Monday, June 3, 2013

राम संपथ सफल रहे 'फुकरों' संग एक बार फिर कुछ नया करने में

ताज़ा  सुर ताल - फुकरे

मित त्रिवेदी की ही तरह राम सम्पंथ भी एक और ऐसे संगीतकार जिनके काम से हमेशा ही नयेपन की उम्मीद रहती है. राम की नयी एल्बम है फिल्म फुकरे  का संगीत. आईये आज की इस महफ़िल में चर्चा करें इसी एल्बम की. यहाँ गीतकार हैं विपुल विग और मुन्ना धिमान. गौरतलब है कि विपुल फिल्म के स्क्रीन लेखक भी हैं. 

शीर्षक गीत की रफ़्तार, राम के रचे डी के बॉस  जैसी है, यहाँ भी भूत  है जो लँगोटी लेके भाग  रहा है, पर शाब्दिक रूप से गीत का फ्लेवर काफी अलग है. एक नए गायक अमजद भगडवा की ताज़ी ताज़ी आवाज़ में है ये गीत और शीर्षक गीत अनुरूप पर्याप्त मसाला है गीत में. अमजद की आवाज़ प्रभावी है. 

क्लिंटन सेरेजो की दमदार आवाज़ में है अगला गीत रब्बा, जो शुरू तो होता है बड़े ही नर्मो नाज़ुक अंदाज़ में होता है जिसके बाद गीत का रंग ढंग पूरी तरह से बदल जाता है, शब्द बेहद ही खूबसूरत है, और संगीत संयोजन में विविधता भरपूर है जिससे श्रोता पूरे समय गीत से जुड़ा ही रहता है 

संगीत  संयोजन की यही विविधता ही अगले गीत जुगाड  की भी शान है, जहाँ धुन कव्वाली नुमा है और बेहद सरल है. जुबान पर चढ़ने में सहज है और तीन अंतरे का ये गीत भी पूरे समय श्रोताओं की दिलचस्पी बरकरार रखता है. शब्द एकदम सामयिक हैं, वास्तव में यही आज की तस्वीर भी है, बेहद सरल शब्दों में गीतकार बहुत कुछ कह गए हैं यहाँ. जुगाड  के इस काल में ये गीत किसी एंथम से कम नहीं है. और हाँ गायक के रूप में कैलाश खेर से बेहतर चुनाव और कौन हो सकता था, कीर्ति सगाथिया ने भी उनका अच्छा साथ निभाया है.

आंकड़ों की बात की जाए तो मिका  सिंह का कोई तोड़ नहीं है, शायद ही उनका कोई गीत कम चर्चित रह जाता होगा. अगले गीत में मिका के साथ हैं खुद राम सम्पंथ और तरन्नुम मलिक. बेडा  पार  नाम के इस गीत में भी राम ने विविधता से सजाया है, पर गीत उतना प्रभावी नहीं बन पाया. गीत का कैच भी उतना जबरदस्त नहीं है जितना उपरोक्त दो गीतों में था. 

लग  गयी लॉटरी  एक और मजेदार गीत हैं, राम संपथ और तरन्नुम मालिक के युगल स्वरों में ये गीत अपनी सरल धुन के चलते जुबाँ पे चढ़ने लायक है. गीत बहुत लंबा नहीं है इसलिए विविधताओं के अभाव में भी गीत बढ़िया लगता है. 

राम संपथ की एल्बम हो और सोना महापात्रा की आवाज़ में कोई गीत न हो कैसे संभव है ? अम्बर सरिया  (अमृतसर के मुंडे ) को संबोधित ये गीत बेहद मधुर है. हालाँकि धुन कुछ कुछ हिमेश के रचे नमस्ते  लन्दन  के रफ्ता रफ्ता  गीत से काफी हद तक मिलती जुलती है पर फिर भी सोना ने इसे एक अलग ही रूप दे डाला है. मुन्ना धिमान के पंजाबी जुबान की चाशनी में डूबे शब्द इसकी मधुरता में जरूरी इजाफा करते हैं.  एल्बम का सबसे बढ़िया गीत है ये और राम के बहतरीन गीतों में से निश्चित ही एक.

हमारी राय में एल्बम के बहतरीन गीत -

जुगाड, रब्बा , और अम्बर सरिया 

हमारी रेटिंग - ३.७ / ५  

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी

आवाज़ - अमित तिवारी

 

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1 comment:

Vijay Vyas said...

शीर्षक गीत के नए गायक अमजद भगडवा बीकानेर (राजस्‍थान) के हैं। इनके पिता व चाचा 'अली-गनी' स्‍थानीय स्‍तर पर लोकप्रिय संगीतकार है। सोनी टीवी पर पूर्व में प्रसारित कार्यक्रम 'वार परिवार' में भी यह परिवार सिरकत कर चुका है। आभार ।

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