Sunday, September 15, 2013

स्वरगोष्ठी – 137 में आज : ‘मन रे हरि के गुण गा...’


 
स्वरगोष्ठी – 137 में आज

रागों में भक्तिरस – 5

ध्रुवपद अंग में राग भैरव का रंग


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीत-रसिकों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला के आज के अंक में हम आपसे राग भैरव पर चर्चा करेंगे जो भक्तिरस की सृष्टि करने में सबसे उपयुक्त राग है। भारतीय संगीत के इस प्राचीनतम राग में आज हम आपको एक ध्रुवपद रचना सुनवाएँगे। साथ ही इस राग पर आधारित, 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘मुसाफिर’ से एक मधुर भक्तिगीत प्रस्तुत करेंगे। 


स श्रृंखला के पिछले अंकों में हम यह चर्चा कर चुके हैं कि वर्तमान भारतीय संगीत की परम्परा वैदिक काल से जुड़ी है। उस काल के उपलब्ध प्रमाणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि तत्कालीन संगीत का स्वरूप धर्म और आध्यात्म से प्रभावित था। वैदिक युग के बाद भारतीय संगीत का अगला पड़ाव पौराणिक युग में होता है। इस युग में जनसामान्य का झुकाव शास्त्रगत संगीत की अपेक्षा लोक-गीत और नृत्य की ओर अधिक हुआ। इस प्रवृत्ति को और अधिक स्पष्ट करते हुए हैलीन कॉफमैन ने ‘दी म्यूजिक ऑफ आर्य’ नामक पुस्तक में लिखा है कि पौराणिक युग में लोक-गीत और लोक-नृत्यों का सर्वाधिक विकास हुआ था। इन विधाओं में स्थानीय रुचियों का पूरा ध्यान रखा जाता था। इस युग में लिखे ‘हरिवंश पुराण’ में नृत्य और मार्कण्डेय पुराण, वायु पुराण तथा वृहद्धर्म पुराण में वाद्य संगीत का विस्तृत उल्लेख मिलता है। जैन साहित्य में उल्लेख है कि इस युग में वीणा का सर्वाधिक प्रचार हुआ। वीणा के विविध प्रकार- परिवादिनी, विपंची, बल्लकी, महती, नकुली, कच्छपी आदि लोकप्रिय थे।

आज हम आपसे राग भैरव की चर्चा करेंगे। प्राचीन ग्रन्थों में भैरव को प्रथम राग माना गया है। ऐसी मान्यता है कि इस राग का सृजन स्वयं भगवान शिव ने किया था। यह प्रातःकालीन राग है, अर्थात सूर्योदय के पश्चात इस के गायन-वादन की परम्परा है। आजकल अधिकतर संगीत सभाओं और गोष्ठियों का आयोजन आम तौर पर सायंकाल या रात्रि में किया जाता है। इस कारण राग भैरव सुनने का अवसर कम मिलता है। सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति के राग भैरव में ऋषभ और धैवत स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। कुछ विद्वानो के अनुसार प्राचीन काल में भैरव में शुद्ध निषाद (वर्तमान स्वरूप) के स्थान पर कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता था। राग के अवरोह में वक्रगति का प्रयोग किया जाता है। राग भैरव में जोगिया की तरह शुद्ध मध्यम पर ठहराव नहीं दिया जाता। राग कलिंगड़ा इससे मिलता-जुलता राग है। आइए, अब हम आपको राग भैरव के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाते है।

आज हम आपको 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘मुसाफिर’ से राग भैरव पर आधारित एक गीत लता मंगेशकर के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं। यह कीर्तन शैली का भक्ति गीत है, जिसके संगीतकार सलिल चौधरी थे। राग भैरव को आधार बना कर सलिल चौधरी ने फिल्म ‘जागते रहो’ में भी एक आकर्षक गीत- ‘जागो मोहन प्यारे...’ तैयार किया था, जो आज भी लोकप्रिय है। यह गीत हम कई अवसरों पर ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ से प्रस्तुत कर चुके है। आज उन्हीं सुरीले संगीतकार का राग भैरव पर आधारित यह दूसरा गीत सुनिए। इस गीत में बंगाल के लोकप्रिय ताल वाद्य ‘खोल’ का प्रयोग कहरवा ताल में किया गया है। गीत में आपको एकाध स्थान पर राग जोगिया का स्पर्श भी परलक्षित होगा, किन्तु गीत का ढाँचा राग भैरव के स्वरों में है। इस गीत से जुड़े दो तथ्य भी उल्लेखनीय हैं। आगामी 28 सितम्बर को कोकिलकंठी गायिका लता मंगेशकर का जन्मदिन है। भक्तिरस से पगे उनके इस गीत के माध्यम से हम उन्हें शुभकामनाएँ अर्पित करते हैं। इसके साथ ही फिल्म ‘मुसाफिर’ सुप्रसिद्ध फिल्म निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की प्रथम निर्देशित फिल्म थी। आगामी 30 सितम्बर को उनकी 91वीं जयन्ती है। इस गीत के माध्यम से हम उस महान फ़िल्मकार की स्मृतियों को नमन करते हैं। लीजिए, आप यह गीत सुनिए।



राग भैरव : ‘मन रे हरि के गुण गा...’ : लता मंगेशकर : फिल्म मुसाफिर




वर्तमान में भारतीय संगीत की जितनी भी शैलियाँ प्रचलित हैं, उनमें ध्रुपद अथवा ध्रुवपद शैली सबसे प्राचीन है। प्राचीन ग्रन्थों में प्रबन्ध गीत शैली का उल्लेख मिलता है। ध्रुवपद या ध्रुपद का जनक इसी प्रबन्ध गीत को माना जाता है। ध्रुवपद शैली की विशिष्ट पद रचना और गायन पद्यति का विकास ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर के काल (1468-1516 ई.) में उन्हीं के प्रयासों से हुआ था। वे मध्ययुगीन पद शैली के प्रवर्तक भी माने जाते हैं। राजा मानसिंह स्वयं एक संगीतज्ञ थे, इसलिए उनके द्वारा प्रवर्तित शैली में परम्परा की उपेक्षा नहीं की गई थी। उन्होने प्राचीन शास्त्र को ही आधार मान कर ध्रुवपद शैली का विकास किया था। आगे चल कर ध्रुवपद शैली चार भिन्न बानी (वाणी), गौरहार, डागर, खण्डहार और नौहार बानी के नाम से विकसित हुई। आज के अंक में हम आपके लिए डागरबानी के अन्तर्गत राग भैरव का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। डागर परिवार के सुविख्यात साधक उस्ताद सईदुद्दीन डागर के स्वरों में सुनिए, राग भैरव में निबद्ध ध्रुवपद। सूल ताल में पखावज संगति उद्धवराव आपेगाँवकर ने किया है। आप राग भैरव में यह ध्रुवपद सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



राग भैरव : ‘मध आली मध अन्त शिव आली...’ : उस्ताद सईदुद्दीन डागर





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 137वीं संगीत पहेली में हम आपको एक भक्तिरस प्रधान खयाल रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 140वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह किस राग में निबद्ध है?

2 – यह खयाल रचना किस ताल में प्रस्तुत की गई है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 139वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 135वीं संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित जसराज के स्वरों में प्रस्तुत एक स्तुतिगीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग दरबारी कान्हड़ा और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक पण्डित जसराज। इस अंक के दोनों प्रश्नो के उत्तर एक लम्बे अन्तराल के बाद मिन्नेसोटा, U.S.A से दिनेश कृष्णजोइस, हमारे नियमित प्रतिभागी जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, जबलपुर की क्षिति तिवारी और लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’, जिसके अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपको राग भैरव की चर्चा करते हुए इस राग की दो रचनाओं का रसास्वादन कराया। अगले अंक में हम आपको एक कम प्रचलित राग में गूँथी रचनाएँ सुनवाएँगे जिनमें भक्ति और श्रृंगार, दोनों रसों की रचनाएँ प्रस्तुत की जाती हैं। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र
 

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