Wednesday, March 31, 2010

चिट्टी आई है वतन से....अपने वतन या घर से दूर रह रहे हर इंसान के मन को गहरे छू जाता है ये गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 390/2010/90

नंद बक्शी पर केन्द्रित लघु शृंखला 'मैं शायर तो नहीं' के अंतिम कड़ी पर हम आज आ पहुँचे हैं। आज जो गीत हम आप को सुनवा रहे हैं, उसका ज़िक्र छेड़ने से पहले आइए आपको बक्शी साहब के अंतिम दिनों का हाल बताते हैं। अप्रैल २००१ में एक हार्ट सर्जरी के दौरान उन्हे एक बैक्टेरियल इन्फ़ेक्शन हो गई, जो उनके पूरे शरीर में फैल गई। इस वजह से एक एक कर उनके अंगों ने काम करना बंद कर दिया। अत्यधिक पान, सिगरेट और तम्बाकू सेवन की वजह से उनका शरीर पूरी तरह से कमज़ोर हो चुका था। बक्शी साहब ने अपने आख़िरी हफ़्तों में इस बात का अफ़सोस भी ज़ाहिर किया था कि काश गीत लेखन के लिए उन्होने इन सब चीज़ों का सहारा ना लिया होता! उन्होने ४ अप्रैल २००१ को अपने दोस्त सुभाष घई साहब के साथ एक सिगरेट पी थी, और वादा किया था कि यही उनकी अंतिम सिगरेट होगी, पर वे वादा रख ना सके और इसके बाद भी सिगरेट पीते रहे। जीवन के अंतिम ७ महीने वे अस्पताल में ही रहे, और उन्हे इस बात से बेहद दुख हुआ था कि उनके ज़्यादातर नए पुराने निर्माता, दोस्त, टेक्नीशियन, संगीतकार और गायक, जिनके साथ उन्होने दशकों तक काम किया, उनसे मिलने अस्पताल नहीं आए। ७१ वर्ष की आयु में आनंद बक्शी ने मुंबई के नानावती अस्पताल में ३० मार्च २००२ के दिन दम तोड़ दिया। उनके करीबी मित्रों का यह रवैया शायद बक्शी साहब ने बरसों पहले ही अपने उस गीत में लिखा डाला था कि "नफ़रत की दुनिया को छोड़ के प्यार की दुनिया में ख़ुश रहना मेरे यार, इस झूठ की नगरी से तोड़ के नाता जा प्यारे, अमर रहे तेरा प्यार"।

गीतकार आनंद बक्शी के सीधे सरल गीत इतने असरदार हैं कि श्रोताओं के दिलों पर एक अमिट छाप छोड़े बिना नहीं रहते। ज़रा याद कीजिए पंकज उधास का गाया फ़िल्म 'नाम' का वह गाना जिसे जब भी सुना जाए तो आँखों में पानी भर ही आता हैं। इस गीत में बक्शी साहब ने अपने वतन और अपने घर की अहमियत लोगों को समझाने की कोशिश की है। अपने घर परिवार की अहमियत क्या होती है, यह उनसे बेहतर भला कौन जाने जिन्होने अपने सपनों को साकार करने के लिए घर से भाग आए थे! आज हम फ़िल्म 'नाम' के इसी कालजयी गीत को सुनने जा रहे हैं "चिट्ठी आई है वतन से", जिसके संगीतकार हैं लक्ष्मीकांत प्यारेलाल। कुछ कुछ इसी अंदाज़ पर बक्शी साहब ने 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे' फ़िल्म में "घर आजा परदेसी तेरा देस बुलाए रे" गीत लिखा था, जिसे भी काफ़ी मकबूलियत हासिल हुई थी। वक़्त बदला, फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के वो सारे संगीतकार एक एक कर बिछड़ते चले गए। इस बदलते दौर और बदलते मिज़ाज को बख़ूबी अपनाया गीतकार आनंद बक्शी ने और नए माहौल और नए संगीतकारों के साथ भी उनकी ट्युनिंग् क़ाबिल-ए-तारीफ़ रही। नदीम श्रवण, ए. आर. रहमान, अनु मलिक, उत्तम सिंह, जतिन ललित जैसे संगीतकारों की धुनों को लोकप्रिय बोलों से संवारा है बक्शी साहब ने। आज बक्शी साहब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन हमारे साथ हैं उनकी जादूई क़लम से निकले हुए बेशुमार और बेमिसाल नग़में जिनकी गूंज युगों युगों तक सुनाई देती रहेगी। आज मुझे बक्शी साहब के लिखे एक गीत के बोल याद आ रहे हैं - "फूल खिलते हैं, लोग मिलते हैं, मगर पतझड़ में जो फूल मुर्झा जाते हैं, वो बहारों के आने से खिलते नहीं, कुछ लोग एक रोज़ जो बिछड़ जाते हैं, वो हज़ारों के आने से मिलते नहीं, उम्र भर चाहे कोई पुकारा करे उनका नाम, वो फिर नही आते, वो फिर नहीं आते"। इसी के साथ 'मैं शायर तो नहीं' शृंखला को समाप्त करने की दीजिए हमें इजाज़त, और आप सुनिए फ़िल्म 'नाम' से "चिट्टी आई है वतन से"। वाकई ऐसा गीत लिख कर कोई भी गीतकार फक्र से मर सकता है.



क्या आप जानते हैं...
कि आनंद बक्शी जब अपने अंतिम दिनों में अस्पताल में थे, तब अस्पताल का एक स्वीपर ने उनकी बहुत सेवा की थी। जब बक्शी साहब की बेटी ने उस स्वीपर को टिप देनी चाही ताकि वो बक्शी साहब की तरफ़ और ज़्यादा ध्यान दे, तो उस स्वीपर ने टिप लेने से ये कहकर इंकार कर दिया कि वो यूँहीं अपने गुरु की सेवा कर खुश है

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है -"हाथ", गीत बताएं -३ अंक.
2. दो गायिकाओं का गाया युगल गीत है ये इनमें से एक हैं शमशाद बेगम, दूसरी गायिका का नाम बताएं - ३ अंक.
3. १९४६ में आई इस फिल्म के संगीतकार कौन है -२ अंक.
4. दो बाल कलकारों पर फिल्माए इस गीत कि किसने लिखा है -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
अवध जी आप २ अंक दूर हैं अर्ध शतक से, और अनीता जी भी बस २ अंक दूर हैं डबल फिगर से. इंदु जी ३ अंक कमा कर शरद जी के करीब पहुँचने की कोशिश में हैं तो पदम सिंह जी आपसे कैसे भूल हो गयी कल. चलिए ये भी हिस्सा है खेल का...अरे पूर्वी जी...कहाँ थे आप इतने दिनों....सच मानिये आपकी कमी हमें बहुत खली....चलिए अब आये हैं तो कुछ दिन रुक के जाईयेगा :),आनंद लीजिए कल से नयी शृंखला का

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

कहते हैं अगले ज़माने में कोई "मीर" भी था.. हामिद अली खां के बहाने से मीर को याद किया ग़ालिब ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७७

ज की महफ़िल बाकी महफ़िलों से अलहदा है, क्योंकि आज हम "ग़ालिब" के बारे में कुछ नया नहीं बताने जा रहे..बल्कि माहौल को खुशनुमा बनाने के लिए (क्योंकि पिछली छह महफ़िलों से हम ग़ालिब की लाचारियाँ हीं बयाँ कर रहे हैं) "बाला दुबे" का लिखा एक व्यंग्य "ग़ालिब बंबई मे" आप सबों के सामने पेश करने जा रहे हैं। अब आप सोचेंगे कि हमें लीक से हटने की क्या जरूरत आन पड़ी। तो दोस्तों, व्यंग्य पेश करने के पीछे हमारा मकसद बस मज़ाकिया माहौल बनाना नहीं है, बल्कि हम इस व्यंग्य के माध्यम से यह दर्शाना चाहते हैं कि आजकल कविताओं और फिल्मी-गानों की कैसी हालत हो गई है.. लोग मक़बूल होने के लिए क्या कुछ नहीं लिख रहे. और जो लिखा जाना चाहिए, जिससे साहित्य में चार-चाँद लगते, उसे किस तरह तिलांजलि दी जा रही है। हमें यकीन है कि आपको महफ़िल में आया यह बदलाव नागवार नहीं गुजरेगा.. तो हाज़िर है यह व्यंग्य: (साभार: कादंबिनी)

दो चार दोस्तों के साथ मिर्ज़ा ग़ालिब स्वर्ग में दूध की नहर के किनारे शराबे तहूर (स्वर्ग में पी जाने वाली मदिरा) की चुस्कियाँ ले रहे थे कि एक ताज़ा–ताज़ा मरा बंबइया फ़िल्मी शायर उनके रू-ब-रू आया, झुक कर सलाम वालेकुम किया और दोजानू हो कर अदब से बैठ गया। मिर्ज़ा ने पूछा, 'आपकी तारीफ़?' बंबइया शायर बोला, 'हुज़ूर मैं एक हिंदुस्तानी फ़िल्मी शायर हूँ। उस दिन मैं बंबई के धोबी तालाब से आ रहा था कि एक शराबी प्रोडयूसर ने मुझे अपनी मारुति से कुचल डाला।'

ग़ालिब बोले, 'मुबारिक हो मियाँ जो बहिश्त नसीब हुआ वर्ना आधे से ज़्यादा फ़िल्म वाले तो जहन्नुम रसीद हो जाते हैं। ख़ैर, मुझे कैसे याद फ़रमाया।'
बंबइया शायर बोला, 'हुज़ूर, आप तो आजकल वाकई ग़ालिब हो रहे हैं। क़रीब तीस साल पहले आप पर फ़िल्म बनी थी जो खूब चली और आजकल आप 'सीरियलाइज़्ड' हो रहे हैं।' मिर्ज़ा ग़ालिब समझे नहीं। पास बैठे दिल्ली के एक फ़िल्म डिस्ट्रीब्यूटर के मुंशी ने उन्हें टीवी के सीरियल की जानकारी दी।

मिर्ज़ा गहरी साँस छोड़ कर बोले, 'चलो कम से कम मरने के बाद तो मेरी किस्मत जागी, मियाँ। वर्ना जब तक हम दिल्ली में रहे कर्ज़ से लदे रहे, खुशहाली को तरसे और कभी इसकी लल्लो–चप्पो की तो कभी उसकी ठोड़ी पर हाथ लगाया।'
'अरे हुज़ूर, अब तो जिधर देखो आप ही आप महक रहे है,' बंबइया शायर बोला। फिर फ़िल्मी शायर ने अपनी फ्रेंच कट दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए कहा, 'अगर हुज़ूर किसी तरह खुदा से कुछ दिनों की छुट्टी लेकर बंबई जा पहुँचें तो बस यह समझ लीजे कि सोने से लद कर वापस आएँ। मेरी तो बड़ी तमन्ना है कि आप दो चार फ़िल्मों में 'लिरिक' तो लिख ही डालें।' आस पास बैठे चापलूसों ने भी उसकी बात बड़ी की ओर न जाने कौन-सा फ़ितूर मिर्ज़ा के सर पर चढ़ा कि वे तैयार हो गए।

दूसरे दिन बाकायदा अल्ला मियाँ के यहाँ मिर्ज़ा और उनके तरफ़दार जा पहुँचे और कह–सुन कर उन्होंने अल्ला मियाँ को पटा लिया। जिसका नतीजा यह हुआ कि मिर्ज़ा ग़ालिब को तीस दिन की 'अंडर लीव' मय टीए डीए के दे दी गई और वे 'बहिश्त एअरलाइन' में बैठ कर बंबई के हवाई अड्‌डे पर जा उतरे।
°°°
बंबइया शायर ने उन्हें सारे अते–पते, और ठिकानों का जायज़ा दे ही रखा था, लिहाज़ा मिर्ज़ा ग़ालिब टैक्सी पकड़कर 'हिंदुस्तान स्टूडियोज़' आ पहुँचे। अंदर जाकर उन्होंने भीमजी भाई डायरेक्टर को उस स्वर्गवासी बंबइये शायर का ख़त दिया। भीम जी भाई उन्हें देखते ही अपने चमचे कांति भाई से बोल, क्या नसीरूद्दीन शाह का कांट्रैक्ट कैंसिल हो गया, कांतिभाई। ये नया बागड़ू मिर्ज़ाग़ालिब के मेकअप में कैसे?

कांतिभाई ने अपने चश्मे से झाँक कर देखा और बोले, 'वैसे मेकअप आप अच्छा किया है पट्‌ठे का। रहमान भाई ने किया लगता है। पर ये इधर कैसे आ गया? मिर्जा ग़ालिब का शूटिंग तो गुलज़ार भाई कर रहा है।'
तभी मिर्ज़ा ग़ालिब बोले, 'सहिबान, मैं एक्टिंग करने नहीं आया हूँ। मैं ही असली मिर्ज़ा गालिब हूँ, मैं तो फ़िल्म में शायरी करने आया हूँ जिसे शायद आप लोग 'लिरिक' कहते हैं।'
भीम जी भाई बोले, 'अच्छा, तो तुम लिरिक लिखते है।'
मिर्ज़ा बोले, 'जी हाँ।'

भीम जी भाई न फ़ौरन ही अपने असिस्टेंट मानिक जी को बुलाया और हिदायत दी, 'अरे सुनो मानिक जी भाई। इसे ज़रा परखो। 'लिरिक' लिखता है।' मानिक जी भाई ने ग़ालिब को घूर कर देखा और कहा, 'आओ मेरे साथ।'
मानिक जी ग़ालिब को बड़े हाल में ले गए जहाँ आधा दर्जन पिछलग्गुए तुकबंद बैठे थे। मानिक जी बोले, 'पहले सिचुएशन समझ लो।'
मिर्ज़ा बोले, 'इसके क्या मानी, जनाब।'
मानिक जी बोले, 'पहले हालात समझ लो और फिर उसी मुताबिक लिखना है। हाँ तो, हीरोइन हीरो से रूठी हुई बरगद के पेड़ के नीचे मुँह फुलाए बैठी है। उधर से हीरो आता है सीने पर हाथ रख कर कहता है कि तूने अपने नज़रिये की तलवार से मेरे दिल में घाव कर दिया है। अब इस सिचुएशन को ध्यान में रखते हुए लिख डालो एक गीत।'
मिर्ज़ा ग़ालिब ने काग़ज़ पर लिखना शुरू किया और पाँच मिनट बाद बोले, सुनिए हज़रत, नहीं ज़रियते राहत ज़राहते पैकां
यह ज़ख्मे तेग है जिसको कि दिलकुशा कहिए
नहीं निगार को उल्फ़त, न हो, निगार तो है
रवानिए रविशो मस्तिए अदा कहिए

मिर्ज़ा की इस लिरिक को सुनते ही मानिक जी भाई का ख़ास चमचा पीरूभाई दारूवाला बोला, 'बौस, ये तो पश्तो में गीत लिखता है। मेरे पल्ले में तो कुछ पड़ा नहीं, तुम्हारे भेजे में क्या घुसा काय?'
मानिक जी बौखला कर बोले, 'ना जाने कहाँ से चले आते हैं फ़िल्मों में। देखो मियाँ इस तरह ऊल-जलूल लिरिक लिख कर हमें क्या एक करोड़ की फ़िल्म पिटवानी है।'
पर हुज़ूर, मिर्ज़ा बोले, 'मैं आपको अच्छे पाए की शायरी सुना रहा हूँ।'

ये पाए की शायरी है या चौपाये की, मानिक जी लाल पीले होकर बोले, 'तुमसे पहले भी एक पायेदार शायर आया था–क्या नाम था उसका – हाँ, याद आया,जोश। वह भी तुम्हारे माफ़िक लंतरानी बकता था और जब उसकी अकल ठिकाने आई तब ठीक-ठीक लिखने लगा था।'
पीरूजी दारूवाला बोला, 'उसका वह गाना कितना हिट गया था बौस– हाय, हाय। क्या लिखा था ज़ालिम ने, मेरे जुबना का देखो उभार ओ पापी।'
ग़ालिब बोले, 'क्या आप जोश मलीहाबादी के बारे में कह रहे है? वो तो अच्छा ख़ासा कलाम पढ़ता था। वह भला ऐसा लिखेगा।'
'अरे हाँ, हाँ। उसी जोश का मैं ज़िक्र कर रहा हूँ,' मानिक जी भाई बोला, 'बंबई की हवा लगते ही वह रोगनजोश बन गया था।'
तभी पीरूभाई बोले, 'देखो भाई, हमारा टाइम ख़राब मत करो। हमें कायदे के गीत चाहिए। ठहरो तुम्हें कुछ नमूने सुनाता हूँ।'
पीरूभाई दारूवाला ने पास खड़े म्यूज़िक डायरेक्टर बहरामजी महरबानजी को इशारा किया। तभी आर्केस्ट्रा शुरू हो गया। पहले तो आर्केस्ट्रा ने किसी ताज़ा अमरीकन फ़िल्म से चुराई हुई विलायती धुन को तोड़ मरोड़ कर ऐसा बजाया कि वह 'एंगलोइंडियन' धुन बन गई। उसके बाद हीरो उठा और कूल्हे मटका–मटका कर डांस करने लगा। हीरोइन भी बनावटी ग़ुस्से में उससे छिटक–छिटक कर दूर भागती हुई नखरे दिखाने लगी। तभी माइक पर खड़े सिंगर ने गाना शूरू कर दिया – तेरे डैडी ने दिया मुझे परमिट तुझे फँसाने का
इश्क का नया अंदाज़ देखकर ग़ालिब बोले, 'अस्तग़फरूल्ला, क्या आजकल हिंदुस्तान में वालिद अपने बरखुरदार को इस तरह लड़कियाँ फँसाने की राय देते हैं?'
पीरूभाई बोले, 'मियाँ वो दिन गए जब ख़लील खाँ फाख़्ते उड़ाते थे। हिंदुस्तान में तरक्की हम लोगों की बदौलत हुई है। हमारी ही बदौलत आज बाप बेटे शाम को एक साथ बैठ कर विस्की की चुस्की लेते हैं। होटलों में साथ-साथ लड़कियों के संग डिस्को करते है।'
मानिक जी भाई बोले, 'इसे ज़रा चलत की चीज़ सुनाओ, पीरूभाई।'
पीरूभाई ने फिर म्यूज़िक डायरेक्टर को इशारा किया और आर्केस्ट्रा भनभना उठा। ले जाएगे ले जाएगे, दिल वाले दुल्हनिया ले जाएँगे'
ग़ालिब गड़बड़ा गए। 'क्या आजकल शादी के मौके पर ऐसे गीत गाए जाते हैं?'
पीरूभाई बोले, 'मियाँ, गीत तो छोड़ो, बारात में दूल्हे का बाप और जो कोई भी घर का बड़ा बूढ़ा ज़िंदा हो, वह तक सड़क पर वह डांस दिखाता है कि अच्छे-अच्छे कत्थक कान पर हाथ लगा लें। अरे मर्दों की छोड़ो दूल्हे की दो मनी अम्मा भी सड़क पर ऐसे नाचती है जैसे रीछ। देखो नमूना।'
और मिर्ज़ा को आधुनिक भारतीय विवाह उत्सव का दृश्य दिखलाया गया, जिसमें दूल्हे के अब्बा–अम्मी दादा–दादी बिला वजह और बेताले होकर कूल्हे मटका-मटकाकर उलटी सीधी धमाचौकड़ी करने लगे।

मिर्ज़ा बोले, 'ऐसा नाच तो हमने सन सत्तावन के गदर से पहले बल्लीमारान के धोबियों की बारात में देखा था।'
पीरूभाई दारूवाला खिसियाकर बोले, 'ऐसी की तैसी में गए बल्लीमारान के धोबी मियाँ। आजकल तो घर-घर में यह डिस्को फलफूल रहा है। तभी मुस्कराते हुए मानिक भाई ने कहा, 'अरे, ज़रा पुरानी चाल की चीज़ भी सुनाओ।'
अबकी बार हीरोइन ने लहंगा फरिया पहन कर विशुद्ध उत्तर परदेशिया लोकनृत्य शैली की झलक दिखलाई और वैसे ही हाव–भाव करने लगी। तभी माइक पर किरनबेन गाने लगीं, झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में गीत ख़त्म होते ही मानिक भाई बोले, इसे कहते हैं लिरिक और म्यूज़िक का ब्लेंडिंग। इसके मुकाबले में लिखो तो जानें। बेमानी बक–बक में क्या रखा है।'
यह सुनकर ग़ालिब का चेहरा लाल हो गया। सहसा वे बांगो–पांगो और उसके बगल में बैठे ढोल वाले से ज़ोर से बोले—
तू ढोल बजा भई ढोल बजा।
यह महफ़िल नामाक़ूलों की।
लाहौल विला, लाहौल विला।

उनकी इस लिरिक की चाल को बांगो वाले ने फौरन ही बाँध लिया और उधर आर्केस्ट्रा भी गनगना उठा। मानिक जी भाई और पीरू भाई की बाँछें खिल गईं और वे सब मग्न होकर बक़ौल ग़ालिब 'धोबिया–नृत्य' करने लगे। और जब उनकी संगीत तंद्रा टूटी तो मानिक भाई बोले, वाह, वाह क्या बात पैदा की है ग़ालिब भाई।
पर तब तक ग़ालिब कुकुरमुत्ता हो और स्टूडियो से रफूचक्कर हो कर बहिश्त एअर लाइन की रिटर्न फ्लाइट का टिकट लेकर अपनी सीट पर बैठे बुदबुदा रहे थे —

न सत्ताईस की तमन्ना न सिले की परवाह
गर नहीं है मेरे अशआर में मानी न सही।

सच कहूँ तो इस व्यंग्य को पढने के बाद हीं मुझे मालूम हुआ कि "माननीय जोश मलीहाबादी" ने भी चालू किस्म के गाने लिखे थे.. मैं जोश साहब का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ/था, लेकिन अब समझ नहीं आ रहा कि मैं कितना सही हूँ/था और कितना गलत!! आखिर इस बदलाव का जिम्मेदार कौन है.. परिस्थितियाँ या फिर शायरों की बदली हुई मानसिकता। आप अपने दिल पर हाथ रखके इस प्रश्न का जवाब ढूँढने की कोशिश कीजिएगा। मुझे यकीन है कि जिस दिन हमें इस प्रश्न का जवाब मिलेगा, उसी दिन हमारे साहित्य/हमारे गीत सुरक्षित हाथों में लौट आएँगे। खैर.. हमारी गज़लें तो "ग़ालिब" के हाथों में सुरक्षित हैं और इसका प्रमाण ग़ालिब के ये दो शेर हैं। मुलाहज़ा फ़रमाईयेगा:

ज़िन्दगी यूँ भी गुज़र ही जाती
क्यों तेरा राहगुज़र याद आया

मैंने मजनूं पे लड़कपन में 'असद'
संग उठाया था कि सर याद आया


ग़ालिब की बातें हो गई, दो(या फिर तीन?) शेर भी हो गएँ, अब क्यों न हम ग़ालिब के हवाले से "ग़ालिब के गुरू" मीर तक़ी "मीर" को याद कर लें। "कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था" - इन पंक्तियों से ग़ालिब ने अपने गुरू को जो श्रद्धांजलि दी है, उसकी मिसाल देने में कई तहरीरें कम पड़ जाएँगी। इसलिए अच्छा होगा कि हम खुद से कुछ न कहें और "हामिद अली खां" साहब को हीं ग़ालिब की रूह उकेरने का मौका दे दें। तो पेश है "उस्ताद" की आवाज़ में "ग़ालिब" की "शिकायतों और इबादतों" से भरी यह गज़ल। हमारा दावा है कि आप इसे सुनकर भाव-विभोर हुए बिना रह न पाएँगे:

हुई ताख़ीर तो कुछ बाइसे-ताख़ीर भी था
आप आते थे, मगर कोई अनाँगीर भी था

तुम से बेजा है मुझे अपनी _____ का गिला
इसमें कुछ शाइबा-ए-ख़ूबी-ए-तक़दीर भी था

तू मुझे भूल गया हो, तो पता बतला दूँ
कभी फ़ितराक में तेरे कोई नख़चीर भी था

रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो "ग़ालिब"
कहते हैं अगले ज़माने में कोई "मीर" भी था




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "कायल" और शेर कुछ यूँ था-

रगों में दौड़ने-फिरने के हम नहीं कायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

गज़ल से गुजरकर इस शेर को सबसे पहले पहचाना "तपन" जी ने, लेकिन पिछली बार की हीं तरह इस बार भी सही जवाब देने के बावजूद पहला प्रवेशी विजयी नहीं हो सका,क्योंकि इस महफ़िल में शेर के बिना आना अपशगुन माना जाता है :) इस वज़ह से "शरद" जी इस बार भी "शान-ए-महफ़िल" बने। शरद जी, आपने महफ़िल में ये शेर पेश किए:

हर एक चेहरे को ज़ख्मों का आईना न कहो
ये ज़िन्दगी तो है रहमत, इसे सज़ा न कहो ...
मैं वाकीयात की ज़ंजीर का नही कायल
मुझे भी अपने गुनाहों का सिलसिला न कहो ... (राहत इन्दौरी)

सीमा जी, आपके इन शेरों के क्या कहने! नख-शिख हैं चमत्कृत बिन गहने!!

शिकवा-ए-शौक करे क्या कोई उस शोख़ से जो
साफ़ कायल भी नहीं, साफ़ मुकरता भी नहीं (फ़िराक़ गोरखपुरी )

हम तो अब भी हैं उसी तन्हा-रवी के कायल
दोस्त बन जाते हैं कुछ लोग सफ़र में खुद ही (नोमान शौक़ )

सुमित जी, हमें खुशी है कि हम किसी न किसी तरह से आपकी ज़िदगी का हिस्सा बन गए हैं.. आपको एफ़ एम की कमी नहीं खलती और आप जैसे शुभचिंतकों के कारण हमें "इश्क-ए-बेरहम" की कमी नहीं खलती :)

मंजु जी, मेरा मन आपकी इन पंक्तियों का कायल हो गया:

जब से तुम मेरे दिल में उतरे हो ,
मेरा शहर दीवानगी का कायल हो गया .

अवनींद्र जी, आपको पढकर ऐसा नहीं लगता कि किसी नौसिखिये को पढ रहा हूँ। आपमें वह माद्दा है, जो अच्छे शायरों में नज़र आता है, बस इसे निखारिये। ये रहे आपके शेर:

मेरे महबूब मैं तेरा कायल तो बहुत था
पर अफ़सोस.., मैं तेरे काबिल ना हो सका

कौन कहता है कायल हूँ मैं मैखाने का
सूरत -ऐ -साकी ने दीवाना बना रखा है
घूमता रहता है वो शमा के इर्द गिर्द बेबस
या खुदा किस मिटटी से परवाना बना रखा है (क्या बात है.....शुभान-अल्लाह!)

शन्नो जी और नीलम जी, महफ़िल को खुशगवार बनाए रखने के लिए आप दोनों का तह-ए-दिल से शुक्रिया। अपनी यह उपस्थिति इसी तरह बनाए रखिएगा।

आसमां की ऊंचाइयों के कायल हुये हैं
जमीं पर कदम जिनके पड़ते नहीं हैं. (शन्नो जी, कमाल है.. थोड़ी-सी चूक होती और मेरी नज़रों से आपका यह शेर चूक जाता..फिर मैं अफ़सोस हीं करता रह जाता.. बड़ी हीं गूढ बात कहीं है आपने)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, March 30, 2010

सोलह बरस की बाली उमर को सलाम....और सलाम उन शब्दों के शिल्पकार को

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 389/2010/89

'मैंशायर तो नहीं' शृंखला में आनंद बक्शी साहब के लिखे गीतों का सिलसिला जारी है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर। आज ३० मार्च है। आज ही के दिन सन् २००२ को आनंद बक्शी साहब इस दुनिया-ए-फ़ानी को हमेशा हमेशा के लिए छोड़ गए थे। और अपने पीछे छोड़ गए असंख्य लोकप्रिय गीत जो दुनिया की फ़िज़ाओं में हर रोज़ गूँज रहे है। ऐसा लगता ही नहीं कि बक्शी साहब हमारे बीच नहीं हैं। सच भी तो यही है कि कलाकार कभी नही मरता, अपनी कला के ज़रिए वो अमर हो जाता है। इस शृंखला में अब तक आपने कुल ८ गीत सुनें, जिनमें से तीन ६० के दशक के थे और पाँच गानें ७० के दशक के थे। सच भी यही है कि ७० के दशक में बक्शी साहब ने सब से ज़्यादा हिट गीत लिखे। ८० के दशक में भी उनके कलम की जादूगरी जारी रही। तो आज से अगले दो अंकों में हम आपको दो गीत ८० के दशक से चुन कर सुनवाएँगे। आज एक ऐसी फ़िल्म के गीत की बारी जिस फ़िल्म के गीतों ने ८० के दशक के शुरु शुरु में तहलका मचा दिया था। लता मंगेशकर और एस. पी. बालासुब्रह्मण्यम मुख्य रूप से इस फ़िल्म के गीतों का गाया, और संगीतकार थे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल। 'एक दूजे के लिए', जी हाँ, १९८१ की इस फ़िल्म के "तेरे मेरे बीच में" गीत के लिए बक्शी साहब को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था। आज हम इसी फ़िल्म का गीत सुनेंगे, लेकिन यह गीत नहीं, बल्कि शायद इससे भी बेहतर एक गीत, जिसे मुख्य रूप से तो लता जी ने ही गाया है, लेकिन शुरुआती बोल अनुप जलोटा की आवाज़ में है। "सोलह बरस की बाली उमर को सलाम, मैं प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम"। यह गीत बक्शी साहब के पसंदीदा गीतों में से एक है, और कहने की ज़रूरत नहीं कि यह मेरा बक्शी साहब का लिखा सब से पसंदीदा गीत रहा है। इस गीत की खासियत ही यह है कि जैसे जैसे गीत को सुनते जाते हैं, इसके बोलों में बहते चले जाते हैं। एक शब्द से दूसरे शब्द, दूसरे से तीसरे में। एक धारा की तरह है यह गीत जिसमें एक बार बह निकले तो अंजाम तक पहुँच कर ही होश वापस आता है। एक जुनून है इस गीत में, और साथ ही साथ आध्यात्मिकता भी है। पैशन और स्पिरिचुयलिटी। प्यार का पक्ष लेकर ज़माने से एक तरह की बग़ावत करता है यह गीत। हर उस शख़्स, या चीज़, यहाँ तक कि वक़्त को भी सलाम करता है यह गीत जिसने भी प्यार की रवायत को आगे बढ़ाया। जुदाई करवाने वाले वक़्त का भी शुक्रिया अदा किया जा रहा है क्योंकि यह भी प्यार का ही एक पक्ष है। यह एक ऐसा गीत है कि जिसका एक एक शब्द हमें सोचने पर मजबूर कर देती है। इसलिए आगे बढ़ने से पहले पेश है इस गीत के पूरे बोल:

कोशिश करके देख ले दरिया सारे नदियाँ सारी,
दिल की लगी नहीं बुझती, बुझती है हर चिंगारी।

सोलह बरस की बाली उमर को सलाम,
ए प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम।

दुनिया में सब से पहले जिसने यह दिल दिया,
दुनिया के सब से पहले दिलबर को सलाम,
दिल से निकलने वाले रस्ते का शुक्रिया,
दिल तक पहुँचने वाली डगर को सलाम,
ए प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम।
जिसमें जवान होकर बदनाम हम हुए,
उस शहर उस गली उस घर को सलाम,
जिसने हमें मिलाया जिसने जुदा किया,
उस वक़्त उस घड़ी उस गजर को सलाम,
ए प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम।
मिलते रहें यहाँ हम ये है यहाँ लिखा,
इस लिखावट की ज़ेर-ओ-ज़बर को सलाम,
साहिल की रेत पर युं लहरा उठा ये दिल,
सागर में उठने वाली हर लहर को सलाम,
इन मस्त गहरी गहरी आँखों की झील में,
जिसने हमें डुबोया उस भँवर को सलाम,
घुंघट को छोड़ कर जो सर से सरक गई,
ऐसी निगोड़ी धानी चुनर को सलाम,
उल्फ़त के दुश्मनों ने कोशिश हज़ार की,
फिर भी नहीं झुकी जो उस नज़र को सलाम,
ए प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम।

दोस्तों, इन शब्दों को पढ़ने के बाद आप भी मेरी यह बात ज़रूर मानेंगे कि आनंद बक्शी काव्य के किसी एक रंग के अधीन रह कर गीतों की रचना नहीं की। वो एक स्वतंत्र गीतकार थे। रुमानी गीत हो या ग़ज़ल, देश प्रेम का गीत हो या फिर कोई और रंग, आनंद बक्शी की कोई सीमा नहीं थी। और इस प्रस्तुत गीत में तो उन्होने कमाल ही कर दिया है। बक्शी साहब यह ज़रूर मानते थे कि एक गीतकार को दिल से एक शायर होना चाहिए और वो वही थे, विचारों से शायर और शब्दों से गीतकार। उन्होने सदा यह कामयाब संतुलन बनाकर गीत लिखने की नई मिसाल पैदा की। वो बड़ी से बड़ी बात को इस सहजता से अपने गीतों में कह जाते थे कि इन पंक्तियों को किसी अन्य शब्दों से बदलना असंभव हो जाता था। इस बात का आज के प्रस्तुत गीत से बढ़कर और क्या उदाहरण हो सकता है भला! तो आइए अब इस जुनूनी गीत को सुना जाए। लता जी के स्वर ने क्या ख़ूब न्याय किया है बक्शी साहब के बोलों का, और एल.पी की धुन और ऒर्केस्टेशन है जैसे सोने पे सुहागा। आँखें मूंद कर इस गीत को सुनिएगा, और गीत के ख़त्म होने के बाद जब आप अपनी आँखें खोलेंगे कि उन्हे नम पाएँगे। यक़ीन मानिए... चलते चलते आनंद बक्शी साहब को उनकी पुण्यतिथि पर 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से हम स्मृति सुमन अर्पित करते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि आनंद बक्शी के नाती आदित्य दत्त ने जब फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में क़दम रखा तो उन्होने अपनी फ़िल्म का शीर्षक रखा 'आशिक़ बनाया आपने', जो कि प्रेरीत था बक्शी साहब के लिखे फ़िल्म 'कर्ज़' के गीत एक गीत से-"दर्द-ए-दिल दर्द-ए-जिगर दिल में जगाया आपने, पहले तो मैं शायर था आशिक़ बनाया आपने"।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. एक अंतरे में शब्द आता है -"शमशान", गीत बताएं -३ अंक.
2. ये गीत इस गायक के जीवन का शायद सबसे हिट गीत रहा, गायक कौन हैं- २ अंक.
3. इस फिल्म के निर्देशक का नाम बताएं -२ अंक.
4. संगीतकार जोड़ी है लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की, फिल्म में दो नायक हैं, नाम बताएं-२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
सब विजेताओं को बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, March 29, 2010

अब के सजन सावन में....बरसेंगे गीत ऐसे सुहाने, बख्शी साहब की कलम के

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 388/2010/88

नंद बक्शी साहब की बस यही सब से बड़ी खासियत रही कि जब जिस सिचुयशन के लिए उनसे गीत लिखने को कहा गया, उस पर पूरा पूरा न्याय करते हुए ना केवल उन्होने गीत लिखे बल्कि गीत को मक़बूल कर के भी दिखाया। आम सिचुयशनों से हट के जब भी कोई इस तरह की सिचुयशन आई, बक्शी साहब ने हर बार कमाल कर दिखाया। अब फ़िल्म 'चुपके चुपके' का ही वह गीत ले लीजिए, "अब के सजन सावन में, आग लगेगी बदन में"। इस फ़िल्म की कहानी से तो आप सभी वाकीफ़ हैं, और आए दिन टी.वी पे यह फ़िल्म दिखाई जाती रहती है। तो इस गाने के सिचुयशन से भी आप वाकीफ़ होंगे। एक तरफ़ नायिका (शर्मीला) के परिवार वाले उनसे एक पारिवारिक पार्टी में गीत गानें का अनुरोध करते हैं। दूसरी तरफ़ कमरे के बाहर, दरवाज़े के पीछे छुप कर ड्राइवर बने शर्मीला के पति (धर्मेन्द्र) भी इंतज़ार में है अपनी पत्नी से गीत सुनने के लिए। सिर्फ़ शर्मीला को ही पता है कि कमरे के बाहर धर्मेन्द्र खड़े हैं। तो इस सिचुयशन पर एक ऐसे गीत की ज़रूरत है कि जिसमें पार्टी में मौजूद लोगों का भी मनोरंजन हो जाए और शर्मीला अपने दिल की बात धर्मेन्द्र तक पहुँचा भी सके। यह एक हास्य रस से भरी फ़िल्म थी, इसलिए इस गीत में भी चुलबुलापन और नटखटपन की आवश्यक्ता थी। ऐसे में गीतकार आनंद बक्शी साहब की कलम चल पड़ी और देखिये क्या ख़ूब गीत लेकर आए। क्योंकि कहानी में नायक और नायिका का मिलन संभव नहीं हो पा रहा (नायक के ड्राइवर रूप धारण करने की वजह से), ऐसे में सावन के महीने में जो व्याकुलता दिल में जागने वाली है, उसी तरफ़ इशारा किया गया है। "तेरे मेरे प्यार का यह साल बुरा होगा, जब बहार आएगी तो हाल बुरा होगा, रात भर जलाएगी ये मस्त मस्त पवन, सजन मिल ना सकेंगे दो मन एक ही आंगन में"। लता मंगेशकर की आवाज़ ने जुदाई के दर्द को बड़े ही शरारत भरे अंदाज़ में क्या ख़ूब उभारा है और सचिन देव बर्मन के संगीत के तो क्या कहने। बंगाल के लोक धुन पर आधारित यह गीत दिल को जहाँ एक तरफ़ गुदगुदा जाती है, उतना ही सुकून भी देती है। वैसे इस फ़िल्म के दूसरे सभी गानें भी बेहद ख़ूबसूरत हैं, जैसे कि लता जी का ही गाया "चुपके चुपके चल री पुरवईया", लता-मुकेश का गाया "बाग़ों में कैसे ये फूल खिलते हैं" और रफ़ी-किशोर का गाया "सा रे गा मा"। तो आज 'मैं शायर तो नहीं' शृंखला में बक्शी साहब के लिखे "अब के सजन सावन में" की बारी।

क्योंकि आज आनंद बक्शी साहब के बोल सज रहे हैं लता जी के होठों पर, तो चलिए आज जान लेते हैं कि बक्शी साहब का क्या कहना है सुरों की मलिका के बारे में- "लता मंगेशकर का नाम किसी तारुफ़ का मोहताज नहीं, लेकिन जी चाहता है कि कुछ कहूँ। इतना ही कहूँगा कि हम सब ख़ुशक़िस्मत हैं कि हमारे बीच लता मंगेशकर जैसी आर्टिस्ट मौजूद हैं। उनकी आवाज़ को सुनकर जी करता है कि अच्छे अच्छे गीत लिखें और धुनें बनाएँ। वो कभी कभी पूछती हैं कि ये लफ़्ज़ कैसे कहना है, तो मैं उनसे कहता हूँ कि आप जैसे कहेंगी, वैसा ही ये कहा जाएगा! पंजाबी लफ़्ज़ भी वो इतना ख़ूबसूरत बोलती हैं कि ऐसा लगता है जैसे कोई पंजाबी लड़की हों।" देखा दोस्तों आपने कि लता जी की आवाज़ भी गीतकारों और संगीतकारों के लिए प्रेरणा स्त्रोत बनी हैं। और आनंद बक्शी साहब का यह बड़प्पन ही कहना पड़ेगा कि ख़ुद इतने बड़े गीतकार होते हुए भी यह श्रेय उन्होने लता जी को दिया। यही बड़प्पन और विनम्रता तो इंसान को सफलता की बुलंदी तक पहुँचाता है, ठीक वैसे ही जैसे बक्शी साहब पहुँचे हैं। तो आइए सुनते हैं लता जी, सचिन दा और बक्शी साहब की तिकड़ी का यह सदाबहार गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि आनंद बक्शी ने अंत तक सुभाष घई निर्देशित सभी १३ फ़िल्मों के गीत लिखे। पहली फ़िल्म थी 'गौतम गोविंदा' (१०७९) और अंतिम फ़िल्म थी 'यादें' (२००१)

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. गीत के शुरूआती दो मिसरों में कहीं ये शब्द आता है -"चिंगारी", गीत बताएं -३ अंक.
2. इस गीत में लता का साथ दिया है एक ऐसे गायक ने जो भजन गायन के लिए अधिक जाने जाते हैं, कौन हैं ये- २ अंक.
3. इस फिल्म के अन्य गीत के लिए बख्शी साहब को फिल्म फेयर मिला था, फिल्म बताएं-२ अंक.
4. इस प्रेम कहानी के नायक नायिका कौन थे -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी आपकी चोरी पकड़ी गयी....खैर ३ अंक हम आपको अवश्य देंगें, साथ में अनीता जी और पाबला जी को भी बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

विंटेज रहमान, ठन्डे शंकर, और सक्रिय शांतनु हैं आज के टी एस टी मेनू में

ताज़ा सुर ताल १३/२०१०

सजीव- 'ताज़ा सुर ताल' में आज एक नहीं बल्कि तीन तीन फ़िल्मो के गीत गूंजेंगे जो हाल ही में प्रदर्शित हुईं हैं। ये तीनों फ़िल्में एक दूसरे से बिल्कुल अलग है, एक दूजे से बिल्कुल जुदा है। सुजॊय, तुम्हे याद है एक दौर ऐसा था जब ए. आर. रहमान नए नए हिंदी फ़िल्मी दुनिया में आए थे और उस दौर में दक्षिण के कई फ़िल्मों को हिंदी में डब किया जा रहा था जिनमें रहमान का संगीत था।

सुजॊय - हाँ, जैसे कि 'हम से है मुक़ाबला', 'दुनिया दिलवालों की', 'रोजा' और बहुत सी ऐसी फ़िल्में जिन्हे हिंदी में डब किया गया था। इन फ़िल्मों के गानें ऒर्जिनली तमिल होने की वजह से इन्ही धुनों पर हिंदी के बोल लिखना भी एक चैलेंज हुआ करता था।

सजीव - हाँ, और यह काम उन दिनों भली भाँती कर लिया करते थे गीतकार पी.के. मिश्रा। ख़ैर, वह दौर तो गुज़र चुका है, लेकिन हाल में रहमान की धुनों वाली एक और मशहूर तमिल फ़िल्म को हिंदी में डब किया गया है। यह फ़िल्म है 'शिवाजी दि बॊस'।

सुजॊय - सजीव, मुझे याद है २००७ के जून महीने में मैं अपने काम के सिलसिले में चेन्नई गया हुआ था, उन दिनों यह तमिल फ़िल्म वहाँ रिलीज़ हुई थी। मुझे अब भी याद है रजनीकांत के बड़े बड़े पोस्टर्स पूरे शहर भर में छाए हुए थे।

सजीव - बिल्कुल ठीक, १५ जून २००७ को यह फ़िल्म रिलीज़ हुई थी, और इसका हिंदी वर्ज़न रिलीज़ हुआ है ८ जनवरी २०१० को। वी.एम प्रोडक्शन्स निर्मित व एस. शंकर निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे रजनीकांत, श्रिया सरन, सुमन, विवेक, रघुवरण प्रमुख। ए. आर. रहमान ने न केवल फ़िल्म के गाने स्वरबद्ध किए बल्कि पार्श्व संगीत भी तैयार किया।

सुजॊय - तो सजीव, बात संगीत के चल पड़ी है तो आगे बढ़ने से पहले अपने श्रोताओं को सुनवा देते हैं इस फ़िल्म से एक गीत। इस गीत को सुनते हुए हिंदी प्रांत के श्रोताओं को एक अंदाज़ा हो जाएगा दक्षिण में चल रहे संगीत के बारे में। इसे गाया है ब्लाज़, रैग्ज़, तन्वी, सुरेश पीटर ने। इस गीत के तमिल वर्ज़न को विजय ने लिखा था।

गीत - स्टाइल


सुजॊय - 'शिवाजी दि बॊस' फ़िल्म एक सुप्रतिष्ठित सॊफ़्टवेयर सिस्टेम आर्किटेक्ट शिवाजी के इर्द गिर्द घूमती है, जो हाल ही में भारत लौटा है अमेरीका में अपना कार्य समाप्त कर। उसका सपना है कि भारत आकर वो इस समाज को मुफ़्त चिकित्सा व शिक्षा दिलवाए। लेकिन उसे यहाँ पर कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अब उसके पास अपने तरीके से इस करप्ट सिस्टेम का मुकाबला करना है। यही है इस फ़िल्म की मूल कहानी। इस फ़िल्म को उस समय तक का सब से महँगी फ़िल्म मानी गई जो ६० करोड़ की राशी में बनी थी, और इस फ़िल्म ने १०० करोड़ के उपर का व्यापार किया, यानी कि ४० करोड़ का मुनाफ़ा।

सजीव - अब इसी फ़िल्म का एक और गीत सुन लेते हैं जिसे हरिहरण और मधुश्री ने गाया है। मधुश्री ने युं तो बहुत कम फ़िल्मों में गाया हैं, लेकिन जितने भी गीत गाये हैं उनमें से ज़्यादातर ए. आर. रहमान के गानें हैं। यह गीत है "वाह जी वाह जी वाह जी, मेरा जीवन है शिवाजी"। इसका तमिल संस्करण भी इन्ही गायकों की आवाज़ों में है और उसे लिखा था वैरामुथु ने।

सुजॊय - गीत सुनने से पहले आपको बता दें कि २००८ में इस फ़िल्म को फ़िल्मफ़ेयर-दक्षिण अवार्ड्स में बहुत सारे पुरस्कार मिले। तमाम और पुरस्कारों के अलावा सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म और ए. आर. रहमान को सर्वश्रेष्ठ संगीतकर का पुरस्कार मिला था।

गीत - वाह जी वाह जी



सजीव - अब हम आते हैं आज की दूसरी फ़िल्म पर। 'कार्तिक कॊलिंग् कार्तिक'। इस फ़िल्म के रिलीज़ से पहले जिस तरह की उम्मीदें इससे की जा रहीं थीं, शायद उतनी यह फ़िल्म खरी नहीं उतरी और सिनेमाघरों से जल्दी ही यह फ़िल्म उतर गई। जहाँ तक संगीत का सवाल है, इस फ़िल्म के कम से कम दो गीतों ने लोगों के दिलों को ज़रूर छुआ।

सुजॊय - और इनमें से एक गीत ने लोगों के दिलों को ही नहीं, बल्कि कदमों को ज़रूर छुआ। जब शंकर अहसान लॊय का संगीत हो और जावेद अख़्तर के गीत हों, तो गानें अच्छे बनेंगे ही। तो सजीव, क्योंकि आज हम इस फ़िल्म का एक ही गीत सुनेंगे, इसलिए क्यों ना हम उसी गीत को यहाँ बजाएँ जो सब से ज़्यादा हिट रहा.

सजीव - बिल्कुल, "उफ़ तेरी अदा", यह गीत इन दिनों काफ़ी बज रहा है। शंकर महादेवन, अलिज़ा मेन्डोन्सा और साथियों की आवाज़ें हैं इस गाने में। मेरा ख़याल है कि गीत के बोलों पर ज़्यादा ध्यान ना देकर इसकी रिदम के साथ झूमना चाहिए, तभी इसे ज़्यादा एंजॊय किया जा सकेगा।

गीत - उफ़ तेरी अदा


सुजॊय - और अब आज की तीसरी व अंतिम फ़िल्म की बारी। यह फ़िल्म भी प्रदर्शित हो चुकी है, 'वेल डन अब्बा'। श्याम बेनेगल जैसे निर्देशक के फ़िल्म की और उनके फ़िल्मों के संगीत की भूमिका देने की आवश्यक्ता नहीं पड़ती। उनकी शुरुआती फ़िल्मों का संगीत देखिए और आज के दौर में बनी उनकी फ़िल्मों का संगीत, कितना फ़र्क आ गया है, लेकिन समानांतर सिनेमा का जो उनका स्टाइल है, वह उन्होने बरकरार रखा है।'ज़ुबेदा' और 'बोस दि फ़ॊरगोटेन हीरो' में उन्होने रहमान का संगीत लिया था, फिर उसके बाद वो मुड़ गए शान्तनु मोइत्र की तरफ़ जिनके साथ उन्होने इससे पहले 'वेलकम टू सज्जनपुर' में काम किया था। और अब ये दोनों साथ में फिर एक बार आए हैं 'वेल डन अब्बा' में।

सजीव - शान्तनु मोइत्र और उनके गीतकार जोड़ीदार स्वानंद किरकिरे का काम हमेशा ही उत्कृष्ट होता है। बहुत कम फ़िल्में करते हैं ये दोनों लेकिन हर एक फ़िल्म के गानें बहुत ख़ास हुआ करते हैं चाहे फ़िल्म चले या ना चले। '३ इडियट्स' की अपार सफलता के बाद अब ज़ाहिर है कि इस फ़िल्म के गीतों से भी लोग उमीदें ज़रूर लगाएँगे, लेकिन लोगों को यह भी याद रखना होगा कि '३ इडियट्स' एक व्यावसायिक फ़िल्म थी और 'वेल डन अब्बा' एक पैरलेल फ़िल्म है। इनका आपस में तुलना करना निरर्थक है।

सुजॊय - 'वेल डन अब्बा' के मुख्य कलाकार हैं बोमन इरानी, मिनिशा लाम्बा, रवि किशन और सोनाली। स्वानंद किरकिरे के अलावा अशोक मिश्र और इला अरुण ने भी इसमें गीत लिखे हैं। तो चलिए पहला गीत सुनते हैं इला अरुण और डैनियल जॊर्ज की आवाज़ों में "मेरी बन्नो होशियार"। यह एक शादी वाला गाना है और इसमें बोल भी गुदगुदाने वाले हैं।

सजीव - और पार्श्व में जो तेलुगू के शब्द आते है, उनसे भी गीत में एक ख़ास बात आ गई है। अच्छा सुजॊय इस गीत को सुनो और सुनने के बाद बताओ कि तुम्हे इस गीत से कौन सी पुरानी फ़िल्मी गीत की याद आई।

गीत - मेरी बन्नो होशियार


सुजॊय - सजीव, मुझे लगता है कि इस गीत की धुन मिलती जुलती है 'दो आँखें बारह हाथ' फ़िल्म में लता जी के गाए गीत "स‍इयां झूठों का बड़ा सरताज निकला" से। दरअसल क्या है कि इस तरह के उत्तर भारत के शादी वाले गीतों की धुन लगभग एक जैसी ही होती है जो लम्बे समय से चली आ रही है। धुन वही है लेकिन बोल बदलते जाते हैं। इसलिए हम यह नहीं कह सकते कि किसी तरह की 'ट्युन लिफ़्टिंग्' हुई है, बस यही कह सकते हैं कि इसे एक पारम्परिक धुन मान लें।

सजीव - ठीक कहा। और अब एक सुफ़ी शैली में बना गीत राघव और राजा हसन की आवाज़ में। रियल्टी शो से उभरे राजा हसन को आजकल मौके मिलने लगे हैं, हो सकता है कि धीरे धीरे वो सीढियाँ चढ़ते जाएँगे। यह गीत है "रहीमन इश्क का धागा रे, कबहूँ ना चटकाना रे"। रहीम के दोहों पर आधारित यह गीत सुनते हुए आपको अपने बचपन की याद ज़रूर आ जाएगी जब हिंदी के पाठ्यक्रम में रहीम और कबीर जैसे संतों के दोहों के पाठ हुआ करते थे।

सुजॊय - और इन दोहों में जीवन दर्शन के उपदेशों को कितनी ख़ूबसूरती के साथ प्रकृति से उदाहरण लेकर समझाया गया है। याद है फ़िल्म 'अखियों के झरोखों से' फ़िल्म में भी इसी तरह का एक दोहावलि गीत था जिसमें एक प्रतियोगिता में नायक और नायिका दोहों से एक दूसरे का मुकाबला करते हैं। उस गीत में पहला दोहा था "बड़े बड़ाई ना करे बड़े ना बोले बोल, रहीमन हीरा कब कहे लाख टका मेरो मोल"।

सजीव - और पता है 'अखियों के झरोखों से' के उस दोहावलि में भी इस दोहे का शुमार किया गया था, यानी कि "रहीमन इश्क का धागा रे..."। सचमुच, ये दोहे सुनकर बहुत सुकून मिलता है, और 'वेल डन अब्बा' के इस गीत में भी वही बात है। सुनते हैं।

गीत - रहीमन इश्क का धागा


"शिवाजी दा बॉस" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***
बोलों पर बिना ध्यान दिए यदि विंटेज रहमान को एक बार फिर सुनना चाहते हैं तो अल्बम खरीद लाईये. ये रहमान का वो अंदाज़ है जहाँ संगीत धुनों पर खुल कर बरसता है, हिंदी फिल्मों में रहमान बेहद संयम बरतते हैं साजों के चुनाव आदि के मामले में, यहाँ मेचुरिटी नज़र आती है, पर इस तरह की तमिल फिल्मों में जहाँ उन्हें बस "धाकड" संगीत देना होता है, वो लौट आते हैं अपने पुराने अंदाज़ में, ये वही अंदाज़ है.

"कार्तिक कौल्लिंग कार्तिक" के संगीत को आवाज़ रेटिंग **१/२
गीतकार संगीतकार की ये वो टीम है जिसने संगीत की दुनिया को एक से एक गीत दिए हैं, पर विडम्बना देखिये ये जोड़ी अब अपना चार्म खोती सी दिखाई दे रही है. नएपन् का सतत अभाव.

"वेल डन अब्बा" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***
अल्बम के लिहाज से न सही पर फिल्म की पठकथा के अनुरूप नज़र पड़ता है ये संगीत. यहाँ भी कोई नयापन नहीं है, पर गीत मधुर जरूर लगते हैं

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ३७- शिवाजी दि बॊस' ए.वी.एम की फ़िल्म थी। बताइए ए.वी.एम की पहली हिंदी फ़िल्म कौन सी थी और किस साल प्रदर्शित हुई थी?

TST ट्रिविया # ३८- एक ऐसा साल था जिस साल फ़िल्मफ़ेयर के अन्तर्गत जतिन ललित को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का पुरस्कार मिला था, और उसी साल ए. आर. रहमान को फ़िल्मफ़ेयर का आर. डी. बर्मन अवार्ड मिला था। बताइए वह कौन साल था और जतिन ललित और रहमान को किन किन फ़िल्मों के लिए ये पुरस्कार मिले थे?

TST ट्रिविया # ३९- रहीम का वह कौन सा दोहा है जिसमें बिगड़ी बात फिर ना बन पाने की बात कही गई है?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछली बार अल्बम के चयन को लेकर कुछ बात छिड़ी, देखिये हमारा काम नयी अल्बोम के संगीत के बारे में जानकारी देना है ये तो श्रोता ही बतायेंगें कि वो कितने सार्थक हैं. मुनीश जी और तन्हा जी आप दोनों के विचारों का हम स्वागत करते हैं. सीमा जी केवल एक ही जवाब. चलिए अन्य दो जवाब हम दिए देते हैं.
जिन ३ गीतों में हमने समानता पूछी थी उन तीनों गीतों के संगीतकार महिला हैं और उनकी आवाज़ भी इन गीतों में शामिल है। पहला गीत सरस्वती देवी का है (फ़िल्म" अछूत कन्या), दूसरा गीत उषा खन्ना (फ़िल्म: बिन फेरे हम तेरे)।
दिबाकर बनर्जी का टीवी सीरियल था 'नॊट ए नाइस मैन टू नो'.

Sunday, March 28, 2010

आदमी जो कहता है आदमी जो सुनता है....जिंदगी भर पीछा करते हैं कुछ ऐसे गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 387/2010/87

'मैंशायर तो नहीं' - गीतकार आनंद बक्शी पर केन्द्रित इस लघु शृंखला में आज जिस गीत की बारी है वह एक दार्शनिक गीत है। इस जॉनर के गानें भी बक्शी साहब ने क्या ख़ूब लिखे हैं। कुछ की याद दिलाएँ? "ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मुकाम, वो फिर नहीं आते", "आदमी मुसाफ़िर है, आता है जाता है", "दो रंग दुनिया के और दो रास्ते", "इक बंजारा गाए जीवन के गीत सुनाए", "गाड़ी बुला रही है सीटी बजा रही है, चलना ही ज़िंदगी है चलती ही जा रही है", "ये जीवन है, इस जीवन का, यही है रंग रूप", "दिए जलते हैं फूल खिलते हैं, बड़ी मुश्किल से मगर दुनिया में दोस्त मिलते हैं", और भी न जाने कितने ऐसे गीत हैं जिनमें ज़िंदगी के फलसफे को समेटा था बक्शी साहब ने। आज हम आपके लिए लेकर आए हैं फ़िल्म 'मजबूर' से "आदमी जो कहता है, आदमी जो सुनता है, ज़िंदगी भर वो सदाएँ पीछा करती हैं"। बहुत ही असरदार गीत है और यह एक ऐसा गीत है जिसके साथ हर आदमी अपनी ज़िंदगी को जोड़ सकता है। क्या ख़ूब कहा है बक्शी साहब ने कि "कोई भी हो हर ख़्वाब तो सच्चा नहीं होता, बहुत ज़्यादा प्यार भी अच्छा नहीं होता, कभी दामन छुड़ाना हो तो मुश्किल हो, प्यार के रिश्ते टूटें तो, प्यार के रस्ते छूटें तो, रास्ते में फिर वफ़ाएँ पीछा करती हैं"। ग़ौर कीजिए कि कैसी बोलचाल वाली भाषा है, लेकिन कितना असरदार! और किशोर दा की वज़नदार और भावपूर्ण आवाज़ ने गीत को एक अलग ही दर्जा प्रदान किया है। फ़िल्म 'मजबूर' के संगीतकार थे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल। यह फ़िल्म बनी थी १९७४ में, रवि टंडन का निर्देशन था, अमिताभ बच्चन, परवीन बाबी, फ़रीदा जलाल और प्राण मुख्य कलाकार थे इस फ़िल्म में। कहानी कुछ इस प्रकार थी कि रवि खन्ना अपने अपाहिज बहन, छोटे भाई और विधवा माँ के साथ रहता है। एक दिन उसे पता चलता है कि उसे ब्रेन ट्युमर है और उसके पास केवल ६ महीने का ही समय है। ऐसे में अपनी माँ और भाई-बहन के भविष्य के बारे में सोचते हुए वो एक क़त्ल का इलज़ाम अपने सर ले लेता है जिसके बदले उसे भारी रकम मिलती है अपने परिवार को सुरक्षित करने के लिए। लेकिन क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर होता है। क्या होता है आगे चलकर, आप में से बहुतों को पता होगा, ना हो तो कभी इस फ़िल्म को ज़रूर देखिएगा।

आनंद बक्शी एक ऐसे गीतकार रहे जिन्होने अनेक कलाकारों को उनका पहला हिट गीत दिया उनके पहले ही फ़िल्म में, जैसे कि सनी देओल, जैकी श्रोफ़, कमल हसन, कुमार गौरव, रजनीकांत, राखी, डिम्पल कपाडिया, ऋषी कपूर, अमृता सिंह, अमृता अरोड़ा, उदय चोपड़ा, जिम्मी शेरगिल, जया प्रदा, मनिषा कोयराला, विवेक मुशरन, महिमा चौधरी, नम्रता शिरोडकर, अर्जुन रामपाल, तब्बु, संजय दत्त, ज़ीनत अमान और मीनाक्षी शेशाद्री। सिर्फ़ अभिनेता ही नहीं, बहुत सारे गायकों ने भी अपना पहला ब्रेकिंग् गीत बक्शी साहब का ही लिखा हुआ गाया। इनमें शामिल हैं शैलेन्द्र सिंह, कुमार सानू, कविता कृष्णमूर्ती, एस. पी. बालासुब्रह्मण्यम, सुखविंदर सिंह, तलत अज़ीज़, रूप कुमार राठोड़। 'आराधना' के गीतों से किशोर कुमार का एक नया स्टाइल ही आ गया, और रफ़ी साहब का भी कमबैक हुई 'अमर अक्बर ऐंथनी' और 'धरमवीर' जैसी फ़िल्मों के साथ। दोस्तों, क्योंकि आज आनंद बक्शी और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की तिकड़ी का गीत बज रहा है, तो क्यो ना प्यारेलाल जी से की गई मुलाक़ात से एक अंश निकाल कर यहाँ पेश किया जाए। यह मुलाक़ात की थी विविध भारती के कमल शर्मा जी ने 'उजाले उनकी यादों के' सीरीज़ के लिए।

प्र: आनंद बक्शी साहब के साथ में आपका एक बहुत अलग तरह का, बहुत अच्छा...
उ: बहुत!
प्र: उनकी ट्युनिंग् थी आपकी...
उ: और उनका क्या था कि जैसे लक्ष्मी जी, या जो भी प्रोड्युसर हैं, उनको अगर कुछ चेंज करवाना हो, मतलब मैं ऐसे बता रहा हूँ, क्योंकि कुछ भी चेंज करने को कहो तो 'अरे बहुत अच्छा है, तुम लोग समझते नहीं, ये लो लाइफ़ बन गई तुम लोगों की', ऐसा, तो कुछ भी चेंज करना हो तो मुझे बोलते थे। तो हम साथ में आते थे गाड़ी मे बान्द्रा से, तो 'बक्शी जी, ऐसे बात कह रहे थे', 'अच्छा मैं समझ गया, क्या चेंज करना है बता, क्या लाइन है बता'।
प्र: गाड़ी में बैठ के?
उ: हाँ, गाड़ी में बैठ के, जैसा बोल देता था वैसा लिख देते थे, और वहाँ पहुँच कर, 'लक्ष्मी, चल लिख ले'। तो ऐसा, मतलब, काम करने का, मतलब, अजीब था। कमाल के थे।




क्या आप जानते हैं...
कि आनंद बक्शी को पान खाने की ज़बरदस्त आदत थी, और निधन से ६-७ महीने पहले भी दिन में कम से कम २५ पान चबा जाते थे।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है -"आँगन" गीत बताएं -३ अंक.
2. एक मल्टी स्टारर फिल्म थी ये पर व्यावसायिक फार्मूला फिल्मों से हट कर हल्की फुल्की गुदगुदाने वाली, नाम बताएं - २ अंक.
3. कौन थे संगीत निर्देशक -२ अंक.
4. लता की आवाज़ में सजा ये छेड छाड वाला गीत किस अभिनेत्री ने निभाया है परदे पर -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
पाबला जी आपने खबर देकर मन खुश किया है, यदि लेखिका प्रतिभा कटियार से आप वाकिफ हों या यदि आज वो इस एपिसोड को पढ़ रही हों तो उन्हें हम शुक्रिया कहना चाहेंगे जिस खूबसूरत अंदाज़ में उन्होंने आवाज़ के अंदाज़ का बयां किया पढ़ कर हमारा हौंसला दुगना हुआ है. साथ ही शरद जी, अनुपम जी, इंदु जी सभी को बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, March 27, 2010

भूल गया सब कुछ .... याद रहे मगर बख्शी साहब के लिखे सरल सहज गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 386/2010/86

नंद बक्शी उन गीतकारों मे से हैं जिन्होने संगीतकारों की कई पीढ़ियों के साथ कंधे से कंधा मिलाते हुए हिट काम किया है। जहाँ एक तरफ़ सचिन देव बर्मन के साथ काम किया है, वहीं उनके बेटे राहुल देव बर्मन के साथ भी एक लम्बी पारी खेली है। कल्याणजी-आनंदजी के धुनों पर भी गानें लिखे हैं और विजु शाह के भी। चित्रगुप्त - आनंद मिलिंद, श्रवण - संजीव दर्शन आदि। फ़िल्म 'देवर' में संगीतकार रोशन के साथ भी काम किया है, और रोशन साहब के बेटे राजेश रोशन के साथ तो बहुत सारी फ़िल्मों में उनका साथ रहा। आज हम आपको बक्शी साहब का लिखा और राजेश रोशन का स्वरबद्ध किया हुआ एक गीत सुनवाना चाहेंगे। इस गीत के बारे में ख़ुद आनंद बक्शी साहब से ही जानिए, जो उन्होने विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में कहे थे: "मरहूम रोशन मेरे मेहरबान दोस्तों में से थे। उनके साथ मैंने काफ़ी गीत लिखे हैं। मुझे ख़ुशी है कि उनका बेटा राजेश उनके नाम को रोशन कर रहा है। राजेश रोशन के साथ मुझे फ़िल्म 'जुली' में काम करने का मौका मिला। तो फ़िल्म 'जुली' का गीत, जिसे लता और किशोर ने गाया है, आप इसे सुनिए।" दोस्तों, हम ज़रूर सुनेंगे यह गीत, लेकिन उससे पहले आपको बता दें कि 'जुली' फ़िल्म का यह युगल गीत लता-किशोर के सदाबहार युगल गीतों में शामिल किया जाता है। फ़िल्म के चरित्रों के मुताबिक़ थोड़ा सा वेस्टर्ण टच इस गीत को दिया गया है। थोड़ा सा नशीलापन, थोड़ी सी सेन्सुयलिटी का स्वाद इस गीत में मिलता है। यह वह दौर था जब 'आइ लव यू' पर गानें बनने लगे थे। आज वह चलन ख़त्म हो गया है, मुझे याद नहीं पिछली बार किस फ़िल्मी गीत में ये शब्द आए थे। कुछ चर्चित गीत जिनमें 'आइ लव यू' का इस्तेमाल हुआ है, वे हैं "मेरी सोनी मेरी तमन्ना" (यादों की बारात), "काटे नहीं कटते दिन ये रात" (मिस्टर इण्डिया), "इलु इलु" (सौदागर), "अंग्रेज़ी में कहते हैं" (ख़ुद्दार), वगेरह। हाँ, याद आया, आख़िरी बार फ़िल्म 'मुझसे दोस्ती करोगे' में सोनू निगम और अलिशा चिनॊय ने गाया था "ओ माइ डारलिंग् आइ लव यू"!

आनंद बक्शी साहब के करीयर संबंधित जानकारी का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए आज हम आपको बताना चाहेंगे उन ४० गीतों के बारे में जो नॊमिनेट हुए थे फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार के लिए। ये हैं वो गीत:

वर्ष - नामांकन - पुरस्कार
1967 सावन का महीना (मिलन)
1969 कोरा काग़ज़ था (आराधना) ; बड़ी मस्तानी है (जीने की राह)
1970 बिंदिया चमकेगी (दो रास्ते)
1971 ना कोई उमंग है (कटी पतंग)
1972 चिंगारी कोई भड़के (अमर प्रेम)
1973 हम तुम एक कमरे में (बॊबी); मैं शायर तो नहीं (बॊबी)
1974 गाड़ी बुला रही है (दोस्त)
1975 आएगी जरूर चिट्ठी (दुल्हन); महबूबा महबूबा (शोले)
1976 मेरे नैना सावन भादों (महबूबा)
1977 परदा है परदा (अमर अक्बर ऐंथनी)
1978 मैं तुल्सी तेरे आंगन की (शीर्षक गीत); आदमी मुसाफ़िर है (अपनापन) आदमी मुसाफ़िर है (अपनापन)
1979 सावन के झूले पड़े (जुर्माना); डफ़ली वाले (सरगम)
1980 शीशा हो या दिल हो (आशा); ओम शांति ओम (कर्ज़); दर्द-ए-दिल (कर्ज़); बने चाहे दुश्मन ज़माना (दोस्ताना)
1981 सोलह बरस की (एक दूजे के लिए); तेरे मेरे बीच में (एक दूजे के लिए); याद आ रही है (लव स्टोरी) तेरे मेरे बीच में (एक दूजे के लिए);
1983 जब हम जवां होंगे (बेताब)
1984 सोहनी चनाब दे किनारे (सोहनी महिवाल)
1985 ज़िंदगी हर कदम (मेरी जंग)
1989 लगी आज सावन की (चांदनी)
1993 चोली के पीछे क्या है (खलनायक); जादू तेरी नज़र (डर)
1994 तू चीज़ बड़ी है मस्त मस्त (मोहरा)
1995 तूझे देखा तो यह जाना सनम (दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे) तूझे देखा...
1997 भोली सी सूरत (दिल तो पागल है); आइ लव माइ इण्डिया (परदेस); ज़रा तसवीर से तू (परदेस)
1999 ताल से ताल मिला (ताल); इश्क़ बिना (ताल) इश्क़ बिना (ताल)
2000 हम को हम ही से चुरा लो (मोहब्बतें)
2001 उड़ जा काले कावां (ग़दर एक प्रेम कथा)




क्या आप जानते हैं...
कि आनंद बक्शी ने संगीतकार रोशन के लिए पहली बार फ़िल्म 'सी.आइ.डी गर्ल' में गीत लिखे थे। उसके बाद आई थी फ़िल्म 'देवर'।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है -"जिंदगी" गीत बताएं -३ अंक.
2. अमिताभ बच्चन प्रमुख भूमिका में थे इस फिल्म में, नाम बताएं - २ अंक.
3. कौन थे इस फिल्म के निर्देशक -२ अंक.
4. एल पी के संगीत निर्देशन में किस गायक ने इसे गाया था -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी एकदम सही पहचाना गीत, पाबला जी जो आपने जवाब दिया वो तो सवाल में ही है :), अवध जी सही जवाब दिया, आपको जो दो गीत हैं वो हर कसौटी पर खरे नहीं उतरते, गौर कीजिये. पदम सिंह जी आपका अंदाज़ खूब भाया जवाब देने का. अनीता सिंह जी आपका खाता खुला है २ अंकों से बधाई, अनुपम जी लेट भले हुए, पर उपस्तिथि जरूर दर्ज की आपने शुक्रिया

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

सुनो कहानी: मैं एक भारतीय

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में शरद जोशी की कहानी "बुद्धिजीवियों का दायित्व" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं अनुराग शर्मा की एक कहानी "मैं एक भारतीय", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी "मैं एक भारतीय" का कुल प्रसारण समय 3 मिनट 15 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

"मैं एक भारतीय" का टेक्स्ट बर्ग वार्ता ब्लॉग पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



पतझड़ में पत्ते गिरैं, मन आकुल हो जाय। गिरा हुआ पत्ता कभी, फ़िर वापस ना आय।।
~ अनुराग शर्मा

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी

कमलाकन्नन ने उनकी बात समझ कर उनसे बात करना शुरू किया।
(अनुराग शर्मा की "मैं एक भारतीय" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3
#Sixty Sixth Story, Main Ek Bhartiya: Anurag Sharma/Hindi Audio Book/2010/11. Voice: Anurag Sharma

Friday, March 26, 2010

बागों में बहार आई, होंठों पे पुकार आई...जब बख्शी साहब ने आवाज़ मिलाई लता के साथ इस युगल गीत में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 385/2010/85

'मैंशायर तो नहीं', आनंद बक्शी के लिखे गीतों पर आधारित इस शृंखला में आज हम सुनेंगे ख़ुद बक्शी साहब की ही आवाज़ में एक गीत, लेकिन उस गीत के ज़िक्र से पहले हम आपको उनके जीवन से जुड़ी कुछ अहम तारीख़ों से रु-ब-रु करवाना चाहेंगे। ये हैं वो तारीख़ें -
माँ का निधन - १९४०
कैम्ब्रिज कॊलेज, रावलपिण्डी से निवृत्ति - ६ मार्च १९४३
'रॊयल इण्डियन नेवी' में भर्ती - १२ जुलाई १९४४
'रॊयल इण्डियन नेवी' से मुक्ति - ५ अप्रैल १९४६
देश विभाजन के बाद रावलपिण्डी से पलायन - २ अक्तुबर १९४७
'कॊर्प्स ऒफ़ सिग्नल्स' में भर्ती - १५ अक्तुबर १९४७
'कॊर्प्स ऒफ़ सिग्नल्स' से मुक्ति - १२ अप्रैल १९५०
बम्बई में पहली बार काम की तलाश में आगमन - १९५१
ई.एम.ई (The Corps of Electrical and Mechanical Engineers) में भर्ती - १६ फ़रवरी १९५१
कमला मोहन से विवाह - २ अक्तुबर १९५४
ई.एम.ई से मुक्ति - २७ अगस्त १९५६
बम्बई में दूसरी बार आगमन - अक्तुबर १९५६


आनंद बक्शी के दादाजी सुघरमल वैद बक्शी रावलपिण्डी में ब्रिटिश राज के दौरान सुपरिंटेंडेण्ट ऒफ़ पुलिस थे। उनके पिता मोहन लाल वैद बक्शी रावलपिण्डी में एक बैंक मैनेजर थे, और जिन्होने देश विभाजन के बाद इण्डियन आर्मी को सेवा प्रदान की। आनंद बक्शी साहब को घर में प्यार से 'नंद' और 'नंदो' कहकर परिवार वाले पुकारा करते थे। उनका पूरा नाम था आनंद प्रकाश। नेवी में बतौर सोलजर उनका कोड नाम था 'आज़ाद'। आनंद बक्शी ने केवल १० वर्ष की आयु में अपनी माँ सुमित्रा को खो दिया और अपनी पूरी ज़िंदगी मातृ प्रेम के पिपासु रह गए। उनकी सौतेली माँ ने उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। इस तरह से आनंद अपनी दादीमाँ के और करीब हो गए। आनंद बक्शी साहब ने अपनी माँ के प्यार को सलाम करते हुए कई गानें भी लिखे जैसे कि "माँ तुझे सलाम" (खलनायक), "माँ मुझे अपने आंचल में छुपा ले" (छोटा भाई), "तू कितनी भोली है" (राजा और रंक) और "मैंने माँ को देखा है" (मस्ताना)। दोस्तों, ये तो थी कुछ जानकारी आनंद बक्शी साहब के व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी हुई। और आइए अब बात करते हैं आज के गाने की। जैसा कि शुरु में ही हमने बताया था कि आज गूंजने वाली है बक्शी साहब की ही आवाज़, तो आप ने अंदाज़ा लगा लिया होगा कि हम कौन सा गीत बजा रहे हैं। जी हाँ, फ़िल्म 'मोम की गुड़िया' से लता जी के साथ उनका गाया हुआ "बाग़ों में बहार आई, होठों पे पुकार आई, आजा आजा आजा आजा मेरी रानी"।

'मोम की गुड़िया' सन् १९७२ की फ़िल्म थी। यह मोहन कुमार की फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे रतन चोपड़ा और तनुजा। यह कम बजट की फ़िल्म थी, जिसमें संगीतकार थे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल। यही वह फ़िल्म थी जिसमें पहली बार आनंद बक्शी को गीत गाने का मौका मिला था। हुआ युं कि एक बार मोहन कुमार ने बक्शी साहब को एक चैरिटी फ़ंक्शन में गाते हुए सुन लिया था। उसके बाद उन्होने एल.पी को राज़ी करवाया कि वो कम से कम एक गीत बक्शी साहब से गवाए 'मोम की गुड़िया' में। और इस तरह से बक्शी साहब ने एक एकल गीत गाया "मैं ढूंढ रहा था सपनों में"। यह गीत सब को इतनी पसंद आई कि मोहन कुमार ने सब को आश्चर्य चकित करते हुए घोषणा कर दी कि आनंद बक्शी एक डुएट भी गाएँगे लता मंगेशकर के साथ। और इस तरह से बनी "बाग़ों में बहार आई"। इस गीत के रिकार्डिंग् के बाद बक्शी साहब ने लता जी को फूलों का एक गुलदस्ता उपहार में दिया उनके साथ युगल गीत गाने के लिए। फ़िल्म के ना चलने से ये गानें भी ज़्यादा सुनाई नहीं दिए, लेकिन इस युगल गीत को आनंद बक्शी पर केन्द्रित हर कार्यक्रम में शामिल किया जाता है। तो आइए आनंद बक्शी के लिखे इस गीत में हम उनके शब्दों के साथ साथ उनकी अनोखी आवाज़ का भी मज़ा लें।



क्या आप जानते हैं...
कि आनंद बक्शी ने १९६६ की फ़िल्म 'पिकनिक' में एक भिखारी की भूमिका अदा की थी।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. फिल्म में नायिका ने नाम पर फिल्म का नाम था, और ये फिल्म का शीर्षक गीत है जिसमें नायिका का नाम बहुत बार आता है, गीत बताएं-३ अंक.
2. इस युगल गीत में लता के साथ किस गायक की आवाज़ है - २ अंक.
3. फिल्म "देवर" में बख्शी साहब ने गीत लिखे थे, उस फिल्म को इस फिल्म के साथ आप कैसे जोड़ सकते हैं-२ अंक.
4. अपने ज़माने की इस चर्चित प्रेम कहानी में किस अभिनेत्री ने प्रमुख भूमिका निभाई थी -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी लगातार सही जवाबों के छक्के लगाकर ६१ अंकों पर आ चुकी हैं, शरद जी हैं ७८ अंकों पर, अवध जी ४४ तो पदम सिंह जी छंलाग लगा कर ३४ अंकों पर आ गए हैं, पाबला जी पिछले कुछ दिनों से हजारी लगा कर ८ अंकों पर तो आ गए हैं पर अभी अनुपम जी (१०) से पीछे हैं, हाँ, रोहित जी (७) और संगीता जी (४) से जरूर आगे हैं अब.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, March 25, 2010

सोच के ये गगन झूमे....लता और मन्ना दा का गाया एक बेशकीमती गीत बख्शी साहब की कलम से

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 384/2010/84

६०के दशक के अंतिम साल, यानी कि १९६९ में एक फ़िल्म आई थी 'ज्योति'। फ़िल्म कब आई कब गई किसी ने ध्यान ही नहीं दिया। लेकिन इस फ़िल्म में कम से कम एक गीत ऐसा था जो आज तक हमें इसे याद करने पर मजबूर कर देता है। आनंद बक्शी का लिखा, सचिन देव बर्मन का संगीतबद्ध किया, और लता मंगेशकर व मन्ना डे का गाया वह गीत है "सोच के ये गगन झूमे, अभी चांद निकल आएगा, झिलमिल चमकेंगे तारे"। जहाँ एक तरफ़ लता जी के गाए इन बोलों में एक आशावादी भाव सुनाई देता है, वहीं अगले ही लाइन में मन्ना डे साहब गाते हैं कि "चांद जब निकल आएगा, देखेगा ना कोई गगन को, चांद को ही देखेंगे सारे", जिसमें थोड़ा सा अफ़सोस ज़ाहिर होता है। चांद और गगन के द्वारा अन्योक्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है। अगर कहानी मालूम ना हो तो इसका अलग अलग अर्थ निकाला जा सकता है। फ़िल्म 'ज्योति' की कहानी का निचोड़ भी शायद इन्ही शब्दों से व्यक्त किया जा सकता हो। ख़ैर, बस यही कहेंगे कि यह एक बेहद उम्दा गीत है बक्शी साहब का लिखा हुआ। फ़िल्म के ना चलने से इस गीत की गूंज बहुत ज़्यादा सुनाई नहीं दी, लेकिन अच्छे गीतों के क़द्रदान आज भी इस गीत को भूले नही हैं। आनंद बक्शी पर केन्द्रित 'मैं शायर तो नहीं' शृंखला की तीसरी कड़ी में आज इसी गीत की बारी। चन्द्रा मित्र निर्मित इस फ़िल्म को निर्देशित किया था दुलाल गुहा ने और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे अभि भट्टाचार्य, तरुन बोस, संजीव कुमार, निवेदिता, अरुणा ईरानी व सारिका प्रमुख। प्रस्तुत गीत संजीव कुमार और निवेदिता पर फ़िल्माया गया है।

आनंद बक्शी साहब पर केन्द्रित इस शृंखला में हम हर रोज़ उनसे जुड़ी कुछ बातें आप तक पहुँचा रहे हैं, इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए आज हम लेकर आए हैं विविध भरती के 'जयमाला' कार्यक्रम का एक अंश। क्योंकि शुरुआती दिनों में बक्शी साहब का फ़ौज से गहरा नाता रहा है, तो जब वे 'जयमाला' कार्यक्रम में फ़ौजी भाइयों से मुख़ातिब हुए, तो उन्होने अपने दिल के जज़्बात फ़ौजी भाइयों के लिए कुछ इस तरह से व्यक्त किया था - "मेरे प्यारे फ़ौजी भाइयों, हम बहुत पुराने साथी हैं। आज ज़िंदगी ने मुझे बहुत दूर ला फेंका है, पर मैं आप को भूला नहीं हूँ। उम्मीद है कि आप भी मुझे याद करते होंगे। और अगर आप भूल गए हों तो आपको याद दिला दूँ कि मैं चार साल 'सिग्नल्स' में 'टेलीफ़ोन ऒपरेटर' रहा हूँ, और इतना ही अरसा 'ई.एम.ई कोर' में ईलेक्ट्रिशियन रहा हूँ। वहाँ भी मैं आप लोगों के दिल बहलाता था। मुझे वो दिन याद हैं जब सर्द रातों को पहाड़ों के नीचे बैठ कर लाउड स्पीकर में गानें सुना करता था और सोचा करता था कि क्या ऐसा भी दिन आएगा कि जब लाउड स्पीकर के नीचे बैठ कर लोग मेरे गीत सुनेंगे! बेशक़ वह दिन आया, लेकिन एक बात कहूँ आप से? वहाँ आप के साथ चैन और सुकून था, और यहाँ? ख़ैर छोड़िए!" बक्शी साहब की बातें जारी रहेंगी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर आगे भी, फ़िल्हाल सुनते हैं "सोच के ये गगन झूमे"। इस गीत की धुन को सुन कर शायद आपको एक और गीत की धुन याद आ जाए। राजेश रोशन द्वारा संगीतबद्ध 'आख़िर क्यों' फ़िल्म के गीत "एक अंधेरा लाख सितारे" की धुन काफ़ी मिलती जुलती है इस गीत से जिस जगह लता जी गाती हैं "झिलमिल चमकेंगे तारे"। कहिए, ठीक कहा ना मैंने!



क्या आप जानते हैं...
कि 'काग़ज़ के फूल' फ़िल्म के लिए सचिन देव बर्मन ने पहले आनंद बक्शी का नाम प्रोपोज़ किया था। पर गुरु दत्त साहब को एक बड़े नाम की तलाश थी। इसलिए उन्होने बक्शी साहब का नाम गवारा नहीं किया।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. गीत में नायक नायिका "राजा- रानी" कहकर संबोधित कर रहे हैं एक दूजे को, गीत बताएं-३ अंक.
2. लता जी के साथ जिस गायक ने अपनी आवाज़ मिलाई है इस गीत में वो इस फिल्म में पहली बार बतौर गायक दुनिया को सुनाई दिए थे, किसकी बात कर रहे हैं हम - २ अंक.
3. तनूजा और रतन चोपड़ा अभिनीत इस फिल्म के निर्देशक कौन है -२ अंक.
4. कौन हैं संगीतकार जोड़ी -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
शुक्रिया इंदु जी, इस गीत ने आपको इतने करीब से स्पर्श किया ये जानकार बेहद खुशी हुई. शरद जी, पदम जी और रोमेंद्र जी आप सब को भी बधाई. इंदु जी आपका विशेष शुक्रिया, आपने भूल सुधार की हमारी, पदम् जी आपको ३ अंक जरूर मिलेंगें

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, March 24, 2010

कुछ तो लोग कहेंगें...बख्शी साहब के मिजाज़ को भी बखूबी उभारता है ये गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 383/2010/83

नंद बक्शी साहब के लिखे गीतों पर आधारित इस लघु शृंखला 'मैं शायर तो नहीं' को आगे बढ़ाते हुए हम आ पहुँचे थे १९६७ की फ़िल्म 'मिलन' पर। इसके दो साल बाद, यानी कि १९६९ में जब शक्ति सामंत ने एक बड़ी ही नई क़िस्म की फ़िल्म 'आराधना' बनाने की सोची तो उसमें उन्होने हर पक्ष के लिए नए नए प्रतिभाओं को लेना चाहा। बतौर नायक राजेश खन्ना और बतौर नायिका शर्मीला टैगोर को चुना गया। अब हुआ युं कि शुरुआत में यह तय हुआ था कि रफ़ी साहब बनेंगे राजेश खन्ना की आवाज़। लेकिन उन दिनों रफ़ी साहब एक लम्बी विदेश यात्रा पर गए हुए थे। इसलिए शक्तिदा ने किशोर कुमार का नाम सुझाया। उन दिनो किशोर देव आनंद के लिए गाया करते थे, इसलिए सचिनदा पूरी तरह से शंका-मुक्त नहीं थे कि किशोर गाने के लिए राज़ी हो जाएंगे। शक्ति दा ने किशोर को फ़ोन किया, जो उन दिनों उनके दोस्त बन चुके थे बड़े भाई अशोक कुमार के ज़रिए। किशोर ने जब गाने से इनकार कर दिया तो शक्तिदा ने कहा, "नखरे क्युँ कर रहा है, हो सकता है कि यह तुम्हारे लिए कुछ अच्छा हो जाए"। आख़िर में किशोर राज़ी हो गए। शुरु शुरु में सचिनदा बतौर गीतकार शैलेन्द्र को लेना चाह रहे थे, लेकिन यहाँ भी शक्तिदा ने सुझाव दिया कि क्युँ ना सचिनदा की जोड़ी उभरते गीतकार आनंद बक्शी के साथ बनाई जाए। और यहाँ भी उनका सुझाव रंग लाया। जब तक रफ़ी साहब अपनी विदेश यात्रा से लौटते, इस फ़िल्म के करीब करीब सभी गाने रिकार्ड हो चुके थे सिवाय दो गीतों के, जिन्हे फिर रफ़ी साहब ने गाया। इस तरह से आनंद बक्शी को पहली बार सचिन देव बर्मन के साथ काम करने का मौका मिला। 'आराधना' के बाद आई शक्ति दा की अगली फ़िल्म 'कटी पतंग' जिसमें आनंद बक्शी की जोड़ी बनी सचिन दा के बेटे पंचम यानी राहुल देव बर्मन के साथ, और इस फ़िल्म ने भी सफलता के कई झंडे गाढ़े। 'कटी पतंग' की सफलता के जशन अभी ख़तम भी नहीं हुआ था कि शक्तिदा की अगली फ़िल्म 'अमर प्रेम' आ गयी १९७१ में और एक बार फिर से वही कामयाबी की कहानी दोहरायी गई। आनंद बक्शी, राहूल देव बर्मन और किशोर कुमार की अच्छी-ख़ासी तिकड़ी बन चुकी थी और इस फ़िल्म के गाने भी ऐसे गूंजे कि अब तक उनकी गूंज सुनाई देती है। तो चलिए, आज हम 'अमर प्रेम' से सुनते हैं "कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना"।

'अमर प्रेम' की कहानी आधारित थी विभुति भुशण बंदोपाध्याय की उपन्यास पर। यह फ़िल्म १९७० की अरबिंदो मुखर्जी की बंगला फ़िल्म 'निशिपद्म' का हिंदी रीमेक था। एक अच्छे घर के नौजवान लड़के का एक वेश्या के प्रति पवित्र प्रेम की कहानी है 'अमर प्रेम' जो मानवीय मूल्यों और संबंधों की एक बार फिर से मूल्यांकन करने पर हमें मजबूर कर देती है। इस गीत में ही जैसे कहा गया है कि लोग तो बातें करते ही रहेंगे, उनकी तरफ़ ध्यान देकर हम अपनी ज़िंदगी क्यों ख़राब करें। अगर हमें लगता है कि जो हम कर रहे हैं वह सही है, तो फिर ज़माने की बातों से क्या डरना! आनंद बक्शी साहब के स्टाइल के मुताबिक़ उन्होने बड़े ही बोलचाल वाली भाषा का प्रयोग करते हुए इस गीत के अल्फ़ाज़ लिखे हैं। "कुछ रीत जगत की ऐसी है हर एक सुबह की शाम हुई, तू कौन है तेरा नाम है क्या सीता भी यहाँ बदनाम हुई, फिर क्यों संसार की बातों से भीग गए तेरे नैना"। अगर ऐसे गीत लिखने के बाद भी लोग बक्शी साहब की समालोचना करते हैं तो वो बेशक़ करते रहें, उनके लिए ख़ुद बक्शी साहब ही कह गए हैं कि "कुछ तो लोग कहेंगे"। ख़ैर, अब इस गीत के संदर्भ में हम रुख़ करेंगे विविध भारती पर प्रसारित प्यारेलाल जी के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम की ओर, जिसमें उन्होने आनंद बक्शी साहब के बारे में बहुत सी बातें की थी और इस गीत के बारे में कुछ ऐसे विचार व्यक्त किए थे। प्यारेलाल जी से बातचीत कर रहे हैं कमल शर्मा।

प्र: प्यारे जी, क्योंकि बक्शी साहब की बात चल रही है, उनका लिखा कोई गाना जो आपको बहुत ज़्यादा अपील करता हो, म्युज़िक के पॊयण्ट ऒफ़ विउ से भी और कहानी के तरफ़ से भी।

उ: उनका तो देखिए, हर गाने में कुछ ना कुछ बात होती ही है। लेकिन जो पंचम का गाना है "कुछ तो लोग कहेंगे", मैं समझता हूँ बहुत ही बढ़िया बात कही है उन्होने। यह ऐसा बनाया है कि जैसे हम बात करते हैं, और पंचम ने भी क्या ट्युन बनाई, "कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना, छोड़ो बेकार की बातं में कहीं बीत ना जाए रैना", 'beautiful things'!

प्र: जीवन के दर्शन को बड़े आसान से शब्दों में...

उ: बिल्कुल! उसको देखिए ना "कुछ तो लोग कहेंगे", ज़रूर बक्शी जी ने पहले कहा होगा, तो उसको कैसे (गीत को गाते हुए), ये सब चीज़ें जो हैं ना, अंडर करण्ट चीज़ होती है, जो लोग समझते हैं, नहीं समझते हैं, गायकी समझिए ४०% काम करता है संगीतकार का, हम लोग काम जो करते हैं यह पूरा टीम वर्क है, ये लोग नहीं समझते हैं.




क्या आप जानते हैं...
कि आनंद बक्शी को फ़िल्म 'अमर प्रेम' के "चिंगारी कोई भड़के" गीत के लिए फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था, लेकिन उस साल यह पुरस्कार गया हसरत जयपुरी की झोली में फ़िल्म 'अंदाज़' के गीत "ज़िंदगी एक सफ़र है सुहाना" के लिए।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में ये शब्द एक से अधिक बार आता है अलग अलग सन्दर्भों में -"गगन", गीत बताएं-३ अंक.
2. संजीव कुमार और निवेदिता पर फ़िल्माया गाया था ये गीत, संगीतकार बताएं- २ अंक.
3. लता मंगेशकर के साथ किस गायक की आवाज़ है इस गीत में -२ अंक.
4. फिल्म का नाम बताएं -३ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी बधाई, पाबला जी और शरद जी भी दो अंकों का इजाफा कर गए हैं खाते में, पर पदम सिंह जी चूक गए, रोमेंद्र सागर और कृष्ण मुरारी जी, आप दोनों का स्वागत है

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है.. ग़ालिब के ज़ख्मों को अपनी आवाज़ से उभार रही हैं मरियम

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७६

र कड़ी में हम ग़ालिब से जुड़ी कुछ नई और अनजानी बातें आपके साथ बाँटते हैं। तो इसी क्रम में आज हाज़िर है ग़ालिब के गरीबखाने यानि कि ग़ालिब के निवास-स्थल की जानकारी। (अनिल कान्त के ब्लाग "मिर्ज़ा ग़ालिब" से साभार):

ग़ालिब का यूँ तो असल वतन आगरा था लेकिन किशोरावस्था में ही वे दिल्ली आ गये थे । कुछ दिन वे ससुराल में रहे फिर अलग रहने लगे । चाहे ससुराल में या अलग, उनकी जिंदगी का ज्यादातर हिस्सा दिल्ली की 'गली क़ासिमजान' में बीता । सच पूंछें तो इस गली के चप्पे-चप्पे से उनका अधिकांश जीवन जुड़ा हुआ था । वे पचास-पचपन वर्ष दिल्ली में रहें, जिसका अधिकांश भाग इसी गली में बीता । यह गली चाँदनी चौक से मुड़कर बल्लीमारान के अन्दर जाने पर शम्शी दवाख़ाना और हकीम शरीफ़खाँ की मस्जिद के बीच पड़ती है । इसी गली में ग़ालिब के चाचा का ब्याह क़ासिमजान (जिनके नाम पर यह गली है ।) के भाई आरिफ़जान की बेटी से हुआ था और बाद में ग़ालिब ख़ुद दूल्हा बने आरिफ़जान की पोती और लोहारू के नवाब की भतीजी, उमराव बेगम को ब्याहने इसी गली में आये । साठ साल बाद जब बूढ़े शायर का जनाज़ा निकला तो इसी गली से गुज़रा ।

जनाब हमीद अहमदखाँ ने ठीक ही लिखा है :
"गली के परले सिरे से चलकर इस सिरे तक आइए तो गोया आपने ग़ालिब के शबाब से लेकर वफ़ात तक की तमाम मंजिलें तय कर लीं ।"


इन बातों से मालूम होता है कि ग़ालिब वास्तव में आगरा के रहने वाले थे। तो क्यों ना हम आगरा की गलियों का मुआयना कर लें, क्या पता उन गलियों में हमें गज़ल कहते हुए ग़ालिब मिल जाएँ। ("मिर्ज़ा ग़ालिब का घर हुआ ग़ायब" पोस्ट से साभार):

शहर के इतिहासकार और वयोवृद्ध बताते हैं कि कालां महल इलाक़े में एक बड़ी हवेली हुआ करती थी, जहाँ सन् १७९७ में ग़ालिब का जन्म हुआ था। लेकिन कालां महल इलाक़े में कोई भी उस जगह के बारे में पक्के तौर पर नहीं कह सकता, जहाँ मियाँ ग़ालिब का जन्म हुआ था। हालाँकि एक इमारत है, जो ग़ालिब की हवेली की ली गई एक बहुत पुरानी तस्वीर से मिलती-जुलती है। बचपन में मुंशी शिव नारायण को ग़ालिब द्वारा लिखे गए एक पत्र से उनकी हवेली के बारे में जानकारी मिलती है, जिसमें उन्होंने अपने घर के बारे में काफ़ी कुछ लिखा है। उन्हीं को लिखे एक अन्य ख़त में उन्होंने आर्थिक तंगी के चलते पैतृक सम्पत्ति छोड़ने की इच्छा का भी उल्लेख किया है। उन्होंने अपनी सम्पत्ति १८५७ के गदर के आस-पास सेठ लक्ष्मीचंद को बेच दी थी।

अब एक स्कूल ट्रस्ट उस सम्पत्ति का मालिक है, लेकिन ट्रस्ट प्रबंधन के मुताबिक़ उस सम्पत्ति का ग़ालिब से कुछ लेना-देना नहीं है। पुराने रिकॉर्ड के मुताबिक़ वहाँ जो ख़ूबसूरत बग़ीचा था, वह कब का ग़ायब हो चुका है और अब वहाँ एक बड़ा सा पानी का टेंक है। इमारत के वर्तमान मालिक के हिसाब से ग़ालिब का उस भवन से कोई सम्बन्ध नहीं है। हालाँकि तथ्य कुछ और ही बयान करते हैं। १९५७ में ग़ालिब की सालगिरह के मौक़े पर मशहूर उर्दू शायद मैकश अकबराबादी की एक तस्वीर है, जो प्रधानाचार्य के वर्तमान दफ़्तर के ठीक सामने ली गई है।

ग़ालिब से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम १९६० तक बाक़ायदा वहीं आयोजित किए जाते रहे हैं। ट्रस्ट द्वारा बड़े पैमाने पर की गई तोड़-फोड़ और निर्माण के चलते अब भवन काफ़ी बदल चुका है। विख्यात शायर फिराक़ गोरखपुरी और अभिनेता फ़ारुक़ शेख़, जिन्होंने ग़ालिब पर एक फ़िल्म का निर्माण किया था, भी इस इमारत को देखने आए थे। ऐतिहासिक तथ्य पुख़्ता तौर पर इशारा करते हैं कि वही भवन मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्मस्थल है, जहाँ आज एक गर्ल्स इंटर कॉलेज चल रहा है। हालाँकि इस बारे में अभी और शोध की ज़रूरत है कि क्या वही इमारत ग़ालिब की पुश्तैनी हवेली है।

हद ये है कि हमारे देश के सबसे बड़े शायर का घर वीरानियों में गुम है... वीरानियाँ क्या. हमें तो यह भी नहीं पता कि ग़ालिब जब आगरा में थे तो कहाँ रहा करते थे। चलिए... इस बात का शुक्र है कि भले हीं ग़ालिब के निशान ज़मीन से मिट गए हों, लेकिन लोगों के दिलों में जो स्थान ग़ालिब ने बनाया है, उसे कोई मिटा नहीं सकता.. वक़्त के साथ वे निशान और भी पुख्ता होते जा रहे हैं। इसी बात पर क्यों न हम ग़ालिब के चंद शेरों पर नज़र दौड़ा लें:

छोड़ूँगा मैं न उस बुत-ए-काफ़िर का पूजना
छोड़े न ख़ल्क़ गो मुझे काफ़िर कहे बग़ैर

"ग़ालिब" न कर हुज़ूर में तू बार-बार अर्ज़
ज़ाहिर है तेरा हाल सब उन पर कहे बग़ैर


पिछली महफ़िल में हमने ग़ालिब के जो ख़त पेश किए थे, उनमें ग़म और दु:खों की भरमार थी। माहौल को बदलते हुए आज हम वे दो ख़त पेश कर रहे हैं, जिनसे ग़ालिब का मज़ाकिया लहजा झलकता है। तो ये रहे दो ख़त:

१) ग़ालिब ने अपने एक दोस्त को रमज़ान के महीने में ख़त लिखा। उसमें लिखते हैं "धूप बहुत तेज़ है। रोज़ा रखता हूँ मगर रोज़े को बहलाता रहता हूँ। कभी पानी पी लिया, कभी हुक़्क़ा पी लिया,कभी कोई टुकड़ा रोटी का खा लिया। यहाँ के लोग अजब फ़हम र्खते हैं, मैं तो रोज़ा बहलाता हूँ और ये साहब फ़रमाते हैं के तू रोज़ा नहीं रखता। ये नहीं समझते के रोज़ा न रखना और चीज़ है और रोज़ा बहलाना और बात है"।

२) एक दोस्त को दिसम्बर १८५८ की आखरी तारीखों में ख़त लिखा। उस दोस्त ने उसका जवाब जनवरी १८५९ की पहली या दूसरी तारीख को लिख भेजा। उस खत के जवाब में उस दोस्त को ग़ालिब ख़त लिखते हैं। "देखो साहब ये बातें हमको पसन्द नहीं। १८५८ के ख़त का जवाब १८५९ में भेजते हैं और मज़ा ये के जब तुमसे कहा जाएगा तो ये कहोगे के मैंने दूसरे ही दिन जवाब लिखा है"।

अब हुआ ना माहौल कुछ खुशनुमा। बदले माहौल में निस्संदेह हीं आपमें अब गज़ल सुनने की तलब जाग चुकी होगी। गज़ल तो हम सुना देंगे, लेकिन क्या करें ग़ालिब की लेखनी दु:खों से ज्यादा दूर नहीं रह पाती, इसलिए अगर यह गज़ल सुनकर आप भावुक हो गएँ तो इसमें हमारी कोई गलती न होगी। तो लीजिए पेश है "ग़ालिब का है अंदाज़-ए-बयाँ और" एलबम से "मरियम"(इनके बारे में हमें ज़्यादा कुछ पता नहीं चल सका, इसलिए पूरी की पूरी कड़ी हमने ग़ालिब के नाम कर दी, हाँ आवाज़ में वह नशा है वह खनक है, जो यकीनन हीं आपको बाँधकर रखेगी।) की आवाज़ में यह गज़ल:

हर एक बात पे कहते हो तुम कि 'तू क्या है'
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख, जुस्तजू क्या है

रगों में दौड़ने-फिरने के हम नहीं ____
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "अहद" और शेर कुछ यूँ था-

ता फिर न इन्तज़ार में नींद आये उम्र भर
आने का अहद कर गये आये जो ख़्वाब में

इस शब्द की सबसे पहले पहचान की अवनींद्र जी ने,लेकिन चूँकि उन्होंने तब कोई शेर पेश नहीं किया, इसलिए "शान-ए-महफ़िल" की पदवी से नवाज़ा जाता है अवनींद्र जी के बाद महफ़िल में उपस्थित होने वाले शरद जी को। शरद जी, इस बार आप पूरे रंग में दीखे और उस रंगे में आपने महफ़िल को भी रंग दिया। ये रहे आपके पेश किए हुए शेर:

मैनें एहद किया था न उस से मिलूंगा मैं
वो रेत पे लकीर थी पत्थर पे नहीं थी । (स्वरचित)

ग़म तो ये है कि वो अहदे वफ़ा टूट गया
बेवफ़ा कोई भी हो तुम न सही हम ही सही (राही मासूम रज़ा) शुभान-अल्लाह... इस शेर का तो मैं फ़ैन हो गया :)

सीमा जी, आपने दो किश्तों में ४ शेर पेश किए... माज़रा क्या है? :) मज़ाक कर रहा हूँ बस :) यह रही आपकी पेशकश:

कहा था किसने के अहद-ए-वफ़ा करो उससे
जो यूँ किया है तो फिर क्यूँ गिला करो उससे (अहमद फ़राज़)

अह्द-ए-जवानी रो-रो काटा, पीरी में लीं आँखें मूँद
यानि रात बहोत थे जागे सुबह हुई आराम किया (मीर तक़ी 'मीर') .. इस शेर को पढकर जाने क्यों मुझे गुलज़ार साहब की पंक्तियाँ याद आ रही हैं... सारी जवानी कतरा के काटी, पीरी में टकरा गए हैं (दिल तो बच्चा है जी)

तुम्हारे अह्द-ए-वफ़ा को अहद मैं क्या समझूं
मुझे ख़ुद अपनी मोहब्बत का ऐतबार नहीं (साहिर लुधियानवी)

अवनींद्र जी, आपने रूक-रूक कर जो शेरों की बौछार की, उससे मैं भींगे बिना नहीं रह सका। अब चूँकि सारे हीं शेर यहाँ डाले नहीं जा सकते, इसलिए लकी ड्रा के सहारे मैंने इन दो शेरों को चुना है :)

ऐ ज़िन्दगी एक एहद मांगता हूँ तुझसे
फ़िर येही खेल हो तो मेरे साथ ना हो (स्वरचित )

वो जब से उम्र कि बदरिया सफ़ेद हो गयी
एहदे वफ़ा तो छोड़ो मुस्कुराता नहीं कोई (स्वरचित ) हा हा हा... क्या खूब कहा है आपने

नीलम जी, आपको हमारी महफ़िल और हमारी पेशकश पसंद आई, इसके लिए आपका तह-ए-दिल से शुक्रिया। आपने कहा कि आपका शेर चोरी का है, कोई बात नही, लेकिन इस शेर के मालिक का नाम तो बता देतीं। वैसे शेर कमाल का है:

और क्या अहदे वफ़ा होते हैं
लोग मिलते हैं,जुदा होते हैं

शन्नो जी, आपने अनजाने में हीं महफ़िल को जो दुआ दी, उससे मेरा दिल बाग-बाग हो गया... वाह क्या कहा है आपने:

हमें किसी की अहदे वफ़ा का इल्म नहीं
हम और हमारी महफ़िल बरक़रार रहे

मनु जी, आपको समझना इतना आसान नहीं। आप महफ़िल में आए, बड़े दिनों बाद आए, इससे हमें बड़ी हीं खुशी हासिल हुई, लेकिन खतों को पढने के बाद गज़ल सुनना ज़रूरी नहीं समझा.. यह मामला मुझे समझ नहीं आया। थोड़ा खुलकर समझाईयेगा।

सुमित जी और पूजा जी आप लोगों की दुआओं के कारण हीं महफ़िल आज अपनी ७६वीं कड़ी तक पहुँच सकी है। अपना प्यार (और/या) आशीर्वाद इसी तरह बनाए रखिएगा :)

मंजु जी, शेर कहने में आपने बड़ी हीं देर कर दी। अच्छी बात यह है कि आपको वह पता ( http://www.ebazm.com/dictionary.htm ) मिल चुका है, जहाँ से शब्दों के अर्थ मालूम पड़ जाएँगे। यह रहा आपका शेर:

निभानी नहीं आती उसे रस्म अहद वफा की ,
टूटती हैं चूडियाँ हर दिन बेवफाई से .

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, March 23, 2010

सावन का महीना पवन करे सोर.....और बिन सावन ही मचा शोर बख्शी साहब से सीधे सरल गीतों का

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 382/2010/82

मैं शायर तो नहीं'। गीतकार आनंद बक्शी पर केन्द्रित इस लगु शृंखला की दूसरी कड़ी में आपका स्वागत है। कल हमने आनंद बक्शी साहब के जीवन के शुरुआती दिनों का हाल आपको बताया था, और हम आ पहुँचे थे सन् १९६५ पर जिस साल उनकी पहली कामयाब फ़िल्म 'जब जब फूल खिले' प्रदर्शित हुई थी। दोस्तों, कल हमने यह कहा था कि 'जब जब फूल खिले' की अपार कामयाबी के बाद आनंद बक्शी को फिर कभी पीछे मुड़ कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। यह बात 'ब्रॊड सेन्स' में शायद सही थी, लेकिन हक़ीक़त कुछ युं थी कि इस फ़िल्म के बाद परदेसी बने आनंद बक्शी की तरफ़ किसी ने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। और जैसे 'जब जब...' फ़िल्म का गीत "यहाँ मैं अजनबी हूँ" उन्ही पर लागू हो गया। उनके तरफ़ इस उदासीन व्यवहार का कारण था उस समय हर संगीतकार का अपना गीतकार हुआ करता था, जैसे शंकर जयकिशन के लिए लिखते थे शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी, नौशाद के लिए शक़ील, कल्याणजी-आनंदजी के लिए इंदीवर वगेरह। यहाँ तक कि सचिन देव बर्मन ने भी उन्हे नया समझ कर उनकी ओर ध्यान नहीं दिया। पर तक़दीर को भी अपना रंग दिखाना था, आनंद बक्शी के सूखे जीवन में भी सावन की सुरीली फुहार आनी ही थी, और वह आकर रही। आप हमारा इशारा समझ गए होंगे। जी हाँ, सन् १९६७ में, यानी कि 'जब जब फूल खिले' के दो साल बाद, जब फ़िल्मकार एल. वी. प्रसाद ने फ़िल्म 'मिलन' की योजना बनाई तो संगीतकार के रूप में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को और बतौर गीतकार आनंद बक्शी को चुना गया। सुनिल दत्त, नूतन और जमुना अभिनीत इस फ़िल्म के सुमधुर संगीत के लिए लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार दिया गया। नूतन को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री और जमुना को सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री के पुरस्कार मिले।

'मिलन' का सब से मक़बूल गीत था "सावन का महीना पवन करे सोर", जिसके लिए आनंद बक्शी साहब को नॊमिनेट किया गया था फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार के लिए। हालाँकि उन्हे यह पुरस्कार नहीं मिल पाया, लेकिन इस गीत ने वह असर छोड़ा कि आज भी यह गीत बक्शी साहब के लिए बेहतरीन गीतों में गिना जाता है। लोक शैली में लिखे हुए इस गीत को बारिश या सावन पर बनने वाले गीतों की श्रेणी में बहुत उपर के स्थान दिया जाता रहा है। आज प्रस्तुत है यही गीत 'मैं शायर तो नहीं' शृंखला के तहत। लता मंगेशकर और मुकेश की युगल आवाज़ें हैं इस गीत में। यहाँ एक बात कहना ज़रूरी है कि जब भी लता जी और मुकेश जी एक साथ स्टेज शोज़ पर गए हैं, इस गीत को ज़रूर ज़रूर गाए हैं। गीत की शुरुआत में जो नोक झोंक है "शोर" और "सोर" को लेकर, उसका जनता तालियों की गड़गड़ाहट के साथ स्वागत करती आई है हर शो में। सन् १९७६ में आनंद बक्शी साहब तशरीफ़ लाए थे विविध भारती के स्टुडियो में 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम प्रस्तुत करने हेतु। उसमें इस गीत को बजाते हुए उन्होने कहा था - "'मिलन' फ़िल्म के एक गीत का मुखड़ा लिख कर मैं बीमार पड़ गया। डॊक्टर ने बाहर जाने से रोक लगा दी। तो मैंने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को अपने घर पर बुला लिया। देखने लायक नज़ारा था। एक तरफ़ मैं लेटा हूँ, एक तरफ़ लक्ष्मी-प्यारे मुझे अंतरे का मीटर समझा रहे हैं, डॊकटर मेरी नस पकड़े खड़े हैं, और मैं गीत के बोल सोच रहा हूँ। जब यह गीत बना तो सावन के बादलों की ही तरह इस गीत ने काफ़ी शोर मचाया।" आनंद बक्शी के गीतों की खासियत थी मोहब्बत के मुख्तलिफ रंग जो उनके चाहनेवालों के लिए सावन की बौछार की तरह थी। तो आइए दोस्तों, आज का यह गीत सुनें, और सावन के नज़ारों के साथ साथ बक्शी साहब के घर के उस नज़ारे को भी महसूस करें जिसका वर्णन अभी बक्शी साहब ने दिया।



क्या आप जानते हैं...
कि आनंद बक्शी ने करीब २५० फ़िल्मों में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ काम किया, और फ़िल्म 'दोस्ती' को छोड़कर उन सभी फ़िल्मों में गीत लिखे जिनके लिए लक्ष्मी-प्यारे को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिले।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. एक अंतरे की पहली पंक्ति में शब्द है "रीत", गीत बताएं -३ अंक.
2. विभुति भुशण बंदोपाध्याय की उपन्यास पर आधारित थी ये फिल्म नाम बताएं- २ अंक.
3. इसी कहानी पर अरबिंदो मुखर्जी ने १९७० में जो बांगला फिल्म बनायीं थी उसका रिमेक थी ये क्लास्सिक, कौन थे मुख्या अभिनेता और अभिनेत्री -२ अंक.
4. आनंद बख्शी साहब को इस फिल्म के एक अन्य गीत के लिए नामांकन मिला था, पर किस गीतकार ने उनसे बाज़ी मार ली बताएं -३ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
बहुत खूब शरद जी आपके निर्णय का हम भी स्वागत करते हैं, पर अवध जी सही जवाब लाये और पदम जी और इंदु जी भी...सभी को बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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