Thursday, May 31, 2012

आकाशवाणी के राष्ट्रीय प्रसारण में प्लेबैक इंडिया की चर्चा

दोस्तों, नमस्कार अभी हाल ही में अकस्मिक रूप से मेरी मुलाकात आकाशवाणी के राष्ट्रीय प्रसारण सेवा में Assistant Director (Prog), श्री वी के सामब्याल से हुई. मैंने बातों ही बातों में उनसे अपने ऑनलाइन रेडियो प्लेबैक इंडिया का भी जिक्र कर दिया. मेरा उद्देश्य मात्र इतना ही था कि रेडियो के इतने बड़े पद पर कार्यरत  सामब्याल जी हमारे प्रयासों को देखें और अपने विचार देकर हमारा मागदर्शन करें. पर दोस्तों उस वक्त मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब अगले दिन ही उन्होंने मुझे फोन कर स्टूडियो आमंत्रित किया और एक साक्षात्कार का निमंत्रण दे डाला. बहरहाल लगभग दो हफ्ते पहले ये साक्षात्कार रिकॉर्ड हुआ, उद्घोषिका तानिया घोष से हुई मेरी ये बातचीत कल शाम ऑल इंडिया रेडियो के राष्ट्रीय प्रसारण सेवा से ७.४५ मिनट पर "मुलाकात" नाम के एक कार्यक्रम के माध्यम से प्रसारित हुआ. मेरे कुछ मित्रों ने इसे सुना और बधाईयां भेजी, कुछ तकनिकी कारणों से नहीं सुन पाए, जिनमें से मैं खुद और मेरा परिवार भी शामिल है. पर मैं फिर एक बार सामब्याल जी का धन्येवाद कहूँगा कि उन्होंने मुझे इस कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग भेजी, जिसे मैं आप सब के साथ शेयर कर रहा हूँ. सामब्याल जी से एक संक्षित मुलाक़ात के बाद ये जान पाया हूँ, कि कला और संगीत का सम्मान करने वाले और कम चर्चित प्रतिभाओं का मान करने वाले शीर्ष अधिकारी आज भी हमारे सिस्टम में मौजूद हैं. एक बार फिर उनका तहे दिल से आभार.

आप इस साक्षात्कार नीचे दिए गए किसी भी प्लयेर से सुन सकते हैं, इसमें आपके इस प्रिय जाल स्थल रेडियो प्लेबैक के उदेश्यों, लक्ष्यों और भविष्य की योजनाओं की चर्चा हुई है, सुनकर बताएं कैसा रही ये वार्ता  

Wednesday, May 30, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (1) -इश्क्जादे और बंद कमरा

संगीत समीक्षा 
अल्बम - इश्क्जादे 
संगीत - अमित त्रिवेदी






पुस्तक चर्चा 
पुस्तक - बंद कमरा 
मूल लेखिका - सरोजिनी साहू
अनुवाद - दिनेश माली 






आपकी बात - अमित तिवारी के साथ 




Monday, May 28, 2012

सिने-पहेली # 22 (जीतिये 5000 रुपये के इनाम)


सिने-पहेली # 22 (28 मई, 2012) 


नमस्कार दोस्तों, 'सिने पहेली' की २२-वीं कड़ी लेकर मैं, सुजॉय चटर्जी, हाज़िर हूँ। जीवन में बहुत अधिक व्यस्तता की वजह से पिछले दिनों मैं आप सब से दूर रहा, 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ भी प्रस्तुत नहीं कर पाया, जिसका मुझे बहुत अफ़सोस है। आशा करता हूँ कि जून के महीने से फिर सक्रीय हो जाऊँगा। मैं कृष्णमोहन मिश्र जी का आभारी हूँ कि समय-समय पर उनके सहयोग की वजह से 'सिने पहेली' में कभी रुकावट नहीं आई। पिछले सप्ताह 'सिने पहेली' में हमारे साथ दो नए प्रतियोगी जुड़े हैं - एक हैं न्यू जर्सी, यू.एस.ए से आनन्द अकेला और दूसरे हैं हैदराबाद से सागर चन्द नाहर। आप दोनों का बहुत बहुत स्वागत है और आपको यह सुझाव देना चाहूंगा कि अगर महाविजेता बनने का आप सपना देखते हैं तो बिना कोई एपिसोड मिस किए इस प्रतियोगिता में भाग लेते रहिए, आप ज़रूर बन सकते हैं महाविजेता।

दोस्तों, आज 'सिने पहेली' में मैं आपके लिए एक नई चुनौती लेकर आया हूँ। पाँच सवालों का सिलसिला तो बहुत हो गया, क्यों न आज की कड़ी में कुछ अलग हट के किया जाए। वर्ग पहेली के बारे में क्या ख़याल है? जी हाँ, आज मैं आपके लिए एक फ़िल्मी वर्ग पहेली लेकर आया हूँ। मुझे उम्मीद है कि इसका भी आप भरपूर आनद लेंगे। ये रही आज की वर्ग पहेली। 





आज की पहेली में आप पाँच नहीं, दस नहीं, बल्कि पूरे 24 अंक आप कमा सकते हैं। इस वर्ग पहेली के सूत्र ये रहे...

ऊपर से नीचे:


1. महबूब, महबूबा, प्रेमी, प्रेमिका के लिए प्रयोग में लाया जाने वाला शब्द जिसका फ़िल्मी गीतों में अक्सर प्रयोग हुआ है। इस शीर्षक से ९० के दशक में फ़िल्म भी बनी थी।

2. पाँव का पर्यायवाची शब्द, जिसका प्रयोग बप्पी लाहिड़ी स्वरबद्ध एक गीत के मुखड़े में हुआ है और इस मुखड़े की पहली पंक्ति एक मीरा भजन से ली गई है।

3. अमोल पालेकर, उत्पल दत्त अभिनीत एक हास्य फ़िल्म जिसमें सुषमा श्रेष्ठ ने एक गीत गाया था।

4. लता-शब्बीर के गाये एक बारिश वाले गीत के मुखड़े का तीसरा शब्द।

5. यूं तो यह शराब, भंग, अफ़ीम से होता है, पर कभी-कभी प्यार से भी हो जाता है; आमिर ख़ान पर फ़िल्माये एक मशहूर गीत के मुखड़े का पहला शब्द।

8. इस शीर्षक से कम से कम दो फ़िल्में बनी हैं। ५० के दशक की फ़िल्म में लता-हेमन्त का गाया एक गीत है जो "गगन" शब्द से शुरू होता है।

10. कुमार सानू और अलकाअ याज्ञ्निक का गाया तथा शाहरुख़ ख़ान व काजोल पर फ़िल्माया एक गीत के मुखड़े का पहला शब्द। गीत में बहुत से बच्चे भी दिखते हैं।

11. जसपाल सिंह के गाये एक गीत के मुखड़े का पहला शब्द; इसी शीर्षक से एक फ़िल्म भी है जिसमें लता-रफ़ी का गाया एक युगल गीत है जिसमें भीगे मौसम का ज़िक्र है।

12. अमिताब बच्चन अभिनीत एक "मशहूर" फ़िल्म।

15. शेखर कपूर की यादगार फ़िल्म जिसके एक गीत में अरबी घोड़े का ज़िक्र है।

16. सलमन ख़ान अभिनीत फ़िल्म जिसमें नायिका गूंगी है।

17. तीन शब्दों वाले फ़िल्म का पहला शब्द; इस फ़िल्म में इसके गीतकार ने लता मंगेशकर के साथ एक गीत भी गाया था।

20. चैन का पर्यायवाची जिसका फ़िल्मी गीतों में ख़ूब प्रयोग होता रहा है।


बायें से दायें:


1. एक संगीतकार जोड़ी; एक की उपाधि है सेनगुप्ता और दूसरे की बक्शी।

6..राजेश खन्ना की एक फ़िल्म के शीर्षक का दूसरा शब्द।

7. गंगा के साथ अक्सर इसका उल्लेख आता है।

9. राज कपूर की शुरुआती फ़िल्मों में एक; शमशाद बेगम का गाया एक कोयल वाला गीत भी है इस फ़िल्म में।

11. राज कपूर और रणधीत कपूर ने इस फ़िल्म में अभिनय किया है, संगीत राहुल देव बर्मन का है।

13. रणधीर कपूर, हेमा मालिनी अभिनीत एक तीन शब्दों वाली फ़िल्म के शीर्षक के पहले दो शब्द।

14. अक्षय कुमार की फ़िल्म, जिसका शीर्षक एक मुहावरा भी है।

17. जंगल में ----- नाचा।

18. शर्मीला टैगोर - संजीव कुमार अभिनीत मशहूर फ़िल्म जिसमें संगीत मदन मोहन का है

19. रोशन द्वारा स्वरबद्ध एक फ़िल्म; यह एक किस्म का पेड़ भी है। 

21. सैफ़ अली ख़न व प्रीति ज़िंटा अभिनीत एक मशहूर फ़िल्म की शीर्षक का पहला शब्द।

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और अब ये रहे इस प्रतियोगिता में भाग लेने के कुछ आसान से नियम....

१. जवाब भेजने के लिए आपको करना होगा एक ई-मेल cine.paheli@yahoo.com के ईमेल पते पर। 'टिप्पणी' में जवाब न कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे।

२. ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 22" अवश्य लिखें, और जवाबों के नीचे अपना नाम व स्थान लिखें।

३. आपका ईमेल हमें शुक्रवार 1 जून तक मिल जाने चाहिए।

४. आप अपने जवाब एक ही ईमेल में लिखें। किसी प्रतियोगी का पहला ईमेल ही मान्य होगा। इसलिए सारे जवाब प्राप्त हो जाने के बाद ही अपना ईमेल भेजें।

है न बेहद आसान! तो अब देर किस बात की, लगाइए अपने दिमाग़ पे ज़ोर और जल्द से जल्द लिख भेजिए अपने जवाब। जैसा कि हमने शुरु में ही कहा है कि हर सप्ताह हम सही जवाब भेजने वालों के नाम घोषित किया करेंगे, और पचासवे अंक के बाद "महाविजेता" का नाम घोषित किया जाएगा। 

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और अब २१ मई को पूछे गए 'सिने-पहेली # 21' के सवालों के सही जवाब---

1. पहले सवाल का गीत है फ़िल्म 'नई उमर की नई फ़सल' फ़िल्म का गीत "कारवाँ गुज़र गया ग़ुबार देखते रहे"। पूरा मुखड़ा है - स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग के बबूल से, और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे, कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

2. 'चित्र-पहेली' का सही जवाब है अभिनेता मोतीलाल, यह फ़िल्म 'जागते रहो' का दृश्य है।

3. इस प्रश्न का सही जवाब है फ़िल्म 'स्वदेस' के इस गीत में उदित नारायण के अलावा जिन दो बालकलाकारों की आवाज़ें हैं, वो हैं मास्टर बिग्नेश और बेबी पूजा। 

4. 'कौन हूँ मैं' का सही जवाब है संगीतकार पन्नालाल घोष।

5. 'गीत अपना धुन पराई' में जो विदेशी गीत "When Johny comes marching home" सुनवाया था, उससे उससे प्रेरित हिंदी गीत है फ़िल्म 'बातों बातों में' का "न बोले तुम न मैंने कुछ कहा"।

और अब 'सिने पहेली # 21' के विजेताओं के नाम ये रहे -----



1. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- 5 अंक



2. रीतेश खरे, मुंबई --- 5 अंक



3. सलमन ख़ान, अलीगढ़ --- 5 अंक 

4. क्षिति तिवारी, इंदौर --- 5 अंक

5. आनन्द अकेला, न्यू जर्सी, यू.एस.ए --- 5 अंक

6. शुभ्रा शर्मा, नयी दिल्ली --- 5 अंक

7. पंकज मुकेश, बेंगलुरू --- 5 अंक

8. शरद तैलंग, कोटा --- 4 अंक

9. गौतम केवलिया, बीकानेर --- 4 अंक

10. सागर चंद नाहर, हैदराबाद -- 3 अंक

11. अमित चावला, दिल्ली --- 3 अंक


सभी विजेताओं को हार्दिक बधाई। अंक सम्बंधित अगर आपको किसी तरह की कोई शिकायत हो, तो cine.paheli@yahoo.com के पते पर हमें अवश्य सूचित करें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी १००% सम्भावना है महाविजेता बनने की। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, और अनुमति दीजिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को, नमस्कार!

Sunday, May 27, 2012

दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर : ९२वें जन्मदिवस पर स्मरण

स्वरगोष्ठी – ७२ में आज - ‘रघुपति राघव राजाराम...’ 


वह संगीत, जिससे महात्मा गाँधी ने भी प्रेरणा ग्रहण की थी 

भारतीय संगीत को जनसामान्य में प्रतिष्ठित स्थान दिलाने में जिन शिखर-पुरुषों का आज हम स्मरण करते हैं, उनमें एक नाम पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर का है। मात्र ३४ वर्ष की आयु में ही उन्होने भारतीय संगीत के कोश को समृद्ध कर इस नश्वर जगत से विदा ले लिया था। कल २८ मई को इस महान संगीतज्ञ ९२वीं जयन्ती है। इस अवसर पर रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से श्रद्धेय पलुस्कर जी की स्मृतियों को सादर नमन है।  

‘स्वरगोष्ठी’ के एक नये अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज हम एक ऐसे संगीतज्ञ के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आपसे चर्चा करेंगे, जिन्होने अपने छोटे से जीवन-काल में भारतीय संगीत को असाधारण रूप से समृद्ध किया। आज हम चर्चा कर रहे हैं, पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर, जिनका जन्म २८ मई, १९२१ को नासिक, महाराष्ट्र में, भारतीय संगीत के उद्धारक पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर की बारहवीं सन्तान के रूप में हुआ था। भारतीय संगीत के इस अनूठे साधक को ‘बापूराव’ और ‘डी वी’ उपाख्य से भी पहचाना जाता है।

उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों में भारतीय संगीत-जगत के दो विष्णु- पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे और सन्त संगीतज्ञ पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर, अपने-अपने ढंग से संगीत को घरानों और दरबारी बन्धन से मुक्त कराने और संगीत-शिक्षा को सर्वसुलभ कराने के प्रयत्न में संलग्न थे। बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों में इन प्रयत्नों का प्रतिफल भी परिलक्षित हो रहा था। ऐसे ही परिवेश में बापूराव का जन्म हुआ था। उनके जीवन का पहला दशक नासिक में ही व्यतीत हुआ था। ६ वर्ष की आयु में बालक बापूराव का यज्ञोपवीत संस्कार हुआ और उसी आयु से पिता विष्णु दिगम्बर जी ने संगीत-शिक्षा का शुभारम्भ कर दिया। अभी बापूराव की आयु मात्र १० वर्ष की थी, कि विष्णु दिगम्बर जी का निधन हो गया। बापूराव की आगे की संगीत-शिक्षा उनके बड़े चचेरे भाई चिन्तामणि राव और विष्णु दिगम्बर जी के दो शिष्यों- पण्डित विनायक राव पटवर्द्धन तथा पण्डित नारायण राव व्यास द्वारा सम्पन्न हुई। मात्र २० वर्ष की आयु में ही भारतीय संगीत के नभ पर छा जाने वाले बापूराव बीसवीं शताब्दी के एकमात्र संगीतज्ञ हुए। आइए, पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर के स्वरों में राग श्री की एक मोहक रचना का रसास्वादन करते है-

राग श्री : ‘हरि के चरण कमल...’ : पण्डित दत्तात्रेय विष्णु (डी.वी.) पलुस्कर



राग श्री की इस रचना के रिकार्ड किये जाने की कहानी भी अत्यन्त रोचक है। १९५५ में दत्तात्रेय को चीन यात्रा पर जाना था। जाने से पहले एक रिकार्डिंग कम्पनी के आग्रह पर उन्होने राग श्री के विस्तृत संस्करण का रिकार्ड बनाने की योजना बनाई थी। चीन जाने से पहले स्टुडियो में उन्होने एक पूर्वाभ्यास किया था। योजना थी कि यात्रा से वापस आने पर इसे अन्तिम रूप दिया जाता। अगस्त, १९५५ में वे चीन यात्रा से लौटे और लगभग दो मास तक इन्सेफेलाइटिस रोग से ग्रसित रहने के बाद २५ अक्तूबर, को उनका निधन हो गया। इस प्रकार राग श्री के प्रस्तावित रिकार्ड को अन्तिम रूप देने में व्यवधान हुआ। बाद में उनकी पूर्वाभ्यास की रेकार्डिंग को ही श्री जी.एन. जोशी ने सम्पादित कर अन्तिम रूप दिया। इस प्रसंग की जानकारी कानपुर के वरिष्ठ संगीतज्ञ डॉ. गंगाधरराव तैलंग से प्राप्त हुई।

बापूराव के गायन का रेडियो पर पहला प्रसारण १९३८ में हुआ था। इसके बाद उन्हें देश के लगभग प्रत्येक केन्द्रों से श्रृंखलाबद्ध रूप से आमंत्रित किया गया। रेडियो प्रसारण के कारण तत्कालीन अविभाज्य भारत में राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान बनी। यूँ तो भारत में ग्रामोफोन रिकार्ड बनाने वाली कम्पनियों ने बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में ही दस्तक दे दी थी, किन्तु उन दिनों केवल लोकप्रिय संगीत के रिकार्ड बनाने का चलन था। बापूराव ने तत्कालीन ७८ आर.पी.एम. के रिकार्ड की अवधि को ध्यान में रख कर विभिन्न रागों की रचनाओं का संक्षिप्त रूप तैयार किया। ग्रामोफोन कम्पनी ने १९४४ में उनका पहला रिकार्ड जारी किया। जनसामान्य ने इस रिकार्ड को खूब पसन्द किया। इसके बाद तो विभिन्न रागों और राग आधारित भजनों के रिकार्ड का ऐसा सिलसिला चला कि उनके निधन के बाद तक जारी रहा। आइए, अब हम आपको पण्डित पलुस्कर के स्वर में राग तिलक कामोद, तीनताल में निबद्ध एक मधुर रचना सुनवाते हैं।

राग तिलक कामोद : ‘कोयलिया बोले अमवा की डार...’ : स्वर - पण्डित डी.वी. पलुस्कर



१९५२ में एक फिल्म बनी थी- बैजू बावरा, जिसमें फिल्म के कथानक के अनुसार अकबर के दरबार में तानसेन और बैजू के बीच एक सांगीतिक मुक़ाबला का प्रसंग फिल्माया जाना था। फिल्म के संगीतकार नौशाद अली ने इस युगल गीत के लिए पण्डित पलुस्कर जी और उस्ताद अमीर खाँ को आमंत्रित किया। पूरा प्रसंग समझाने के बाद नौशाद ने दोनों दिग्गजों को पूरी स्वतन्त्रता दे दी। फिल्म के इस प्रसंग में तानसेन (अभिनेता सुरेन्द्र) के लिए उस्ताद अमीर खाँ ने और बैजू (भारत भूषण) के लिए पण्डित पलुस्कर ने स्वर प्रदान किया था। मात्र पाँच मिनट दस सेकेंड की इस रिकार्डिंग में दोनों संगीत-साधकों ने राग देशी का जैसा स्वरूप उपस्थित किया, उससे समूचा फिल्म-जगत चकित रह गया। गीत का आरम्भ थोड़े विलम्बित लय में ‘तुम्हरे गुण गाऊँ...’ से होता है। कुछ क्षण के बाद द्रुत लय, तीनताल में- ‘आज गावत मन मेरो झूम के...’ के माध्यम से जैसी जुगलबन्दी इस गीत में की गई है, उससे यह ऐतिहासिक महत्त्व का गीत बन गया। लीजिए, आप भी सुनिए वह ऐतिहासिक गीत-

फिल्म – बैजू बावरा : ‘आज गावत मन मेरो...’ : पं. डी.वी. पलुस्कर और उस्ताद अमीर खाँ



तुलसी, मीरा, सूर, कबीर आदि भक्त कवियों की रचनाओं को विभिन्न रागों में निबद्ध कर ग्रामोफोन रिकार्ड के माध्यम से पण्डित जी, जन-जन के बीच लोकप्रिय हो ही चुके थे। फिल्म ‘बैजू बावरा’ के प्रदर्शन के बाद पण्डित डी.वी. पलुस्कर की प्रतिभा की सुगन्ध फिल्म-जगत में भी फैली। फिल्म ‘बैजू बावरा’ के बाद पलुस्कर जी के गायन का उपयोग एक बांग्ला फिल्म ‘शापमोचन’ में भी किया गया था। इस फिल्म में उत्तम कुमार नायक थे और संगीतकार हेमन्त कुमार थे। राग बहार की एक बन्दिश- ‘कलियन संग करता रंगरेलियाँ...’ का इस फिल्म में प्रयोग किया गया था। फिल्म के प्रसंग के अनुसार एक जमींदार की महफिल में युवा गायक पर गीत फिल्माया गया था। लीजिए, बांग्ला फिल्म ‘शापमोचन’ में प्रयुक्त राग बहार की यह बन्दिश-

बांग्ला फिल्म – शापमोचन : ‘कलियन संग करता रंगरेलियाँ...’ : पण्डित डी.वी. पलुस्कर



हम आरम्भ में ही यह चर्चा कर चुके हैं कि पण्डित डी.वी. पलुस्कर, भारतीय संगीत के उद्धारक और युगप्रवर्तक पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर के संस्कार-वाहक पुत्र थे। उनके पिता ने अपने समय में भारतीय संगीत के शास्त्रोक्त किन्तु सरल, भक्ति-रस की चाशनी में पगे स्वरूप को जन-जन तक सुलभ कराया तो पुत्र ने भी अपने ढंग से उस परम्परा को आगे बढ़ाया। विष्णु दिगम्बर जी, संगीत-शिक्षण के लिए गन्धर्व महाविद्यालयों की स्थापना कराने, देश के कोने-कोने में संगीत सम्मेलनों का आयोजन कराने के साथ ही कांग्रेस के अधिवेशनों में भी सम्मिलित हुआ करते थे। वे राजनैतिक मंचों से भी संगीत के माध्यम से जन-जागृति का अलख जगाते थे। ऐसे ही एक अवसर पर महात्मा गाँधी ने विष्णु दिगम्बर जी से जब –‘रघुपति राघव राजाराम...’ सुना तो वे इस पद की पंक्तियों से अत्यन्त प्रभावित हुए और इसे अपनी दैनिक प्रार्थना में सम्मिलित कर लिया। गाँधी जी ने स्वयं स्वीकार किया था कि इस पद को सुनने से उन्हें अपार आत्मिक शक्ति प्राप्त होती है। कीर्तन शैली में प्रस्तुत इस भक्तिपद को पण्डित डी.वी. पलुस्कर ने अपना स्वर देकर इसकी लोकप्रियता में और भी वृद्धि की थी। ग्रामोफोन कम्पनी ने इस कीर्तन का भी एक रिकार्ड जारी किया था। इसी कीर्तन के साथ ही आज के अंक से मुझे यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।

कीर्तन : ‘रघुपति राघव राजा राम...’ : पण्डित डी.वी. पलुस्कर



आज की पहेली

आज की ‘संगीत-पहेली’ में हम आपको सुनवा रहे हैं, पाश्चात्य संगीत की एक वाद्यवृन्द (आर्केस्ट्रा) रचना का एक अंश। यह किसी पश्चिमी संगीतकार की रचना नहीं, बल्कि भारतीय संगीतकार की रचना है, जिन्हें वाद्यवृन्द संचालक (कंडक्टर), संयोजक (अरेंजर) और संगीतकार (कम्पोजर) के रूप में विश्व स्तर पर मान्यता मिली थी। देश-विदेश के अनेक पुरस्कारों से सम्मानित इस कलाकार को भारत में पद्मभूषण और पद्मविभूषण सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। पाश्चात्य वाद्यवृन्द (आर्केस्ट्रा) का अंश सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के ८०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक-श्रोता हमारी तीसरी श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।



१ – पाश्चात्य संगीत के इस वाद्यवृन्द (आर्केस्ट्रा) संचालक (कंडक्टर), संयोजक (अरेंजर) और संगीतकार (कम्पोजर) को पहचानिए और हमें इनका नाम बताइए।

२ – पाश्चात्य संगीत के इस कलाकार की कई संगीत-रचनाओं में एक विश्वविख्यात भारतीय तंत्रवाद्य-वादक ने भी योगदान किया है। आप उस महान तंत्रवाद्य-वादक का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ७४वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

पिछली पहेली के उत्तर

‘स्वरगोष्ठी’ के ७०वें अंक की पहेली में हमने आपको उस्ताद शाहिद परवेज़ द्वारा सितार पर बजाया राग सोहनी का एक अंश सुनवाया था और आपसे दो प्रश्न पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग सोहनी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गीत ‘प्रेम जोगन बन के...’। इस बार की पहेली का उत्तर एकमात्र प्रतिभागी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने ही दिया है। प्रकाश जी ने राग के नाम को सही नहीं पहचाना, किन्तु सितार के स्वरों को सुन कर जिस फिल्मी गीत ('कुहू कुहू बोले कोयलिया...’) की पहचान की है, आश्चर्यजनक रूप से इस गीत का आरम्भिक हिस्सा राग सोहनी पर ही आधारित है। प्रकाश जी के दोनों उत्तर गलत होने के बावजूद हम उन्हें एक अंक बतौर बोनस, प्रदान कर रहे हैं।

पहेली श्रृंखला के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ६१वें से लेकर ७०वें अंक तक की श्रृंखला में १६ अंक अर्जित कर जबलपुर की क्षिति तिवारी एक बार पुनः श्रृंखला की विजेता बन गईं हैं। उन्होने दस में से आठ पहेलियों में भाग लिया और सभी प्रश्नों के सही उत्तर दिये। १५ अंक अर्जित कर बैंगलुरु के पंकज मुकेश ने दूसरा स्थान प्राप्त किया। पंकज जी ने भी आठ पहेलियों में भाग लिया, किन्तु ६५वें अंक की पहेली में उनका एक उत्तर गलत हो गया था। ९ अंक पाकर पटना की अर्चना टण्डन ने तीसरा और ८ अंक पाकर मीरजापुर (उत्तर प्रदेश) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने चौथा स्थान प्राप्त किया है। आप सबको 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ का अगला अंक पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत पर केन्द्रित होगा। पाश्चात्य संगीत के एक भारतीय कलाकार ऐसे हुए, जिन्होने पूरे विश्व को अपनी संगीत प्रस्तुतियों से सम्मोहित किया है। कई राष्ट्रों ने उन्हें अपने देश की नागरिकता प्रदान कर सम्मानित भी किया है। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित अपनी इस गोष्ठी में हम इन्हीं कलाकार के विषय में चर्चा करेंगे। आप अवश्य पधारिएगा।
  
कृष्णमोहन मिश्र


“मैंने देखी पहली फिल्म” : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता

दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूर्ण करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव swargoshthi@gmail.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा “मैंने देखी पहली फिल्म”। सर्वश्रेष्ठ 3 आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कार-स्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव, प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 31 अक्टूबर 2012 है।  

Friday, May 25, 2012

"सत्य" कड़वा, संगीत मधुर - सिंड्रेला

आपने देखा उनके जीवन का सत्य, हम सुनायेंगें उनके ह्रदय का संगीत
दोस्तों, आपने इन्हें देखा, आमिर खान के लोकप्रिय टी वी शो "सत्यमेव जयते" में. शो का वो एपिसोड सिन्ड्रेला प्रकाश के व्यक्तिगत जीवन पर अधिक केंद्रित था, पर कहीं न कहीं एक झलक हमें सुनाई दी, उनकी ऊर्जा से भरी, और उम्मीद को रोशनी से संवरी आवाज़ की. तो हमने सोचा कि क्यों न उनके इस पक्ष से हम अपने श्रोताओं को परिचित करवायें. एक संक्षिप बातचीत के जरिये हम जानेगें सिन्ड्रेला के गायन और संगीत के बारे में, साथ ही सुनेंगें उनके गाये हुए कुछ गीत भी....

देखिये सिंड्रेला का एपिसोड सत्यमेव जयते पर

सजीव - सिन्ड्रेला, आपका बहुत बहुत स्वागत है रेडियो प्लेबैक इंडिया पर...

सिंड्रेला - शुक्रिया सजीव

सजीव - बात शुरुआत से करते हैं, संगीत से जुड़ाव कैसे हुआ ?

सिंड्रेला - संगीत परमेश्वर का दिया हुआ तोहफा है. मैं बचपन से ही गाती हूँ, मम्मी ने मुझे वोकल और वोइलिन की शिक्षा दिलवाई. इसके बाद मैंने गिटार भी सीखा, मेरा पूरा परिवार संगीत से जुड़ा हुआ है. पापा और मम्मी दोनों गाते थे. भाई पियानो में रूचि रखता है. संगीत से भी ज्यादा हम येशु से प्यार करते हैं, बस संगीत के माध्यम से उस प्यार को दर्शाते हैं.

सजीव - अच्छा तो गाते गाते कब ये महसूस हुआ कि अब आपको अपनी खुद की अल्बम कट करनी चाहिए ?

सिंड्रेला -  ५ साल की उम्र से ही मैं चर्च में तो कहीं कन्वेंशन या गोस्पल मीटिंग आदि में गाती रही हूँ. पर वास्तव में मैं जीसस के अलावा और किसी के लिए नहीं गा सकती हूँ. मैंने आजतक येशु के अलावा किसी और के लिए एक गाना भी नहीं लिखा है. बचपन से गाने के कारण बड़ी इच्छा थी कि एक अल्बम कट करूँ और प्रभु की कृपा से मेरा पहला अल्बम २०११ में बाहर आया...ठीक महफूज़ गीत के बनने के २ साल बाद....

सजीव - तो क्यों न यहाँ हम आपका पहला गीत "महफूज़" सुनते चलें....जो व्यक्तिगत रूप से भी मुझे बहुत अधिक पसंद है...

सिंड्रेला - जी जरूर

गीत - महफूज़ - गायिका - सिंड्रेला Song - Mahfooz / Singer - Cindrella Prakash


सजीव - दोस्तों हम आपको बता दें कि जिस प्रकार भक्ति गीतों की भजन संध्याएं होती है उसी प्रकार ईसा मसीह यानी प्रभु येशु (जीसस) की स्तुति में गाये जाने वाले गीतों को गोस्पल कहा जाता है और सिंड्रेला सोफ्ट रोक गोस्पल गीत गातीं हैं... सिंड्रेला ये बताएं कि येशु मसीह के प्रति आकर्षण तो स्वाभाविक था क्योंकि आप एक क्रिशचन परिवार में पली बढ़ी...मगर क्या यही इस आकर्षण की वजह थी या कोई और भी अनुभव रहा आपके जीवन में ?

सिंड्रेला - जब हम किसी से प्यार करते हैं तब कोई न कोई काम सिर्फ और सिर्फ उसी के लिए करना चाहते हैं, ठीक उसी वजह से मैं अपने जीसस के लिए गीत लिखना और गाना चाहती हूँ, सिर्फ उन्हीं के लिए. एक जीसस लविंग परिवार में पैदा हुई इसलिए बचपन से बाईबल पढते हुए बड़ी हुई हूँ. मेरी मम्मी ११ साल तक बीमार थी. हम लोग दिन भर मम्मी को अपनी मुश्किलों से लोहा लेते हुए देखते थे. ये सिर्फ येशु का अनुग्रह है कि मम्मी ११ साल तक जी भी पायी. उनके दोनों किडनियाँ नाकाम हो चुकी थी. जीसस के प्रति मेरा स्नेह बचपन की है. उनका मुस्कुराता चेहरा हमेशा आँखों के सामने रहता है. क्या किसी ऐसे इश्वर से प्रेम करना मुश्किल है जिसने हमसे इतना प्यार किया कि अपना जीवन ही हमें दे दिया. यही एहसास मुझे क्रोस (सलीब) की तरफ खीच लाया.

सजीव - वाह, यानी कि ये आपका पक्का फैसला है कि आप सिर्फ और सिर्फ गोस्पल ही गाना चाहती हैं ?

सिंड्रेला - जी हाँ, मैं सिर्फ और सिर्फ अपने येशु के लिए ही लिखना और गाना चाहती हूँ...

सजीव - चलिए एक विराम और लेते हैं आपके गीत "सुकून" को सुनकर

गीत - सुकून, गायन - सिंड्रेला Song - Sukoon / Singer - Cindrella Prakash


सजीव - सिंड्रेला, आपने महफूज़ गाने का एक विडियो भी बनाया. कैसे संभव हो पाया ये सब, और प्रोडक्शन, वितरण आदि आप कैसे कर पायीं ?

सिंड्रेला - जी मेरे ऐसे बहुत से दोस्त हैं जिन्होंने मेरे गानों के द्वारा आशीष पाया है. उन्होंने ही विडियो बनाया और अपलोड किया. महफूज़ की २००० प्रतियाँ बनी थी जो ३ महीने में भी खतम भी हो गयी. मेरी दूसरी अल्बम "महफूज़ वाणी" की ३००० प्रतियाँ बनी है. जिसका वितरण अभी प्रोसेस में है. मेरी दोनों अल्बम्स मुफ्त वितरण के लिए उपलब्ध है. सबसे बड़ी कीमत येशु ने सूली पर चढकर चूका दी है. मैं उससे अधिक कुछ भी कीमत नहीं मांग सकती हूँ.

मेरी दोनों अल्बम्स ने बहुत से लोगों को उम्मीदें दी है, उनके दिलों को छुआ है, अब वो कितने हैं ये तो न्याय के दिन ही पता चलेगा.

सजीव - आप एक जबरदस्त आवाज़ की मालकिन हैं...संगीत की दिशा में कुछ सपने ....

सिंड्रेला - मालकिन ? बिलकुल नहीं...मैं सिर्फ एक सेविका हूँ. येशु ने आवाज़ दी है और मैं उसका इस्तेमाल उन्हीं के लिए कर रही हूँ....मैं अपने आपको बस इसी रूप में देखना चाहती हूँ, लोगों की सेवा करना चाहती हूँ..बस

सजीव - नयी अल्बम "महफूज़ वाणी" के बारे में कुछ बताईये ?

सिंड्रेला - Mehfuz was acoustic But Mehfuz Vani is full throttle music. महफूज़ में ४ गाने थे पर महफूज़ वाणी में ८ गाने हैं, इस अल्बम में एक तमिल गीत भी है, जो मेरी मम्मी का सबसे पसंदीदा गीत था. उन्होंने ही मुझे सिखाया था...इन सभी गीतों में भी मैंने अपनी जिंदगी के कुछ हिस्सों को पेश किया है. अल्बम फ्री डाउनलोड के लिए नेट पर उपलब्ध है.




सजीव - वैसे तो हम जानते हैं कि आप फ़िल्मी गीतों में दिलचस्पी नहीं रखती हैं, पर कोई एक गायिका बॉलीवुड की जिनसे आपको कभी प्रेरणा मिली हो...


सिंड्रेला - जी मेरी प्रेरणा तो "पवित्र आत्मा" से है...वैसे मुझे श्रेया घोषाल और सुनिधि चौहान पसंद हैं...


सजीव - शुक्रिया सिंड्रेला, रेडियो प्लेबैक परिवार की और से तमाम शुभकामनाएँ आपको...


सिंड्रेला - शुक्रिया सजीव जी, और सभी श्रोताओं को भी नमस्कार....


सजीव - चलिए हम अपने श्रोताओं को छोड़ते हैं आपके गीत "ख्वाब" के साथ....


गीत - ख्वाब, गायिका - सिंड्रेला Song - Khwaab/ Singer - Cindrella Prakash   


विडियो ऑफ महफूज़

Thursday, May 24, 2012

गिरिजेश राव की कहानी "गुम्मी"

'बोलती कहानियाँ' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने युवा लेखक अभिषेक ओझा की कहानी ""अच्छा बुरा"" का पॉडकास्ट एकता अग्रवाल की आवाज़ में सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं गिरिजेश राव की कहानी "गुम्मी", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने। कहानी "गुम्मी" का कुल प्रसारण समय 4 मिनट 14 सेकंड है।


सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

इस कथा का टेक्स्ट एक आलसी का चिठ्ठा पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

"पास बैठो कि मेरी बकबक में नायाब बातें होती हैं। तफसील पूछोगे तो कह दूँगा,मुझे कुछ नहीं पता "
~ गिरिजेश राव

हर हफ्ते रेडियो प्लेबैक पर सुनें एक नयी कहानी

"वे दोनों बहुत नाराज़ हुए कि रात को ही बताना था। असल में वे सुखदा में घबराहट की कमी देख कुछ अधिक ही घबरा गए।"
(गिरिजेश राव की कहानी "गुम्मी" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3
#18th Story, Gummi: Girijesh Rao/Hindi Audio Book/2012/18. Voice: Anurag Sharma

Tuesday, May 22, 2012

"ब्लोग्गर्स चोईस" के पहले सत्र का समापन मेरी पसंद के गीतों के साथ -रश्मि प्रभा

गीतों से शुरू होता है जीवन - कभी माँ की लोरी से, कभी गुड़िया की कहानी से. एड़ी उचकाकर जब मैं खुद गाती थी तो सारी दुनिया अपनी लगती थी ... उसी एड़ी की मासूमियत से शुरू करती हूँ अपनी पसंद - नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए ..
.


मैं बहुत डरती थी, डरती भी हूँ (किसी को बताइयेगा मत, भूत सुन लेगा - हाहाहा ) . जब अपने पापा के स्कूल के एक गेट से दूसरे गेट तक अकेली पड़ जाती थी तो भूत को भ्रमित करने के लिए और खुद को हिम्मत देने के लिए गाती थी - मैं हूँ भारत की नार लड़ने मरने को तैयार ...


एक ख़ास उम्र और वैसे ख्वाब .... गीत तो कई थे , पर यह गीत एक समर्पित सा एहसास देता है ....


बच्चों के बीच मेरे पैरों में एक अदभुत शक्ति आ जाती, और मैं कहानियों की पिटारी बन जाती .... अपना वह पिटारा आज भी मेरी पसंद में है, जिसे अब मैं अपने सूद को दूंगी यानि ग्रैंड चिल्ड्रेन को ....


मेरे बच्चे मेरी ज़िन्दगी और मैं उनकी वह दोस्त माँ , जो उनके चेहरे से मुश्किलों की झलकियाँ मिटा दे ..... यह गीत हमारी पसंद,



दोस्तों रेडियो प्लेबैक इंडिया के इस साप्ताहिक कार्यक्रम "ब्लोग्गेर्स चोयिस" हमने बहुत से साथी ब्लोग्गरों की पसंद के गीत सुने, आज अपनी खुद की पसंद के गीतों के इस सत्र के लिए इस स्तंभ का समापन कर रही हूँ. जाहिर है अभी बहुत बहुत ब्लोग्गर्स बचे जिनकी पसंद हमने नहीं जानी है, नहीं सुनी है...लेकिन फ़िक्र न करें, बस अगले सत्र का इन्तेज़ार करें. अगले सप्ताह से लाऊँगीं एक नया खेल, नए अंदाज़ में, तैयार रहिएगा 

Monday, May 21, 2012

सिने-पहेली # 21 (जीतिये 5000 रुपये के इनाम)

सिने-पहेली # 21 (21 मई, 2012)


मस्कार, दोस्तों। आज है 'सिने पहेली' की 21वीं कड़ी, यानी आज इस प्रतियोगिता के तीसरे सेगमेण्ट की पहली कड़ी है और इसे हम सबके प्रिय सुजॉय चटर्जी की व्यस्तता के कारण मैं कृष्णमोहन मिश्र, प्रस्तुत करते हुए आप सभी का स्वागत कर रहा हूँ। इससे पहले कि आज की 'सिने पहेली' का सिलसिला शुरू हो, सेगमेण्ट के विजेता की घोषणा करना आवश्यक है। यूँ तो इस प्रतियोगिता के नियमित प्रतिभागियों ने तो विजेता का अनुमान लगा ही लिया होगा।

दोस्तों, हमारे दूसरे सेगमेण्ट के विजेता हुए हैं- लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जिन्होने 49 अंक अर्जितकर सर्वोच्च स्थान पर रहे। बैंगलुरु के पंकज मुकेश ने प्रकाश जी को कड़ी टक्कर देते हुए दूसरा स्थान और मुम्बई के रीतेश खरे ने तीसरा स्थान प्राप्त किया है। इन दोनों प्रतिभागियों को क्रमशः 45 और 42 अंक मिले हैं। चौथे स्थान पर 34 अंक लेकर अमित चावला और पांचवें स्थान पर 32 अंक पाकर क्षिति तिवारी ने स्वयं को दर्ज़ कराया है। इन प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इनके साथ-साथ दूसरे सेगमेण्ट की प्रतियोगिता में उनकी हिस्सेदारी के लिए सभी प्रतियोगियों का बहुत-बहुत आभार।

सभी नए और पुराने प्रतियोगियों से हमारा अनुरोध है कि आज से आरम्भ हो रहे तीसरे सेगमेण्ट के पहले अंक से एक नई ऊर्जा और नए उत्साह से इस प्रतियोगिता में भाग लेना आरम्भ करें। संभव है, इस सेगमेण्ट के विजेता आप ही हों। नए प्रतियोगियों के लिए 'सिने पहेली' महाविजेता बनने के नियम हम एक बार फिर दोहरा देते हैं। हमने इस प्रतियोगिता को दस-दस कड़ियों के सेगमेण्ट्स में विभाजित किया है। इस तरह से १००-वें अंक तक १० सेगमेण्ट्स हो जाएँगे, और हर सेगमेण्ट का एक विजेता घोषित होगा। इस तरह से १० सेगमेण्ट्स के बाद जो सर्वाधिक सेगमेण्ट का विजेता होगा, वही होगा ‘महाविजेता’ और उन्ही को 5000 रुपये की नकद राशि से सम्मानित किया जाएगा। आप सब को अग्रिम शुभकामना देते हुए आरम्भ करते हैं आज की पहेली के सवालों का सिलसिला।

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सवाल - 1 : बूझो तो जाने

इस श्रेणी में हम आपको कुछ शब्द देंगे जिनका इस्तेमाल कर आपको किसी हिन्दी फ़िल्मी गीत का मुखड़ा बनाना है। यानी कि हम आपको किसी गीत के मुखड़े के कुछ महत्वपूर्ण शब्दों को आगे-पीछे करके देंगे, आपको सही मुखड़ा पहचानना है। तो ये रहे आज के गीत के कुछ शब्द; ध्यान से पढ़िए और इन शब्दों को उचित स्थानों पे बिठाकर बताइए कि यह कौन सा गीत है।

बहार, फूल, गुजर, सिंगार, बाग, मीत

सवाल – 2 : पहचान कौन? 



 आज की चित्र-पहेली में पहचानिए कलाकार को।




सवाल – 3 : सुनिए और पहचानिए

आज हम आपको सुनवा रहे हैं एक गीत का अंश,  इसे ध्यान से सुनिए। इस गीत में आप फिलहाल केवल एक गायक की आवाज़ सुन रहे हैं, किन्तु गीत के अगले हिस्से में दो बाल कलाकारों की आवाज़ें भी शामिल हैं। आपको इस तीनों आवाज़ों को पहचानना है।


सवाल – 4 : कौन हूँ मैं?

मैं एक संगीतकार हूँ। फिल्मों के साथ-साथ शास्त्रीय संगीत के मंचों पर भी मुझे और मेरे वाद्य को श्रोताओं का भरपूर प्यार मिला। मेरी जन्मभूमि और आरम्भिक कर्मभूमि बंगाल रही है। फिल्मों में मेरा पदार्पण ‘न्यू थियेटर्स’ के माध्यम से हुआ, जहाँ मैं एक नामी संगीतकार के सहायक के तौर पर रहा। चौथे दशक के अन्त में मैं मुम्बई आ गया। बाम्बे टाकीज़ की मेरी पहली फिल्म में मेरे द्वारा स्वरबद्ध दो गीत बेहद लोकप्रिय हुए थे, जिनमें खान मस्ताना और बिब्बो के स्वर थे। बाम्बे टाकीज़ की ही एक और फिल्म के गीत भी हिट हुए, जिनमें अशोक कुमार और देविका रानी की हिट जोड़ी थी। मैंने संगीतकार अनिल विश्वास, रफीक गजनवी और शान्तिकुमार देसाई के साथ मिल कर भी कुछ फिल्मों में संगीत दिया। छठे दशक की एक फिल्म में मैंने राष्ट्रगीत के समकक्ष मान्य ‘वन्देमातरम...’ गीत (सुधा, मन्ना डे, शैलेश) को एक फिल्म में शामिल किया था। मुझे फिल्मों की अपेक्षा शास्त्रीय संगीत के मंचों और रेडियो से प्रस्तुति देना अधिक भाता था। अपने अन्तिम दिनों में मैं आकाशवाणी के राष्ट्रीय वाद्यवृन्द का कम्पोजर, कण्डक्टर और प्रोड्यूसर के पद पर रहा। क्या आप बता सकते हैं कि कौन हूँ मैं?

सवाल – 5 : गीत अपना धुन पराई

और अब पाँचवा और आख़िरी सवाल। सुनिए इस विदेशी धुन को और पहचानिए वह हिन्दी फ़िल्मी गीत जो इस धुन से प्रेरित है।


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तो दोस्तों, हमने पूछ लिए हैं आज के पाँचों सवाल, और अब ये रहे इस प्रतियोगिता में भाग लेने के कुछ आसान से नियम....

१. अगर आपको सभी पाँच सवालों के जवाब मालूम है, फिर तो बहुत अच्छी बात है, पर सभी जवाब अगर मालूम न भी हों, तो भी आप भाग ले सकते हैं, और जितने भी जवाब आप जानते हों, वो हमें लिख भेज सकते हैं।

२. जवाब भेजने के लिए आपको करना होगा एक ई-मेल cine.paheli@yahoo.com के ईमेल पते पर। 'टिप्पणी' में जवाब न कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे।

३. ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 20" अवश्य लिखें, और जवाबों के नीचे अपना नाम, स्थान और पेशा लिखें।

४. आपका ईमेल हमें शुक्रवार 25मई तक मिल जाने चाहिए।

है न बेहद आसान! तो अब देर किस बात की, लगाइए अपने दिमाग़ पे ज़ोर और जल्द से जल्द लिख भेजिए अपने जवाब। जैसा कि हमने शुरु में ही कहा है कि हर सप्ताह हम सही जवाब भेजने वालों के नाम घोषित किया करेंगे, और सौवें अंक के बाद "महाविजेता" का नाम घोषित किया जाएगा।

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और अब ये रहे 'सिने पहेली-20' के सवालों के सही जवाब...
१. पहले सवाल 'बूझो तो जाने' का सही जवाब है फ़िल्म 'एक बाप छह बटे' का मोहम्मद रफ़ी व सुलक्षणा पण्डित का गाया गीत "घड़ी मिलन की आई, आई तू छुट्टी लेकर आजा, प्यार की बीन बजे न अकेले, तु ज़रा साथ निभा जा, अजब मुसीबत आई आई यहाँ तो सुन मेरे राजा, एक साथ कई सुर बजते हैं, बंद हो कैसे बता जा..."

२. चित्र पहेली का सही जवाब है सोनू निगम

३. 'सुनिये तो' में सुनवाए गए गीत के अंश में जो दो आवाज़ें हैं वो हैं सुधा मल्होत्रा और मधुबाला ज़वेरी की, और यह गीत है फ़िल्म 'नाग पद्मिनी' का "दिन हैं सुहाने", जिसके संगीतकार हैं सनमुख बाबू।

४. 'कौन हूँ मैं' का सही जवाब है सोनू निगम। उषा मंगेशकर ने उनका प्लेबैक किया था १९८२ की फ़िल्म 'उस्तादी उस्ताद से' में और गीत था "साथी तेरे नाम एक दिन जीवन कर जायेंगे"। राम लक्ष्मण इसके संगीतकार थे जिन्होने सोनू निगम की आवाज़ बाद में ली थी 'हम साथ साथ हैं' के गीत "आओ जी दुल्हन हम सब से मिलो जी" में जिसमे उन्होंने शक्ति कपूर का प्लेबैक किया था।

५. 'गीत अपना धुन पराई' में सुनवाए गए विदेशी गीत "coming through the Rye" से प्रेरित हिंदी गीत है फ़िल्म 'चोरी चोरी' का "पंछी बनूं उड़ती फिरूं"

और अब 'सिने पहेली # 20' के विजेताओं के नाम ये रहे-

1. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ – 4 अंक 
2. सलमान खाँ, अलीगढ़ – 4 अंक 
3. क्षिति तिवारी, जबलपुर – 3 अंक 
4. पंकज मुकेश, बेंगलुरू – 3 अंक, 
5. रीतेश खरे, मुंबई -2 अंक 
6. इंदु पुरी गोस्वामी, चित्तौड़गढ़ - 1 अंक

सभी विजेताओं को हार्दिक बधाई। अंक सम्बन्धित अगर आपको किसी तरह की कोई शिकायत हो, तो cine.paheli@yahoo.com के पते पर हमें अवश्य सूचित करें। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी शत-प्रतिशत सम्भावना है महाविजेता बनने की। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, और अनुमति दीजिए अपने इस ई-दोस्त कृष्णमोहन मिश्र को, नमस्कार!

Sunday, May 20, 2012

गीत उस्तादों के : चर्चा राग सोहनी की

स्वरगोष्ठी – ७१ में आज

राग सोहनी के स्वरों का जादू : 'प्रेम जोगन बन के...'

पटियाला कसूर घराने के सिरमौर, उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ पिछली शताब्दी के बेमिसाल गायक थे। अपनी बुलन्द गायकी के बल पर संगीत-मंचों पर लगभग आधी शताब्दी तक उन्होने अपनी बादशाहत को कायम रखा। पंजाब अंग की ठुमरियों के वे अप्रतिम गायक थे। संगीत-प्रेमियों को उन्होने संगीत की हर विधाओं से मुग्ध किया, किन्तु फिल्म संगीत से उन्हें परहेज रहा। एकमात्र फिल्म- ‘मुगल-ए-आजम’ में उनके गाये दो गीत हैं। आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में हम इनमें से एक गीत पर चर्चा करेंगे।

शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक और फिल्म संगीत पर केन्द्रित साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नये अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने सभी पाठकों-श्रोताओं का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, हमारे कई संगीत-प्रेमियों ने फिल्म संगीत में पटियाला कसूर घराने के विख्यात गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के योगदान पर चर्चा करने का आग्रह किया था। आज का यह अंक हम उन्हीं की फरमाइश पर प्रस्तुत कर रहे हैं।

भारतीय फिल्मों के इतिहास में १९५९ में बन कर तैयार फिल्म- ‘मुगल-ए-आजम’, एक भव्य कृति थी। इसके निर्माता-निर्देशक के. आसिफ ने फिल्म की गुणबत्ता से कोई समझौता नहीं किया था। फिल्म के संगीत के लिए उन्होने पहले गोविन्द राम और फिर अनिल विश्वास को दायित्व दिया, परन्तु फिल्म-निर्माण में लगने वाले सम्भावित अधिक समय के कारण बात बनी नहीं। अन्ततः संगीतकार नौशाद तैयार हुए। नौशाद ने फिल्म में मुगल-सल्तनत के वैभव को उभारने के लिए तत्कालीन दरबारी संगीत की झलक दिखाने का हर सम्भव प्रयत्न किया। नौशाद और के. आसिफ ने तय किया कि अकबर के नवरत्न तानसेन की मौजूदगी का अनुभव भी फिल्म में कराया जाए। नौशाद की दृष्टि विख्यात गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ पर थी, किन्तु फिल्म में गाने के लिए उन्हें मनाना सरल नहीं था। पहले तो खाँ साहब ने फिल्म में गाने से साफ मना कर दिया, परन्तु जब दबाव बढ़ा तो टालने के इरादे से, एक गीत के लिए २५,००० रुपये की माँग की। यह उस समय की एक बड़ी धनराशि थी, परन्तु के. आसिफ ने तत्काल हामी भर दी। नौशाद ने शकील बदायूनी से प्रसंग के अनुकूल गीत लिखने को कहा। गीत तैयार हो जाने पर नौशाद ने खाँ साहब को गीत सौंप दिया। उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ ने ठुमरी अंग की गायकी में अधिक प्रयोग किए जाने वाले राग सोहनी, दीपचन्दी ताल में निबद्ध कर गीत- ‘प्रेम जोगन बन के...’ को रिकार्ड कराया। रिकार्डिंग से पहले खाँ साहब ने वह दृश्य देखने की इच्छा भी जताई, जिस पर इस गीत को शामिल करना था। मधुबाला और दिलीप कुमार के उन प्रसंगों को देख कर उन्होने गायन में कुछ परिवर्तन भी किए। इस प्रकार भारतीय फिल्म-संगीत-इतिहास में राग सोहनी के स्वरों में ढला एक अनूठा गीत शामिल हुआ। आइए पहले आपको यह गीत सुनवाते हैं-

फिल्म – मुगल-ए-आजम : ‘प्रेम जोगन बन के...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ



उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ द्वारा राग सोहनी के स्वरों में पिरोया यह गीत के. आसिफ को इतना पसन्द आया कि उन्होने खाँ साहब को दोबारा २५,००० रुपये भेंट करते हुए एक और गीत गाने का अनुरोध किया। खाँ साहब का फिल्म में गाया राग रागेश्री, तीनताल में निबद्ध दूसरा गीत है- ‘शुभ दिन आयो राजदुलारा...’। ये दोनों गीत फिल्म संगीत के इतिहास के सबसे खर्चीले गीत सिद्ध हुए। आइए, खाँ साहब के गाये, राग सोहनी में निबद्ध इस गीत के बहाने थोड़ी चर्चा राग सोहनी के बारे में करते हैं। हम ऊपर यह चर्चा कर चुके हैं कि राग सोहनी का प्रयोग ठुमरी अंग में अधिक होता है। यह राग मारवा थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग का प्रयोग दो प्रकार से किया जाता है। पहले प्रकार, औडव-षाडव के अन्तर्गत आरोह में ऋषभ, पंचम तथा अवरोह में पंचम का प्रयोग नहीं किया जाता। राग के दूसरे स्वरूप के आरोह में ऋषभ और अवरोह में पंचम का प्रयोग नहीं होता। यह पूर्वाङ्ग प्रधान राग है। परन्तु इसके गायन-वादन में उत्तराङ्ग प्रधान राग मारवा और पूर्वी की झलक नज़र आती है। इसके अलावा राग हिंडोल की छाया भी दिखती है। राग सोहनी का खयाल अंग में बेहद आकर्षक गायन, पण्डित कुमार गन्धर्व की सुपुत्री और शिष्या कलापिनी कोमकली ने किया है। राग सोहनी, तीनताल में निबद्ध, पण्डित कुमार गन्धर्व की यह रचना अब आप सुनिए-

राग – सोहनी, तीनताल : ‘रंग न डारो श्याम जी...’ : कलापिनी कोमकली



राग सोहनी चंचल प्रवृत्त का राग है। श्रृंगार, विशेष रूप से श्रृंगार के विरह पक्ष की सार्थक अनुभूति कराने में यह राग समर्थ है। भारतीय संगीत के रागों पर विस्तृत शोधकर्त्ता सत्यनारायण टाटा के अनुसार राग सोहनी, कर्नाटक पद्यति के राग हंसनन्दी के समतुल्य है। यदि राग हंसनन्दी में शुद्ध ऋषभ का प्रयोग किया जाए तो यह ठुमरी अंग के राग सोहनी की अनुभूति कराता है। सुप्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद शुजात खाँ का मत है कि तंत्रवाद्य पर राग मारवा, पूरिया और सोहनी का वादन कम किया जाता है। शायद इसलिए कि वाद्य के लिए यह थोड़ा मुश्किल है किन्तु नामुमकिन नहीं। जिस कलाकार ने अपने वाद्य पर इन रागों को साध लिया, वह राग के सौन्दर्य को द्विगुणित कर देता है। आइए अब आपको, राग सोहनी में पगी एक आकर्षक रचना, सितार पर सुनवाते है। वादक हैं, उस्ताद शाहिद परवेज़ और इस वादन में तबला संगति की है, उस्ताद अकरम खाँ ने। आप सितार के तंत्रों पर राग सोहनी का आनन्द लीजिए और मुझे आज यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।

सितार पर राग – सोहनी : वादक – उस्ताद शाहिद परवेज़ : रचना – द्रुत तीनताल



आज की पहेली

आज की संगीत-पहेली में हम आपको सुनवा रहे हैं, एक राग-आधारित गीत का अंश, इसे सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। आज से आरम्भ हो रही पहेली की तीसरी श्रृंखला की अन्तिम कड़ी अर्थात ८०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक-श्रोता हमारी तीसरी श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।



१ – गीत के इस अंश में दो गायक कलाकारों के स्वर हैं। इनमें एक स्वर पण्डित दत्तात्रेय विष्णु (डी.वी.) पलुस्कर का है। दूसरा स्वर किस विख्यात गायक का है?
२ – गीत का यह अंश ध्यान से सुनिए और राग का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ७३वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

आपकी बात

‘स्वरगोष्ठी’ के ६९वें अंक में हमने आपको १९६३ की भोजपुरी फिल्म ‘विदेशिया’ के गीत- 'हँसी हँसी पनवाँ खियौले बेईमनवा...’ का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- मन्ना डे और महेन्द्र कपूर तथा दूसरे का उत्तर है- भोजपुरी फिल्म विदेशिया। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर, बैंगलुरु से पंकज मुकेश और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई। इनके अलावा सुर-गन्धर्व मन्ना डे के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में प्रस्तुत दो अंकों की श्रृंखला की अनेक पाठकों ने न केवल सराहना की है, बल्कि अपने सुझावों के साथ फरमाइशें भी की हैं। इन सभी पाठकों-श्रोताओं को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से आभार।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ का आगामी अंक सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित दत्तात्रेय विष्णु (डी.वी.) पलुस्कर जी की स्मृति में समर्पित होगा। आगामी २१ मई को इस संगीत-मनीषी की ९२वीं जयन्ती है। आगामी रविवार को प्रातः ९-३० बजे आप और हम ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में पुनः मिलेंगे। तब तक के लिए हमें विराम लेने की अनुमति दीजिए।

कृष्णमोहन मिश्र

Friday, May 18, 2012

अभिषेक ओझा की कहानी "अच्छा बुरा"

'बोलती कहानियां' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने हरिशंकर परसाई की कहानी "अश्‍लील" का पॉडकास्ट अनुराग शर्मा की आवाज़ में सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं अभिषेक ओझा की कहानी "अच्छा बुरा", आवाज़ एकता अग्रवाल की।

कहानी "अच्छा बुरा" का कुल प्रसारण समय 4 मिनट 33 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

इस कथा का टेक्स्ट ओझा-उवाच पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

वास्तविकता तो ये है कि किसे फुर्सत है मेरे बारे में सोचने की, लेकिन ये मानव मन भी न!
~ अभिषेक ओझा

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी
"सबको पता था कि हरीश की गर्लफ्रेंड है तो कोई उससे बात करने की कोशिश भी नहीं कर रहा था। वरना ऐसी पार्टियों में लोग लड़कियों को अकेला कहाँ रहने देते हैं।"
(अभिषेक ओझा की "वो लोग ही कुछ और होते हैं" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3

#17th Story, Achchha Bura : Abhishek Ojha/Hindi Audio Book/2012/17. Voice: Ekta Agarwal

Wednesday, May 16, 2012

केतकी गुलाब जूही...कहानी इस एतिहासिक गीत के बनने की

फिल्म-संगीत-इतिहास के सुनहरे पृष्ठ पर दर्ज़ 'बसन्त बहार' का गीत


भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में कुछ ऐसे गीत दर्ज़ हैं, जिनकी रचना-प्रक्रिया पर्याप्त रोचक तो है ही, उसमें कलात्मक सृजनशीलता के दर्शन भी होते हैं। १९५६ में प्रदर्शित फिल्म 'बसन्त बहार' में एक ऐसा गीत रचा गया, जिसे राग आधारित गीत कहने संकोच का अनुभव होता है। गीत की रचना-प्रक्रिया की जानकारी दिये बिना यदि किसी संगीत-प्रेमी को सुना दिया जाए तो कोई आश्चर्य नहीं कि श्रोता इसे राग बसन्त बहार का एक छोटा खयाल कह कर सम्बोधित कर दे।


'एक गीत सौ कहानियाँ' के एक नए अंक में आज मैं कृष्णमोहन मिश्र आपके बीच उपस्थित हूँ। इस स्तम्भ के प्रस्तुतकर्ता सुजॉय चटर्जी की अन्यत्र व्यस्तता के कारण आज का यह अंक मुझे प्रस्तुत करना है। मित्रों, फिल्म-संगीत-जगत में समय-समय पर कुछ ऐसे गीतों की रचना हुई है, जो आज हमारे लिए अनमोल धरोहर बन गए हैं। एक ऐसा ही गीत १९५६ में प्रदर्शित फिल्म 'बसन्त बहार' में रचा गया था। यूँ तो इस फिल्म के सभी गीत अपने समय में हिट हुए थे, किन्तु फिल्म का एक गीत- 'केतकी गुलाब जूही चम्पक वन फूलें...' कई कारणों से फिल्म-संगीत-इतिहास के पृष्ठों में दर्ज़ हुआ। इस गीत की मुख्य विशेषता यह है कि पहली बार किसी वरिष्ठ शास्त्रीय गायक (पण्डित भीमसेन जोशी) और फिल्मी पार्श्वगायक (मन्ना डे) ने मिल कर एक ऐसा युगल गीत गाया, जो पूरी तरह राग बसन्त बहार के स्वरों में ढाला गया था। यही नहीं, फिल्म के प्रसंग के अनुसार राज-दरबार में आयोजित प्रतियोगिता में नायक भारतभूषण को गायन में दरबारी गायक के मुक़ाबले में विजयी होना था। आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि दरबारी गायक के लिए भीमसेन जी ने और नायक के लिए मन्ना डे ने पार्श्वगायन किया था। फिल्म से जुड़ा तीसरा रेखांकन योग्य तथ्य यह है कि फिल्म के संगीतकार शंकर-जयकिशन अपने उन आलोचकों को करारा जवाब देने में सफल हुए, जो उनके संगीत में शास्त्रीयता की कमी का आरोप लगाया करते थे।

१९४९ की फिल्म 'बरसात' से अपनी हलकी-फुलकी और आसानी से गुनगुनाने वाली सरल धुनों के बल पर सफलता के झण्डे गाड़ने वाले शंकर-जयकिशन को जब १९५६ की फिल्म 'बसन्त बहार' का प्रस्ताव मिला तो उन्होने इस शर्त के साथ इसे तुरन्त स्वीकार कर लिया कि फिल्म के राग आधारित गीतों के गायक मन्ना डे ही होंगे। जबकि फिल्म के नायक भारतभूषण के भाई शशिभूषण सभी गीत मोहम्मद रफी से गवाना चाहते थे। मन्ना डे की प्रतिभा से यह संगीतकार जोड़ी, विशेष रूप से शंकर, बहुत प्रभावित थे। 'बूट पालिश' के बाद शंकर-जयकिशन के साथ मन्ना डे नें अनेक यादगार गाने गाये थे। १९५३ में मन्ना डे नें शंकर-जयकिशन के संगीत निर्देशन में तीन फिल्मों- 'चित्रांगदा', 'घर-बार' और 'दर्द-ए-दिल' में गीत गाये। १९५५ में मन्ना डे के गायन से सजी दो ऐसी फ़िल्में बनीं, जिन्होंने उनकी गायन प्रतिभा में चाँद-सितारे जड़ दिये। फिल्म 'सीमा' का गीत- "तू प्यार का सागर है, तेरी एक बूँद के प्यासे हम...." फ़िल्मी भक्ति-गीतों में आज भी सर्वश्रेष्ठ पद पर प्रतिष्ठित है। इसी वर्ष मन्ना डे ने राज कपूर की फिल्म 'श्री ४२०' में तीन गाने गाये, जिनमें पहला एकल गीत-"दिल का हाल सुने दिलवाला...", दूसरा, आशा भोसले के साथ युगल गीत- "मुड़ मुड़ के ना देख मुड़ मुड़ के...." और तीसरा लता मंगेशकर के साथ गाया युगल गीत -"प्यार हुआ, इकरार हुआ..."। फिल्म 'श्री ४२०' के गीत जबरदस्त हिट हुए थे। इस फिल्म के गानों को गाकर मन्ना डे नें शंकर को इतना प्रभावित कर दिया कि आगे चल कर शंकर उनके सबसे बड़े शुभचिन्तक बन गए। शंकर-जयकिशन ने फिल्म 'बसन्त बहार' में मन्ना डे के स्थान पर किसी और पार्श्वगायक को लेने से साफ मना कर दिया। फिल्म के निर्देशक राजा नवाथे मुकेश की आवाज़ को पसन्द करते थे, परन्तु वो इस विवाद में तटस्थ बने रहे। निर्माता आर. चन्द्रा भी पशोपेश में थे। मन्ना डे को हटाने का दबाव जब अधिक हो गया तब अन्ततः शंकर-जयकिशन को फिल्म छोड़ देने की धमकी देनी पड़ी। अन्ततः मन्ना डे के नाम पर सहमति बनी।

फिल्म 'बसन्त बहार' में शंकर-जयकिशन ने ९ गीत शामिल किए थे, जिनमें से दो गीत- 'बड़ी देर भई...' और 'दुनिया न भाए मोहे...' मोहम्मद रफी के एकल स्वर में गवा कर उन्होने शशिभूषण की बात भी रख ली। इसके अलावा उन्होने मन्ना डे से चार गीत गवाए। राग मियाँ की मल्हार पर आधारित 'भयभंजना वन्दना सुन...' (एकल), राग पीलू पर आधारित 'सुर ना सजे...' (एकल), लता मंगेशकर के साथ युगल गीत 'नैन मिले चैन कहाँ...' और इन सब गीतों में शामिल था राग बसन्त बहार के स्वरों में पिरोया वह ऐतिहासिक गीत- 'केतकी गुलाब जुही...', भी है, जिसे मन्ना डे के साथ पण्डित भीमसेन जोशी ने गाया है। इस आलेख की आरम्भिक पंक्तियों में हम फिल्म के उस प्रसंग की चर्चा कर चुके हैं, जिसमें यह गीत फिल्माया गया था। आइए, अब कुछ चर्चा इस गीत की रचना-प्रक्रिया के बारे में करते हैं। संगीतकार शंकर-जयकिशन फिल्म के इस प्रसंग के लिए एक ऐतिहासिक गीत रचना चाहते थे। उन्होने सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पण्डित भीमसेन जोशी और सारंगी वादक पण्डित रामनारायण को आमंत्रित किया और यह दायित्व उन्हें सौंप दिया। इसके आगे की कहानी आप स्वयं पण्डित भीमसेन जोशी की जुबानी सुनिए, इस रिकार्डिंग के माध्यम से। पण्डित भीमसेन जोशी पर निर्मित वृत्तचित्र का यह एक अंश है, जिसमें गीतकार गुलज़ार, पण्डित जी से सवाल कर रहे हैं।

पण्डित भीमसेन जोशी से गुलज़ार की बातचीत का एक अंश 


पण्डित जी ने बातचीत के दौरान जिस 'गीत लिखने वाले' की ओर संकेत किया है, वो कोई और नहीं, बल्कि गीतकार शैलेन्द्र थे। दूसरी ओर शंकर-जयकिशन ने जब इस जुगलबन्दी की बात मन्ना डे को बताई तो वे एकदम भौचक्के से हो गए। मन्ना डे ने यद्यपि कोलकाता में उस्ताद दबीर खाँ और मुम्बई आकर उस्ताद अमान अली खाँ और उस्ताद अब्दुल रहमान खाँ से संगीत का प्रशिक्षण प्राप्त किया था, किन्तु पण्डित जी के साथ जुगलबन्दी गाने का प्रस्ताव सुन कर उनकी हिम्मत जवाब दे गई। मन्ना डे की उस समय की मनोदशा को समझने के लिए लीजिए, प्रस्तुत है- उनके एक साक्षात्कार का अंश-

मन्ना डे के साक्षात्कार का एक अंश


इस गीत को गाने से बचने के लिए मन्ना डे चुपचाप पुणे चले जाने का निश्चय कर चुके थे, लेकिन पत्नी के समझाने पर उन्होने इस प्रकार पलायन स्थगित कर दिया। पंकज राग द्वारा लिखित पुस्तक 'धुनों की यात्रा' में इस प्रसंग का उल्लेख करते हुए लिखा गया है कि- मन्ना डे अपने संगीत-गुरु उस्ताद अब्दुल रहमान खाँ के पास मार्गदर्शन के लिए भी गए थे। इसके अलावा मन्ना डे के गाये हिस्से में राग बसन्त के साथ राग बहार का स्पर्श दिया गया और लय भी थोड़ी धीमी की गई थी। पण्डित रामनारायण ने मन्ना डे को कुछ ऐसी तानें सीखा दी, जिससे फिल्म का नायक विजयी होता हुआ नज़र आए। साक्षात्कार में मन्ना डे ने स्वीकार किया है कि उनके साथ गाते समय पण्डित जी ने अपनी पूरी क्षमता का प्रयोग नहीं किया था। अन्ततः पण्डित भीमसेन जोशी, पण्डित रामनारायण, उस्ताद अब्दुल रहमान खाँ, मन्ना डे और शैलेन्द्र के प्रयत्नों से फिल्म 'बसन्त बहार' का ऐतिहासिक गीत- 'केतकी गुलाब जूही चम्पक वन फूलें...' की रचना हुई और फिल्म संगीत के इतिहास में यह गीत सुनहरे पृष्ठों में दर्ज़ हुआ। इस गीत से जुड़ा एक तथ्य यह भी है कि गीत की उत्कृष्ठता और सफलता से उत्साहित होकर संगीतकार शंकर-जयकिशन ने इसके बाद अपनी क्षमता से कई राग आधारित गीतो की रचना कर संगीत-प्रेमियों को लुभाया। लीजिए, अब आप पूरा गीत सुनिए-

फिल्म - बसन्त बहार : 'केतकी गुलाब जूही चम्पक वन फूलें...' : स्वर - भीमसेन जोशी और मन्ना डे  


तो दोस्तों, यह था आज का 'एक गीत सौ कहानियाँ'। कैसा लगा ज़रूर बताइएगा टिप्पणी में या आप मुझ तक पहुँच सकते हैं cine.paheli@yahoo.com के पते पर भी। इस स्तम्भ के लिए अपनी राय, सुझाव, शिकायतें और फ़रमाइशें इसी ईमेल आइडी पर ज़रूर लिख भेजें। आज बस इतना ही, अगले बुधवार फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर हाज़िर हो‍ऊंगा, तब तक के लिए अपने आज के ई-दोस्त कृष्णमोहन मिश्र को इजाज़त दीजिए। नमस्कार!

कृष्णमोहन मिश्र

Tuesday, May 15, 2012

ब्लोग्गर्स चोयिस में आज लावण्या शाह की पसंद

व्
धीर , गंभीर, सजग, बाह्यमुखी, सौन्दर्य से भारी लावण्या शाह जी को कौन साहित्यकार ब्लॉगर नहीं जानता, गीतकार/कवि पंडित नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री और लता जी की मुहँ बोली बहिन हैं ये. चलिए आज जानते हैं उनकी पसंद के ख़ास 3 गाने कौन से हैं- 

1 ) Satyam Shivam Sunderam ( Title song ) 
Singer : Lata ji : 
Lyricist : Pt. Narendra Sharma 
MD : Laxmikant / Pyarelal 
Raj Kapoor Production




2 ) Nain Diwane Ek nahee mane Film : Afsar
AFSAR was first film produced by Dev Anand after
 forming Navketan wirh his brothers Chetan and Vijay Anand 
Singer : Suraiya Jamaal Sheikh (June 15, 1929 - January 31, 2004) 
was a singer and actress in Indian films, and was popularly known as 
Suraiya in the film industry. 
She became a superstar in the 1940s and 50s during the time when actors sang their own songs.
Music By : S D Burman..Link : 



3 ) Baje Re Muraliya Baje 
This music is supreme combination,Bharat Ratna - Lata Mangeshkar,
Bharat Ratna Pt Bhimsen Joshi and Music direction by SHrinivas Khale
lyrics ; Pandit Narendra Sharma 
Jai Shri Krishna !! 
Pandit Bhim Sen Joshi ji & Lata Mangeshker didiji 

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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