Saturday, September 5, 2009

रे मन सुर में गा...फ़िल्मी गीतों में भी दिए हैं मन्ना डे और आशा ने उत्कृष्ट राग गायन की मिसाल

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 193

फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के पार्श्वगायकों में एक महत्वपूर्ण नाम मन्ना डे साहब का रहा है। भले ही उन्हे नायकों के पार्श्व गायन के लिए बहुत ज़्यादा मौके नहीं मिले, लेकिन उनकी गायकी का लोहा हर संगीतकार मानता था। शास्त्रीय संगीत में उनकी मज़बूत पकड़ का ही नतीजा था कि जब भी किसी फ़िल्म में शास्त्रीय संगीत पर आधारित, या फिर दूसरे शब्दों में, मुश्किल गीतों की बारी आती थी तो फ़िल्मकारों और संगीतकारों को सब से पहले मन्ना दा की ही याद आ जाती थी। आज '१० गायक और एक आपकी आशा' की तीसरी कड़ी में आशा भोंसले का साथ निभाने के लिए हमने आमंत्रण दिया है इसी सुर गंधर्व मन्ना डे साहब को! युं तो मन्ना दा ने लता मंगेशकर के साथ ही अपने ज़्यादातर लोकप्रिय युगल गीत गाए हैं, लेकिन आशा जी के साथ भी उनके गाए बहुत सी सुमधुर रचनाएँ हैं। आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में छा रहा है शास्त्रीय संगीत का रंग मन्ना दा और आशा जी की आवाज़ों में। फ़िल्म 'लाल पत्थर' का यह गीत है "रे मन सुर में गा"। क्या गाया है इन दोनों ने इस गीत को! कोई किसी से कम नहीं। इस जैसे गीत को सुन कर कौन कह सकता है कि फ़िल्मी गायक गायिकाएँ पारंपरिक शास्त्रीय गायकों के मुक़ाबले कुछ कम है! शास्त्रीय गायन की इस पुर-असर जुगलबंदी ने फ़िल्म संगीत के मान सम्मान को कई गुणा बढ़ा दिया है। 'लाल पत्थर' एफ़. सी. मेहरा की एक मशहूर और चर्चित फ़िल्म रही है जिसमें राज कुमार, हेमा मालिनी, राखी और विनोद मेहरा जैसे बड़े सितारों ने जानदार भूमिकाएँ निभायी। निर्देशक थे सुशील मजुमदार। फ़िल्म की कहानी प्रशांत चौधरी की थी, संवाद लिखे ब्रजेन्द्र गौड़ ने, और स्कीनप्ले था नबेन्दु घोष का। १९७१ में जब यह फ़िल्म बनी थी तब जयकिशन इस दुनिया में नहीं थे। शंकर ने अकेले ही फ़िल्म का संगीत तैयार किया, लेकिन 'शंकर जयकिशन' के नाम से ही। जयकिशन के नाम को हटाना उन्होने गवारा नहीं किया। इस फ़िल्म के गानें लिखे हसरत जयपुरी, नीरज और नवोदित गीतकार देव कोहली ने। देव कोहली ने इस फ़िल्म में किशोर कुमार का गाया "गीत गाता हूँ मैं" लिख कर रातों रात शोहरत की बुलंदी को छू लिया था। वैसे आज का प्रस्तुत गीत नीरज जी का लिखा हुआ है। इस गीत के लिए आशा जी और मन्ना डे की तारीफ़ तो हम कर ही चुके हैं, शंकर जी की तारीफ़ भी हम कैसे भूल सकते हैं, शुरु से ही वो शास्त्रीय रंग वाले ऐसे गीतों को इसी तरह का सुखद सुरीला अंजाम देते आ रहे हैं।

'लाल पत्थर' १९७१ की फ़िल्म थी। इसके ठीक एक साल बाद १९७२ में बंबई के एक होटल के एक शानदार हौल में मनाया गया था आशा भोंसले के फ़िल्मी गायन के २५ वर्ष पूरे हो जाने पर एक जश्न। बड़े बड़े सितारे आए हुए थे उस 'सिल्वर जुबिली' की पार्टी में, और उस मौके के लिए देश के कई महान संगीतकारों ने बधाई संदेश रिकार्ड किए थे आशा जी के लिए। इनमें से कई ऐसे हैं जो ख़ुद अब ज़िंदा नहीं हैं, मगर उनका संगीत हमेशा हमेशा रहेगा। ऐसे ही एक संगीतकार थे शंकर जयकिशन की जोड़ी। तो उस आयोजन में शंकर जी ने क्या कहा था आशा जी के बारे में, ज़रा आगे पढ़िए - "आशा जी की आवाज़ में इतना रस है, इतना सेक्स है, कि कोई भी दिलवाला झूम जाए, कि जब आवाज़ में इतना सेक्स है तो आवाज़वाली तो बहुत ख़ूबसूरत होंगी! आशा जी ख़ुद भी ख़ूबसूरत हैं और इनका दिल भी इतना ख़ूबसूरत है जैसे भोले बच्चे का होता है। गाने का कमाल ऐसा कि दादरा, ठुमरी, ग़ज़ल, गीत, क्लासिकल और माडर्न, किस स्टाइल की तारीफ़ करें! बिल्कुल १००% सोना। मेरी भगवान से यही प्रार्थना है कि आशा जी की एक नहीं कई 'जुबिली' हों, हर 'जुबिली' पर मुझे बड़ी ख़ुशी होगी।" दोस्तों, शंकर जी की ये बातें हमें अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत 'संगीत के सितारों की महफ़िल' कार्यक्रम के सौजन्य से प्राप्त हुई। तो लीजिए शंकर जयकिशन, आशा भोंसले और मन्ना डे के नाम करते हैं आज का यह गीत जो कि आधारित है राग कल्याण पर। खो जाइए मधुरता के समुंदर में, और ज़रा सोचिए कि क्या इससे ज़्यादा मधुर कोई और चीज़ हो सकती है!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. कल के गीत में आशा के सहगायक हैं "जगमोहन बख्शी".
२. इस फिल्म में आशा जी ने पहली बार बर्मन दा सीनियर के लिए गाया था.
३. मुखड़े में शब्द है - "हसीना".

पिछली पहेली का परिणाम -
रोहित जी बिलकुल सही जवाब देकर आपने कमाए दो अंक और और आपका कुल स्कोर हुआ २०. बधाई...मनु जी सर मोहर ही न लगते रहिये...कभी समय से भी आ जाया कीजिये.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

मुंशी प्रेमचंद की विजय

सुनो कहानी: विजय - मुंशी प्रेमचंद

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में प्रेमचंद की कहानी "नसीहतों का दफ्तर" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द की कथा "विजय", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 25 मिनट 14 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।






मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ...मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)


हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी


नतीजा यह हूआ कि आपस के प्यार और सच्चाई की जगह सन्देह पैदा हो गये। दरबारियों में गिरोह बनने लगे।
(प्रेमचंद की "विजय" से एक अंश)



नीचे के प्लेयर से सुनें.
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यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3

#Thirty sixth Story, Vijay: Munshi Premchand/Hindi Audio Book/2009/30. Voice: Anurag Sharma

Friday, September 4, 2009

चल बादलों के आगे ....कहा हेमंत दा ने आशा के सुर से सुर मिलाकर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 192

'१० गायक और एक आपकी आशा' की पहली कड़ी में कल आप ने आशा भोसले और तलत महमूद का गाया फ़िल्म 'इंसाफ़' का युगल गीत सुना था। आज भी कल जैसा ही एक नर्म-ओ-नाज़ुक रोमांटिक युगल गीत लेकर हम हाज़िर हुए हैं। आज के गायक हैं हेमंत कुमार। इससे पहले की हम आज के गीत की चर्चा करें, क्योंकि यह शृंखला केन्द्रित है आशा जी पर, तो आशा जी के बारे में पहले कुछ बातें हो जाए! आशा जी ने फ़िल्म जगत में अपना सफ़र शुरु किया था बतौर बाल कलाकार। 'बड़ी माँ' और 'आई बहार' जैसी फ़िल्मों में उन्होने अभिनय किया था। बतौर पार्श्वगायिका उन्हे पहला मौका दिया था संगीतकार हंसराज बहल ने, फ़िल्म थी 'चुनरिया' और साल था १९४८। लेकिन यह फ़िल्म नहीं चली और उनका गाना भी नज़रंदाज़ हो गया। शोहरत की ऊँचाइयों को छूने के लिए उन्हे करीब करीब १० साल संघर्ष करना पड़ा. १९५७ के कुछ फ़िल्मों से वो हिट हो गयीं और १९५८ में बनी 'हावड़ा ब्रिज' के "आइए मेहरबान" गीत से तो वो लोगों के दिलों पर राज करने लगीं। १९४८ की 'चुनरिया' से लेकर १९५८ की 'हावड़ा ब्रिज' तक जिन जिन प्रमुख फ़िल्मों में आशा जी ने गीत गाए, उन पर एक नज़र डालते चलें।

१९४९ - लेख, रुमाल
१९५० - मुक़द्दर, बावरे नन
१९५१ - सब्ज़ बाग़, लचक, जोहरी, मुखड़ा
१९५२ - जलपरी, संगदिल, अलादिन और जादुई चिराग़
१९५३ - परिनीता, एक दो तीन, छम छमा छम, रंगीला, चाचा चौधरी, हुस्न का चोर, गौहर, आग का दरिया, नौलखा हार, शमशीर, पापी
१९५४ - इल्ज़ाम, अलिबाबा और ४० चोर, बूट पालिश, अधिकार, चक्रधारी, धूप छाँव, दुर्गा पूजा, तुल्सीदास, मस्ताना
१९५५ - मधुर मिलन, श्री नकद नारायण, लुटेरा, मुसाफ़िरखाना, इंसानीयत, जशन, नवरात्री, मस्तानी, शिव भक्त, राजकन्या, रेल्वे प्लेट्फ़ार्म, तातर का चोर, हल्लागुल्ला, जल्वा, प्यारा दुश्मन
१९५६ - छू मंतर, कर भला, पैसा ही पैसा, इंद्रसभा, राम नवमी, सबसे बड़ा रुपया, हम सब चोर हैं, क़िस्मत, समुंदरी डाकू, इंसाफ़, गुरु घंटाल, फ़ंटुश, भागमभाग, जल्लाद
१९५७ - नौ दो ग्यारह, तुम सा नहीं देखा, संत रघु दुश्मन, जौनी वाकर, क़ैदी, अभिमान, पेयिंग्‍ गेस्ट, कितना बदल गया इंसान, बड़े सरकार, बंदी, बड़ा भाई, उस्ताद, मिस्टर एक्स, देख कबीरा रोया, एक झलक।

हेमंत कुमार के साथ आशा जी के गाये तमाम गीतों में से आज सुनिए १९५७ की फ़िल्म 'एक झलक' का एक बड़ा ही मधुर गीत "चल बादलों से आगे कुछ और ही समां है, हर चीज़ है निराली हर ज़िंदगी जवाँ है"। उन दिनों हेमंत कुमार अभिनेता प्रदीप कुमार के स्क्रीन वायस हुआ करते थे। दोनों ने अपने अपने बंबई के करीयर की शुरुआत १९५२ की फ़िल्म 'आनंदमठ' से की थी। उसके बाद 'अनारकली' और 'नागिन' जैसी ब्लौक्बस्टर फ़िल्में आईं। १९५७ में भी इस जोड़ी का सिलसिला जारी रहा। दीप खोंसला के साथ मिल कर प्रदीप कुमार ने 'दीप ऐंड प्रदीप प्रोडक्शन्स' की स्थापना की और इस बैनर के तले पहली फ़िल्म का निर्माण किया 'एक झलक'। ज़ाहिर सी बात है कि हेमंत कुमार से वो अपना पार्श्वगायन करवाते। लेकिन संगीत निर्देशन का भी दायित्व हेमंतदा को ही सौंपा गया। प्रदीप कुमार, वैजयंतीमाला और राजेन्द्र कुमार अभिनीत इस फ़िल्म में हेमंत दा ने नायिका के लिए आशा जी की आवाज़ चुनी और गीतों को लिखा एस. एच. बिहारी ने। गीता दत्त के साथ गाए युगल गीत "आजा ज़रा मेरे दिल के सहारे" के अलावा, हेमंत दा ने आशा जी के साथ कम से कम दो ऐसे युगल गीत गाए जो बेहद बेहद पसंद किए गए। उनमें से एक तो आज का प्रस्तुत गीत है, और दूसरा गीत था "ये हँसता हुआ कारवाँ ज़िंदगी का न पूछो चला है किधर"। इन दोनों गीतों में पाश्चत्य संगीत का असर है, लेकिन मेलडी को बरक़रार रखते हुए। यही तो बात थी उस ज़माने की। पाश्चात्य संगीत को अपनाना कोई बुरी बात नहीं है, जब तक वो गीत की मधुरता, शब्दों की गहराई और हमारी शोभनीय संस्कृति के साथ द्वंद न करने लग जाए। हेमंत दा ने जब कभी भी पाश्चात्य संगीत का इस्तेमाल अपने गीतों में किया है, हर बार इन चीज़ों को ध्यान में रखा है। तो चलिए सुनते हैं आज का यह गीत। कल जो बोनस १० अंकों वाला सवाल हमने पूछा था, उसका सही जवाब हम ऐसे नहीं बताएँगे, बल्कि हर रोज़ धीरे धीरे राज़ पर से परदा उठता जाएगा, जैसे जैसे गीत पेश होते जाएँगे।



गील के बोल:
हेमंत: (चल बादलों से आगे
कुछ और ही समा है
हर चीज़ है निराली
हर ज़िंदगी जवाँ है ) \- 2

आशा: (जिसे देखने को मेरी
आँखें तरस रही हैं ) \- 2
वो जगह जहाँ से हरदम
उजला बरस रही है
मेरी ख़्वाब की वो दुनिया
बतलाओ तो कहाँ है
हर चीज़ है निराली
हर ज़िंदगी जवाँ है

हेमंत: चल बादलों से आगे ...


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. कल के गीत आशा के साथ होंगें "मन्ना डे".
२. इस मशहूर फिल्म के नाम में एक रंग का नाम शामिल है.
३. शास्त्रीय संगीत पर आधारित इस गीत को लिखा है नीरज ने.

पिछली पहेली का परिणाम -
हर बार की तरह पराग जी फिर आगे निकल आये हैं २२ अंकों के साथ. बधाई....१० बोनुस अंकों के लिए आप सब ने अच्छी कोशिश की, पर सही जवाब किसी के पास नहीं मिला....खैर ऐसे मौके हम आपको आगे भी देते रहेंगें.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

ओ क़ाबा-ए-दिल ढाहने वाले, बुतखाना हूँ तो तेरा हूँ.... "ज़हीन" के शब्द और "शुभा" की आवाज़

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #४२

"प्रश्न-पहेली" की यह दूसरी "किश्त" पाठकों को भा रही है, इसी यकीन और इसी उम्मीद के साथ हम पहुँच गए हैं इस पहेली के दूसरे सोपान पर। आज के प्रश्नों का पिटारा खोलने से पहले वक्त है पिछली महफ़िल के विजेताओं और अंकों से परदा हटाने का। पहेली के साथ हीं शरद जी की वापसी तय थी और वैसा हीं हुआ। बस हमें किसी की कमी खली तो वो हैं "दिशा" जी। चलिए कोई बात नहीं, उम्मीद करते हैं कि दिशा जी अगली पहेलियों का जरूर हिस्सा बनेंगी। पिछली कड़ी की पहेलियों का सबसे पहले जवाब दिया शरद जी ने। वैसे तो उन्हें इसके लिए ४ अंक मिलने चाहिए थें, लेकिन चूँकि उन्होंने दूसरे प्रश्न में आधा हीं उत्तर दिया ("मुन्नी बेगम" और "१९७६" ये दो उत्तर थे) , इसलिए कुल मिलाकर उन्हें ३ हीं अंक मिलते हैं। शरद जी के बाद "सीमा" जी जवाबों के साथ हाज़िर हुईं। उन्होंने दोनों प्रश्नों के सही सवाल दिए। इसलिए उन्हें नियम के अनुसार २ अंक मिलते हैं। अब बारी है आज के प्रश्नों की| तो यह रही प्रतियोगिता की घोषणा और उसके आगे दो प्रश्न: ५० वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। अगर आपने पिछली कड़ियों को सही से पढा होगा तो आपको जवाब ढूँढने में मुश्किल नहीं होगी, नहीं तो आपको थोड़ी मेहनत करनी होगी। और हाँ, हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद २ अंक और उसके बाद हर किसी को १ अंक मिलेंगे। इन १० कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की ५ गज़लों की फरमाईश कर सकता है, जिसे हम ५३वीं से ६०वीं कड़ी के बीच में पेश करेंगे। लेकिन अगर ऐसा हो जाए कि १० कड़ियों के बाद हमें एक से ज्यादा विजेता मिल रहे हों तो ५१वीं कड़ी ट्राई ब्रेकर का काम करेगी, मतलब कि उन विजेताओं में से जो भी पहले ५१वीं कड़ी के एकमात्र मेगा-प्रश्न का जवाब दे दे,वह हमारा फ़ाईनल विजेता होगा। एक बात और- जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) "मैं कोई बर्फ़ नहीं जो पिघल जाऊँगा" यह किसने लिखा है और किसकी फिल्म में इस गाने को स्थान दिया गया है?
२) "शाहनामा-ए-इस्लाम" की रचना करने वाला एक शायर जिसकी एक नज़्म में "अलस्त" शब्द का प्रयोग हुआ है। उस शायर का नाम बताएँ और यह भी बताएँ कि उस नज़्म में अलस्त का किस अर्थ में प्रयोग हुआ है।


आज की गज़ल सुनवाने से पहले हम आपको आपकी अपनी दिल्ली में आयोजित होने वाले एक समारोह से अवगत कराना चाहेंगे जिसके बारे में मुमकिन है कि कईयों को पता न हो। इस समारोह की महत्ता इसलिए भी है कि इसका रिश्ता जहाँ एक तरह सूफ़ी कलामों से जुड़ा है तो वहीं दूसरी तरह सूफ़ी और शास्त्रीय गायकी से। जहान-ए-खुसरो एक पर्व, एक उत्सव है, जो हर साल दिल्ली में मार्च के महीने में मनाया जाता है। इसकी शुरूआत २००१ में प्रसिद्ध सूफ़ी कवि अमिर खुसरो की याद में की गई थी। अमिर खुसरो हज़रत निज़ाम-उद-दीन औलिया, जो कि चिश्ती परंपरा के संत थे, के शिष्य थे। अमिर खुसरो ने हीं तबला और सितार का ईजाद किया था। उर्दू भाषा के जनक के रूप में भी इन्हें याद किया जाता है। जहाँ तक जहान-ए-खुसरो का सवाल है तो तीन दिनों तक चलने वाले इस पर्व की स्थापना हिंदी फिल्मों के जाने-माने फिल्म निर्देशक मुज़फ़्फ़र अली ने की थी। इस महापर्व में पूरी दुनिया से सूफ़ी संगीत के जानकार शिरकत करते हैं। "बुखारा", "शिराज़" और "कुस्तुनतुनिया" तक से आकर लोगों ने इस महापर्व की शोभा बढाई है। इस महापर्व के जो दो मुख्य आकर्षण रहे हैं: वे हैं बेगम आबिदा परवीन और शुभा मुद्गल। हुमायूँ के मकबरे पर आयोजित होने वाले इस पर्व की रंगीनियों के क्या कहने। वसंत ऋतु होने के कारण आसपास का वातावरण बड़ा हीं सुखद रहता है। साथ हीं कृत्रिम सजावट भी मन को मोह लेते हैं। तो यूँ सजता है हर साल "जहान-ए-खुसरो"। इसी सजावट और इसी मदहोशी के आलम से हर साल कई सारी रिकार्डिंग्स उमड़ कर बाहर की दुनिया में आती है। ऐसी हीं एक रिकार्डिंग "जहान-ए-खुसरो(THE REALM OF THE HEART)" से लेकर आए हैं हम आज की गज़ल जिसे अपनी आवाज़ से सजाया है शास्त्रीय संगीत और पॉप संगीत पर बराबर का अधिकार रखने वालीं शोभा मुद्गल ने और जिसकी रचना की है हज़रत ज़हीन शाह ताजी साहब ने। तो चलिए पहले हम बात करते हैं शुभा मुद्गल जी की।

रवीन्द्ग कालिया साहब "ग़ालिब छुटी शराब" शीर्षक से लिखे अपने लेख में अनजाने में हीं शुभा मुद्गल का परिचय दे देते हैं: जब महादेवीजी की अध्‍यक्षता में फै़ज़ का नागरिक अभिनंदन और विदाई समारोह हो रहा था तो डीपीटी ने मंच से शुभा मुद्‌गल को फै़ज़ की एक ग़ज़ल पेश करने की दावत दी थी। उन दिनों शुभा मुद्‌गल शुभा गुप्‍ता थीं और इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय की छात्रा थीं-अत्‍यंत दुबली-पतली और छरहरे बदन की छुईमुई सी युवती। तब तक इलाहाबाद इस प्रतिभा से नितांत अपरिचित था। शुभा मुद्‌गल ने जब अपने सधे कंठ से फै़ज़ की ग़ज़ल पेश की तो हाल में सन्‍नाटा खिंच गया। उनकी अदायगी में शास्‍त्रीय संगीत का पुट और गज़ब का कसाव था। फै़ज़ खुद दाद देने लगे। उनकी गायी हुई एक गज़ल आज भी स्‍मृतियों में कौंध रही है-

गुलों में रंग भरे बादा-ए-नौ बहार चले,
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले।

बहुत कम लोग जानते होंगे, शुभा मुद्‌गल हिंदी के प्रख्‍यात प्रगतिशील समीक्षक प्रकाशचंद्र गुप्‍त की पौत्री हैं। इस बात का उल्‍लेख करना भी ग़ैरज़रूरी न होगा कि शुभा के पिता स्‍कंदगुप्‍त फ़ैज़ के ज़बरदस्‍त फैन थे और पिता की तरह इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग से सम्बद्ध थे। उन्‍होंने फै़ज़ के कार्यक्रमों पर मूवी कैमरे से फिल्‍म बनाई थी। और फै़ज़ की हर गुफ़्‍तगू और तकरीर का टेप तैयार किया था। वह भारत के मान्‍यताप्राप्‍त क्रिकेट कमेंटटर भी थे।
शुभा भक्ति संगीत को अपने लिए मार्गदर्शन का एक साधन मानती हैं। इस बाबत उनका कहना है कि जब मैंने संगीत सीखना शुरू किया, तो मुझे बताया गया था कि संगीत और भक्ति एक दूसरे का पर्याय है। मेरे द्वारा कृष्ण संप्रदाय की दीक्षा लेने का एक प्रमुख कारण यह भी रहा है। यह संप्रदाय संगीत को विशेष महत्व देता है। वे भगवान की भक्ति दो प्रकार भोग सेवा और राग सेवा से करते है। यह टिक्का, जिसे लोग स्टाइलिश बिंदी समझते है, इस संप्रदाय से जुड़ने की निशानी है। शुभा मुद्गल ने कुमार गंधर्व के बाद भारत में उनकी गायन-शैली को जीवित रखने का काम किया है। इन्होंने गुरू रामाश्रय झा से संगीत की विधिवत शिक्षा ली है। जब शुभा इलाहाबाद में थीं तो सुमित्रानंदन पंत और फ़िराक़ गोरखपुरी जैसे दिग्गज इनके पड़ोसी हुआ करते थे। फ़िराक को याद करते हुए ये कहती हैं: फ़िराक़ जी कभी भी आकर दरवाजा खटखटा देते थे। एक बार फ़िराक़ जी हमारे घर पर रचना सुनाने आने वाले थे। हम लोग इंतज़ार करते रह गए पर वे आ न सके। फिर एक दिन अचानक दरवाजे की घंटी बजी। फिर एक बुलंद आवाज़ सुनाई पड़ी- स्कंद है? स्कंद यानि मेरे पिता जी। मैने जाकर देखा तो निचुड़े हुए कुरते-पायजामे में फिराक़ जी खड़े थे। मैं उन्हें देख कर ठिठक कर रह गई। बड़ी-बड़ी आँखें, उन आँखों में अद्भुत तेज था। फिर उसी गरजती हुई आवाज़ में कहा -उस दिन नहीं आ पाया इसलिए आज आ पाया हूँ। वैसे क्या आपको पता है कि शुभा जी गायिका बनने से पहले एक कथक नृत्यांगना थी। नहीं पता....कोई बात नहीं, हम किस लिए हैं, लेकिन आज नहीं, कभी दूसरे अंक में। अभी तो आज की गज़ल की ओर रूख करते हैं। उससे पहले आज की गज़ल/नज़्म के शायर ज़हीन साहब का एक शेर पेश-ए-खिदमत है:

निगह-ए-नाज़ से पूछेंगे किसी दिन ये ज़हीन,
तूने क्या-क्या न बनाया, कोई क्या-क्या न बना|


ज़हीन साहब के बारे में अंतर्जाल पर कम हीं जानकारी उपलब्ध है। लेकिन हम आपसे वादा करते हैं कि जब भी इनकी कोई गज़ल या नज़्म अगली बार हमारी महफ़िल का हिस्सा बनेगी तो इनकी ज़िंदगी और इनके कलामों से आपको ज़रूर अवगत करवाएँगे। आज चूँकि शुभा जी की हीं बातें होती रह गईं, इसलिए कुछ अलग लिखने का वक्त न मिला। कोई बात नहीं, वो कहते हैं ना कि "पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त" । इसलिए वक्त के तकाजे को समझते हुए आज की गज़ल/नज़्म का लुत्फ़ उठाते हैं:

मैं होश में हूँ तो तेरा हूँ,
दीवाना हूँ तो तेरा हूँ,
हूँ राज़ अगर तो तेरा हूँ,
अफ़साना हूँ तो तेरा हूँ।

बर्बाद किया, बर्बाद हुआ,
आबाद किया, आबाद हुआ,
वीराना हूँ तो तेरा हूँ,
काशाना हूँ तो तेरा हूँ।

इस तेरी तजल्ली के कुर्बां,
कुर्बान-ए-तजल्ली हर उनवा,
मैं शमा भी हूँ तो तेरा हूँ,
परवाना हूँ तो तेरा हूँ।

तू मेरे कैफ़ की दुनिया है,
तू मेरी मस्ती का आलम,
पैमाना हूँ तो तेरा हूँ,
मैखाना हूँ तो तेरा हूँ।

हर ज़र्रा ज़हीन की हस्ती का,
तस्वीर है तेरी सर-ता-पा,
ओ क़ाबा-ए-दिल ढाहने वाले,
बुतखाना हूँ तो तेरा हूँ।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

तुझ पे भी बरसा है उस __ से मेह्ताब का नूर
जिस में बीती हुई रातों की कसक बाक़ी है


आपके विकल्प हैं -
a) बाम, b) शाम, c) दरीचे, d) फलक

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "किश्तों" और शेर कुछ यूं था -

भूले है रफ्ता रफ्ता उन्हें मुद्दतों में हम
किश्तों में खुदखुशी का मज़ा हमसे पूछिये..

खुमार साहब के इस शेर को सबसे पहले सही पहचाना "सीमा" जी ने। वाह...क्या बात है सीमा जी....पिछली बार की तरह इस बार भी महफ़िल में आप खुल कर नज़र आईं। धीरे-धीरे शान-ए-महफ़िल बनती जा रहीं हैं आप। कुलदीप जी और शामिख साहब को जबरदस्त टक्कर दिया है आपने। इसका पता इसी बात से चलता है कि जिस गज़ल को शामिख साहब न पहचान पाएँ, आपने न सिर्फ़ उस गज़ल से हमें अवगत कराया, बल्कि यह भी बताया कि उस गज़ल के गज़लगो "अदीम हासमी" साहब हैं। वैसे तो "किश्तों" शब्द पर आपने कई सारे शेर पेश किए, लेकिन हम "जहीर कुरैशी" साहब की वह गज़ल यहाँ उद्धृत करना चाहेंगे, जिसमें रदीफ़ हीं है "किश्तों में":

विष असर कर रहा है किश्तों में
आदमी मर रहा है किश्तों में

उसने इकमुश्त ले लिया था ऋण
व्याज को भर रहा है किश्तों में

एक अपना बड़ा निजी चेहरा
सबके भीतर रहा है किश्तों में

माँ ,पिता ,पुत्र,पुत्र की पत्नी
एक ही घर रहा है किश्तों में

एटमी अस्त्र हाथ में लेकर
आदमी डर रहा है किश्तों में

सीमा जी के बाद महफ़िल में आना हुआ मंजु जी का। यह रहा आपका स्वरचित शेर:

किश्तों पर किया था दिल पर जादू `
अब दर्द का अहसास ही बाकी 'मंजू '

शामिख साहब...जरा संभलिए..महफ़िल में आप तनिक देर से हाज़िर हुए और यह देखिए सीमा जी महफ़िल लूट ले गईं। आपने भी एक से बढकर एक शेर पेश किए। बानगी मौजूद है:

लोग उम्रे दराज़ की दुआएँ करते हैं
यहाँ ये हाल है, किश्तों में रोज़ मरते हैं

एक मुश्त देखा नही तुझे कभी भी
बस किश्तों में देखा है थोड़ा-थोडा

सुमित जी और मनु जी, न जाने आप दोनों किस जल्दीबाजी में थे...आँधी की तरह आए और तूफ़ान की तरह निकल पड़े...महफ़िल में थोड़ा और वक्त गुजारा कीजिए। सुमित जी, पुराना शेर याद दिलाने के लिए शुक्रिया।

कुलदीप जी, खुमार साहब के प्रति आपकी दीवानगी तो हमें तब भी मालूम पड़ गई थी, जब खुमार साहब पर हमने एक अंक पेश किया था। आपने खुमार साहब की कई सारी गज़लें महफ़िल को मुहैया कराईं। इसके लिए धन्यवाद। "किश्तों" पर आपने यह शेर महफ़िल के सुपूर्द किया:

जिंदगी का ज़हर पीना पड़ रहा है
मुझे किश्तों में जीना पड़ रहा है

शन्नो जी..अपनी खास अदा के साथ महफ़िल में नज़र आईं। महफ़िल को विषय बनाकर शेर कहने का आपका अंदाज़ काबिल-ए-तारीफ़ है। यह रही आपकी पेशकश:

किसकी नज़र लग गयी है उनको
की अब बातें भी करते हैं तो किश्तों में.

अंत में शरद जी अपने स्वरचित शेर के साथ महफ़िल की शमा बुझाते दिखे:

जब तक जिया मरता रहा मैं किश्तों में
अब कर दिया शामिल मुझे फ़रिश्तों में ।

श्याम जी, महफ़िल में आपका स्वागत है। यह क्या, आए... एक शेर कहा और उस शेर को बस शरद जी को संभालने को कह कर चल दिए। हम भी तो हैं यहाँ। आप जैसे शायर को महफ़िल में पाकर हम धन्य हो गए:

कभी नींद बेची कभी ख्वाब बेचे
यूं किश्तों मे बिकना पड़ा ‘श्याम’ मुझको

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Thursday, September 3, 2009

दो दिल धड़क रहें हैं और आवाज़ एक है....आशा और तलत ने आवाज़ मिलाई आवाज़ से

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 191

गायक मुकेश के बाद आज से हम फ़िल्म संगीत की आकाश के उस सितारे पर एक लघु शृंखला शुरु करने जा रहे हैं जिनकी आवाज़ का जादू हर उम्र के सुनने वालों पर गहराई से हुआ है। दिल की गहराई में आसानी से उतर जाने वाली, हर भाव, हर रंग को उजागर करने वाली ये आवाज़ है फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध पार्श्व गायिका आशा भोंसले की। आशा भोंसले की आवाज़ की अगर हम तारीफ़ करें तो शायद शब्द भी फीके पड़ जाये उनकी आवाज़ की चमक के सामने। और यह चमक दिन ब दिन बढ़ती चली गयी है अलग अलग रंग बदल कर, ठीक वैसे जैसे कोई चित्रकार अलग अलग रंगों से अपने चित्र को सुंदरता प्रदान करता चला जा रहा हो! ८ सितंबर को आशा जी का जनम दिन है। इसी को केन्द्र करते हुए आज से अगले १० दिनों तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनिए आशा जी के गाए युगल गीतों की एक ख़ास लघु शृंखला '१० गायक और एक आपकी आशा'। इसके तहत हम आप को आशा जी के गाए फ़िल्म संगीत के सुनहरे युग के १० युगल गीत सुनवाएँगे, १० अलग अलग गायकों के साथ गाए हुए। इसमें हम गायिकाओं को शामिल नहीं कर रहे हैं। 'फ़ीमेल डुएट्स' पर हम भविष्य में एक अलग से शृंखला का आयोजन ज़रूर करेंगे। तो दोस्तों, '१० गायक और एक आपकी आशा' की इस पहली कड़ी में हम ने आशा जी के साथ जिस गायक को चुना है, वो हैं मखमली आवाज़ वाले, हर दिल अज़िज़, अपने तलत महमूद साहब। युं तो आशा जी और तलत साहब ने बहुत से युगल गीत गाए हैं, जिनमें से कुछ जाने कुछ अंजाने रह गये हैं, लेकिन सब से पहले जो दो चार गीत झट से ज़हन में आते हैं, वो हैं फ़िल्म 'सोने की चिड़िया' के "प्यार पर बस तो नहीं है" और "सच बता तू मुझपे फ़िदा", फ़िल्म 'बड़ा भाई' का "चोरी चोरी दिल का लगाना बुरी बात है", फ़िल्म 'अपसरा' का "है ज़िंदगी कितनी हसीन", फ़िल्म '२४ घंटे' का "हम हाल-ए-दिल तुम से कहना है, कहिए", फ़िल्म 'लैला मजनू' का "बहारों की दुनिया पुकारे तू आजा", फ़िल्म 'लाला रुख़' का "प्यास कुछ और भी भड़का दे झलक दिखला के", फ़िल्म 'मेम साहिब' का "कहता है दिल तुम हो मेरे लिए", फ़िल्म 'बहाना' का "तेरी निगाहों में तेरी ही बाहों में रहने को जी चाहता है", फ़िल्म 'एक साल पहले' का "नज़र उठा के ये रंगीं समा रहे न रहे", इत्यादि। आशा जी और तलत साहब के गाए ऐसे तमाम सुमधुर युगल गीतों के समुंदर में से आज हम ने जिस लोकप्रिय गीत को चुना है, वह है फ़िल्म 'इंसाफ़' का, "दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज़ एक है"।

फ़िल्म 'इंसाफ़' बनी थी सन् १९५६ में केदार कपूर के निर्देशन में। रावजी यु. पटेल निर्मित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे अजीत और नलिनी जयवंत। फ़िल्म में संगीत का बीड़ा उठाया चित्रगुप्त ने और गीत लिखे असद भोपाली साहब ने। युं तो उस साल, यानी कि १९५६ में, चित्रगुप्त के संगीत निर्देशन में कई फ़िल्में प्रदर्शित हुईं जैसे कि 'बसंत पंचमी', 'बसरे की हूर', 'जयश्री', 'क़िस्मत', 'तलवार की धनी', और 'ज़िंदगी के मेले', लेकिन इनमें से कोई भी फ़िल्म नहीं चली, और ना ही उनका संगीत। अगर कुछ चला तो सिर्फ़ फ़िल्म 'इंसाफ़' का प्रस्तुत गीत, जो आज एक सदाबहार नग़मा बन कर रह गया है। बड़ा ही नाज़ुक गाना है यह, जिसमें असद भोपाली ने मोहब्बत के अहसासों को कुछ इस क़दर शब्दों में पिरोया है कि सुन कर दिल ख़ुश हो जाता है। "रंगीन हर अदा है, बेचैन हर नज़र है, एक दर्द सा इधर है, एक दर्द सा उधर है, दोनों की बेक़रारी का अंदाज़ एक है, नग़में जुदा जुदा है मगर साज़ एक है"। इस गीत के रीदम में चित्रगुप्त जी ने 'वाल्ट्ज़' का प्रयोग किया है। अगर आप 'वाल्ट्ज़' की जानकारी रखते हैं तो आप इसे इस गीत में महसूस कर सकते हैं। और अगर आप को इसका पता नहीं है तो कृपया इन गीतों के रीदम को ज़हन में लाने की कोशिश कीजिए, आप ख़ुद ब ख़ुद महसूस कर लेंगे 'वाल्ट्ज़' के रीदम को। नौशाद साहब ने 'वाल्ट्ज़' को हिंदी फ़िल्मी गीतों में लोकप्रिय बनाया था, इसलिए उन्ही के बनाये कुछ ऐसे गीतों की याद आप को दिलाते हैं, फ़िल्म 'दास्तान' का "त र री त र री....ये सावन रुत तुम और हम", फ़िल्म 'अंदाज़' का "तोड़ दिया दिल मेरा", फ़िल्म 'मेला' का "धरती को आकाश पुकारे", वगेरह। ग़ुलाम मोहम्मद के संगीत में फ़िल्म 'लैला मजनू' का गीत "चल दिया कारवाँ" भी 'वाल्ट्ज़' पर ही आधारित है। और सज्जाद साहब के स्वरबद्ध फ़िल्म 'संगदिल' का गीत "दिल में समा गए सजन, फूल खिले चमन चमन" तथा फ़िल्म 'दोस्त' का "बदनाम मोहब्बत कौन करे" में भी वाल्ट्ज़ का सुंदर प्रयोग सुनने को मिलता है। तो दोस्तों, आज हमने आप को 'वाल्ट्ज़' की थोड़ी बहुत जानकारी दी, आइए अब सुनते हैं आज का यह प्रस्तुत गीत आशा भोसले और तलत महमूद की आवाज़ में।



गीत के बोल -

आशा : आ आ... हं हं... आ आ...
दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज़ एक है \-2
तलत : नग़मे जुदा\-जुदा हैं मगर साज़ एक है
दोनों : दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज़ एक है \-2

तलत: रँगीन हर अदा है, बेचैन हर नज़र है \-2
आशा: इक दर्द सा इधर, इक दर्द सा उधर है
तलत: दोनों की बेक़रारी का अंदाज़ एक है \-2
तलत-आशा: नग़मे जुदा\-जुदा हैं मगर साज़ एक है
दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज़ एक है

आशा: तड़पाइये न हमको, शर्माइये न हमसे \-2
तलत: दोनों की ज़िंदगी है एक दूसरे के दम से \-2
आशा: हम दो कहानियाँ हैं मगर राज़ एक है \-2
तलत-आशा: नग़मे जुदा\-जुदा हैं मगर साज़ एक है
दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज़ एक है \-2


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ये है आशा का गाया एक और दोगाना.
२. साथी गायक हैं "हेमंत कुमार".
३. गीतकार हैं एस एच बिहारी और गीत में "बादलों" के आगे जाने की बात की है.

आज की पहेली के साथ जीतिए १० बोनस अंक
आप के हिसाब से हम और किन ८ गायकों को इस शृंखला में शामिल करने जा रहे हैं। अगर आप ने अगले २० घंटे के भीतर बिल्कुल सही जवाब दे दिया तो आप को मिलेंगे बोनस १० अंक, जो आप को आप के ५० अंक तक जल्द से जल्द पहुँचने में बेहद मददगार साबित होंगे। तो यह सुनहरा मौका है आप सभी के लिए और जो श्रोता 'पहेली प्रतियोगिता' पहले से ही जीत चुके हैं, उन्हे भी हम यह मौका दे रहे हैं कि आप भी इस विशेष बोनस सवाल का जवाब दे सकते हैं, आप के अंक सुरक्षित रहेंगे भविष्य के लिए। तो झट से याद कीजिए सुनहरे दौर के गायकों के नाम, जिनके साथ आशा जी ने गीत गाए हैं और आप को लगता है कि हम उन्ही गायकों को शामिल करने वाले हैं। आज आप तलत महमूद को सुन रहे हैं और कल हेमंत कुमार को सुनेंगे। तो फिर आपने बताने हैं कि बाक़ी के ८ गायकों के नाम कौन कौन से हैं?

पिछली पहेली का परिणाम -
पूर्वी जी बधाई २० अंकों के साथ अब आप पराग जी के बराबर आ चुकी हैं...सभी साथियों का आभार

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

"जी" पीढी का 'जागो मोहन प्यारे...' है "यो" पीढी में 'वेक अप सिद...'

ताजा सुर ताल (19)

ताजा सुर ताल में आज सुनिए शंकर एहसान लॉय और जावेद अख्तर का रचा ताज़ा तरीन गीत

सजीव- सुजॉय, जब भी हमें किसी नई फ़िल्म के लिए पता चलता है कि उसके संगीतकार शंकर एहसान लॉय होंगे, तो हम कम से कम इतना ज़रूर उम्मीद करते हैं कि उस संगीत में ज़रूर कुछ नया होगा, कोई नया प्रयोग सुनने को मिलेगा। तुम्हारे क्या विचार हैं इस बारे में?

सुजॉय - जी हाँ बिल्कुल, मैं आप से सहमत हूँ। पिछले दो चार सालों में उनकी हर फ़िल्म हिट रही है। और आजकल चर्चा में है 'वेक अप सिद' का म्युज़िक।

सजीव- मैं बस उसी पर आ रहा था कि तुमने मेरी मुँह की बात छीन ली। तो आज हम बात कर रहे हैं शंकर एहसान लॉय के तिकड़ी की और साथ ही उनकी नई फ़िल्म 'वेक अप सिद' की। लेकिन सुजॉय, मुझे इस फ़िल्म के गीतों को सुनकर ऐसा लगा कि इस फ़िल्म के गीतों में बहुत ज़्यादा नयापन ये लोग नहीं ला पाए हैं।

सुजॉय - सची बात है। पिछले साल 'रॊक ऒन' में जिस तरह का औफ़ बीट म्युज़िक इस तिकड़ी ने दिया था, इस फ़िल्म के गानें भी कुछ कुछ उसी अंदाज़ के हैं।

सजीव- हो सकता है कि इस फ़िल्म में नायक सिद के व्यक्तित्व को इसी तरह के गीतों की ज़रूरत हो! इस फ़िल्म का शीर्षक गीत, जिसे शंकर महादेवन ने गाया है, आज हम अपने श्रोताओं को सुनवा रहे हैं। इस गीत में जावेद अख़तर ने उस कश्मकश, युवावस्था की परेशानियाँ और 'आइडेन्टिटी क्राइसिस' को उभारने की कोशिश की है जिनसे हर युवक आज की दौर में गुज़रता है। पर न तो जावेद साहब ही यहाँ कोई करिश्मा कर पाए हैं न ही संगीतकार तिकडी ने ही कोई चमत्कारिक तत्व डाला है गीत में...

सुजॉय - इस शीर्षक गीत का एक रॉक वर्ज़न भी बनाया गया है जो गीत से ज़्यादा एक 'अलार्म' घड़ी ज़्यादा प्रतीत होती है। लेकिन अच्छी रीमिक्स का नमूना पेश किया है इस संगीतकार तिकड़ी ने। एक बार फिर 'रॉक ऑन' की याद दिलाता है यह गीत। सजीव, इस फ़िल्म के दूसरे गीतों के बारे में आपका क्या ख़याल है?

सजीव- शंकर का ही गाया एक और गीत है इस फ़िल्म में "आज कल ज़िंदगी", जो तुम्हे 'दिल चाहता है' के "कैसी है ये रुत के जिसमें फूल बन के दिल खिले" गीत की याद ज़रूर दिलाएगा।

सुजॉय - वाक़ई?

सजीव- हाँ, "लाइफ़ इज़ क्रेज़ी" गीत पेप्पी है जिसे शंकर ने उदय बेनेगल के साथ गाया है रॉक शैली में। कविता सेठ और अमिताभ भट्टाचार्य का गाया "इकतारा" भी कर्णप्रिय है। पर इस गीत को शंकर एहसान लॉय ने नहीं बल्कि अमित त्रिवेदी ने स्वरबद्ध किया है. मुझे लगता है ये इस फिल्म का एक और ऐसा गीत है जिसे इस शृंखला का हिस्सा बनना चाहिए

सुजॉय - ये वही अमित त्रिवेदी वही हैं न जिन्होने 'देव-डी' में संगीत देकर काफ़ी नाम कमाया था?

सजीव- बिल्कुल वही। एक और उल्लेखनीय गीत इस फ़िल्म का है क्लिन्टन सेरेजो का गाया हुआ "क्या करूँ"। क्लिन्टन की आवाज़ हम ने अक्सर पार्श्व में सुना है शंकर एहसान लॉय के गीतों में। यह भी एक पेप्पी गीत है, जिसके साथ सेरेजो ने पूरा न्याय किया है।

सुजॉय- सजीव, मुझे तो लगता है 'वेक अप सिद' की कहानी कुछ अलग हट के होगी क्योंकि इस फ़िल्म में रणबीर कपूर की नायिका बनी हैं कोनकोना सेन शर्मा, जो ज़्यादातर कलात्मक और पैरलेल सिनेमा के लिए जानी जाती है। मेरा ख़याल है निर्माता करण जोहर और नवोदित निर्देशक अयान मुखर्जी से कुछ नए और अच्छे की उम्मीद की जा सकती है।

सजीव - बिलकुल कोंकण मेरी सबसे पसंदीदा अभिनेत्रियों में हैं और वो इस फिल्म में तो मुझे इस फिल्म का बेसर्ब्री से इंतज़ार है. प्रोमोस देख कर बिलकुल लगता है कि फिल्म काफी युवा है. पर उस हिसाब से मुझे इस फिल्म का संगीत एक "लेट डाउन" ही लगा. और हाँ अयान मुखर्जी से याद आया कि इस उभरते निर्देशक ने इससे पहले बतौर सहायक निर्देशक आशुतोश गोवारिकर के साथ 'स्वदेस' में और करण जोहर के साथ 'कभी अलविदा ना कहना' में काम किया है। सुजॉय, शंकर- अहसान और लॉय के बारे में कुछ बताओ हमारे पाठकों को।

सुजॉय - सब से पहले तो यही कहूँगा कि एहसान का पूरा नाम है एहसान नूरानी और लॉय का पूरा नाम है लॉय मेन्डोन्सा; शंकर का पूरा नाम तो आप जानते ही हैं। आम तौर पर लोगों को लगता है कि शंकर-एहसान-लॉय ही फ़िल्म संगीत जगत की पहली संगीतकार तिकड़ी है।

सजीव- मैं भी तो यही मानता हूँ।

सुजॉय - नहीं, बहुत कम लोगों को यह पता है कि गुज़रे दौर में एक बहुत ही कमचर्चित संगीतकार तिकड़ी रही है लाला-असर-सत्तार। सुनने में लाला असर सत्तार एक ही आदमी का नाम प्रतीत होता है, लेकिन हक़ीक़त में ये तीन अलग अलग शख़्स थे।

सजीव- अच्छा हाँ नाम तो कुछ सुना हुआ सा लग रहा है, पर वाकई एक ही आदमी का नाम लगता है.

सुजॉय- शंकर अपने करीयर की शुरुआती दिनों में विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाया करते थे जब कि अहसान नूरानी की-बोर्ड वादक थे और लॉय संगीत संयोजक का काम किया करते थे। उन्ही विज्ञापनों के दिनों में इन तीनो की दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि साथ साथ काम करने का निश्चय कर लिया।

सजीव- बतौर संगीतकार शकर अहसान लॊय की पहली फ़िल्म थी मुकुल एस. आनंद की फ़िल्म 'दस', जिसमें सलमान ख़ान और संजय दत्त थे। "सुनो ग़ौर से दुनियावालों बुरी नज़र ना हम पे डालो" गीत बेहद मशहूर हुआ था। लेकिन मुकुल एस. आनंद की असमय निधन से फ़िल्म पूरी ना हो सकी लेकिन म्युज़िक रिलीज़ कर दिया गया। उसके बाद 'मिशन कश्मीर', 'दिल चाहता है', 'कल हो ना हो', 'लक्ष्य', 'अरमान', 'क्यों हो गया ना!', 'फिर मिलेंगे', 'रुद्राक्ष', 'एक और एक ग्यारह', 'कभी अल्विदा ना कहना', 'झूम बराबर झूम', 'बण्टी और बबली', 'रॉक ऑन' जैसी फ़िल्मों ने इस तिकड़ी को बेहद लोकप्रिय संगीतकारों की कतार में शामिल कर लिया।

सुजॉय - तो सजीव, शकर एहसान और लॉय को 'वेक अप सिद' के संगीत की कामयाबी के लिए हम शुभकामनाएँ देते हैं और अपने श्रोताओं को सुनवाते हैं फ़िल्म 'वेक अप सिद' का टाइटल ट्रैक ख़ुद शंकर महादेवन की ही आवाज़ में।

सजीव- ज़रूर...आवाज़ की टीम ने इस गीत को दिए हैं २.५ अंक ५ में से....अब श्रोता फैसला करें कि उनकी नज़र में इस गीत को कितने अंक मिलने चाहिए....गीत के बोल इस तरह हैं -

सुनो तो ज़रा हमको है ये कहना,
वक़्त है क्या तुमको पता है न,
सो गयी रात जागे दिन है अब जागना,
आँखें मसलता है सारा ये समां,
आवाजें भी लेती है अंगडायियाँ....
वेक अप सिद....सारे पल कहें,
वेक अप सिद....चल कहीं चलें...
वेक अप सिद....सब दिशाओं से आ रही है सदा
सुन सको अगर सुनों...
वेक अप....

ये जो कहें वो जो कहें सुन लो,
अब जो सही दिल लगे चुन लो,
करना है क्या तुम्हें ये तुम्हीं करो फैसला,
ये सोच लो तुमको जाना है कहाँ,
तुम ही मुसाफिर तुम्हीं ही तो हो कारवां....
वेक अप सिद....

आज ये देखो कल जैसा ही न हो,
आज भी यूं न तुम सोते न रहो,
इतने क्यों सुस्त हो कुछ कहो कुछ सुनो,
कुछ न कुछ करो,
रो पडो या हंसो,
जिंदगी में कोई न कोई रंग भरो....
वेक अप सिद....


और अब सुनिए ये गीत -



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 2.5 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं.आज के दौर का एक सफल संगीतकार/गायक जिसने शुरुआत एक धारावाहिक निर्माता के रूप में की थी. १९९८ में सलमान खान अभिनीत फिल्म में उन्होंने पहली बार संगीत निर्देशन किया था. पहचानिये इस फनकार को और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का सही जवाब एक बार दिया तनहा जी ने, बधाई जनाब...विनोद कुमार जी, शमिख फ़राज़ जी, मंजू गुप्ता जी, और रोहित जी आप सब ने अपनी राय रखी जिसके लिए आभार.


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Wednesday, September 2, 2009

ओ जानेवाले हो सके तो लौट के आना...हर दिल से आती है यही सदा मुकेश के लिए

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 190

'१० गीत जो थे मुकेश को प्रिय', इस लघु शृंखला में पिछले ९ दिनों से आप सुनते आ रहे हैं गायक मुकेश के गाये उन्ही के पसंद के गीतों को। आज हम आ पहुँचे हैं इस शृंखला की अंतिम कड़ी में। मुकेश के गए इतने साल बीत जाने पर भी उनकी यादें हम सब के दिल में बिलकुल ताज़ी हैं, उनके गीतों को हम हर रोज़ ही सुनते हैं। वो इस तरह से हमारी ज़िंदगियों में घुलमिल गए हैं कि ऐसा लगता है कि जैसे वो कहीं गए ही न हो! उनका शरीर भले ही इस दुनिया में न हो, लेकिन उनकी आत्मा हर वक़्त हमारे बीच मौजूद है अपने गीतों के माध्यम से। आज इस अंतिम कड़ी के लिए हम ने उनकी पसंद का एक ऐसा गीत चुना है जिसे सुनकर दिल उदास हो जाता है किसी जाने वाले की याद में। सचिन देव बर्मन के संगीत में शैलेन्द्र की गीत रचना फ़िल्म 'बंदिनी' से, "ओ जानेवाले हो सके तो लौट के आना, ये घाट तू ये बाट कहीं भूल न जाना"। इस फ़िल्म का आशा भोंसले का गाया एक गीत आप कुछ ही दिन पहले सुन चुके हैं जिसे शरद तैलंग जी के अनुरोध पर हमने आप को सुनवाया था। उस दिन भी हमने आप से कहा था, और आज भी दोहरा रहे हैं कि इस फ़िल्म का हर एक गीत अपने आप में मास्टरपीस है और यह कहना नामुमकिन है कि कौन सा गीत किससे बेहतर है। क्योंकि आज जाने वाले की बात हो रही है तो आइए गीत सुनने से पहले २७ अगस्त १९७६ की उस दुखद घटना का ब्योरा एक बार फिर से याद करते हैं जिसे नितिन मुकेश ने अमीन सायानी को तफ़सील से बताया था। मुकेश का इंतेक़ाल अमरीका में हुआ, भारी दिल और भीगी पलकें लिए उनके अपने, उनके साथी मुकेश के शव को लेकर हवाई जहाज़ में लौटे। शमशान घाट में अंतिम क्रिया समाप्त हुईं और फिर कुछ दिन बाद उनके बेटे नितिन को अमीन सायानी ने अपने पापा के बारे में बताने के लिए अपने स्टुडियो में बुलाया। अब आगे सुनिये नितिन मुकेश की ज़बानी।

"आप ने मुझे यह सवाल किया, इसका जवाब शायद मैं कभी नहीं दे सकता। मगर क्योंकि मैं जानता हूँ कि आप सब मेरे पापा को इतना प्यार करते हैं, इसलिए मैं कुछ ऐसी बातें कहना चाहता हूँ उन दिनों की जो उनकी ज़िंदगी के आ़ख़िरी दिन थे। २७ जुलाई की रात मैं और पापा रवाना हुए न्यु यार्क के लिए। न्यु यार्क से फिर हम कनाडा गये, वैन्कोवर। वहाँ हमें दीदी मिलने वाली थीं। दीदी हैं लता मंगेशकर जी, दुनिया की, हमारे देश की महान कलाकार, मगर हमारे लिए तो बहन, दीदी, बहुत प्यारी हैं। वो हमें वैन्कोवर में मिलीं। फिर शोज़ शुरु हुए, पहली अगस्त को पहला शो आरंभ हुआ। और उसके बाद १० शोज़ और होने थे। एक के बाद एक शो बहुत बढ़िया हुए, लोगों को बहुत पसंद आए। लोगों ने बहुत प्यार बरसाया, ऐसा लगा कि शोहरत के शिखर पर पहुँच गए हैं दोनों। दीदी तो बहुत महान कलाकार हैं, मगर उनके साथ जाके, उनके साथ एक मंच पर गा के पापा को भी बहुत इज़्ज़त मिली और बहुत शोहरत मिली। इसी तरह से ६ शोज़ बहुत अच्छी तरह हो गए। फिर सातवाँ शो था मोनट्रीयल में। वहाँ एक ऐसी घटना घटी, जिससे पापा बहुत ख़ुश हुए मगर मैं ज़रा घबरा गए। वहाँ उन दो महान कलाकारों के साथ मुझे भी गाने को कहा गया, और आप यकीन मानिए, मेरे में हिम्मत बिल्कुल नहीं थी मगर दीदी ने मुझे बहुत साहस दिया, बहुत हिम्मत दी, और इस वजह से मैं स्टेज पर आया। मेरा गाना सुन के, दीदी के साथ खड़ा हो के मैं गा रहा हूँ, यह देख के पापा बहुत ख़ुश हुए, बहुत ज़्यादा ख़ुश हुए, और मुझे बहुत प्यार किया, बहुत आशिर्वाद दिए।

फिर वह दिन आया, २७ अगस्त! उस दिन शाम को डेट्रायट में शो था। उस दिन मुझे इतना प्यार किया, इतना छेड़ा, इतना लाड़ किया कि जब मैं आज सोचता हूँ कि २६ साल की उम्र में शायद कभी इतना प्यार नहीं किया होगा। ४:३० बजे दोपहर को कहने लगे कि 'हारमोनियम मँगवायो बेटे, मैं ज़रा रियाज़ करूँगा', मैने हारमोनियम निकाल के उनके सामने रखा, वो रियाज़ करने लगे। मुझे ऐसा लग रहा था कि, आवाज़ बहुत ख़ूबसूरत लग रही थी, और बहुत ही मग्न हो गए थे अपने ही संगीत में। जब रियाज़ कर चुके तो मुझसे बोले कि 'एक प्याला चाय मँगवा, मैं आज एक दम फ़िट हूँ', और हँसने लगे। कहने लगे कि 'जल्दी जल्दी तैयार हो जाओ, कहीं देर न हो जाए शो के लिए'। कह कर वो स्नान करने चले गए। मुझे ज़रा भी शक़ नहीं था कि कुछ होने वाला है, इसलिए मैं ख़ुद रियाज़ करने बैठ गया। कुछ देर के बाद बाथरूम का दरवाज़ा खुला तो मैने देखा कि पापा वहाँ हाँफ़ रहे थे, उनका साँस फूल रहा था, मैं एक दम घबरा गया, और घबरा के होटल के ओपरेटर से कहा कि डाक्टर को जल्दी भेजो। फिर मैने दीदी (लता) को फ़ोन करने लगा तो बहुत प्यार से धुतकारने लगे, कहने लगे कि 'दीदी को परेशान मत करो, मैं इंजेक्शन ले लूँगा, ठीक हो जाउँगा, फिर शाम की शो में हम चलेंगे'। पर मैं उनकी नहीं सुनने वाला था, मैने दीदी को जल्दी बुला लिया, और ५/७ मिनट में दीदी भी आ गयीं, डाक्टर भी आ गए, और ऐम्बुलैन्स में ले जाने लगे। तब मैने उनके जीवन की जो सब से प्यारी चीज़ थी, उनके पास रखी, तुलसी रामायण। उसके बाद हम ऐम्बुलैन्स में बैठ के अस्पताल की ओर चले। अब वो मेरा हौसला बढ़ाने लगे, 'बेटा, मुझे कुछ नहीं होगा, मैं बिल्कुल ठीक हूँ, मैं बिल्कुल ठीक हो जाउँगा', ये सब कहते हुए अस्पताल पहुँचे। पहुँचने के बाद जब उन्हे पता चला कि उन्हे 'आइ.सी.यु' में ले जाया जा रहा है, जितना प्यार, जितनी जान बाक़ी थी, मेरी तरफ़ देख के मुस्कुराए, और बहुत प्यार से, अपना हाथ उठा के मुझे 'बाइ बाइ' किया। इसके बाद उन्हे अंदर ले गए, और इसके बाद मैं उन्हे कभी नहीं देख सका।
"

लता मंगेशकर, जो अपने मुकेश भ‍इया के उस अंतिम घड़ी में उनके साथ थीं, उनके गुज़र जाने के बाद अपने शोक संदेश में कहा था:

"मुकेश, जो आप सब के प्रिय गायक थे, उनमें बड़ी विनय थी। मुकेश के स्वर्गवास पे दुनिया के कोने कोने में संगीत के लाखों प्रेमियों के आँखों से आँसू बहे। मेरी आँखों ने उन्हे अमरीका में दम तोड़ते हुए देखा। आँसू भरी आँखों से मैने मुकेश भइया के पार्थिव शरीर को अमरीका से विदा होते देखा। मुकेश भ‍इया को श्रद्धांजली देने के लिए तीन शब्द हैं, जिनमें एक उनकी भावना कह सकते हैं कि जिसमें एक कलाकार दूसरे कलाकार की महान कला की प्रशंसा करते हैं। उनकी मधुर आवाज़ ने कितने लोगों का मनोरंजन किया, जिसकी गिनती करते करते न जाने कितने वर्ष बीत जाएँगे। जब जब पुरानी बातें याद आती हैं तो आँखें भर जाती हैं।"

"दे दे के ये आवाज़ कोई हर घड़ी बुलाए,
फिर जाए जो उस पार कभी लौट के न आए,
है भेद ये कैसा कोई कुछ तो बताना,
ओ जानेवाले हो सके तो लौट के आना।
"

मुकेश जी को 'हिंद-युग्म' की तरफ़ से विनम्र नमन!

दोस्तों, मुकेश जी को समर्पित १० गीतों की इस शृंखला के बारे में अपनी राय और अपने विचार हमें ज़रूर लिखिएगा, धन्यवाद!



गीत के बोल -

ओ जानेवाले हो सके तो लौट के आना
ये घाट तू ये बाट कहीं भूल न जाना

बचपन के तेरे मीत तेरे संग के सहारे
ढूँढेंगे तुझे गली\-गली सब ये ग़म के मारे
पूछेगी हर निगाह कल तेरा ठिकाना
ओ जानेवाले...

है तेरा वहाँ कौन सभी लोग हैं पराए
परदेस की गरदिश में कहीं तू भी खो ना जाए
काँटों भरी डगर है तू दामन बचाना
ओ जानेवाले...

दे दे के ये आवाज़ कोई हर घड़ी बुलाए
फिर जाए जो उस पार कभी लौट के न आए
है भेद ये कैसा कोई कुछ तो बताना
ओ जानेवाले...


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. आशा भोंसले के गाये दोगानों पर आधारित है अगली श्रृंखला '१० गायक और एक आपकी आशा' जिसका शुभारम्भ होगा कल से.
२. कल के गीत में आशा का साथ दिया है -"तलत महमूद" ने.
३. असद भोपाली के लिखे इस गीत में भी मुखड़े में आपके इस प्रिय जालस्थल का नाम है.

पिछली पहेली का परिणाम -
रोहित जी बधाई...आपने फिर कमाए २ अंक और आपका स्कोर हुआ १८. पराग जी ने सही कहा....इस गीत में जाने क्या बात है जब भी सुनो खुद-ब-खुद ऑंखें नम् हो जाती है....सभी श्रोताओं का एक बार फिर आभार.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, September 1, 2009

कोई जब तुम्हारा ह्रदय तोड़ दे....इन्दीवर साहब के शब्दों और मुकेश के स्वरों ने इस गीत अमर बना डाला

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 189

मुकेश के साथ राज कपूर और शंकर जयकिशन के नाम इस तरह से जुड़े हुए हैं कि ऐसा लगता है जैसे इन्ही के लिए मुकेश ने सब से ज़्यादा गानें गाये होंगे। लेकिन हक़ीक़त कुछ और ही है। मुकेश जी ने सब से ज़्यादा गानें संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी के लिए गाये हैं। ख़ास कर जब दर्द भरे मशहूर गीतों की बात चलती है तो कल्याणजी-आनंदजी के लिए गाए उनके गीतों की एक लम्बी सी फ़ेहरिस्त बन जाती है। आज एक ऐसा ही गीत आपको सुनवा रहे हैं जो मुकेश जी को बेहद पसंद था। मनोज कुमार की सुपर हिट देश भक्ति फ़िल्म 'पूरब और पश्चिम' का यह गीत है "कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे, तड़पता हुआ जब कोई छोड़ दे, तब तुम मेरे पास आना प्रिये, मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा तुम्हारे लिए"। इंदीवर जी ने इस गीत में प्यार करने का एक अलग ही तरीका इख्तियार किया है कि नायक का प्यार इतना गहरा है कि वह नायिका को जीवन के किसी भी मोड़ पर, किसी भी वक़त, किसी भी हालत में अपना लेगा, नायिका कभी भी उसके पास वापस लौट सकती है। "अभी तुमको मेरी ज़रूरत नहीं, बहुत चाहनेवाले मिल जाएँगे, अभी रूप का एक सागर हो तुम, कमल जितने चाहोगी खिल जाएँगे, दर्पण तुम्हे जब डराने लगे, जवानी भी दामन छुड़ाने लगे, तब तुम मेरे पास आना प्रिये, मेरा सर झुका है झुका ही रहेगा तुम्हारे लिए"। इससे बेहतरीन अभिव्यक्ति शायद ही कोई शब्दों में लिख सके। दोस्तों, इंदीवर जी का लिखा यह मेरा सब से पसंदीदा गीत रहा है। इस गीत के रिकार्डिंग से जुड़ा एक मज़ेदार क़िस्सा आनंदजी ने विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में बताया था। जब आनंदजी भाई से पूछा गया कि "मुकेश जी के साथ रिकार्डिंग कैसा रहता था? एक ही टेक में गाना रिकार्ड हो जाता था?", तो इसके जवाब में आनंदजी बोले, "मुकेश जी के केस में उल्टा था, बार बार वो रीटेक करवाते थे। किसी किसी दिन तो गाना बार बार सुनते सुनते लोग बोर हो जाते थे, म्युज़िशियन्स थक जाते थे। अब यह जो गाना है 'पूरब और पश्चिम' का, "कोई जब तुम्हारा...", यह हमने शुरु किया शाम ३ बजे, और रीटेक करते करते गाना जाके रिकार्ड हुआ अगले दिन सुबह ७ बजे। इस गाने में एक शब्द आता है "प्रिये", तो मुकेश जी को यह शब्द प्रोनाउंस करने में मुश्किल हो रही थी, वो 'परिये परिये' बोल रहे थे। एक समय तो वो गुस्से में आकर बोले कि 'यह क्या गाना बनाया है, यह मुझसे गाया नहीं जाएगा"। इस घटना को याद करते हुए आनंदजी की बार बार हँसी छूट रही थी उस कार्यक्रम में।

इस मज़ेदार किस्से के बाद आनंदजी ने मुकेश जी की तारीफ़ भी ख़ूब की थी, एक और अंश यहाँ प्रस्तुत है उस तारीफ़ की - "मुकेश जी इतने अच्छे थे, मैं एक क़िस्सा सुनाता हूँ आप को, एक बार बाहर जा रहे थे, दिल्ली जाना था उनको, और यहाँ पर शूटिंग आ गयी। तो गाना रिकार्ड करना था, हमने यह तय किया कि फ़िल्हाल किसी डबिंग आर्टिस्ट से गाना गवा लिया जाए, बाद में मुकेश जी की आवाज़ में कर देंगे। सुमन कल्याणपुर के साथ गाना था, तो हमने नया सिंगर मनहर उधास से गाना गवा लिया। बाद में सब कुछ मुकेश जी को बताया गया और गाना भी उन्हे सुनाया तो उन्होने कहा कि 'इसमें क्या बुरा है?' इसी को रख लो न, यह अच्छा है! इसमें बुरा क्या है! अभी तो नये आएँगे ही न? हम भी कभी नए थे कि नहीं!' इस तरह के, खुले दिल से, यह कहने के बाद भी उन्होने कभी किसी से नहीं कहा कि 'मैने गाना मनहर उधास को दे दिया, नहीं। वो गहरे आदमी थे, बड़े आदमी थे, इस तरह की सोच उनमें नहीं थी, इस तरह की बातें नहीं करते थे कभी।" दोस्तों, मनहर उधास के गाए जिस गीत का ज़िक्र अभी हमने किया वह फ़िल्म 'विश्वास' का था "आप से हमको बिछड़े हुए एक ज़माना बीत गया"। दोस्तों, अब वापस आते हैं मुकेश के गाए आज के गीत पर, सुनिए इंदीवर, कल्याणजी-आनंदजी और मुकेश की सदाबहार तिकड़ी के संगम से उत्पन्न यह 'एवरग्रीन सॊंग'।



गीत के बोल:

कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे
तड़पता हुआ जब कोई छोड़ दे
तब तुम मेरे पास आना प्रिये
मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा
तुम्हारे लिये, कोई जब ...

अभी तुमको मेरी ज़रूरत नहीं
बहुत चाहने वाले मिल जाएंगे
अभी रूप का एक सागर हो तुम
कंवल जितने चाहोगी खिल जाएंगे
दरपन तुम्हें जब डराने लगे
जवानी भी दामन छुड़ाने लगे
तब तुम मेरे पास आना प्रिये
मेरा सर झुका है झुका ही रहेग
तुम्हारे लिये, कोई जब ...

कोई शर्त होती नहीं प्यार में
मगर प्यार शर्तों पे तुमने किया
नज़र में सितारे जो चमके ज़रा
बुझाने लगीं आरती का दिया
जब अपनी नज़र में ही गिरने लगो
अंधेरों में अपने ही घिरने लगो
तब तुम मेरे पास आना प्रिये
ये दीपक जला है जला ही रहेग
तुम्हारे लिये, कोई जब ...

और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. जब भी मुकेश की याद आती है यही गीत सदा बन दिल से निकलता है.
२. आशा भोंसले की आवाज़ में इस फिल्म का और गीत अभी कुछ दिन पहले ही बजा था इस शृंखला में.
३. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"बचपन".

पिछली पहेली का परिणाम -
पूर्वी जी ने सही जवाब देकर कमाए २ और अंक और आपका स्कोर हुआ १८. दिलीप जी आपकी बात से हम भी बहुत हद तक सहमत हैं. पाबला जी आपका हुक्म सर आँखों पर....अन्य सभी श्रोताओं का भी आभार

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

फिर तमन्ना जवां न हो जाए..... महफ़िल में पहली बार "ताहिरा" और "हफ़ीज़" एक साथ

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #४१

ज से फिर हम प्रश्नों का सिलसिला शुरू करने जा रहे हैं। इसलिए कमर कस लीजिए और तैयार हो जाईये अनोखी प्रतियोगिता का हिस्सा बनने के लिए। पिछली प्रतियोगिता के परिणाम उम्मीद की तरह तो नहीं रहे(हमने बहुतों से प्रतिभागिता की उम्मीद की थी, लेकिन बस दो या कभी किसी अंक में तीन लोगों ने रूचि दिखाई) लेकिन हाँ सुखद ज़रूर रहे। हमने सोचा कि क्यों न उसी ढाँचे में इस बार भी प्रश्न पूछे जाएँ, मतलब कि हर अंक में दो प्रश्न। हमने इस बात पर भी विचार किया कि चूँकि "शरद" जी और "दिशा" जी हमारी पहली प्रतियोगिता में विजयी रहे हैं इसलिए इस बार इन्हें प्रतियोगिता से बाहर रखा जाए या नहीं। गहन विचार-विमर्श के बाद हमने यह निर्णय लिया कि प्रतियोगिता सभी के लिए खुली रहेगी यानि सभी समान अधिकार से इसमें हिस्सा ले सकते हैं, किसी पर कोई रोक-टोक नहीं। तो यह रही प्रतियोगिता की घोषणा और उसके आगे दो प्रश्न: आज से ५० वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। अगर आपने पिछली कड़ियों को सही से पढा होगा तो आपको जवाब ढूँढने में मुश्किल नहीं होगी, नहीं तो आपको थोड़ी मेहनत करनी होगी। और हाँ, हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद २ अंक और उसके बाद हर किसी को १ अंक मिलेंगे। इन १० कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की ५ गज़लों की फरमाईश कर सकता है, जिसे हम ५३वीं से ६०वीं कड़ी के बीच में पेश करेंगे। लेकिन अगर ऐसा हो जाए कि १० कड़ियों के बाद हमें एक से ज्यादा विजेता मिल रहे हों तो ५१वीं कड़ी ट्राई ब्रेकर का काम करेगी, मतलब कि उन विजेताओं में से जो भी पहले ५१वीं कड़ी के एकमात्र मेगा-प्रश्न का जवाब दे दे,वह हमारा फ़ाईनल विजेता होगा। एक बात और- जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) "वे अपने गुरु (बाल गंगाधर तिलक) से भी चार क़दम और आगे बढ़ गए और उस समय पूर्ण आज़ादी...." यह किसने और किसके लिए कहा था?
२) एक फ़नकारा जिन्हें अपनी गज़लों की पहली एलबम की रोयाल्टी के तौर पर सत्तर हज़ार का चेक दिया गया था और जो अपने चाहने वालों के बीच "नादिरा" नाम से मक़बूल हैं। उस फ़नकारा का वास्तविक नाम बताएँ और यह भी बताएँ कि वह एलबम कब रीलिज हुई थी।


सवालों की झड़ी लगाने के बाद अब वक्त है आज की महफ़िल को रंगीं करने का। आज की गज़ल कई लिहाज़ से खास है। पहला तो यह कि महफ़िल-ए-गज़ल की पिछली ४० कड़ियों में कभी भी ऐसा नहीं हुआ है कि हमें किसी गज़ल/नज़्म के रचनाकार का नाम तो मालूम हो लेकिन एक हीं नाम के दो-दो जनाब हाज़िर हो जाएँ। आज की गज़ल का हाल उन सारी गज़लों/नज़्मों से अलहदा है। हमने जब इस गज़ल के गज़लगो का नाम मालूम करना चाहा तो "हफ़ीज़" नाम हर जगह मौजूद पाया। दिक्कत तो तब आई जब एक जगह पर हफ़ीज़ होशियारपुरी का नाम दर्ज़ था तो दूसरी जगह पर हफ़ीज़ जालंधरी का(इन्हें अबु-उल-असर के नाम से भी जाना जाता है)। होशियारपुरी साहब का नाम था तो बस एक हीं जगह लेकिन वह श्रोत कुछ ज्यादा हीं विश्वसनीय है (अधिकांश शायरों की जानकारी हमें वहीं से हासिल हुई है), वहीं जालंधरी साहब का नाम एक से ज्यादा जगहों पर दर्ज़ था, उदाहरण के लिए, यहाँ। अब हमें यह समझ नहीं आया कि किसी मानें और किसे छोड़ें, इसलिए अंतत: हमने यह निर्णय लिया कि हम दोनों की बातें आपसे शेयर कर लेते हैं, फिर आपकी मर्ज़ी (या आपका शोध) कि आप किसे इस गज़ल का गज़लगो मानें। आज से पहले हमने एक कड़ी में होशियारपुरी साहब की "मोहब्बत करने वाले कम न होंगे" सुनवाया था जिसे अपनी आवाज़ से सजाया था इक़बाल बानो ने। वहीं जालंधरी साहब की भी एक नज़्म "अभी तो मैं जवान हूँ" हमारी महफ़िल की शोभा बन चुकी है। हमें पूरा विश्वास है कि आप अब तक उस नज़्म के असर से उबरे नहीं होंगे। उस नज़्म में आवाज़ थी आज की फ़नकारा की अम्मीजान मल्लिका पुखराज की। अब अगर आज की गज़ल की बात करें तो यह गज़ल मल्लिका पुखराज का भी संग पा चुकी है। असलियत में, मल्लिका की ऐसी कई सारी गज़लें हैं ("अभी तो मैं जवान हूँ" भी उस फ़ेहरिश्त में शामिल है) जिन्हें उनके बाद उनकी बेटी ने अपनी आवाज़ से सराबोर किया है। उसी फ़ेहरिश्त से चुनकर हम लाए हैं आज की गज़ल।

अभी तक तो आप जान हीं चुके होंगे कि हम किनकी बात कर रहे थे। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं पाकिस्तान के जानेमाने टी०वी० के शख्सियत और वकील जनाब नईम बोखारी की पत्नी और उस्ताद अख्तर हुसैन की शिष्या मोहतरमा ताहिरा सय्यद की। सय्यद अपने भाई-बहनों में सबसे छोटी हैं। भाई-बहनों में इनके अलावा इनके चार भाई और हैं। इनकी बहन तस्नीम का निकाह पाकिस्तान के सीनेटर एस० एम० ज़फ़र से हुआ है। १९९० में सय्यद अपने पति नईम बोखारी से अलग हो गईं, तब से वे अपने दो बच्चों(एक बेटा और एक बेटी, दोनों हीं वकील हैं) के साथ रह रहीं हैं। यह तो हुई ताहिरा सय्यद की निजी ज़िंदगी की बातें, अब कुछ उनकी गायकी पर भी रोशनी डालते हैं। १९६८-६९ में रेडियो पाकिस्तान पर अपनी आवाज़ बिखेरने के बाद इनकी प्रसिद्धि दिन पर दिन बढती हीं गई। १२ वर्ष की नाजुम उम्र से गायिकी शुरू करने वाली इन फ़नकारा को १९८५ में "नेशनल ज्योग्राफ़िक" के कवर पर भी स्थान दिया गया(ऐसा सम्मान पाने वाली वे सबसे कम उम्र की शख्सियत थीं), जो अपने आप में एक गर्व की बात है। इन्होंने बहुत सारी खुबसूरत गज़लों और नज़्मों को अपनी आवाज़ दी है। ऐसी हीं एक गज़ल है "परवीन शाकिर" की लिखी "बादबाँ खुलने से पहले का इशारा देखना"। समय आने पर हम यह गज़ल आपको ज़रूर सुनवायेंगे। उस समय "ताहिरा" की और भी बातें होंगी।

अब चूँकि हमें पक्का पता नहीं है कि कौन से हफ़ीज़ साहब आज की गज़ल के गज़लगो हैं। इसलिए अच्छा यही होगा कि हम दोनों महानुभावों का एक-एक शेर आपकी खिदमत में पेश कर दें। तो लीजिए पहले हाज़िर है हफ़ीज़ होशियारपुरी साहब का यह शेर:

तेरी मंजिल पे पहुँचना कोई आसान न था
सरहदे अक्ल से गुज़रे तो यहाँ तक पहुंचे।


इसके बाद बारी है हफ़ीज़ जालंधरी साहब के शेर की। तो मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

तुम हीं न सुन सके अगर, क़िस्सा-ए-ग़म सुनेगा कौन,
किसकी ज़ुबां खुलेगी फिर, हम ना अगर सुना सके।


इसी पशोपेश में कि आज की गज़ल के शायर कौन हैं, हम आज की गज़ल की ओर रुख करते हैं। वैसे एक-सा नाम होना कितना बुरा होता है, इसका पता इसी गज़ल से चल जाता है। मक़ते में "हफ़ीज़" तो है लेकिन तब भी कोई फ़ायदा नहीं। वैसे हम आपसे यह दरख्वास्त करेंगे कि इस गज़ल के शायर की खोज़ में(दो हीं विकल्प हैं, इसलिए ज़्यादा दिक्कत नहीं आनी चाहिए) हमारी मदद करें। उससे पहले आराम से सुन लें यह गज़ल :

बे-ज़बानी ज़बां न हो जाए,
राज़-ए-उल्फ़त अयां न हो जाए।

इस कदर प्यार से न देख मुझे,
फिर तमन्ना जवां न हो जाए।

लुत्फ़ आने लगा ज़फ़ाओं में,
वो कहीं मेहरबां न हो जाए।

ज़िक्र उनका जबान पर आया,
ये कहीं दास्तां न हो जाए।

खामोशी है जबान-ए-इश्क़ "हफ़ीज़"
हुस्न अगर बदगुमां न हो जाए।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

भूले हैं रफ्ता रफ्ता उन्हें मुद्दतों में हम,
___ में खुदखुशी का मज़ा हम से पूछिए ...


आपके विकल्प हैं -
a) सदमों, b) बरसों, c) किश्तों, d) सालों

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "फासले" और शेर कुछ यूं था -

फासले ऐसे भी होंगें ये कभी सोचा न था,
सामने भी था मेरे और वो मेरा न था..

सही जवाब के साथ हमारी महफ़िल में पहली बार नज़र आए "निखिल" जी। जनाब आपका इस महफ़िल में बेहद स्वागत है। आपने एक शेर भी पेश किया:

कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फासले से मिला करो..

इनके बाद बारी आई शामिख साहब की। हुज़ूर यह क्या, आप आएँ लेकिन इस बार आपका अंदाज़ कुछ अलग था। आपने तो हमें उस गज़ल की जानकारी हीं नहीं दी जिससे यह शेर लिया गया है। खैर कोई बात नहीं। आपने "फ़ासले" शब्द पर कुछ शेर हमारी महफ़िल में कहे, जिनमें एक शेर जनाब जैदी ज़फ़र रज़ा साहब का था। बानगी देखिए:

ये राह्बर हैं तो क्यों फासले से मिलते हैं
रुखों पे इनके नुमायाँ नकाब सा क्यों है

यह गिला है आपकी निगाहों से
फूल भी हो दरमियाँ तो यह फासले हुए.

पूजा जी, बहुत दिनों बाद आपका हमारी इस महफ़िल में आना हुआ। आपने कैफ़ी आज़मी साहब का लिखा एक शेर हमसे शेयर किया:

इक ज़रा हाथ बढाये तो पकड़ ले दामन,
उसके सीने में समा जाए हमारी धड़कन,
इतनी कुरबत है तो फिर फासला इतना क्यों है???

चाहे जो भी...लेकिन हमारी पिछली महफ़िल की शान रहीं सीमा जी। सीमा जी, आपने तो दिल खुश कर दिया। ये रहे आपके शेर:

तुम गुलसितां से आए ज़िक्र खिज़ां हिलाए,
हमने कफ़स में देखी फासले बहार बरसों

तकरार से फासले नहीं मिटते
जब भी शिकवे हुये हम हम ना रहे

लिख मैंने कैसे, तय किये ये फासले
है कैसे गुजरा, मेर ये सफर लिख दे

सीमा जी के बाद महफ़िल में नज़र आए पिछले महफ़िल के मेजबान(पिछली गज़ल उन्हीं की पसंद की थी ना!)। शरद जी ने एक स्वरचित शेर महफ़िल में पेश किया:

मेरे बच्चे जब अधिक पढ़ते गए
फासले तब और भी बढ़ते गए।

मंजु जी, हमारी यह कोशिश रहती है कि हम उन फ़नकारों से लोगों को अवगत कराएँ,जिन्हें लोग कम जानते हैं या फिर भूलते जा रहे हैं। इसीलिए शायरों से हमें कुछ ज्यादा हीं प्यार रहता है। वैसे आपका शेर हमें पसंद आया:

रात-दिन के फासलें की तरह है वो,
कभी अमावस्या है तो कभी पूर्णिमा की तरह है वो !

सुमित जी, आपने भी कमाल के शेर कहे। वैसे "अदीब" का मतलब होता है- "शायर"। यह रहा आपका शेर:

फाँसला इस कदर नसीब ना हो,
पास रहकर भी तू करीब ना हो।

शन्नो जी, देर आयद , दुरूस्त आयद। अरे आपके पास शेरों की किताब नहीं तो क्या हुआ, शायराना मिज़ाज़ तो है, हमारी महफ़िल के लिए वही काफ़ी है। आपने यह शेर पेश किया:

अच्छा लगा यह आपका अंदाज़ शायराना
फासले थे कुछ ऐसे न महफ़िल में हुआ आना.

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Monday, August 31, 2009

तू कहे अगर जीवन भर मैं गीत सुनाता जाऊं...उम्र भर तो गाया मुकेश ने पर अफ़सोस ये उम्र बेहद कम रही

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 188

ज एक बार फिर से हम वापस रुख़ करते हैं ४० के दशक की आख़िर की तरफ़। १९४९ का साल संगीतकार नौशाद के लिए बेहद फ़ायदेमंद साबित हुआ था। महबूब ख़ान का 'अंदाज़', ए. आर. कारदार की 'दिल्लगी' और 'दुलारी', तथा ताज महल पिक्चर्स की 'चांदनी रात', ये सभी फ़िल्में ख़ूब चली, और इनका संगीत भी ख़ूब हिट हुआ। हालाँकि इसके पिछले साल, यानी कि १९४८ में महबूब साहब की फ़िल्म 'अनोखी अदा' का संगीत हिट हुआ था, नौशाद साहब के संगीत ने कोई कसर नहीं छोड़ी आम जनता के होठों तक पहुँचने के लिए, लेकिन बद-क़िस्मती से बॉक्स ऑफिस पर फ़िल्म असफल रही थी। यही नहीं, १९४७ की महबूब साहब की फ़िल्में 'ऐलान' और 'एक्स्ट्रा गर्ल' भी पिट चुकी थी। इन सब के मद्देनज़र महबूब साहब ने आख़िरकार यह निर्णय लिया कि सिवाय नौशाद साहब के, बाक़ी पूरी टीम में कुछ फेर-बदल की जाए। गीतकार शक़ील बदायूनी के जगह मजरूह सुल्तानपुरी को चुना गया। मेरा ख़याल यह है कि ऐसा महबूब साहब ने इसलिए नहीं किया होगा कि मजरूह शक़ील से बेहतर लिख सकते थे, बल्कि इसलिए कि वो शायद कुछ नया प्रयोग करना चाह रहे होंगे, अपनी फ्लॉप फ़िल्मों की कतार से बाहर निकलने के लिए। अच्छा, तो गायकों में उमा देवी और सुरेन्द्र की जगह आ गये लता मंगेशकर और जी हाँ, मुकेश। और वह फ़िल्म थी 'अंदाज़'। नरगिस, दिलीप कुमार और राज कपूर अभिनीत इस फ़िल्म में सब कुछ नया नया सा था, और संगीत भी उस ज़माने की प्रचलित धारा से अलग हट के थी। नतीजा यह कि फ़िल्म सुपर डुपर हिट, और साथ ही इसका गीत संगीत भी। आज '१० गीत जो थे मुकेश को प्रिय' में सुनिए इसी फ़िल्म से उनका गाया "तू कहे अगर जीवन भर मैं गीत सुनाता जाऊँ, मनबीन बजाता जाऊँ"। यहाँ पर यह बताना ज़रूरी है कि 'अंदाज़' वह एकमात्र फ़िल्म है जिसमें शक़ील बदायूनी ने अपनी १८ साल के कैरीयर में नौशाद साहब के किसी फ़िल्म में गीत नहीं लिखा।

प्रस्तुत गीत अपने ज़माने का एक मशहूर गीत तो रहा ही है, साथ ही यह मुकेश के शरुआती कामयाब गीतों में से भी एक है। हालाँकि उस समय मुकेश की आवाज़ से सहगल साहब की आवाज़ का असर धीरे धीरे ख़तम हो रही थी और मुकेश अपनी अलग पहचान बनाते जा रहे थे, फिर भी इस गीत में कहीं कहीं सहगल साहब का रंग दिखाई पड़ता है। मसलन, जब वो एक अंतरे में गाते हैं "मैं राग हूँ तू वीना है", तो जिस तरह से वो "वीना है" गाते हैं, हमें सहगल साहब की याद आ ही जाती है। इसी फ़िल्म का मुकेश का गाया एक दूसरा बेहद मशहूर गीत है "झूम झूम के नाचो आज, गायो ख़ुशी के गीत"। मुकेश का गाया हुआ एक और गीत है "टूटे ना दिल टूटे ना साथ हमारा छूटे ना", जिसमें भी वही सहगल साहब और न्यु थियटर्स का ज़माना याद आ जाता है। उन दिनों सहगल साहब का प्रभाव फ़िल्म संगीत पर इस क़दर छाया हुआ था कि हर संगीतकार उनकी शैली पर गीत बनाने का ख़्वाब देखा करते थे। 'अंदाज़' में मुकेश का ही गाया हुआ एक और गीत भी है "क्यों फेरी नज़र देखो तो इधर" जिसे फ़िल्म में शामिल नहीं किया गया था। इस फ़िल्म में दिलीप कुमार और राज कपूर दोनों थे, और आगे चलकर मुकेश बने राज साहब की आवाज़। लेकिन मज़े की बात यह है कि इस फ़िल्म में नौशाद साहब ने मुकेश की आवाज़ का दिलीप साहब के लिए इस्तेमाल किया था, न कि राज कपूर के लिए। आगे चलकर नौशाद साहब ने ज़्यादातर गानें रफ़ी साहब से ही गवाये, लेकिन मुकेश से उन्होने जितने गानें उस दौर में गवाये, वे सभी आज गुज़रे ज़माने के अनमोल नग़में बन चुके हैं, और आज का प्रस्तुत गीत भी उन्ही में से एक अनमोल रतन है। सुनते हैं फ़िल्म 'अंदाज़' का यह गीत और सलाम करते हैं मजरूह, नौशाद और मुकेश के अंदाज़ को।



गीत के बोल (सौजन्य - बी एस पाबला)

तू कहे अगर, तू कहे अगर
तू कहे अगर जीवन भर
मैं गीत सुनाता जाऊं
मन बीन बजाता जाऊं
तू कहे अगर

मैं साज़ हूँ तू सरगम है \- 2
देती जा सहारे मुझको \- 2
मैं राग हूँ तू वीणा है \- 2
इस दम जो पुकारे तुझको
आवाज़ में तेरी हर दम
आवाज़ मिलाता जाऊं
आकाश पे छाता जाऊं
तू कहे अगर...

इन बोलों में, तू ही तू है
मैं समझूँ या तू जाने, हो जाने
इनमें है कहानी मेरी, इनमें है तेरे अफ़साने
इनमें है तेरे अफ़साने
तू साज़ उठा उल्फ़त का
मैं झूम के गाता जाऊं
सपनों को जगाता जाऊं
तू कहे अगर...


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इन्दीवर ने लिखा ये गीत जिसे मुकेश ने आवाज़ देकर अमर बना दिया.
२. इस फिल्म में देसी-विदेशी द्वंद में फंसे दिखे नायक नायिका.
३. दूसरे अंतरे की पहली पंक्ति में शब्द है -"शर्त".

पिछली पहेली का परिणाम -
पराग जी उठे देर से हैं पर जब जागते हैं सवेरा कर देते हैं. सही जवाब और २० अंक पूरे हुए आपके. दिलीप आप रोज़ गायें और आपकी ओब्सेर्वेशन के क्या कहने बहुत बढ़िया जानकारी आपने दी. पाबला जी बोलों के लिए एक बार फिर धन्येवाद... अन्य सभी श्रोताओं का भी आभार.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

फ़िक्र करे फुकरे....मिका ने दिया खुश रहने का नया मन्त्र

ताजा सुर ताल (18)

ताजा सुर ताल में आज सुनिए प्रीतम और जयदीप सहानी का रचा ताज़ा हिट गीत

सजीव - सुजॉय, कभी कभी मन करता है कि कुछ ऐसे मस्ती भरे गीत सुनें की सारे गम और फ़िक्र दूर हट जाएँ...क्या आपका भी मन होता है ऐसा कभी...

सुजॉय - पंजाबी धुन और बोलों से सजे ढेरों गीत है ऐसे हिंदी फिल्मों में जिसमें मस्ती जम कर भरी है...."नि तू रात खड़ी थी छत पे कि मैं समझा कि चाँद निकला", "ये देश है वीर जवानों का", "नि मैं यार मनाना नी चाहे लोग बोलियाँ बोले", और हाल के बरसों में तो जैसे हिट गीत बनाने का फ़ार्मूला जैसे बन गया है पंजाबी संगीत का आधार.

सजीव - बिल्कुल! 'जब वी मेट' के "मौजा ही मौजा" और "नगाड़ा नगाड़ा" के बाद तो जैसे पंजाबी लोक धुनों के साथ रीमिक्स फ़िल्म संगीत पर छा सा गया है।

सुजॉय - 'जब वी मेट' से याद आया सजीव कि इन दिनों शाहीद कपूर के नए फ़िल्म की प्रोमो ज़ोर शोर से हर चैनल पर चल रहा है।

सजीव - कहीं तुम्हारा इशारा 'दिल बोले हड़िप्पा' की तरफ़ तो नहीं?

सुजॉय - बिल्कुल! शाहीद और पंजाबी धुनों का तो जैसे चोली दामन का साथ रहा है। 'जब वी मेट' के अलावा बरसों पहले आयी फ़िल्म 'फ़िदा' में भी एक गीत था "अज वे माही लेट्स डू बल्ले बल्ले" जो काफ़ी चला था।

सजीव - सुजॉय, ऐसे थिरकते नग़में भले ही बहुत लम्बी रेस के घोड़े न हों, लेकिन जब फ़िल्म रिलीज़ होती है तो ऐसे गानें फ़िल्म को प्रोमोट करने में काफ़ी हद तक सहायक होते हैं। कुछ दिनों के लिए ही सही लेकिन ये गानें लोगों की ज़ुबान पर चढ़ते हैं और फ़िल्म को भी कामयाब बनाते हैं। और फ़िल्म निर्माण एक कला होने के साथ साथ व्यवसाय भी है, इसलिए इस पक्ष को भी नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता।

सुजॉय - ख़ैर! आज हम बात कर रहे हैं 'दिल बोले हड़िप्पा' की। पहली बार रानी मुखर्जी और शाहीद कपूर की जोड़ी बनी है, और इस फ़िल्म से लोगों को काफ़ी सारी उम्मीदें भी हैं।

सजीव - सुजॉय, क्या तुम्हे 'हड़िप्पा' शब्द का अर्थ पता है?

सुजॉय - अब तक तो पता नहीं था, लेकिन क्योंकि मैं चंडीगढ़ में रहता हूँ, इसलिए मेरे काफ़ी सारे पंजाबी दोस्त हैं, जिन्होने मुझे बताया कि 'हड़िप्पा' का क्या मतलब है। दरसल 'हड़िप्पा' भंगड़ा में इस्तेमाल होने वाला एक शब्द है, ठीक वैसे ही जैसे 'बल्ले बल्ले' का इस्तेमाल होता है। जिस तरह से 'बल्ले बल्ले' का अर्थ होता है 'hurray', उसी तरह से 'हड़िप्पा' का अर्थ होता है 'bravo'! 'चक दे' भी कुछ कुछ इसी तरह का शब्द है।

सजीव - वाह! ये तो तुमने बड़ी अच्छी जानकारी दी। वैसे मैने सुना है कि पहले इस फ़िल्म का नाम सिर्फ़ 'हड़िप्पा' सोचा गया था। लेकिन बाद में फ़िल्म के निर्माता आदित्य चोपड़ा को पता चला कि 'हड़िप्पा' शीर्षक संजय लीला भंसाली ने पहले से ही अपने नाम दर्ज कर चुके हैं। इसलिए इसे बदल कर 'दिल बोले हड़िप्पा' कर दिया गया।

सुजॉय - यह तो बड़ी नई बात पता चली। इसका मतलब यह कि भंसाली जी की भी फ़िल्म आने वाली है 'हड़िप्पा'। अच्छा सजीव, इससे पहले कि हम आज के गीत जो कि है इस फ़िल्म का शीर्षक गीत, सुनवाएँ, क्या आप को कोई ऐसा हिंदी फ़िल्मी गीत याद आ रहा है जिसमें 'हड़िप्पा' शब्द का इस्तेमाल हुआ था?

सजीव - बिल्कुल सुजॉय, मुझे कम से कम एक गीत तो ज़रूर याद है। लता जी और किशोर दा ने ज़ीनत अमान और देव आनंद की फ़िल्म 'वारैंट' में एक गीत गाया था "लड़ी नजरिया लड़ी, चली रे फुलझड़ी, पड़ी शुभ घड़ी, ये घड़ी खड़ी है हाथों में लिए प्रेम हथकड़ी, हड़िप्पा लड़ी हड़िप्पा लड़ी"।

सुजॉय - बिल्कुल, मैं भी इसी गीत की ओर इशारा कर रहा था। अब आइए बात करते हैं 'दिल बोले हड़िप्पा' के टाइटल गीत की। मिका सिंह, सुनिधि चौहान और साथियों का गाया यह गीत है। जयदीप साहनी ने लिखा है। सजीव, जयदीप साहनी आज के दौर के एक ऐसे फ़िल्म लेखक और गीतकार हैं जो इस पीढ़ी के चंद अग्रणी लेखकों में से एक हैं।

सजीव - हाँ, प्रसून जोशी के बाद तो मुझे जयदीप ही ऐसे हैं जो कहानी, संवाद, स्क्रीनप्ले और साथ ही गीतकारिता भी बाख़ूबी निभा रहे हैं। क्या तुम जयदीप के करीयर की महत्वपूर्ण फ़िल्मों के बारे में कुछ बता सकते हो?

सुजॉय -सन् २००० में 'जंगल', २००२ में 'कंपनी' जैसी फ़िल्में लिख कर जयदीप का काफ़ी नाम हो गया था। लेकिन सब से ज़्यादा ख्याति उन्हे जिन तीन फ़िल्मों से मिली, वो फ़िल्में हैं सन् २००५ की 'बण्टी और बबली' (स्क्रीनप्ले व संवाद), २००६ का 'खोंसला का घोंसला' (कहानी, स्क्रीनप्ले व संवाद), २००७ की सुपरहिट फ़िल्म 'चक दे इंडिया' (कहानी, गीतकार)। इन सब के अलावा 'आजा नचले', 'ब्लफ़ मास्टर', 'जॉनी ग़द्दार' और 'रब ने बना दी जोड़ी' में उनके लिखे गानें ख़ूब पसंद किए गए। और अब 'दिल बोले हड़िप्पा'।

सजीव - इस गीत के बोल हैं "भूल फ़िकरा, है जिगरा, तो संग मेरे बोल हड़िप्पा"।

सुजॉय - यानी कि अगर जिगरवाले हो तो सब फ़िक्र छोड़ कर मेरे साथ साथ बोल 'हड़िप्पा'। मैनें इस फ़िल्म की कहानी पढ़ी है, लेकिन मैं यहाँ नहीं बताउँगा क्योंकि जो लोग थियटर में जा कर इस फ़िल्म को देखने की सोच रहे हैं वो शायद मुझ से नाराज़ हो जाएँ, और होना भी चाहिए।

सजीव - इस फ़िल्म के संगीतकार हैं प्रीतम, जो कि इस तरह के पंजाबी धुनों के लिए जाने जाते हैं। जब भी कोई फ़िल्म निर्माता उन्हे अपनी फ़िल्म के साइन करवाते हैं तो उनसे इस तरह का एक गीत ज़रूर बनवा लेते हैं। पता है प्रीतम जब विविध भारती पर इन्टरव्यू देने के लिए आए थे तो उन्होने उसमें कहा था कि जब 'जब वी मेट' के बाद वो पंजाब गए तो वहाँ बैनर पर उनका नाम लिखा गया था 'प्रीतम सिंह'। लोग अक्सर भूल जाते हैं कि इस तरह का चुस्त पंजाबी धुनें बनाने वाले संगीतकार प्रीतम सिंह नहीं बल्कि बंगाली बाबूमोशाय प्रीतम चक्रबर्ती हैं।

सुजॉय - तो चलिए, अब देर किस बात की, सुनते हैं 'दिल बोले हड़िप्पा', जो आज कल लोगों के होठों की शान बना हुआ है।

सजीव - बोलों में बहुत ही गूढ़ पंजाबी भाषा का इस्तेमाल हुआ है. मुझे और सुजॉय दोनों को पंजाबी तो नहीं आती है, इसलिए यदि प्रस्तुत बोलों में कोई गलती रह गयी हो तो हमें बताएं -

दुनिया फिरंगी स्यापा है,
फ़िक्र ही गम का पापा है,
अपना तो बस ये जापा है
फ़िक्र करे फुकरे,
चुन्गम है चब्बी जा,
हैण्ड पम्प है डब्बी जा,
लाइफ का जूस कड्डी जा,
फ़िक्र करे फुकरे,
खुश रहने का नहीं लगता कोई टैक्स ओये रब्बा,
ओये भूल फिकरा है जिगरा, तो संग मेरे बोल हडिप्पा,
ओये भूल फिकरा है जिगरा, तो संग मेरे बोल हडिप्पा...

कोठी न माल हडिप्पा,
न गोरे गाल हडिप्पा,
नहीं जाने तेरे नाल, चाहे जितना संभाल,
छड़ मिटटी डाल हडिप्पा,
खुशियाँ तू घर कर ले,
हाथ दोनों विच भर ले,
अरे खब्बा हो या सज्जा, (कोई इसके माने बताएं हमें :)

नज़रों से बोल हडिप्पा,
कोई जो कोल हडिप्पा,
न करी ज्यादा गोल मोल,
तेरी खुल जानी पोल,
ये दिल का ढोल हडिप्पा,
डर्बी हो या ढाका,
रब तेरा हो राखा,
पड़ने दे तू टिप्पा (कोई इस लाइन के माने भी बताएं )

ओये भूल फिकरा...

और अब सुनिए ये गीत -



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 3 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं.किस नयी फिल्म में जावेद अख्तर और शंकर एहसान लॉय की जोड़ी लौटी है, कौन सी है वो जल्द आने वाली फिल्म? बताईये और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का सही जवाब दिया विश्व दीपक तनहा जी, बधाई. आप सब श्रोताओं का रेटिंग देने के लिए बहुत बहुत आभार.


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Sunday, August 30, 2009

सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं....कौन न खो जाए मुकेश की इस मस्ती भरी आवाज़ में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 187

दिलीप कुमार के लिए पार्श्वगायन की अगर बात करें तो सब से पहले उनके लिए गाया था अरुण कुमार ने उनकी पहली फ़िल्म 'ज्वार भाटा' में। उसके बाद कुछ वर्षों के लिए तलत महमूद बने थे दिलीप साहब की आवाज़। बाद में रफ़ी साहब की आवाज़ ही ज़्यादा सुनाई दी थी दिलीप साहब के होठों से। लेकिन ५० के दशक में कुछ ऐसे गीत बनें हैं जिनमें दिलीप कुमार का प्लेबैक दिया था मुकेश ने, और ख़ास बात यह कि मुकेश की आवाज़ भी उन पर बहुत जचीं और ये तमाम गानें ख़ूब चले भी, फ़िल्म 'यहूदी' का 'ये मेरा दीवानापन है" कह लीजिए या फिर फ़िल्म 'अंदाज़' का "झूम झूम के नाचो आज, गाओ ख़ुशी के गीत", या फिर 'मधुमती' का "सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं" और "दिल तड़प तड़प के कह रहा है आ भी जा"। लेकिन कहा जाता है कि दिलीप साहब नहीं चाहते थे कि मुकेश उनके लिए गाए क्योंकि उनका ख़याल था कि मुकेश की आवाज़ उन पर फ़िट नहीं बैठती। यह बात है १९४८ की जब 'अंदाज़' बन रही थी। फ़िल्म के संगीतकार नौशाद साहब ने उन्हे समझाया कि ऐसे गीतों के लिए मुकेश की आवाज़ ही सब से ज़्यादा सही है, दिलीप साहब मान गए और गीत के सफल होने के बाद मुकेश जी को भी मान गए। आज हम दिलीप साहब और मुकेश जी की जोड़ी को सलाम करते हुए जिस गीत को आप तक पहुँचा रहे हैं वह है फ़िल्म 'मधुमती' का "सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं"। शैलेन्द्र के बोल और सलिल चौधरी का संगीत। यह अपने ज़माने का एक ब्लौकबस्टर फ़िल्म है। कहानी, अभिनय, संगीत, सब चीज़ों में एक नयापन लेकर आये थे बिमल राय। इस फ़िल्म का हर एक गीत हिट हुआ, और यह बताना मुश्किल है कि कौन सा गीत ज़्यादा बेहतर है।

बिमल राय ५० के दशक में गम्भीर सामाजिक मुद्दों पर फ़िल्में बनाने के लिए जाने जाते थे। उनकी हर एक फ़िल्म समाज को, लोगों को कुछ न कुछ शिक्षा ज़रूर दिया करती थी। लेकिन १९५८ की फ़िल्म 'मधुमती' बिल्कुल अलग हट के थी। यह कहानी थी पुनर्जन्म और भटकती हुई आत्मा की। शुरु शुरु में इस तरह की फ़िल्म बनाने के उनके निर्णय से उन्हे समालोचकों के बहुत से तानें सुनने पड़े थे। लेकिन बिमल दा पीछे नहीं हटे और ऋत्विक घटक की इस कहानी पर राजेन्द्र सिंह बेदी से संवाद लिखवा कर और सलिल चौधरी से दिलकश संगीत तैयार करवा कर यह सिद्ध किया कि इस तरह की फ़िल्में बनाने में भी वो दक्षता रखते हैं। इस फ़िल्म के गीत "आजा रे परदेसी" के लिए लता मंगेशकर को अपना पहला फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार मिला था, और उससे भी ज़रूरी बात यह कि यह पुरस्कार किसी गायक को उसी साल पहली बार दिया जा रहा था। दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला अभिनीत इस फ़िल्म की कहानी रोमहर्षक थी, ख़ास कर क्लाइमैक्स का दृश्य तो यादगार है। इसी क्लाइमैक्स को हाल ही में फ़रहा ख़ान ने अपने फ़िल्म 'ओम शांति ओम' में इस्तेमाल किया था। फ़िल्म 'मधुमती' का एक मज़बूत पक्ष रहा है उसका गीत संगीत। कुछ तो है बात इन पहाड़ी लोक धुनों पर बने गीतों में कि आज ५० सालों के बाद भी इस फ़िल्म के गानों को सुनकर ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि इतने पुराने ज़माने के हैं ये गानें। ऐसे गीत पुराने नहीं होते, काल का इन पर कोई असर नहीं चलता, ये तो कालजयी रचनाएँ हैं जिनकी मिठास समय के साथ साथ बढ़ती चली जाती है। सलिल दा के संगीत सफ़र का 'मधुमती' एक बेहद उल्लेखनीय पड़ाव था। और आज के लिए सब से ख़ास बात कि इस फ़िल्म का प्रस्तुत गीत गायक मुकेश के पसंदीदा गीतों में शामिल है। तो लीजिए, हसीन मौसम और सुहाने सफ़र में आप भी खो जाइए, कुछ देर के लिए ही सही!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. संगीतकार नौशाद के लिए गाया यहाँ मुकेश ने.
२. इस नाम की और और फिल्म बनी थी जिसमें शम्मी कपूर और हेमा मालिनी प्रमुख भूमिका में थे.
३. एक अंतरे में इन दो शब्दों का इस्तेमाल है -"साज़" और "वीणा".

पिछली पहेली का परिणाम -
पराग जी बधाई...आप एक बार फिर सब से आगे निकल आये. लगता है आप इंतज़ार करते हैं इस बात का कि कब बाकी लोग आपके बराबर आयें और फिर आप सबको छकाते हुए आगे निकलें. मंजू जी शरद जी की बात पर गौर कीजिये, कहाँ ध्यान है आपका, दिशा जी आप लेट हो गयी....क्या करें....दिलीप जी आपकी और हमारी तरंगें खूब मिलती है, पाबला जी लगता है आपकी नाराजगी दूर नहीं हुई, आपने गीत के बोल प्रस्तुत नहीं किये इस बार :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

पॉडकास्ट कवि सम्मलेन - अगस्त 2009

इंटरनेटीय कवियों की इंटरनेटीय गोष्ठी

Rashmi Prabha
रश्मि प्रभा
Khushboo
खुश्बू
यदि आप पुराने लोगों से बात करें तो वे बतायेंगे कि भारत में एक समय कॉफी हाउसों की चहल-पहल का होता था। कविता-रसज्ञों के घरों पर हो रही कहानियों-कविताओं, गाने-बजाने, बहसों की लघु गोष्ठियों का होता था। जैसे-जैसे तकनीक ने हर किसी को उपभोक्ता बना दिया, हम ग्लोबल गाँव के ऐसे वाशिंदे हो गये जो मोबाइल से अमेरिका के अपने परिचित से तो जुड़ गया, लेकिन अपने इर्द-गिर्द से दूर हो गया।

लेकिन वे ही बुजुर्ग एक और बात भी कहते हैं कि हर चीज़ के दो इस्तेमाल होते हैं। चाकू से गर्दन काटिए या सब्जी काटिए, आपके ऊपर है। हमने भी इस तकनीक का सदुपयोग करने के ही संकल्प के साथ पॉडकास्ट कवि सम्मेलन की नींव रखी थी, ताकि वक़्त की मार झेल रहे कवियों को एक सांझा मंच मिले। जब श्रोता ऑनलाइन हो गया तो कवि क्यों नहीं। इस संकल्पना को मूर्त रूप देने में डॉ॰ मृदुल कीर्ति ने हमारा बहुत सहयोग दिया। हर अंक में नये विचारों ने नये दरवाजे खोले और इस आयोजन की सुगंध चहुँओर फैलने लगी।

रश्मि प्रभा के संचालन सम्हालने के बाद हर अंक में नये प्रयोग होने लगे और नये-नये कवियों का इससे जुड़ना हुआ। खुश्बू से मल्टीमीडिया के माध्यम से इसे जन-सामान्य तक पहुँचाने में हमें मदद मिली। हमें लगता है कि हमारे कहने से अधिक आने वाले समय में यह आयोजन अपनी उपयोगिता खुद सिद्ध करेगा। फिलहाल आप सुनें अगस्त माह का पॉडकास्ट कवि सम्मेलन।



प्रतिभागी कवि- सरस्वती प्रसाद, रश्मि स्वरुप, हेमंत कुमार, कवि कुलवंत, पूनम श्रीवास्तव, रेणु सिन्हा, शन्नो अग्रवाल, मंजुश्री, शरद तैलंग, नीलम प्रभा, शिखा वार्ष्णेय, ओम आर्य, विवेक रंजन श्रीवास्तव, प्रो.सी.बी श्रीवास्तव, प्रीती मेहता, किरण सिन्धु, दीपाली आब, चिराग जैन।

नोट - अगले माह यानी सितम्बर पॉडकास्ट कवि सम्मलेन के लिए सभी प्रतिभागी कवियों के लिए हमने एक थीम निर्धारित किया है. दुर्गा पूजा करीब है और आपने अपनी कलम की धार से "शक्ति" को जगाना है जी हाँ आपका थीम है - "शक्ति". हमारी कोशिश रहेगी कि आपकी कविताओं पर एक वीडियो का भी निर्माण करें. तो फिर देर किस बात की अपनी कलम की "शक्ति" को अपनी बुलंद आवाज़ के माध्यम से हम तक पहुँचायें आज ही.

संचालन- रश्मि प्रभा

तकनीक- खुश्बू


यदि आप इसे सुविधानुसार सुनना चाहते हैं तो कृपया नीचे के लिंकों से डाउनलोड करें-
ऑडियोWMAMP3




आप भी इस कवि सम्मेलन का हिस्सा बनें

1॰ अपनी साफ आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके भेजें।
2॰ जिस कविता की रिकॉर्डिंग आप भेज रहे हैं, उसे लिखित रूप में भी भेजें।
3॰ अधिकतम 10 वाक्यों का अपना परिचय भेजें, जिसमें पेशा, स्थान, अभिरूचियाँ ज़रूर अंकित करें।
4॰ अपना फोन नं॰ भी भेजें ताकि आवश्यकता पड़ने पर हम तुरंत संपर्क कर सकें।
5॰ कवितायें भेजते समय कृपया ध्यान रखें कि वे 128 kbps स्टीरेओ mp3 फॉर्मेट में हों और पृष्ठभूमि में कोई संगीत न हो।
6॰ उपर्युक्त सामग्री भेजने के लिए ईमेल पता- podcast.hindyugm@gmail.com
7. सितम्बर 2009 अंक के लिए कविता की रिकॉर्डिंग भेजने की आखिरी तिथि- 18 सितम्बर 2009
8. सितम्बर 2009 अंक का पॉडकास्ट सम्मेलन रविवार, 27 सितम्बर 2009 को प्रसारित होगा।


रिकॉर्डिंग करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। हमारे ऑनलाइन ट्यूटोरियल की मदद से आप सहज ही रिकॉर्डिंग कर सकेंगे। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

# Podcast Kavi Sammelan. Part 14. Month: August 2009.
कॉपीराइट सूचना: हिंद-युग्म और उसके सभी सह-संस्थानों पर प्रकाशित और प्रसारित रचनाओं, सामग्रियों पर रचनाकार और हिन्द-युग्म का सर्वाधिकार सुरक्षित है।

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