर थे। खेमचन्द जी के अलावा पंडित मोहनलाल जी से उन्होंने कत्थक सीखा।



बसंत प्रकाश जी द्वारा स्वरबद्ध फ़िल्मों में और कौन कौन सी फ़िल्में उल्लेखनीय रहीं?

सलोनी (1952), श्रीमतिजी (1952), निशान डंका (1952), बदनाम (1952), महारानी (1957), नीलोफ़र (1957), भक्तध्रुव (1957), हम कहाँ जा रहे हैं (1966), ज्योत जले (1967), ईश्वर अल्लाह तेरे नाम (1982), अबला (1989)।



देखा जाए तो 1952 का वर्ष उनके करीअर का व्यस्ततम वर्ष रहा। फिर उसके बाद 1957 का वर्ष सुखद था। ’नीलोफ़र’ फ़िल्म का गीत "रफ़्ता रफ़्ता वो हमारे दिल के अरमाँ हो गए" बहुत बहुत कामयाब रहा। 

जी, यह गीत मेरे पिताजी का सब से पसंदीदा गीत था। यह गीत इस फ़िल्म का भी सब से लोकप्रिय गीत था। और अब तक लोग इस गीत को याद करते हैं, सुनते हैं।



बिल्कुल सुनते हैं। यह तो था बसन्त प्रकाश जी का पसन्दीदा गीत; आपका पसन्दीदा गीत कौन सा है?

यूं तो अभी जिन फ़िल्मों के नाम मैंने लिए, उन सब के गानें मुझे बहुत पसंद है, लेकिन एक जो मेरा फ़ेवरीट गीत है, वह है उनकी अंतिम फ़िल्म 'अबला' का, "अबला पे सितम निर्बल पर जुलुम, तू चुप बैठा भगवान रे..."।



1968 के बाद पूरे बीस साल तक वो ग़ायब रहे और 1986 में दोबारा उनका संगीत सुनाई दिया। इसके पीछे क्या कारण है? वो ग़ायब क्यों हुए और दोबारा वापस कैसे आये?

उनके पैत्रिक स्थान पर कुछ प्रॉपर्टी के इशूज़ हो गये थे जिस वजह से उन्हें लकवा मार गया और 15 साल तक वो लकवे से पीड़ित थे। जब वो ठीक हुए, तब उनके मित्र वसंत गोनी साहब, जो एक निर्देशक थे, उन्होंने पिताजी को फिर से संगीत देने के लिए राज़ी करवाया और इन दोनों फ़िल्मों, 'ईश्वर अल्लाह तेरे नाम' और 'अबला', में उन्हें संगीत देने का न्योता दिया। वसंत जी को पिताजी पर पूरा भरोसा था। पिताजी राज़ी हो गये और इस तरह से एक लम्बे अरसे के बाद उनका संगीत फिर से सुनाई दिया।



वह क्या मसला था सम्पत्ति का ज़रा खुल कर बताएँगे अगर आपको कोई आपत्ति ना हो तो?

मेरे पिताजी खेमचन्द जी के सबसे छोटे भाई थे। क्योंकि खेमचन्द जी का कोई बेटा नहीं था, इसलिए उन्होंने पिताजी को गोद लिया ताकि उन्हें सम्पत्ति का वारिस बना सके। खेमचन्द जी की दो हवेलियाँ थीं। पहली हवेली को बंधक बनाया हुआ था, और दूसरी हवेली, जिसका नाम था ’पवनहंस’, उसे कुछ लोगों ने धोखे से हमसे छीन लिया था जाली पेपर्स के बलबूते। क्योंकि पिताजी ज़्यादातर समय मुंबई में गुज़ारते थे, इसका फ़ायदा उठा कर हवेली के नकली पेपर तैयार कर उन लोगों ने उस पर कब्ज़ा कर लिया। उस पर पिताजी ने कानूनी कार्यवाही भी की क्योंकि वह हवेली ही खेमचन्द की अन्तिम निशानी थी हमारे पास और पिताजी उसे खोना नहीं चाहते थे। बीस साल तक यह केस चलने के बाद पिताजी यह केस हार गए। इस सदमे को वो सह नहीं सके और 1975 में उन्हें पैरालिसिस का अटैक आ गया। इस वजह से संगीतकार का दायित्व निभा पाना भी उनके लिए असंभव सा हो गया, और उन्हें काम मिलने बन्द हो गए। वो बस कुछ लोगों को संगीत की शिक्षा दिया करते थे उसके बाद।



बहुत दुख हुआ यह जानकर कि सम्पत्ति ही काल बन गया बसन्त प्रकाश जी के जीवन में। अच्छा ऋतुराज जी, सुनने में आता है कि खेमचंद जी की एक बेटी भी थी जिनका नाम था सावित्री, और जिनके लिए खेमचंद जी ने पैत्रिक स्थान सुजानगढ़ में एक आलीशान हवेली बनवाई थी, पर बाद में आर्थिक कारणों से वह गिरवी रख दी गई, और आज वह किसी और की अमानत है। क्या आप खेमेचंद जी की बेटी सावित्री जी के बारे में कुछ बता सकते हैं?

जी नहीं, मुझे उनके बारे में कुछ नहीं मालूम। पिताजी ने कभी मुझे उनके बारे में नहीं बताया, इसलिए मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकता।



बहुत बहुत शुक्रिया ऋतुराज जी। हम वाक़ई अभिभूत हैं खेमचंद जी और बसंत प्रकाश जी जैसे महान कलाकारों के बारे में आप से बातचीत कर। ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के लिए अपना कीमती वक़्त निकालने के लिए और इतनी सारी बातें बताने के लिए मैं अपनी तरफ़ से, हमारे तमाम श्रोता-पाठकों की तरफ़ से, और ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की तरफ़ से, आपका शुक्रिया अदा करता हूँ। नमस्कार!

आपका भी बहुत धन्यवाद, नमस्कार!



आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी cine.paheli@yahoo.com पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए।  

प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



Sunday, March 22, 2015

ठुमरी पंजाब और लखनऊ की : SWARGOSHTHI – 211 : THUMARI


 
स्वरगोष्ठी – 211 में आज


भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : 9 : ठुमरी


‘छोड़ो छोड़ो कन्हाई नारी देखे सगरी...’





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की एक और नवीन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धान्तों के अनुकूल जो धाराएँ थीं उन्हें स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। पिछली कड़ी से हमने भारतीय संगीत की सर्वाधिक लोकप्रिय ‘ठुमरी’ शैली पर चर्चा शुरू की थी। इस शैली के अन्तर्गत पूरब अंग की ‘बोलबनाव’ और ‘बोलबाँट’ ठुमरियों के सोदाहरण परिचय प्रस्तुत किये थे। आज के अंक से हम ठुमरी के पंजाब अंग और कथक नृत्य में प्रयोग की जाने वाली ठुमरियों पर चर्चा करेंगे और उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ और पण्डित बिरजू महाराज की आवाज़ में दो ठुमरियाँ प्रस्तुत करेंगे। 



त्तर भारतीय संगीत में बोलबाँट की ‘पछाहीं ठुमरी’ और बोलबनाव की ‘पूरबी ठुमरी’ के बारे में पिछले अंक में हम चर्चा कर चुके हैं। इन दोनों शैलियों के अलावा ‘पंजाब अंग’ की ठुमरी भी आज लोकप्रिय है। विद्वानों का मत है की पंजाब में ठुमरी गायन की परम्परा बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में आरंभ हुई थी। सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित दिलीपचन्द्र बेदी के मतानुसार पंजाबी शैली की ठुमरी का आरम्भ कसूर, पटियाला के सुप्रसिद्ध गायक अली बख्श खाँ द्वारा किया गया था। उन्हें ठुमरी का ज्ञान लखनऊ कथक घराने के संस्थापक महाराज बिन्दादीन, उनके भाई महाराज कालिका प्रसाद और ठाकुर नवाब अली खाँ के माध्यम से हुआ। बाद में ‘पंजाब अंग’ की ठुमरी को प्रतिष्ठित करने वालों में गायक अली बख्श खाँ के दोनों सुपुत्रों, उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ और उस्ताद बरकत अली खाँ का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ को पंजाब अंग की ठुमरी गान शैली का आधार स्तम्भ माना जाता है। एक साक्षात्कार में उन्होने स्वयं स्वीकार किया है कि ‘पंजाब अंग’ की ठुमरी ‘पूरब अंग’ की ठुमरियों के आधार पर ही विकसित हुई है। खाँ साहब के अनुसार उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पंजाब के गवैयों ने ‘पूरब अंग’ की ठुमरियों को गाना शुरू किया था। आगे चल कर उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ और उनके भाई उस्ताद बरकत अली खाँ ने पंजाब के लोकधुनों का रंग और टप्पा शैली की छोटी-छोटी तानों के प्रयोग से ठुमरी के सजाया और द्रुत लय को महत्व दिया। ठीक उसी प्रकार जैसे बनारस पहुँच कर ठुमरी में पूर्वाञ्चल की लोकगायकी, कजरी, चैती आदि का रंग मिश्रित हुआ और यहाँ अधिकतर ठुमरी मध्य लय में गायी जाने लगी। पंजाब अंग की ठुमरियों के सिद्ध गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ की आवाज़ में अब हम आपके लिए इस शैली का एक उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। यह राग भिन्न षडज और कहरवा ताल में बँधी ठुमरी है, जिसके बोल हैं, ‘याद पिया की आए...’


ठुमरी पंजाब अंग : ‘याद पिया की आए...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ






‘स्वरगोष्ठी’ के पिछले अंक में हम यह चर्चा कर चुके हैं कि एक शैली के रूप में ठुमरी का विकास अवध के नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में हुआ था। नवाब संगीत और नृत्य के प्रेमी और संरक्षक ही नहीं बल्कि रचनाकार भी थे। ‘अख्तरपिया’ के उपनाम से उनकी ठुमरियाँ आज भी गायी जाती हैं। उन्हीं के दरबार में प्रसिद्ध गवैये उस्ताद सादिक़ अली खाँ और लखनऊ कथक घराने के संस्थापक महाराज बिन्दादीन को बहुत मान-सम्मान प्राप्त था। प्रयोग के आधार पर नवाब के दरबार में ही ठुमरी के दो प्रकार, ‘गानप्रधान’ और ‘नृत्यप्रधान’ ठुमरियों का विकास हुआ था। महाराज बिन्दादीन ‘नृत्यप्रधान’ ठुमरियों के प्रमुख स्तम्भ थे। नृत्य में बोलबाँट की ठुमरियों का प्रयोग किया जाता था। इन ठुमरियों पर नर्तक या नृत्यांगना द्वारा दो प्रकार से भावाभिव्यक्ति की जाती है। अधिकतर ठुमरियों में नर्तक या नृत्यांगना खड़े होकर पूरे आंगिक अभिनय के साथ नृत्य कराते हैं, जबकि बैठ कर अभिनयात्मक हावभाव के साथ ठुमरी प्रस्तुत करते हैं। दूसरे प्रकार की ठुमरी को ‘बैठकी की ठुमरी’ कहा जाता है। ऐसी ठुमरियों के प्रदर्शन में पण्डित शम्भू महाराज अद्वितीय थे। नृत्यप्रधान ठुमरियों में अधिकतर राधा-कृष्ण की लीलाओं का चित्रण होता है। इनमे भक्ति और श्रृंगार का भाव प्रबल होता है। इस प्रकार की ठुमरियों के उदाहरण के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, महाराज बिन्दादीन रचित, छेदछाड़ से युक्त लोकप्रिय ठुमरी। इस ठुमरी को लखनऊ कथक घराने के संवाहक और आधुनिक कथक के शीर्षस्थ कलासाधक पण्डित बिरजू महाराज ने स्वर दिया है। आप इस नृत्यप्रधान ठुमरी की रसानुभूति कीजिए और हमे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


नृत्यप्रधान ठुमरी : ‘छोड़ो छोड़ो कन्हाई नारी देखे सागरी...’ : पण्डित बिरजू महाराज






संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 211वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको पुरानी ठुमरी गायन शैली के उदाहरण का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 220 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश में किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

आप इन प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 28 मार्च, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 213वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 209वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में प्रस्तुत की गई ठुमरी का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका विदुषी गिरिजा देवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दीपचन्दी। इस बार की पहेली में पूछे गए प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ जारी है। श्रृंखला के आज के अंक से हमने आपसे ठुमरी के पंजाब अंग और कथक नृत्य में भाव-प्रदर्शन के लिए प्रयोग की जाने वाली ठुमरी गीतों पर चर्चा की। इस श्रृंखला में आप भी योगदान कर सकते हैं। भारतीय संगीत की किसी शैली पर अपना परिचयात्मक आलेख अपने नाम और परिचय के साथ हमारे ई-मेल पते पर भेज दें। आप अपनी फरमाइश या अपनी पसन्द का आडियो क्लिप भी हमें भेज सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति :कृष्णमोहन मिश्र 



Saturday, March 21, 2015

"देखने में भोला है दिल का सलोना" - चुरा लिया है तुमने जो 'धुन' को


एक गीत सौ कहानियाँ - 55
 

देखने में भोला है दिल का सलोना...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ, 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 55वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'बम्बई का बाबू' के मशहूर गीत "देखने में भोला है दिल का सलोना..." से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें। 


HMV कंपनी का पहला रिटेल स्टोर लंदन के ऑक्सफ़ोर्ड स्ट्रीट में जुलाई 1921 को खोला गया था। इसके पीछे सर एडवार्ड एल्गर का महत्वपूर्ण हाथ था, जो ग्रामोफ़ोन को गम्भीरता से लेने वाले पहले कम्पोज़र थे। इस स्टोर के खुलते ही ग्रामोफ़ोन और म्युज़िक इंडस्ट्री में जैसे एक क्रान्ति की लहर दौड़ गई। HMV दुनिया के विभिन्न देशों में घूम कर वहाँ के संगीत को रेकॉर्ड करते और फिर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड के माध्यम से सुधी श्रोताओं तक पहुँचाते। HMV और तमाम कंपनियाँ तवायफ़ों के कोठों पर जाकर या किसी शास्त्रीय या लोक गायक से गीत-संगीत रेकॉर्ड कर लाते। ऐसे ही एक संगीत साधक थे आन्ध्र प्रदेश के वल्लुरि जगन्नाद राव जिनके कुछ कम्पोज़िशन्स 1920 के दशक में HMV ने रेकॉर्ड किए थे। जगन्नाद राव एक संगीत शिक्षक भी थे जिनकी दो शिष्या सीता और अनसूया हुआ करती थीं। ये दो शिष्यायें आगे चलकर लोक गायिकाओं के रूप में प्रसिद्ध हुईं। 1950 की तेलुगू फ़िल्म 'श्री लक्ष्मम्मा कथा' में संगीतकार सी. आर. सुब्बुरमण ने एक कम्पोज़िशन का इस्तेमाल किया जिनके रचयिता के रूप में सीता और अनसूया को क्रेडिट दिया गया। दरअसल यह कम्पोज़िशन वल्लुरि जगन्नाद राव का कम्पोज़िशन था जो 1920 के दशक के एक ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर जारी भी हुआ था। ख़ैर, इस पर किसी का ध्यान उस समय नहीं गया। क्योंकि बहुत कम लोगों ने 1920 के दशक की वह रेकॉर्डिंग सुन रखी थी, इसलिए किसी को पता भी नहीं चल पाया कि सीता और अनसूया ने अपने शिक्षक की कम्पोज़िशन का इस्तेमाल अपने गीत में किया है। बात वहीं ख़तम हो गई।

पाँव वर्ष बाद, अर्थात् 1955 में टी. चाणक्य निर्मित एक तेलुगू फ़िल्म आई 'रोजुलु मरायी' जिसमें संगीतकार मास्टर वेणु ने अभिनेत्री वहीदा रहमान पर फ़िल्माये जाने के लिए एक नृत्य प्रधान गीत की रचना की। इस गीत के लिए उन्होंने सीता-अनसूया वाले उसी धुन का इस्तेमाल किया और इस बार गाना ज़बरदस्त हिट हुआ। कोसराजु राघवैया के लिखे और जिक्कि कृष्णावेणी के गाये "एरुवाका सगरोरन्नो चिन्नन्ना..." शीर्षक वाले इस गीत ने वहीदा रहमान के करीयर को गति प्रदान किया। आइए पहले यह गीत सुनते हैं।

तेलुगू फिल्म रोजुलु मरायी :  "एरुवाका सगरोरन्नो चिन्नन्ना..." : संगीत - मास्टर वेणु


फिल्म का यह गीत काफी हिट हुआ परन्तु संगीतकार मास्टर वेणु विवाद में घिर गए, धुन चुराने का इलज़ाम उन पर लगा। लोगों ने और संगीत समीक्षकों ने भले ही उनकी आलोचना की हो, पर वेणु कानूनी कार्यवाइयों से बच गए, उन पर कोई केस नहीं किया किसी ने। कुछ दिनों में मामला ठंडा पड़ गया। बात आई गई हो गई।

इस घटना को अभी एक साल भी नहीं बीता था कि अचानक एक ज्वालामुखी जाग उठा, जैसे किसी ने बुझती हुई अग्नि में घी डाल दिया हो। 1956 में इसी तेलुगू फ़िल्म का तमिल रीमेक बना 'कालम मारिपोचु' के शीर्षक से जिअमें जेमिनी गणेशन और अंजलि देवी मुख्य किरदारों में थे। फ़िल्म के सभी गीतों की धुनें तेलुगु वर्ज़न फ़िल्म की ही रखी गईं। इस तरह से "एरुवाका चिन्नन्ना" का तमिल वर्ज़न बना "येरु पुट्टि पोवाये"। तमिल फ़िल्म में भी इस गीत को वहीदा रहमान पर ही फ़िल्माया गया और ये दोनों गीत जिक्कि ने ही गाये।

तमिल फिल्म कालम मारिपोचु : "येरु पुट्टि पोवाये..." : गायक - जिक्कि


तमिल फ़िल्म में इस गीत के आते ही निर्माता लेच्चुमनन चेट्टियार ने अपनी 1956 की ही महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'मदुरई वीरन' के लिए इस धुन को उठा लिया और संगीतकार जी. रामनाथन ने इस धुन पर गीत कम्पोज़ कर डाला जिसके बोल थे "सुम्मा इरुंधाल सोथुक्कु नश्टम... थाणे थन्नन्ना"। डी. योगानन्द निर्देशित इस फ़िल्म में MGR यानी एम. जी. रामचन्द्रन, पी. भानुमती और पद्मिनी मुख्य भुमिकाओं में थे। यह एक बड़े बजट की फ़िल्म थी और फ़िल्म ज़बरदस्त हिट सिद्ध हुई और सभी सिनेमाघरों में इसने 100 दिन पूरे कर लिए। और यह प्रेरित गीत भी ख़ूब कामयाब रहा। पर अब कि बार धुन चुराने का यह मसला पहुँच गया अदालत की चौखट पर। 'श्री लक्ष्मम्मा कथा', 'रोजोलु मरायी' और 'कालम मारिपोचु' तो बच निकले थे पर 'मदुरई वीरन' के ख़िलाफ़ HMV ने कर दी केस कॉपीराइट ऐक्ट के तहत।

तमिल फिल्म मदुरई वीरन :  "सुम्मा इरुंधाल सोथुक्कु नश्टम..." : संगीत - जी. रामनाथन्


आन्ध्र की धुन पर पंजाबी वेशभूषा
हालाँकि HMV ने यह लॉसूट (lawsuit) तीनों के ख़िलाफ़ दर्ज करवाई, पर पत्रकार व फ़िल्म समीक्षक रंगा राव के अनुसार 'मदुरई वीरन' को ही टारगेट बनाया गया। अब इसके पीछे क्या कारण था बताना मुश्किल है। और इस मामले का फ़ैसला किसके हक़ में हुआ इसकी भी जानकारी उपलब्ध नहीं है। पर ऐसा प्रतीत होता है कि फ़ैसला 'मदुरई वीरन' के पक्ष में ही हुआ होगा, वरना 1960 की राज खोसला की हिन्दी फ़िल्म 'बम्बई का बाबू' में सचिनदेव बर्मन हू-ब-हू इसी धुन का इस्तेमाल नहीं करते। इसी धुन पर मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा गीत "देखने में भोला है दिल का सलोना, बम्बई से आया है बाबू चिन्नन्ना" जब आशा भोसले की आवाज़ में ढल कर बाज़ार में आई तो इसे भी लोगों ने हाथों हाथ ग्रहण किया, और समीक्षकों के कलम एक बार फिर से चल पड़े। तेलुगु गीत को क्रेडिट देते हुए मजरूह ने "चिन्नन्ना" शब्द को इस गीत में रखने का फ़ैसला लिया जिसका अर्थ है "छोटे बाबू"। गीत के निर्माण में सचिन दादा के सहायक के रूप में काम किया बेटे राहुल देव बर्मन ने। यह वह समय था जब लता सचिन दादा के लिए नहीं गा रही थीं। इसलिए दादा बर्मन उन दिनों अपने कम्प्ज़िशन्स आशा भोसले को ध्यान में रख कर बनाया करते थे। इस गीत में भी उन्होंने वही किया। एक और ख़ास बात इस गीत की कि धुन भले ही दक्षिण भारत का लिया गया हो, पर गीत का ऑरकेस्ट्रेशन पंजाबी ढंग का बनाया। दूसरे शब्दों में इसे हम फ़्युज़न कह सकते हैं। साज़ों का इस्तमाल भी इसी तरफ़ इशारा करते हैं। गीत में नायिका और सहेलियों के पोशाक भी पंजाबी स्टाइल के ही हैं। इस तरह से पंजाब और आन्ध्र प्रदेश की दूरी को दादा और बेटे बर्मन ने मिटाया। लीजिए अब आप एक ही धुन पर बना चौथा गीत भी सुन लीजिए।

हिन्दी फिल्म बम्बई का बाबू :  "देखने में भोला है दिल का सलोना...' : संगीत - सचिनदेव बर्मन




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Tuesday, March 17, 2015

अनुराग शर्मा की लघुकथा व्यवस्था

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में दीपक मशाल की लघुकथा "परछाईं" का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं अनुराग शर्मा लिखित लघुकथा व्यवस्था, जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

प्रस्तुत लघुकथा "व्यवस्था" का गद्य बर्ग वार्ता ब्लॉग पर पढ़ा जा सकता है। इस कहानी का कुल प्रसारण समय 4 मिनट 25 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।


हर इक ईंट में बसी है एक याद
मेरी ज़िंदगी गिरती दीवार सी है
 ~ अनुराग शर्मा

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"... और पढने की मेज़? राम, राम! हर आकार के बीसियों कागज़ जिनपर तरह-तरह के नोट्स लिखे हुए थे।”
 (अनुराग शर्मा की लघुकथा "व्यवस्था" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
व्यवस्था MP3

#Fifth Story, Vyavastha; Anurag Sharma; Hindi Audio Book/2015/05. Voice: Anurag Sharma

Sunday, March 15, 2015

रंग ठुमरी के : SWARGOSHTHI – 210 : THUMARI




 
स्वरगोष्ठी – 210 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : 8 : ठुमरी

‘रस के भरे तोरे नैन...’






‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की एक और नवीन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धान्तों के अनुकूल जो धाराएँ थीं उन्हें स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। पिछली कड़ी से हमने भारतीय संगीत की सर्वाधिक लोकप्रिय खयाल शैली के अन्तर्गत ‘चतुरंग’ गायकी का सोदाहरण परिचय प्रस्तुत किया था। आज के अंक से हम उपशास्त्रीय संगीत के अन्तर्गत ‘ठुमरी’ गीतों पर चर्चा करेंगे और भारतीय संगीत जगत की सुप्रसिद्ध गायिकाएँ विदुषी गिरिजा देवी और बेगम अख्तर की गायी ठुमरियाँ प्रस्तुत करेंगे। 


र्तमान में भारतीय संगीत की सर्वाधिक लोकप्रिय शैली ‘ठुमरी’ है। यह शैली कैशिकी वृत्ति की मानी जाती है। यह श्रृंगार रस प्रधान, कोमल भाव से युक्त, ललित रागबद्ध और भावपूर्ण गायकी है। अनेक प्राचीन ग्रन्थों में विभिन्न सामाजिक उत्सवों और मांगलिक अवसरों पर स्त्रियॉं द्वारा गायी जाने वाली कैशिकी वृत्ति के गीतों का उल्लेख मिलता है। भरत के नाट्यशास्त्र में भी यह उल्लेख है कि इस प्रकार के गीतों का प्रयोग नृत्य और नाट्य विधा में भावाभिव्यक्ति के लिए किया जाता था। आज भी कथक नृत्य में भाव प्रदर्शन के लिए ठुमरी गायन का प्रयोग किया जाता है। गीत के जिस प्रकार को आधुनिक ठुमरी के नाम से पहचाना जाता है उसका विकास नवाब वाजिद अली शाह के शासनकाल में हुआ। अवध के नवाब वाजिद अली शाह संगीत, नृत्य के प्रेमी और कला-संरक्षक के रूप में विख्यात थे। नवाब 1847 से 1856 तक अवध के शासक रहे। उनके शासनकाल में ही ठुमरी एक शैली के रूप में विकसित हुई थी। उन्हीं के प्रयासों से कथक नृत्य को एक अलग आयाम मिला और ठुमरी, कथक नृत्य का अभिन्न अंग बनी। नवाब ने 'कैसर' उपनाम से अनेक गद्य और पद्य की रचनाएँ भी की थी। इसके अलावा ‘अख्तर' उपनाम से दादरा, ख़याल, ग़ज़ल और ठुमरियों की भी रचना की थी। 7 फरवरी, 1856 को अंग्रेजों ने जब उन्हें सत्ता से बेदखल किया और बंगाल के मटियाबुर्ज नामक स्थान पर नज़रबन्द कर दिया तब उनका दर्द ठुमरी भैरवी –‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ में अभिव्यक्त हुआ। नवाब वाजिद अली शाह की यह ठुमरी इतनी लोकप्रिय हुई कि तत्कालीन और परवर्ती शायद ही कोई शास्त्रीय या उपशास्त्रीय गायक हो जिसने इस ठुमरी को न गाया हो।

उन्नीसवीं शताब्दी से बीसवीं शताब्दी के मध्य तक ठुमरी का विकास नृत्याभिनय और स्वतंत्र गायकी के रूप में हुआ। आरम्भिक काल से ही ठुमरी की दो धाराएँ स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। इसमें पहले प्रकार की ठुमरी नृत्य के साथ गायी जाने वाली ठुमरी है, जिसमें हावभाव और आंगिक अभिनय के तत्व प्रबल होते हैं। दूसरे प्राकार की ठुमरियों में बोलों की भावाभिव्यंजना, स्वर सन्निवेश और काकु का समन्वित प्रयोग होता है। इस प्रकार को ‘गानप्रधान ठुमरी’ कहा जा सकता है। गत्यात्मकता और भावावाभिव्यंजना के आधार पर भी ठुमरियों के दो भेद होते है। इन्हें क्रमशः ‘बोलबाँट की ठुमरी’ और ‘बोलबनाव की ठुमरी’ कहा जाता है। बोलबाँट की ठुमरी गतिप्रधान और बोलबनाव की ठुमरी भावप्रधान होती है। इस श्रृंखला में हम ठुमरी के इन प्रकारों पर आगे चल कर विस्तृत चर्चा करेंगे, परन्तु आज सबसे पहले हम आपको पूरब अंग की बोलबनाव की ठुमरी का एक उदाहरण सुनवाते हैं। राग भैरवी की यह ठुमरी दीपचंदी ताल में निबद्ध है और इसे प्रस्तुत कर रही हैं, विश्वविख्यात गायिका विदुषी गिरिजा देवी।



ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन साँवरिया...’ विदुषी गिरिजा देवी




उनीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में लखनऊ में बोलबाँट और बोलबनाव दोनों प्रकार की ठुमरियों का प्रचलन रहा है। परन्तु बोलबाँट ठुमरियों का प्रसार पश्चिमी उत्तर प्रदेश, ब्रज, दिल्ली आदि क्षेत्रों में अधिक हुआ। इसलिए इस प्रकार की ठुमरियों को ‘पछाहीं ठुमरी’ भी कहा जाने लगा। इसी प्रकार लखनऊ से पूर्व दिशा में अर्थात पूर्वी उत्तर प्रदेश, बनारस और बिहार के कुछ क्षेत्रों में ठुमरी की जो शैली विकसित हुई उसे ‘पूरब अंग की ठुमरी’ कहा जाने लगा। 1956 में अँग्रेजों द्वारा बन्दी बनाए जाने के बाद नवाब वाजिद अली शाह को बंगाल के मटियाबुर्ज नामक स्थान पर नज़रबन्द करने के बाद लखनऊ के कई संगीतज्ञ कोलकाता जाकर बस गए। इन्हीं संगीतज्ञों के माध्यम से बंगाल में भी ठुमरी का प्रचार-प्रसार हुआ।

अब हम आपको एक ऐसी अप्रतिम ठुमरी गायिका की गायी ठुमरी सुनवाते हैं, जिन्होने अपनी अपनी शैली का स्वयं निर्माण किया। उस अप्रतिम गायिका का नाम है, अख्तरी बाई फैजाबादी अर्थात बेगम अख्तर, जिनका जन्म 7 अक्तूबर, 1914 को उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद नामक शहर (तत्कालीन अवध) में एक कट्टर मुस्लिम परिवार में हुआ था। एक बार सुविख्यात सरोदवादक उस्ताद सखावत हुसेन खाँ के कानों में अख्तरी के गुनगुनाने की आवाज़ पड़ी। उन्होने परिवार में ऐलान कर दिया कि आगे चल कर यह नन्ही बच्ची असाधारण गायिका बनेगी, और देश-विदेश में अपना व परिवार का नाम रोशन करेगी। उस्ताद ने अख्तरी के माता-पिता से संगीत की तालीम दिलाने का आग्रह किया। पहले तो परिवार का कोई भी सदस्य इसके लिए राजी नहीं हुआ किन्तु अख्तरी की माँ ने सबको समझा-बुझा कर अन्ततः मना लिया। उस्ताद सखावत हुसेन ने अपने मित्र, पटियाला के प्रसिद्ध गायक उस्ताद अता मुहम्मद खाँ से अख्तरी को तालीम देने का आग्रह किया। वे मान गए और अख्तरी उस्ताद के पास भेज दी गईं। मात्र सात वर्ष की आयु में उन्हें उस्ताद के कठोर अनुशासन में रियाज़ करना पड़ा। तालीम के दिनों में ही उनका पहला रिकार्ड- ‘वह असीरे दम बला हूँ...’ बना और वे अख्तरी बाई फैजाबादी बन गईं। उस्ताद अता मुहम्मद खाँ के बाद उन्हें पटना के उस्ताद अहमद खाँ से रागों की विधिवत शिक्षा मिली। इसके अलावा बेगम अख्तर को उस्ताद अब्दुल वहीद खाँ और हारमोनियम वादन में सिद्ध उस्ताद गुलाम मुहम्मद खाँ का मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। बेगम अख्तर यद्यपि खयाल गायकी में अत्यंत कुशल थीं किन्तु उन्हें ठुमरी और गज़ल गायन में सर्वाधिक ख्याति मिली। बेगम अख्तर की गायकी में शुचिता थी और श्रोताओं के हृदय को छूने की क्षमता भी थी। अब हम आपके लिए बेगम अख्तर के स्वर में एक होरी ठुमरी प्रस्तुत करते हैं। होली के माहौल में आप यह ठुमरी सुनिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



होरी ठुमरी : ‘कैसी ये धूम मचाई...’ : बेगम अख्तर





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 210वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक महान गायक की आवाज़ में कण्ठ संगीत की रचना का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – प्रस्तुति के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम बताइए।

3 – इस रचना के गायक को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 21 मार्च, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 212वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 208वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको महान गायक पण्डित जसराज के स्वरों में प्रस्तुत चतुरंग का एक एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग श्याम कल्याण, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल द्रुत तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- पण्डित जसराज। इस बार पहेली के तीन में से दो प्रश्नों के सही उत्तर पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने और हैदराबाद से डी. हरिना माधवी ने तीनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये हैं। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का यह अंक हम पिछले रविवार को कुछ आपरिहार्य कारणों से नहीं प्रकाशित कर सके, जिसके लिए हमें खेद है। हम आपके इस प्रिय साप्ताहिक स्तम्भ का निर्बाध प्रकाशन करने का प्रयास करते हैं, किन्तु कभी-कभी तकनीकी व्यवधान के कारण हम ऐसा नहीं कर पाते। भविष्य में हम स्तम्भ की निरन्तरता का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आज के अंक से हम जारी श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ के अन्तर्गत ठुमरी गायकी पर चर्चा शुरू की है। आपको यह अंक कैसा लगा? हमें अवश्य लिखिएगा। अगले अंक में हम आपका परिचय ठुमरी के कुछ अन्य प्रकार कराएंगे। यदि आप भी संगीत के किसी भी विषय पर हिन्दी में लेखन की इच्छा रखते हैं तो हमसे सम्पर्क करें। हम आपकी प्रतिभा का सदुपयोग करेने। ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के आगामी अंकों में आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। आज बस इतना ही, अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Saturday, March 14, 2015

फ़िल्मों में क्रिकेट खिलाड़ी - वर्ल्ड कप स्पेशल


वर्ल्ड कप स्पेशल 
 

फ़िल्मों में क्रिकेट खिलाड़ी




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, आजकल क्रिकेट का बुखार हर छोटे-बड़े पर सवार है। विश्वकप क्रिकेट टूर्नामेण्ट, जो कि क्रिकेट का सबसे लोकप्रिय टूर्नामेण्ट होता है, इन दिनों खेला जा रहा है। और भारत की पाकिस्तान, दक्षिन अफ़्रीका, वेस्ट इंडीज़, आयरलैण्ड और संयुक्त अरब अमीरात पर शानदार जीत के बाद भारतीयों के लिए यह टूर्नामेण्ट अब और भी ज़्यादा रोचक और रोमांचक हो उठा है। यूं तो ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ साहित्य, संगीत और सिनेमा की पत्रिका है, पर क्रिकेट के इस बुखार से हम भी नहीं बच सके हैं। तो आइए टीम इण्डिया को विजय की शुभकामनाएँ देते हुए आज के इस विशेष प्रस्तुति में जाने कि भारत के किन किन क्रिकेट खिलाड़ियों ने फ़िल्म जगत में अपना हाथ आज़माया है। 



सिनेमा एक ऐसा माध्यम है जिससे हर कोई आकर्षित होता है। सिनेमा जहाँ एक तरफ़ आम दर्शकों को एक मायाबी संसार में ले जाता है, वहीं दूसरी ओर विभिन्न व्यावसायों के प्रसिद्ध लोग इस क्षेत्र में अपनी किस्मत आज़ामाने को तत्पर रहते हैं। खेल जगत की अगर बात करें तो क्रिकेट एक ऐसा खेल है जिसकी चमक फ़िल्म-जगत की चमक को काँटे का टक्कर देती आई है। फिर भी अनेक बार यह देखा गया है कि क्रिकेट खिलाड़ी फ़िल्मों की ओर आकृष्ट होकर इस क्षेत्र में अपनी किस्मत आज़माने पहुँचे हैं। शुरुआत करते हैं सुनिल गावस्कर से। टेस्ट क्रिकेट के इतिहास के सफल बल्लेबाज़ों में शुमार होता है गावस्कर का नाम। हमारे देश का गौरव हैं वो। क्रिकेट से सन्यास लेने के बाद पता नहीं उन्हें क्या सूझा कि वो चले आए फ़िल्मों की ओर। मराठी फ़िल्म ’सावली प्रेमाची’ में मुख्य किरदार उन्होंने निभाया, जो बुरी तरह से फ़्लॉप रही। इस फ़िल्म की असफलता से ना घबराते हुए गावस्कर ने एक बार फिर साहस जुटाया और इस बार नज़र आए हिन्दी फ़िल्म ’मालामाल’ में नसीरुद्दीन शाह के साथ। हालाँकि यह फ़िल्म उतनी बुरी तरीके से नहीं पिटी, पर सुनिल गावस्कर को यह अहसास ज़रूर हो गया कि अभिनय उनके बस की बात नहीं।

क्रिकेट खिलाड़ियों के फ़िल्मों में अभिनय करने का सिलसिला शुरू हुआ था आज से चार दशक पहले जब हार्ड-हिटिंग् बैट्समैन सलीम दुर्रानी ने परवीन बाबी के साथ बी. आर. इशारा निर्देशित फ़िल्म ’चरित्र’ में अभिनय किया था। ’अर्जुन पुरस्कार’ से सम्मानित होने वाले पहले क्रिकेटर सलीम दुर्रानी क्रिकेट के मैदान में जितने सफल थे, वही सफलता फ़िल्मों में उन्हें नहीं मिली। ’चरित्र’ के बुरी तरह फ़्लॉप होने पर उन्होंने दोबारा इस तरफ़ अपने क़दम नहीं रखे। स्टाइलिश मिज़ाज के बैट्समैन अजय जडेजा ने अपने क्रिकेट करीअर में बहुत सी कामयाबियाँ देखी, पर अपनी सफलता और शोहरत को वो काबू में ना रख सके और अज़हरुद्दीन और मनोज प्रभाकर के साथ मिल कर मैच-फ़िक्सिंग् में जुड़ कर अपने क्रिकेट करीअर का अन्त बुला लिया। जब पाँच वर्षों के लिए उन्हें क्रिकेट जगत से निष्कासित कर दिया गया, तो उन्होंने फ़िल्म-जगत का द्वार खटखटाया और बन गए अभिनेता फ़िल्म ’खेल’ में। सुनिल शेट्टी, सनी देओल और सेलिना जेटली इस फ़िल्म के अन्य मुख्य कलाकार थे। फ़िल्म बुरी तरह असफल रही। दुर्भाग्यवश अजय जडेजा ना तो फिर दोबारा किसी फ़िल्म में अभिनय कर पाये और ना ही क्रिकेट जगत में उनकी वापसी हो सकी। अब बस एक क्रिकेट समीक्षक और कमेन्टेटर के रूप में वो नज़र आते हैं। सचिन तेन्दुलकर के समसामयिक खिलाड़ियों में एक नाम है विनोद काम्बली का। उनका क्रिकेट करीअर सफल ज़रूर रहा पर अवधि कम ही रही। टेस्ट मैचों में दो दोहरे-शतक और दो शतक बनाने वाले विनोद काम्बली ने साल 2002 में संजय दत्त और सुनील शेट्टी के साथ फ़िल्म ’अनर्थ’ में नज़र आये, पर फ़िल्म के रिलीज़ होते ही उन्हें यह समझ आ गया कि ’अनर्थ’ करने का कोई अर्थ नहीं था। ऐसा सुना जाता है कि विनोद काम्बली के दोस्तों ने उन्हें यह चेतावनी दी थी कि यह क़दम मत उठाओ काम्बली, वरना अनर्थ हो जाएगा, पर काम्बली के सर पे हीरो बनने का भूत सवार हो चुका था। नतीजा जल्द ही उन्हें मिल गया।

एक क्रिकेटर जो क्रिकेट से ज़्यादा अभिनय जगत में नाम कमाया, वो हैं सलिल अंकोला।सुन्दर कद-काठी और ख़ूबसूरत चेहरे के धनी सलिल क्रिकेट में ज़्यादा कामयाब नहीं हुए। मुम्बई से ताल्लुक रखने वाले सलिल को भारत के लिए खेलने का मौका तो मिला पर केवल एक टेस्ट मैच में और चन्द एक दिवसीय मैचों में। उनका प्रदर्शन उस स्तर का नहीं था कि नैशनल टीम में उनकी जगह पक्की हो जाती। वो उतने फ़ॉर्म में भी नहीं थे और ना ही उनकी किस्मत ने उनका साथ दिया। इस बात को उन्होंने समझा और बजाय क्रिकेट में अपने आप को घसीटने के उन्होंने अभिनय जगत में क़दम रखने में अपनी भलाई समझी। हिन्दी की तीन फ़िल्मों में उन्होंने अभिनय किया, ये फ़िल्में थीं ’कुरुक्षेत्र’, ’पिता’ और ’चुरा लिया है तुमने’। ये तीनों फ़िल्में ठीक-ठाक चली, पर हिन्दी फ़िल्मों में नायक का जो रूप होता है उसमें फ़िट ना बैठने की वजह से उन्होंने फ़िल्मों को भी अलविदा कर दिया, और रुख़ किया छोटे परदे यानि टेलीविज़न की ओर। और इस बार किस्मत ने उनका पूरा-पूरा साथ दिया। उनके अभिनय से सजे ’करम अपना अपना’, ’कोरा कागज़’, ’नफ़रत’ और ’खाकी’ जैसे धारावाहिक बहुत लोकप्रिय हुए और सलिल अंकोला पहुँच गए घर-घर में।

वर्तमान लोकप्रिय क्रिकेटर युवराज सिंह के पिता योगराज सिंह जो ख़ुद एक ऑल-राउन्डर थे और जिन्होंने एक टेस्ट और छह एक दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय मैच खेले हैं, 70 और 80 के दशकों में पंजाबी फ़िल्मों से जुड़े। योगराज सिंह ने 30 से भी ज़्यादा पंजाबी तथा लगभग 10 हिन्दी फ़िल्मों में अभिनय किया है। हाल ही में फ़रहान अख़्तर की फ़िल्म ’भाग मिलखा भाग’ में उन्होंने मिलखा सिंह के कोच की भूमिका निभाई है। उनके अभिनय से सजी कुछ फ़िल्में हैं - बँटवारा, जट ते ज़मीन, जोर, जट दा, पगरी सम्भाल जट्टा, जिगरा जट दा, इंसाफ़ पंजाब दा, विछोरा, कब्ज़ा, पंचायत, वेस्ट इज़ वेस्ट, माहौल ठीक है, लव यू बॉबी, हीर ऐण्ड हीरो, रोमियो रांझा, बाज़ वगेरह। 80 के दशक में दो क्रिकेटर ऐसे थे जो एक ही फ़िल्म में बाक़ायदा अभिनय करते हुए नज़र आए। ये हैं संदीप पाटिल और सैयद किरमानी। संदीप जहाँ फ़िल्म के मुख्य नायक बनें, वहीं दूसरी ओर विकेट-कीपर किरमानी ने उसी फ़िल्म में खलनायक की भूमिका निभाई। फिल्म में किरमानी और संदीप पाटिल के बीच मारपीट का दृश्य भी था। यह फ़िल्म थी 1985 की ’कभी अजनबी थे’, जिसमें पूनम ढिल्लों और देबश्री रॉय अभिनेत्रियाँ थीं। यह फ़िल्म बुरी तरह से पिट गई, पर फ़िल्म के गीतों ने कमाल ज़रूर किया। फ़िल्म का शीर्षक गीत "कभी अजनबी थे ज़मीं आसमाँ ये, तेरा हाथ थामा जो हुए मेहरबाँ ये" बहुत लोकप्रिय हुआ था और कई वर्षों तक रेडियो के अनुरोध गीतों के कार्यक्रमों में बजता रहा। अन्य गीतों में "दिल की इस दहलीज़ तक", "गीत मेरे होठों को दे गया कोई" भी लोकप्रिय हुए थे और ये सभी कर्णप्रिय गीत हैं।

हिन्दी फ़िल्मों में बाक़ायदा नायक की भूमिका में अभिनय करने वाले क्रिकेटरों में एक नाम है पाक़िस्तानी क्रिकेटर मोहसिन ख़ान का। मशहूर शुरुआती बल्लेबाज़ मोहसिन ख़ान पाक़िस्तानी क्रिकेट के महत्वपूर्ण खिलाड़ियों में से एक रहे। पर अपने क्रिकेट करीअर की चोटी पर रहते समय ही मोहसिन आकृष्ट हुए फ़िल्मी दुनिया की चमक-दमक की ओर, और अपने क्रिकेट करीअर को दाँव पर लगा दिया। फ़िल्मों में उनका पदार्पण हुआ जे. पी. दत्ता की 1987 की फ़िल्म ’बँटवारा’ में। आगे चलकर 90 के दशक में उन्होंने कुछ और फ़िल्में की जैसे कि ’साथी’, ’फ़तेह’ और ’मैडम एक्स’। फ़िल्म ’साथी’ के गाने बहुत मशहूर थे जैसे कि "आज हम तुम ओ सनम मिल के यह वादा करे", "हुई आँख नम और यह दिल मुस्कुराया", पर फ़िल्म असफल ही रही। इन तमाम फ़िल्मों के ना चलने से मोहसिन ख़ान को भी कोई बड़ा मौका नसीब नहीं हुआ, और क्रिकेट के साथ साथ फ़िल्मों का सफ़र भी उनका समाप्त हो गया। अभिनेत्री रीना रॉय के साथ मोहसिन ख़ान का प्रेम-संबंध हुआ, दोनों ने विवाह कर लिया, पर दुर्भाग्यवश आगे चलकर दोनों अलग भी हो गए एक दूसरे से।

प्रसिद्ध गेंदबाज़ बिशन सिंह बेदी के पुत्र अंगद बेदी भी क्रिकेट के मैदान में उतरे, पर अपने पिता की तरह वो एक कामयाब क्रिकेटर नहीं बन सके। उन्होंने दिल्ली के लिए कई मैच खेले, पर राष्ट्रीय टीम में उनका सीलेक्शन कभी नहीं हो पाया। जब उन्हें यह लगा कि क्रिकेट में ऊँचे मकाम तक पहुँच पाना उनके लिए अब संभव नहीं, अंगद ने रुख़ किया मॉडेलिंग् की तरफ़। अच्छे कद-काठी और आकर्षक चेहरे के धनी अंगद को मॉडेलिंग् की दुनिया ने अपने पास बुला लिया। रैम्प शोज़ और कई विज्ञापनों में काम करने के बाद उन्हें टेलीविज़न में ब्रेक मिला ’कूक ना कहो’ और ’ईमोशनल अत्याचार’ जैसे लोकप्रिय शोज़ के होस्ट बनने का। फ़िल्मी परदे पर उनका पदार्पण हुआ फ़िल्म ’फ़ालतू’ में, जिसमें उनका अभिनय सराहा गया। हाल की फ़िल्म ’उंगली’ में भी अंगद अभिनय करते दिखे गए। आने वाले समय में अंगद और फ़िल्मों में नज़र आएँगे और अपने अभिनय का जादू चलाएँगे ऐसी उम्मीद की जा सकती है।

अंगद बेदी की तरह एक और क्रिकेटर जो रणजी क्रिकेट में उत्तर प्रदेश के लिए कई मैच खेले, पर आगे चलकर मॉडलिंग् और अभिनय की दुनिया से जुड़ गए, वो हैं सजिल खण्डेलवाल। सजिल के पिता चाहते थे कि वो एक बहुत बड़ा क्रिकेटर बने। सजिल उसी राह पर चल भी निकले थे और क्रिकेट में कामयाबी की सीढ़ियाँ चढ़ते भी जा रहे थे। पर उनके पिता की आकस्मिक मृत्यु हो जाने पर सजिल का मन क्रिकेट से भर गया। उनके पिता के चले जाने के बाद जैसे वो सारा प्रोत्साहन ही ख़त्म हो गया, और क्रिकेट के प्रति उनका लगाव भी यकायक ख़त्म हो गया। मॉडेलिंग जगत में सजिल ने बहुत काम किया है और उनके अभिनय से सजी एक फ़िल्म भी बनी है ’Confessions of a Rapist' जो सेन्सर बोर्ड के सर्टिफ़िकेशन की अपेक्षा कर रही है। सजिल खण्डेलवाल से विस्तारित बातचीत ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मासिक स्तम्भ ’बातों बातों में’ में कुछ महीने पहले प्रकाशित हुई थी जिसे आप यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

और अब ज़िक्र कुछ ऐसे क्रिकेटरों और उनकी फ़िल्मों की जिनमें वो किसी अन्य चरित्र को नहीं बल्कि अपने आप के रूप में नज़र आए, यानी कि 'as self'। विश्वकप विजयी कप्तान कपिल देव भी कई बार फ़िल्मों में नज़र आये हैं, पर औरों की तरह वो फ़िल्मी चरित्र के रूप में ना आकर अपनी ख़ुद की भूमिका, अर्थात् कपिल देव की भूमिका में ही रूपहले परदे पर उतरे। ’Stumped', 'इक़बाल’, ’आर्यन’, ’चेन कुली कि मेन कुली’ जैसी फ़िल्मों में कपिल देव दिखे गए। राहुल बोस अभिनीत ’चेन कुली कि मेन कुली’ में तो कहानी का अधिकांश भाग कपिल देव की प्रसिद्ध वर्ल्ड-कप विनिंग् बैट के इर्द-गिर्द घूमती है। साजिद नडियाडवाला की फ़िल्म ’मुझसे शादी करोगी’ के क्लाइमैक्स शॉट में कपिल देव और नवजोत सिंह सिद्धु सहित कई भारतीय क्रिकेटर नज़र आए जैसे कि इरफ़ान पठान, हरभजन सिंह, पार्थिव पटेल, मोहम्मद कैफ़, जवगल श्रीनाथ और आशिष नेहरा। हरमन बवेजा अभिनीत फ़िल्म ’विक्ट्री’ में आर. पी. सिंह, प्रवीण कुमार, दिनेश कार्तिक तो नज़र आए ही, साथ में कई ऑस्ट्रेलियन क्रिकेटर भी दिखे जैसे कि ब्रेट ली, ब्रैड हॉग, स्टुआर्ट क्लार्क, सायमन कैटिच।





खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

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