Sunday, August 8, 2010

रविवार सुबह की कॉफी और एक बेहद दुर्लभ अ-प्रकाशित गीत फिल्म मुग़ल-ए-आज़म से (26)...हुस्न की बारात चली

ज़रा गौर कीजिये कि आप किसी काम को दिल से करें उसका पूरा मेहनताना तो मिले लेकिन उसका वो इस्तेमाल न किया जाए जिसके लिए आपने इतनी मेहनत की है. तो आपको कैसा लगेगा. शायद आपका जवाब भी वही होगा जो मेरा है कि बहुत बुरा लगेगा. संगीतकार ने दिन रात एक करके धुन बनाई, गीतकार के शब्दों के भण्डार में डूबकर उसपर बोल लिखे तो वही गायक या गायिका के उस पर मेहनत का न जाने कितने रीटेक के बाद रंग चढ़ाया मगर वो गीत श्रोताओं तक नहीं पहुँच पाया तो इस पर तीनों की ही मेहनत बेकार चली गयी क्योंकि एक फनकार को केवल वाह वाह चाहिए जो उसे नहीं मिली.

लेकिन ऐसे गीतों की कीमत कुछ ज्यादा ही हुआ करती है इस बात को संगीत प्रेमी अच्छी तरह से जानते है, अगर ये गीत हमें कहीं से मिल जाए तो हम तो सुनकर आनंद ही उठाते हैं. लेकिन इतना तो ज़रूर है की इन गीतों को सुनने के बाद आप ये अंदाजा लगा सकते हैं की अगर ये गीत फिल्म के साथ प्रदर्शित हो जाता तो शायद फिल्म की कामयाबी में चार चाँद लगा देता.

ये गीत कभी भी किसी भी मोड़ पर फिल्म से निकाल दिए जाते है जिसकी बहुत सारी वजह हो सकती हैं कभी फिल्म की लम्बाई तो कभी प्रोडूसर को पसंद न आना वगैरह वगैरह. वहीँ दूसरी तरफ कभी कभी ऐसा भी होता है दोस्तों की किसी गीत को संगीतकार अपने प्राइवेट बना लेते हैं और वो फिल्म में आ जाता है यहाँ तक के फिल्म की कहानी उस गीत के अनुरूप मोड़ दी जाती है, फिल्म इतिहास में ऐसे बहुत से गीत हैं जिन्होंने फिल्म की कहानी को एक नया मोड़ दे दिया. खैर इस बारे में कभी तफसील से चर्चा करूंगा एक पूरा अंक इसी विषय पर लेकर.

आप सोच रहे होंगे की ये बातें कब ख़त्म हों और गीत सुनने को मिले तो मैं ज्यादा देर नहीं करूँगा आपको गीत सुनवाने में. ये गीत जो मैं यहाँ लेकर आया हूँ फिल्म मुग़ल ऐ आज़म से है, इस फिल्म के बारे में हर जगह इतनी जानकारी है के मैं कुछ भी कहूँगा तो वो ऐसा लगेगा जैसे मैं बात को दोहरा रहा हूँ. लेकिन फिर भी यहाँ एक बात कहना चाहूँगा जो कुछ कम लोगों को ही पता है की बड़े गुलाम अली साब के इस फिल्म में दो रागों में अपनी आवाज़ दी थी, उस ज़माने में प्लेबैक सिंगिंग आ चुकी थी लेकिन बड़े गुलाम अली साब ने ये दोनों राग ऑनलाइन शूटिंग की दौरान ही गाये थे, बाद में इनकी रेकॉर्डिंग स्टूडियो में हुयी थी. उस ज़माने में बड़े गुलाम अली साब ने इन दो रागों के लिए ६० हज़ार रूपए लिए थे जो उस ज़माने में बहुत ज्यादा थे मगर के. आसिफ तो १ लाख सोचकर गए थे.

चलिए अब गीत की तरफ आते है इस गीत में आवाज़े हैं शमशाद बेगम, लता मंगेशकर और मुबारक बेगम की.
ये गीत फिल्म की कहानी के हिसाब से कहाँ पर फिल्माया जाना था इस का हम तो अंदाजा ही लगा सकते है. मेरे हिसाब से तो इस गीत का फिल्मांकन मधुबाला उर्फ़ अनारकली को दिलीप कुमार उर्फ़ शहजादा सलीम के लिए तैयार करते वक़्त होना चाहिए था. जहाँ अनारकली बनी मधुबाला शहजादा सलीम बने दिलीप कुमार को गुलाब के फूल में बेहोशी के दवा सुंघा देती हैं.

पेश है गीत-

Husn Kii Baarat Chali - Unreleased Song From Mughal-e-Azam



प्रस्तुति- मुवीन



"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

2 comments:

सजीव सारथी said...

आज से लगभग ५० साल पहले महान फिल्म "मुग़ल-ए-आज़म" प्रदर्शित हुई थी, और आज ५० सालों के बाद भी इसे हम याद करते हैं, उत्कृष्ट अभिनय, संगीत, निर्देशन, संवाद, पठकथा, कला संयोजन और उच्चत्तम निर्माण स्तर के लिए. शहजादा सलीम और अनारकली के प्रेम की ये दास्ताँ, जिसमें दिलीप कुमार, मधुबाला और पृथ्वीराज कपूर ने अभिनय किया था, आज भी एक मिसाल है भारतीय फिल्मों के सुनहरे इतिहास में. के आसिफ की इस क्लास्सिक को बनने में पूरे ९ वर्ष लगे, और कहते हैं कि लोग सुबह उठकर इसकी टिकट खरीदने के लिए सिनेमा घरों के बाहर सो जाया करते थे. खुशी की बात ये है कि फिल्म के रंगीन संस्करण को आज की युवा पीढ़ी ने भी हाथों हाथ लिया है. इस दुर्लभ गीत को सुनवाने के लिए धन्येवाद

RAJ SINH said...

सही कहा सजीव जी आपने .
मैं जानता हूँ की लोग सवेरे से ही कोशिशें शुरू करते थे और अक्सर टिकट नहीं पाते थे .

तब हमारे जैसे काम आते थे थियेटर के बाहर जो ' प्रीमियम ' पर यानी ब्लैक में टिकट दे उन्हें खुश कर देते थे :)

मुवीन का आकलन सही है . वैसे भी कई गाने कुछ संस्करणों में थे कुछ में नहीं जैसे ......अय प्यार ये क्यूं दुनिया वाले बेकार की बातें करते हैं ......अनारकली की छोटी अहन पर फिल्माया गया .

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