Sunday, January 19, 2014

पण्डित पलुस्कर और तुलसी के राम

  
स्वरगोष्ठी – 151 में आज

रागों में भक्तिरस – 19

राम की बाललीला के चितेरे तुलसीदास को पलुस्कर जी ने गाया 

‘ठुमक चलत रामचन्द्र बाजत पैजनिया...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की उन्नीसवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और कुछ प्रमुख भक्त कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस भक्ति रचना के फिल्म में किये गए प्रयोग भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की पिछली कड़ी में हमने आपको सोलहवीं शताब्दी के कृष्णभक्त कवि सूरदास के एक लोकप्रिय पद- ‘मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो...’ पर सांगीतिक चर्चा की थी। यह पद कृष्ण की माखन चोरी लीला का वात्सल्य भाव से अभिसिंचित है। इसी क्रम में आज की कड़ी में हम राम की बाललीला का आनन्द लेंगे। गोस्वामी तुलसीदास अपने राम को ठुमक कर चलते हुए और पैजनी की मधुर ध्वनि बिखेरते हुए देखते हैं। तुलसीदास के इस पद को भारतीय संगीत के अनेकानेक शीर्षस्थ कलासाधकों स्वर दिया है। परन्तु ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हम आपको यह पद पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर, भजन गायक पुरुषोत्तमदास जलोटा और लता मंगेशकर की आवाज़ों में प्रस्तुत कर रहे हैं। 

 



सोलहवीं शताब्दी के भक्त कवियों में गोस्वामी तुलसीदास शीर्ष स्थान पर विराजमान हैं। आधुनिक काल में सूरदास और तुलसीदास का मूल्यांकन सूर्य और चन्द्र की उपमा से किया जाता है। तुलसीदास की जन्मतिथि और उनके जन्मस्थान के बारे में कई मत हैं। परन्तु एक प्रचलित धारणा के अनुसार उनका जन्म संवत 1554 को वर्तमान उत्तर प्रदेश के बाँदा जनपद के राजापुर नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी था। इनके गुरु बाबा नरहरिदास (नृसिंहदास) थे, जिन्होंने इन्हें दीक्षा दी। इनका अधिकाँश जीवन चित्रकूट, काशी और अयोध्या में बीता। संवत 1631 में अपने अयोध्या प्रवास के दौरान तुलसीदास ने रामचरितमानस का सृजन आरम्भ किया। अभी अरण्य काण्ड की रचना भी न हो पाई थी कि वैष्णवों से विवाद होने के कारण अयोध्या छोड़ कर काशी जाकर निवास करना पड़ा। तुलसीदास श्रीसम्प्रदाय के आचार्य रामानन्द की शिष्य परम्परा में थे। उन्होंने सामाजिक स्थितियों को देखते हुए लोकभाषा में 'रामचरितमानस' की रचना की। उनके साहित्य में वर्णाश्रमधर्म, अवतारवाद, साकार उपासना, सगुणवाद, गो-ब्राह्मण रक्षा, देवादि विविध योनियों का यथोचित सम्मान एवं प्राचीन संस्कृति और वेदमार्ग का मण्डन और साथ ही उस समय के धार्मिक अत्याचारों और सामाजिक दोषों की एवं पन्थवाद की आलोचना भी की है। गोस्वामीजी पन्थ व सम्प्रदाय चलाने के विरोधी थे। उन्होंने भ्रातृप्रेम, स्वराज्य के सिद्धान्त, रामराज्य का आदर्श, अत्याचारों से बचने और शत्रु पर विजयी होने का निदान भी प्रस्तुत किया है। तत्कालीन परिवेश की समस्त शंकाओं का रामचरितमानस में उत्तर है। अकेले इस ग्रन्थ को लेकर यदि गोस्वामी तुलसीदास चाहते तो अपना अत्यन्त विशाल और शक्तिशाली सम्प्रदाय चला सकते थे। परन्तु उन्होने ऐसा नहीं किया। यह एक सौभाग्य की बात है कि आज यही एक ग्रन्थ है, जो साम्प्रदायिकता की सीमाओं को लाँघ कर सारे देश में व्यापक और सभी मत-मतान्तरों को पूर्णतया मान्य है। सबको एक सूत्र में बाँधने का जो कार्य शंकराचार्य ने किया था वही अपने युग में तुलसीदास की प्रवृत्ति साम्प्रदायिक न थी। उनके ग्रन्थों में अद्वैत और विशिष्टाद्वैत का सुन्दर समन्वय उपस्थित है। इसी प्रकार वैष्णव, शैव, शाक्त आदि साम्प्रदायिक भावनाओं और पूजापद्धतियों का समन्वय भी उनकी रचनाओं में पाया जाता है। वे आदर्श समुच्चयवादी सन्त कवि थे। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हम आपको गोस्वामी तुलसीदास का एक पद, जो उनके आराध्य श्रीराम की बाललीला पर केन्द्रित है, सुनवाएँगे। यह पद इस प्रकार है-

ठुमक चलत रामचन्द्र बाजत पैंजनियाँ।

किलकि किलकि उठत धाय, गिरत भूमि लटपटाय,

धाय मातु गोद लेत दशरथ की रानियाँ।

अंचल रज अंग झारि, विविध भाँति सो दुलारि,

तन मन धन वारि वारि कहत मृदु बचनियाँ।

विद्रुम से अरुण अधर, बोलत मुख मधुर मधुर,

सुभग नासिका में चारु, लटकत लटकनियाँ।

तुलसीदास अति आनन्द, देख कर मुखारविन्द,

रघुवर छबि के समान रघुवर छबि बनियाँ।

ठुमक चलत रामचन्द्र, बाजत पैंजनियाँ।

आइए, सबसे पहले गोस्वामी तुलसीदास का यह पद सुप्रसिद्ध गायक पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर जी (डी.वी. पलुस्कर) के स्वरों में सुनते हैं। इस पद के भाव, गायक पलुस्कर जी और प्रस्तुति में मौजूद राग पीलू की चर्चा हम यह पद सुनने के बाद करेंगे।



तुलसी भजन : ‘ठुमक चलत रामचन्द्र बाजत पैंजनियाँ...’ : पण्डित डी.वी. पलुस्कर





तुलसीदास के मानस में श्रीराम मर्यादापुरुषोत्तम के रूप में विराजमान थे। इसीलिए सूरदास के कृष्ण की भाँति श्रृंगार और चंचल भावों को उन्होने विस्तार नहीं दिया है। रामचरितमानस में भी श्रीराम की बाललीलाओं के प्रसंग संक्षिप्त ही हैं। रामचरितमानस के दोहा संख्या 190 में रामजन्म का प्रसंग है। इसके उपरान्त दोहा संख्या 191 के बाद अत्यन्त प्रचलित छन्द- ‘भए प्रगट कृपाला...’ में माता कौशल्या ‘कीजै शिशुलीला...’ का अनुरोध करतीं हैं। यहाँ से लेकर दोहा संख्या 203 तक गोस्वामी जी ने राम सहित चारो भाइयों के विभिन्न संस्कारों का उल्लेख किया है। बाल सुलभ क्रीडा का जितना मोहक चित्रण तुलसीदास ने इस पद में किया है, वैसा अन्यत्र नहीं मिलता।

इस पद का पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर ने भावपूर्ण गायन प्रस्तुत कर अपने पिता पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर की संगीत परम्परा को आगे बढ़ाया है। पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने भक्त कवियों की कृतियों को सरल रागों में बाँध कर समाज में शास्त्रीय संगीत को ग्राह्य और सर्वसुलभ बनाया था। तुलसीदास का यह पद पलुस्कर जी ने चंचल, श्रृंगार और नटखट भाव की सृष्टि करने वाले राग पीलू के स्वरों में प्रस्तुत किया था। इस पद के लिए यह धुन इतनी लोकप्रिय हुई कि परवर्ती प्रायः सभी गायकों ने इसी धुन का अनुसरण किया। राग पीलू काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। यह ठुमरी अंग का संकीर्ण राग है। रग भैरवी की तरह रसानुभूति के लिए और रचना के भाव को सम्प्रेषित करने के लिए सभी 12 स्वरों का प्रयोग भी किया जा सकता है। इस राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। गोस्वामी तुलसीदास का यही पद अब हम आपको दो प्रमुख कलासाधकों से सुनवाते हैं। पहले प्रस्तुत है, चर्चित भजन गायक पुरुषोत्तमदास जलोटा की आवाज़ में। पुरुषोत्तमदास जी आज के लोकप्रिय भजन गायक अनूप जलोटा के पिता हैं। यह भजन उन्होने कीर्तन शैली में राग मिश्र पीलू के स्वर के साथ गाया है। इसके बाद आप स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर की आवाज़ में यही भजन सुनेंगे। इनकी गायकी में अधिकतर पलुस्कर जी के स्वर-समूह को स्वीकार किया गया है। आप तुलसीदास के इस पद के रस-भाव की अनुभूति कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



तुलसी भजन : ‘ठुमक चलत रामचन्द्र बाजत पैंजनियाँ...’ : पुरुषोत्तमदास जलोटा

 




तुलसी भजन : ‘ठुमक चलत रामचन्द्र बाजत पैंजनियाँ...’ : लता मंगेशकर






आजकी पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 151वीं संगीत पहेली में हम आपको गायन और सितार वादन की जुगलबन्दी के अन्तर्गत एक बेहद लोकप्रिय भजन का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 160वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस रचना में किस राग की झलक है?

2 – यह किस जनप्रिय भजन की धुन है? भजन की केवल आरम्भिक पंक्ति लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 153वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 149वीं संगीत पहेली में हमने आपको सूरदास के एक पद का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग काफी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- एम.एस. शुभलक्ष्मी। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी, चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह और बड़ोदरा, गुजरात से हमारे एक नए प्रतिभागी गोविन्द नामदेव ने दिया है। हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी का एक ही उत्तर सही है। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।



अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ हमने 20 कड़ियों में प्रस्तुत करने का लक्ष्य निर्धारित किया था। यह इस श्रृंखला की उन्नीसवीं कड़ी थी। आज की कड़ी में हमने आपसे गोस्वामी तुलसीदास के वात्सल्य भाव से परिपूर्ण एक पद का रसास्वादन कराया। अगले अंक में आप एक और भक्तकवि की एक भक्ति-रचना का रसास्वादन करेंगे जिसके माध्यम से अनेक शीर्षस्थ कलासाधकों ने रागों का आधार लेकर भक्तिरस को सम्प्रेषित किया है। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। आप हमें एक नई श्रृंखला के विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

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